29.10.09

माँ

रोज की तरह
छत की मुंडेर पर
धोती फैलाकर
किसी कोने में खुद को निचोड़ती
बच्चों की चिंता में
दिनभर
सूखती रहती है माँ।


हवा के झोंके से गिरकर
घर की बाहरी दीवार पर गड़े

खूँटे से अटकी धोती सी लहराती
बच्चों के प्यार में
दिनभर
झूलती रहती है माँ।


शाम ढले
आसमान से उतरकर धोती में लिपटते
अंधेरों को झाड़ती
तारों की पोटली बनाकर
सीढ़ियाँ उतरती
देर तक
हाँफती रहती है माँ।

चुनती है जितना
उतना ही रोती
गमों के सागर में
यादों के मोती
जाने क्या बोलती
न जागी न सोती
रातभर
भींगती रहती है माँ।
--------------------देवेन्द्र कुमार पाण्डेय।

21.10.09

पिता

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल खिलते हैं
सूरज निकलता है
बच्चे जगते हैं
बच्चों के खेल खिलौने होते हैं
मुठ्ठी में दिन
आँखों में
कई सपने होते हैं
पिता जब साथ होते हैं


पिता जब नहीं होते
चिड़ियाँ चीखतीं हैं
फूल चिढ़ाते हैं
खेल खिलौने कुछ नहीं रहते
सपने
धूप में झुलस जाते हैं
बच्चे
मुँह अंधेरे
काम पर निकल जाते हैं
सूरज पीठ-पीठ ढोते
शाम ढले
थककर सो जाते हैं।


पिता जब होते हैं
तितलियाँ
उँगलियों में ठिठक जाती हैं
मेढक
हाथों में ठहर जाते हैं 

मछलियाँ पैरों तले गुदगुदाती हैं
भौंरे कानों में सरगोशी से
गुनगुनाते हैं
इस उम्र के
अनोखे जोश होते हैं
हाथ डैने

पैर खरगोश होते हैं
पिता जब साथ होते हैं।

पिता जब नहीं रहते
जीवन के सब रंग
तेजी से बदल जाते हैं
तितलियाँ, मेढक, मछलियाँ, भौंरे
सभी होते हैं
इस मोड़ पर
बचपने

कहीं खो जाते हैं।
जिंदगी हाथ से

रेत की तरह फिसल जाती है
पिता जब नहीं रहते
उनकी बहुत याद आती है।


पिता के होने और न होने में
एक फर्क यह भी होता है कि
पिता जब साथ होते हैं
समझ् में नहीं आते
जब नहीं होते
महान होते हैं।
--देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

11.10.09

वज़न


बचपन में 'कागज की नाव'
लड़कपन में 'तास के महल'
ज़वानी में 'बालू के घर'
हमने भी बनाए हैं
इनके डूबने, गिरने, या ढह जाने का दर्द
हमें भी हुआ है
राह चलते ठोकरें हमने भी खाई हैं
मगर नहीं आया
कभी कोई 'शक्तिमान'
मेरी पीठ थपथपाने
लोगों ने उड़ाया है मेरा भी मजाक
मगर नहीं आया कभी
किसी दूसरे ग्रह का प्राणी
करने मुझ पर 'जादू'
मेरे घर में भी बहुत सी मकड़ियाँ हैं
मगर नहीं काटा मुझे
कभी किसी मकड़ी ने
नहीं बनाया मुझे
'स्पाइडर मैन'

और अब मैं जान गया हूँजीवन
दूसरों की शक्तियों के सहारे नहीं चलता।


हम
जितने हल्के होते जाएंगे
उतने बिखरते चले जाएंगे

धरती पर टिक रहने के लिए जरूरी है
वज़नी होना
और मैं
यह भी जान गया हूँ
कि मनुष्य का वज़नी होना
'गुरूत्वाकर्षण' के सिध्दांत पर नहीं
बल्कि चरित्र के उस
'गुरू-आकर्षण' के सिध्दांत पर निर्भर करता है
जिसके बल पर
'इंद्र' का आसन भी
पत्ते की तरह कांपने लगता है।

