31.12.12

मिट्टी



मिट्टी है तो
मिट्टी होगी

सूखी होगी
गीली होगी
ठंडी होगी
तपती होगी
कुछ खट्टी कुछ
मीठी होगी
मिट्टी है तो
मिट्टी होगी।

मिट्टी को आकार दिया तो
रंगों का संसार दिया तो
प्राणों का उपहार दिया तो
माया का बाजार दिया तो

गुड्डा होगा
गुड्डी होगी
लड़का होगा
लड़की होगी
बुढ्ढा होगा
बुढ्ढी होगी
लेकिन फिर भी
मिट्टी होगी।

चोर-सिपाही
भी हो सकते
नेता-डाकू
भी हो सकते
भांति-भांति के
जीव भी होंगे
थलचर-जलचर-नभचर होंगे
दुर्जन होंगे, सज्जन होंगे
राक्षस होंगे, मानुष होंगे

प्राणों से जब
कट्टी होगी
सबकी एक दिन
छुट्टी होगी
मिट्टी फिर से
मिट्टी होगी।

मध्य रात्रि फिर छाने को है
नया साल फिर आने को है
दो पल हँस लो, दो पल गा लो
झूठी उम्मीदें मत पालो

ईश्वर को अब
चिट्ठी लिख दो
सब बातें अब
सच्ची लिख दो
लिख दो मिट्टी
गंदी है अब
इंसानों की
मंदी है अब
हे ईश्वर! अब
कट्टी लिख दो
सब मिट्टी को
मिट्टी लिख दो

सागर के खारे पानी से
पूरी मिट्टी को नहलाओ
ज्वालामुखी के अंगारों से
बार-बार फिर इसे तपाओ

मिट्टी फिर से
मिट्टी होगी

सूखी होगी
गीली होगी
ठंडी होगी
तपती होगी 

मिट्टी फिर से
मिट्टी होगी।
................. 

29.12.12

एक बेटी के जाने के बाद

साहसी बेटी के जाने के बाद अब सरकार की आलोचना करना वक्त की बरबादी है। वैसे भी आलोचना उसकी की जाती है जिसमें सुधरने की संभावना हो। सरकारें आसमान से नहीं आतीं। हम ही सरकार हैं। हम जैसे होंगे वैसी सरकारें होंगी। हम सुधरेंगे, जग सुधरेगा। हत्यारों को सजा मिले इसके लिए शांति पूर्ण प्रदर्शन किया जाना चाहिए। अब वे सभी उपाय किये जाने चाहिए जिससे देश में फिर कोई बलात्कार न हो। हम जहाँ हैं वहीं से यह लड़ाई शुरू करनी होगी। शुरूआत अपने घर से करनी होगी। पास-पड़ोस, मोहल्ले, समाज, दफ्तर कहने का मतलब हम जहाँ हैं वहीं यह ध्यान रखना होगा कि कहीं नारी का अपमान न हो। मुख शुद्धि से लेकर मन शुद्धि तक सभी अनुष्ठान करने होंगे। देखना होगा कि आक्रोश में हमारे मुख से जो गाली निकलती है उसमें किसी महिला के साथ बलात्कार तो नहीं हो रहा! यदि हो रहा है तो समझना होगा कि बलात्कार में कहीं न कहीं हम भी दोषी हैं। देश की एक बेटी के साथ हुआ यह अत्याचार नारी को उपभोग की वस्तु समझने की सोच का ही परिणाम है। 

