बेचैन आत्मा

25.4.10

रिफ्यूजी

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         भयंकर गर्मी, बिजली की आँच मिचौनी, अंतरजाल की सुस्त चाल और ब्लागिंग का शौक ! अपनी कविता पोस्ट करना भारी, अपनी कविता पर टिप्पणी करने...
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18.4.10

घर

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पहले घर में बच्चे रहते और रहती थीं दादी-नानी गीतों के झरने बहते थे झम झम झरते कथा-कहानी घुटनों के बल सूरज चलता चँदा नाचे ता ता थैय...
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11.4.10

कार्यालय

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कार्यालय में सो रहा है कुत्ता बकरियाँ आती हैं बाबुओं के सीट के नीचे सूखे पान के पत्तों को चबाकर चली जातीं हैं अधिकारी आते हैं और चले जाते है...
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4.4.10

टिकोरे

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डाल में आ गए जब टिकोरे बहुत बाग में छा गए तब छिछोरे बहुत पेंड़ को प्यार का मिल रहा है सिला मारते पत्थरों से निगोड़े बहुत...
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28.3.10

पानी की मार

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बचपन में जब जाता था परीक्षा देने या जब जाते थे पिताजी घर के बाहर दूर किसी काम से तो माँ झट से रख देतीं थीं दरवाजे पर दो भरी बाल्टिया...
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21.3.10

एक हिंदी गज़ल

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क्या तेरा क्या मेरा पगले चार दिनों का फेरा पगले छोरी-छोरा छुट जाएंगे उठ जाएगा डेरा पगले पत्थर का दिल क्यों रखता है तन माट...
39 comments:
14.3.10

तू है कौन, कौन हैं तेरे

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आज रविवार है. कविता पोस्ट करने का दिन. मार्च ..वित्तीय वर्ष का अंतिम महिना, बच्चों की परीक्षा और उसपर चैत की मस्ती. अपने 'नववर्ष' क...
44 comments:
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