बेचैन आत्मा
25.9.16
सुबह की बातें
›
खामोश हैं, वृक्ष सभी। आंगन में झरे नहीं हैं एक भी पत्ते। चल रही सांसें बता रही हैं कि हवा है। शिकायत के स्वर में चहक रहे हैं पंछी। अखबा...
28 comments:
24.9.16
लोहे का घर-20
›
एक झपकी सी लगी थी लोहे के घर में। बर्फिली पहाड़ियों से दिखते कास के फूल लहुलुहान हो गये थे सहसा! आ गया होऊँ जैसे युद्ध के मैदान में। नहीं...
2 comments:
17.9.16
राजनीति
›
मिर्जा को शिकायत है कि हम राजनीति पर नहीं लिखते! मैं पूछता हूँ- राजनीति में लिखने लायक शेष बचा ही क्या है ? कीचड़ में कंकड़ फेकना और एक दूसर...
22 comments:
13.9.16
कुम्हार
›
कुल्हड़ हैं, पुरुवे हैं, दिये भी हैं लोग मिट्टी से जुड़े भी हैं अभी है बनारस की मस्ती अभी है कुम्हारों की बस्ती. श्रम कठिन, स...
15 comments:
11.9.16
मैं न देखता तो....
›
एक चिड़िया बैठी नीम की शाख पर झर गया एक पत्ता न चिड़िया चहकी न आवाज हुई मैं न देखता तो पता ही नहीं चलता आप न पढ़ते तो जान ही नहीं पाते...
22 comments:
9.9.16
लोहे का घर -19
›
लिटा कर अपने बर्थ में कहता है लोहे का घर-थके हो, आराम करो। खुशी न दे सको जमाने को तो दर्द के किस्से भी नहीं कहते। ......................
5 comments:
30.8.16
शाम जब बारिश हुई....
›
शाम जब बारिश हुई झम झमा झम - झम झमा झम -झम झमा झम - झम। मैं न भीगा - मैं न भीगा - मैं न भीगा ओढ़ कर छतरी चला था मैं न भीगा। भीगीं सड़के...
‹
›
Home
View web version