सरकारी स्तर पर जो कानून बने हैं उन पर अमल हो। कानून में संशोधन की आवश्यकता है तो उसकी मांग हो। देर से ही सही सरकार संवेदनशील हुई है। जन भावना का खयाल करना, संवेदनशील होना उसकी मजबूरी है। मजबूरी में ही सही जांच आयोग का गठन हुआ है। देश भर से सुझाव मांगे जा रहे हैं।  देश भर में फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना की मांग उठ रही है। इस मांग का समर्थन किया जाना चाहिए। इन प्रयासों के साथ-साथ हमे खुद भी अपने सोच पर पुनर्विचार करना होगा। अंतर्जाल की दुनियाँ से, साहित्यकारों की दुनियाँ से, किताबों और अखबारों की दुनियाँ से बाहर निकलकर देखिये..आप जहाँ हैं वहाँ लोगों से बातचीत करके देखिये। आपको गहरी निराशा हाथ लगेगी। समाज वही का वही है। कुछ भी नहीं बदला। आज भी लोगों के मुख से बात-बात पर गालियाँ निकलती हैं। हर गाली में हमारी माँ बहनो के साथ बलात्कार होता है, हम सुनते हैं और चुप रहते हैं। अब हमे यह चुप्पी तोड़नी होगी। सिर्फ यहाँ विरोध करने से काम नहीं चलेगा, वहाँ भी विरोध करना होगा। समाज आज भी इसके लिए लड़कियों के कम कपड़े पहनने को दोषी ठहरा रहा है। समाज आज भी लड़कियों को देर शाम घर से निकलने के लिए दोषी ठहरा रहा है। हमारा समाज आज भी बलात्कार को आम घटना मान रहा है। मैने तो लोगों को यह भी कहते सुना है..पता नहीं ये टीवी वाले इत्ता हो हल्ला काहे मचा रहे हैं! पता नहीं अखबार वाले इत्ता हो हल्ला काहे मचा रहे हैं! यह कोई नई घटना है? रोज ही बलात्कार होता है! दिल्ली में हुआ तो इत्ता बवाल मच गया, छोटे-छोटे शहरों में तो आए दिन ये घटनाएँ होती रहती हैं! लोग अपने घऱ की लड़कियों को सुधारेंगे नहीं, घूमने-फिरने की आजादी देंगे, सुरक्षा का  ध्यान नहीं रखेंगे और जब घटनाएँ घट जाती हैं तो हाय तौबा मचायेंगे!!!

कुछ नहीं सुधरी हमारी मानसिकता। कुछ फर्क नहीं पड़ा हमारी सोच पर। हम दोहरा जीवन जी रहे हैं। दहेज  को मन से या मजबूरी से स्वीकार भी कर चुके हैं। लड़कियों को पढ़ाने, उनको आत्मनिर्भर बनाने की वकालत भी करते हैं और जब वे पढ़ लिखकर अपने पैर पर खड़ी हो गईं तो उन्हें अपनी मर्जी से जीने भी नहीं देना चाहते। पिता चाहते हैं कि लड़कियाँ पढ़ लिखकर नौकरी कर ले, अपने पैर पर खड़ी हो जाय, उसका विवाह आसानी से हो जाय। भविष्य में ससुराल वालों ने तंग किया, पति ने तंग किया तो कम से कम  जी तो लेगी। मतलब लड़कियों को पढ़ाने-लिखाने की उनकी सारी जद्दोजहद का कारण सामाजिक असुरक्षा की भावना है। समाज रूपी राक्षस से वे अपनी बिटिया को बचा कर रखना चाहते हैं। गोया समाज उनसे इतर है। पति चाहते हैं कि पत्नियाँ कमा कर घर चलाने में सहयोगी भी बने, माता-पिता की सेवा भी करे, बच्चों का भी ठीक से ध्यान रखे, घर का कुशल संचालन करे और मेरी मर्जी से ही चलें। लब्बोलुबाब यह कि लड़कियाँ पैदा ही न हों यदि गलती से पैदा हो गईं तो केवल जिंदा रहें, हर तरह से सहयोगी रहें लेकिन मन मर्जी न करें। उनका मन हमारी मर्जी से ही चले। यह तो सभी जानते हैं कि मन पर किसी का नियंत्रण नहीं हो सकता और मन की गुलामी से बड़ी कोई दूसरी गुलामी नहीं है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि सभी नारियाँ दूध की धुली नहीं होतीं। बात सही है। जैसे सभी पुरूष दुष्ट नहीं होते वैसे ही सभी नारियाँ सद चरित्र नहीं होतीं। लोभ नर-नारी में भेद नहीं करता। बुराई किसी में भी आ सकती है। लेकिन एक की बुराई की आड़ लेकर सभी का शोषण करना और नारी को पैर की जूती समझना कहाँ की सज्जनता है?