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9.10.09

आभार

अभी तक तो अंतर्जाल में मात्र हिंद युग्म के लिए ही लिखता था। 'देखा देखी पाप, देखा देखी पुण्य' मैंने भी एक ब्लॉग बना लिया। पाठकों की प्रतिक्रियाओं से उत्साहित हूँ । मेरा प्रयास होगा कि प्रतिसप्ताह कम से कम एक रचना अवश्य पोस्ट करुँ। आशा है आप सभी का सहयोग मिलता रहेगा।

सादर
देवेन्द्र पाण्डेय ।

मेरी बातों से बोझिल हुए मन को पुनः तरोताजा करने के लिए प्रस्तुत हैं दो दोहे :-

कर्जा इतना लीजिये, सब कर्जा चुक जाय
दर्जा झूठे शख्स का, कभी न मिलने पाय।

चमड़ी से चाँदी झरे, दमड़ी एक न जाय
मीठी वाणी बोलिए, देनदार फँस जाय।



6.10.09

देवता

नारदः
नारायण ! नारायण !

विष्णुः
कहिए मुनिवर क्या समाचार है ?

नारदः
आप तो अंतर्यामी हैं प्रभो !

विष्णुः
हस्तिनापुर का क्या हाल है ?


नारदः
कैसी हस्तिनापुर प्रभु ?
पृथ्वी में कोई हस्तिनापुर नहीं है।
लगता है आप नींद में थे।
विष्णुः
हाँ, जरा आँख लग गई थी। क्या प्रहर हुआ ?

नारदः
सदियाँ गुजर गईं।
भरतवंशियों के देश भारत वर्ष में मुगलों का साम्राज्य है।
आप पूछ रहे हैं क्या प्रहर हुआ !
अनर्थ हो चुका है प्रभु।

विष्णुः
शांत मुनिवर ! शांत ! मैं जरा ध्यान लगाता हूँ।

नारदः
नारायण ! नारायण !
बहुत लम्बा ध्यान लगा लिया आपने।
अब जागिए प्रभु !
क्या देखा आपने ?

विष्णुः
शांत मुनिवर।
बड़ा ही रोमांचक दृश्य था।
आपने नाहक मेरा ध्यान भंग कर दिया।
भारतवर्ष में मुगलों का नहीं अब अंग्रेजों का साम्राज्य है।
गाँधी मेरी प्रेरणा से अंग्रेजों से संघर्ष कर रहे हैं।

नारदः
आपकी प्रेरणा से !
आपने प्रेरणा कब दी प्रभु ?
आप तो ध्यान मग्न थे !

विष्णुः
मुनिवर,
मैनें जो उपदेश महाभारत के समय अर्जुन को दिए थे,
उसे भरतवंशियों ने मंत्र बना लिया है। जिसे वे गीता कहते हैं ।
उसी से प्रेरित होकर गाँधी संघर्ष कर रहे हैं।
कितने समझदार हैं मनुष्य !
जानते हैं कि मैं बार-बार अवतार नहीं लुंगा।

नारदः

किन्तु प्रभु..........

विष्णुः
शांत मुनिवर !
मुझे ध्यान लगाने दीजिए।
बड़ा ही रोमांचक दृश्य है।

नारदः
नारायण ! नारायण !
जागिए प्रभु !
मैं स्वयम् धरती का भ्रमण कर आया हूँ ।
सर्वत्र हाहाकार मचा है।
लोग एक-दूसरे के रक्त के प्यासे हो चुके हैं ।
जागिए प्रभु।

विष्णुः
शांत मुनिवर, शांत !
आप बार-बार मेरा ध्यान भंग क्यों कर देते हैं ?
कितना रोमांचक दृश्य था !
मनुष्य अद्भुत हथियारों से लड़ रहे हैं !
ऐसे हथियारों की तो मैने कल्पना भी नहीं की थी।
मेरा सुदर्शन जब तक एक एक सर काटेगा
तब तक लाखों मनुष्य क्षण भर में कालकवलित हो चुके होंगे।
आहा ! कैसा अद्भुत प्राणी है मनुष्य !


नारदः
नारायण ! नारायण !
यह आपको क्या हो गया है प्रभु ?
आप तो मनुष्यों का गुणगान कर रहे हैं !
नैतिकता का सर्वत्र पतन हो चुका है।
लोग भांति-भांति की व्याधियों से ग्रस्त हैं।
सर्वत्र दुर्योधन की सत्ता है ।
पाण्डवों का नामोंनिशान मिट चुका है
और आप कह रहे हैं
कैसा अद्भुत प्राणी है मनुष्य !