एक बार मैं ऑटो से जा रहा था। एक प्रौढ़ महिला लिफ्ट मांग रही थी। ऑटो वाले ने लिफ्ट नहीं दिया। ऑटो में पर्याप्त जगह थी। मुझे नागवार लगा। मैने ऑटो वाले से कहा, "का मर्दवा! बइठा लेहले होता! काहे नाहीं बइठैला? ऑटो वाला हंसते हुए बोला, "आप नाही जनता मालिक! ऊ पॉकेट मार हौ! एकर रोज क धन्धा हौ! बगले बइठ के धीरे-धीरे आपसे बतियाई अउर कब जेब साफ कर देई पतो नाहीं चली! हम रोज देखल करीला। ई रोज यही चक्कर में रहेली।" सुनकर मैं सिहर गया। मुख से यही निकला.. "ठीक कइला, नाहीं बइठैला।"

हमने जो जीवन जीया है, जिस परिवेश से आये हैं, उसमे आधुनिक-आचार विचार हमारे गले नहीं उतरता। हम हर बात पर संशकित हो जाते हैं। लड़के-लड़कियाँ बाग-बगीचों में खुले आम गले में बाहें डाले घूमते हैं। एक लड़की के साथ एक से अधिक ब्वॉय फ्रेंड देखे जा सकते हैं। हमारे चिंहुकने के लिए और आँखें मूंद कर गुजर जाने के लिए वे दृश्य पर्याप्त होते हैं। ऐसे में पुलिस वालों की चिंता पर भी ध्यान देना होगा। वे उनको मार कर भगा नहीं सकते। भगाना भी नहीं चाहिए। लेकिन अब असली समस्या यह है कि कोई पुलिस वाला कैसे तय करे कि यह जो लड़की अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ बैठी है, अपनी मर्जी से आई है या इसे ये लड़के बहला फुसला कर लाये हैं? पूछती है तो स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हुआ। नहीं पूछती तो और ये लड़के कोई कांड करके गुजर जाते हैं तो ? नीयत बदलने में कितना वक्त लगता है? दोषी पुलिस वाले ही होते हैं। लड़के लड़कियों को मन मर्जी घूमने की आजादी मिलनी चाहिए लेकिन यह भी ध्यान में रखना होगा कि हमारी इस स्वतंत्रता का फायदा कोई बलात्कारी तो नहीं उठा रहा है! पुलिस वालों की जिम्मेदारी बहुत कठिन है। उन्हें इसी में सावधानी से गलत और सही को ढूँढना है। सुरक्षा के जो नियम बने हैं उनका कड़ाई से पालन करवाना है। कुछ नहीं हुआ तो कोई बात नहीं लेकिन घटना घटने के बाद हर बिंदु की पड़ताल होती है और यह पाया जाता है कि फलां जगह फलां पुलिस वाले से यह चूक हुई थी। नियमो के पालन में यह कमी थी जिससे घटना घटी और तब सारा इल्जाम पुलिस पर मढ़ा जाना तय है।  बावजूद इसके हाथ पर हाथ धरे तो बैठा नहीं जा सकता। जो कानून बने हैं उनपर अमल होना चाहिए। लड़कियों को भी सावधान रहना होगा। अच्छे-बुरे में भेद करना सीखना होगा। कुछ सोच बनानी होगी, कुछ आत्मसंयम बरतना होगा। पुरूषों से ही सुधरने की कामना करना और स्वयम् सावधान न होना भी गलत है।

सुधार चौरतफा होना चाहिए। भ्रष्टाचार और भौतिकतावादी मानसिकता की सहज स्वीकृति का भी परित्याग करना होगा। हमारे समझ में यह भी नहीं आता कि लोग अब दहेज प्रथा का विरोध करना काहे छोड़ दिये हैं? कित्ता पैसा आ गया है लोगों  के पास? विवाह में इतनी फिजूलखर्ची क्यों होती है? काहे कंगाल होकर भी दहेज देना स्वीकार कर लिये हैं? क्यों नहीं खा सकते बेटी की कमाई? क्यों आज भी बेटी के घर का पानी नहीं पीना चाहिए? क्यों विधवा विवाह को समाज आज भी शर्म की दृष्टि से देखता है। क्यों विधुर नहीं कर सकता आसानी से  दूसरा विवाह? और यह भी कि.. क्यों है बलात्कार मात्र लड़की के लिए ही शर्म?  क्यों हो गया उसका मुँह काला? क्यो समाज बलात्कार पीड़ित लड़की को जीने नहीं देता? क्यों नहीं थाम सकता देश का युवा बलात्कार पी़ड़ित लड़की का हाथ? गलत तो बलात्कारी ने किया, मुँह तो उसका काला होना चाहिए, शर्म तो उसे आनी चाहिये, समाज उसे जीने न दे चैन से, क्यों आती है हमे इतनी शर्म? आज जब श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ लिखने बैठा हूँ तो मुझे उसका नाम भी नहीं मालूम! कोई दामिनी कह रहा है, कोई निर्भया.. क्यों?  माँ-बाप का नाम नहीं मालूम! क्यों?  क्यों है इस शोषित परिवार के लिए यह इतनी शर्मनाक घटना कि वे अब किसी को अपना मुँह नहीं दिखा सकते? धिक्कार है हमारी इस मानवीय सोच पर। झूठी सहानुभूति! झूठी संवेदना!! आधुनिकता का दंभ भरते हो तो पूरी तरह आधुनिक बनो। जाति वाद का विरोध करते हो तो पूरी तरह करो। विवाह के लिए जाति वाद का अंध समर्थन और बातें बड़ी-बड़ी!  यही दोहरी नीति है।

सामाजिक परिवर्तन की यह लड़ाई बहुत कठिन है। पुरूष प्रधान मानसिकता ने लड़िकियों का जीवन और भी कठिन बना दिया है। यह और भी कठिन होगा। संघर्ष में ऐसा ही होता है। नारियाँ आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रही हैं और हर लड़ाई बलिदान मांगती है। हमे यह भी ध्यान रखना होगा कि यह अकेले नारियों का संघर्ष नहीं है। इसे पुरूषों के विरूद्ध समझना हमारी भूल होगी। नारी के बिना पुरूष अधूरा है। यदि हम स्वस्थ और सुंदर समाज का निर्माण चाहते हैं तो नारियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।  देश की बेटी की यह हत्या भी इसी सामाजिक संघर्ष में हुआ बलिदान है। उनके हत्यारों को फाँसी हो यह मांग उचित है। ऐसे सिद्ध अपराधों की सजा फाँसी से कम नहीं होनी चाहिए। लोग लाख तर्क दें कि यह मनोरोग है। मनोरोगी की सजा रोग सुधार होनी चाहिए फाँसी नहीं लेकिन समाज सुधार तो फाँसी ही मांगती है और हमे समाज को सुधारना है। फाँसी का भय ऐसे मनोरोगियों को रोग से मुक्ति भी दिलाने में सहायक होगा।

आज देश की बन चुकी बेटी हमारे बीच नहीं रही। लाख सरकारी संवेदनाओं के बाद भी नहीं रही। जन-जन की दुआओं के बाद भी नहीं रही। यह बात भी सिद्ध हो गई कि सरकारी संवेदनाओं और जन-जन की दुआओं से ज्यादा सच्चे कर्म अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। पाप आसानी से नहीं कटता। पुन्य सतकर्मों के कठिन तप से होकर अंकुरित होता है। बहुत पाप कर लिये हमने। अब समय आ गया है कि समाज सुधार के इस यज्ञ में अपने पुन्य कर्मों की आहुती दें। नव वर्ष की सुबह बलात्कार की किसी दूसरी घटना का समाचार न लाये। नव वर्ष में बलात्कार की घटनाओं का ग्राफ धड़ाम से गिर जाये। एक समय वह भी आये जब बलात्कार की हर घटना आम घटना नहीं, जन जन में आक्रोश का कारण बने। हम बलात्कार मुक्त समाज की स्थापना में सहयोगी बनें यही देश की बेटी के बलिदान के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आइये, आने वाले नववर्ष के लिए हम सिर्फ अपने मित्रों के लिए यह दुआ न मांगे कि आने वाला वर्ष आपके और आपके परिवार के लिए मंगलकारी हो..बल्कि यह दुआ भी माँगे की आने वाला वर्ष जन जन के लिए मंगलकारी हो..बलात्कार मुक्त हो।

(जनसत्ता में प्रकाशित)

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28.12.12

चाहत



हम चाहते हैं
तू
जाड़े में
चाय के गर्म कुल्हड़ की तरह मिले
होठों को छुए
पीते रहें तुझे
चुस्कियों में,

गर्मी में
बर्फ के गोले की तरह
नाचती रहे
हमारी लपलपाती जीभ के चारों ओर
लट्टू की तरह,

सावन में  
बारिश के बूदों की तरह
झमाझम बरसे
भीगते रहें
देर तक
और तू चाहती है...

हम उस मिट्टी की चिंता करें
जो हमारे होठों से लगने के बाद
टूटकर बिखर जाती है,
उस बर्फ की चिंता करें
जो पिघलती चली जाती है,
बारिश के उन बूंदों की चिंता करें
जो धरती में गिरकर
सूख जाती है।

ऐ ज़िदंगी!
हम तुझसे क्या चाहते हैं
और तू हमसे
क्या चाहती है!
.....................................

25.12.12

ठीक है!



ठीक है!