विष्णुः
कैसी नैतिकता मुनिवर ?
यह तो मतों पर निर्भर करता है।
यह तो एक विचार है।
जिस विचार को मानने वाले अधिसंख्य होंगे
वही विचार सर्वोत्तम कहलाएगा।
यही युग धर्म है।
एक समय धरती पर सत्य के मानने वालों का बहुमत था।
मैंने अवसर देख कर अवतार लिया और उनका देवता बन बैठा।
आज तो असत्य को मानने वालों का बहुमत है।
मेरे सत्य के उपदेश व्यर्थ हैं।
मेरे विचार अब रूढ़ीवादी मूर्खों की श्रेणी में गिने जाएंगे।
नारदः
नारायण ! नारायण !
आप पुन्हः अवतार लीजिए प्रभु।
पृथ्वी की रक्षा कीजिए प्रभु।

विष्णुः
शांत मुनिवर ! शांत !
मेरे अवतार लेने पर तुम्हें और भी कष्ट होगा।
लेकिन तुम्हारा विचार उच्चकोटि का है।
यही अवसर है।
मुझे अवश्य अवतार लेना चाहिए।
किन्तु अब मैं
पाण्डवों की ओर से युध्य नहीं करूँगा।
मैं मूर्ख नहीं हूँ।
अब तो मैं
कौरवों की ओर से युध्य कर
नैतिकता वादी मनुष्यों का सफाया करूँगा।
ताकि पृथ्वी पर मेरी जय जयकार होती रहे।
यह तो बहुमत का गणित है
और मुझे
देवता के पद पर बने रहना रहना है।

नारदः
नारायण ! नारायण !
आपने तो मेरी आँखें खोल दीं प्रभु।
चिर निंद्रा में तो मैं ही सो रहा था।
आपकी जय हो !
आपकी जय हो !
आपकी जय हो !

4.10.09

सफेद कबूतर

घर की छत पर
बैठे थे
कई सफेद कबूतर
सबने सब मौसम देखे थे
सबके सब बेदम भूखे थे
घर में एक कमरा था
कमरे में अन्न की गठरी थी
मगर कमरा, कमरा क्या था
काज़ल की कोठरी थी।

एक से रहा न गया
कमरे में गया
अपनी भूख मिटाई
और लौट आया
सबने देखा तो देखते ही रह गये
आपस में कहने लगे
हम सफेद कबूतरों में यह काला कहाँ से आ गया!
सबने चीखा-
चोर!-चोर!
काला कबूतर दूर नील गगन में उड़ गया।

कुछ समय पश्चात
दूसरे से भी न रहा गया
वही भी कमरे में गया
अपनी भूख मिटाई
और लौट आया
सबने चीखा-
चोर!-चोर!
काला कबूतर दूर नील गगन में उड़ गया।

धीरे-धीरे
सफेद कबूतरों का संख्या बल घट गया
नील गगन
काले कबूतरों से पट गया।

एक समय ऐसा भी आया
जब काले कबूतर
घर की छत पर
लौट-लौट आने लगे
सफेद कबूतर
या तो कमरे में
या नील गगन में
उड़-उड़ जाने लगे।

जिन्होंने
कमरे में जाना स्वीकार नहीं किया
भागना स्वीकार नहीं किया
वे
कवि, गुरू, या दार्शनिक हो गये
सबको समझाने लगे-
कमरे में अन्न की गठरी है
मगर रूको
कमरा, कमरा नहीं
काज़ल की कोठरी है।

किसी ने सुना
किसी ने नहीं सुना
किसी किसी ने
सुना अनसुना कर दिया
मगर उनमें
कुछ चालाक ऐसे भी थे
जिन्होंने विशेष परिधान बना लिए
कमरे में जाकर भी
हंस की तरह
उजले के उजले रह गए

बात मामूली नहीं
संगीन है
उन्हीं की जिन्दगी
बेहद रंगीन है

उनके लिए
हर तरफ मजा ही मजा है
वे ही तय करते हैं
किसकी क्या सजा है
उनका
बड़ा ऊँचा जज़्बा है
जी हाँ
आज घर में
उन्हीं का कब्जा है।
जी हाँ
आज घर में
उन्हीं का कब्जा है।

(....यह कविता हिन्दयुग्म में प्रकाशित है।)