कहाँ ठीक है?
'छक्कों' से 'छक्के' हारते हैं
और तुम कहते हो
ठीक है!

नौकरी के लिए
बाप को मारते हैं
छोकरी के लिए
माँ को मारते हैं
और तुम कहते हो
ठीक है!

कहाँ ठीक है?

अब तो करने लगे हैं
चमत्कार!
राह चलते बस में
बलात्कार!
विरोध करो तो
लाठी, पानी की बौछार
और तुम कहते हो ठीक है!

कहाँ ठीक है?

माना कि
तुम्हारे पास भी बेटियाँ हैं
लेकिन तुमने यह नहीं जाना
कि हमारे पास
सिर्फ बेटियाँ हैं
न एसी कार, न सिपहसलार,
ले देकर प्यार ही प्यार है
जख्म मिलता है तो दिखाते हैं गुस्सा
यह गुस्सा नहीं
जरा ठीक से समझो
यह हमारे
आँसुओं की धार है
और तुम कहते हो ठीक है!

कहाँ ठीक है?

ठीक तुम्हारे लिए होगा बाबू
हमारे लिए तो
सब बेठीक है।

ठीक तो तब होगा
जब 'छक्के' भी लगाने लगेंगे 'छक्का'
उखाड़ देंगे तुम्हारी गिल्लियाँ
कर देंगे तुम्हें क्लीन बोल्ड
तब हम कहेंगे..
ठीक है!
हाँ, अब ठीक है।
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नोटः अभी तक तो ब्लॉग से फेसबुक में स्टेटस लिखता था आज पहली बार हुआ कि फेसबुक में स्टेटस लिखते-लिखते यह व्यंग्य लिखा गया। लिखा तो सिर्फ 10 मिनट में है लेकिन दर्द तो कई दिनो का है।

19.12.12

शुक्र है...


नज़र अंदाज़  कर देते हैं हम
छेड़छाड़
दहलते हैं दरिंदगी पर
शुक्र है...
अभी हमें गुस्सा भी आता है!

देख लेते हैं
आइटम साँग
बच्चों के साथ बैठकर
नहीं देख पाते
ब्लू फिल्म
शुक्र है...
अभी हमें शर्म भी आती है!

करते हैं भ्रूण हत्या
बेटे की चाहत में
अच्छी लगती है
दहेज की रकम
बहू को
मानते हैं लक्ष्मी
बेटियों का करते हैं
कंगाल होकर भी दान
शुक्र है....
चिंतित भी होते हैं
लिंग के बिगड़ते अनुपात पर!

गंगा को
मानते हैं माँ
प्यार भी करते हैं
चिंतित रहते हैं हरदम
नाले में बदलते देखकर
शुक्र है...
मूतते वक्त
घुमा लेते हैं पीठ
नहीं दिखा पाते अपना चेहरा!

यूँ तो
संसद में करते ही रहते हैं
अपने हित की राजनीति
लेकिन शुक्र है...
दुःख से दहल जाता है जब
समूचा राष्ट्र
एक स्वर से करते हैं
घटना की निंदा!

शुक्र है...
अभी खौलता है हमारा खून
किसी की पशुता पर
चसकती है
किसी की चीख
अभी खत्म नहीं हुई
इंसानियत पूरी तरह

मानते ही नहीं अपराध
तय नहीं कर पाते अपनी सजा
शुक्र है...
जानते हैं अधिकार
मांगते हैं
बलात्कारी के लिए
फाँसी!

छोड़ नहीं पाये
दोगलई
लेकिन शुक्र है...
अभी नहीं हुये हम
पूरी तरह से
राक्षस।
................

1.12.12

संभावना


हो नहीं पाया अभी
पूरा वणिक ही
हो नहीं पाया अभी
इतना विवश भी
खेत में न छोड़ पाये चार दाने
कृषिजीवी
हैं अभी भी
अन्नदाता
देखिये न!
परिंदे,
उड़ रहे हैं गगन में।

माना प्रदूषित
हो चुकी हैं शैलबाला
आचमन भी असंभव
कूल में अब
प्राण रक्षक
हैं अभी कल्लोलिनी ही
देखिये न!
मछलियाँ,
तैरतीं अब भी नदी में।

आदमी भी रहेगा इस धरा में
जायेगा फिर
इस सदी से उस सदी में
होगी नहीं उसकी कभी
यात्रा अधूरी
देखिये न!
प्रेम है,
दर्द भी है हृदय में।
...................................................