बेचैन आत्मा
16.9.17
रेलगाड़ी
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रेलगाड़ी में बैठ कर रेलगाड़ी पर व्यंग्य लिखने का मजा ही कुछ और है। बन्दा जिस थाली में खायेगा उसी में तो छेद कर पायेगा। दूसरा कोई अपनी थाली क...
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9.9.17
परहित सरिस धर्म नहीं भाई..
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धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं... परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।। परोपकार के बड़ा कोई धर्म...
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2.9.17
लोहे का घर-28
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सुबह (दफ्तर जाते समय) ट्रेन हवा से बातें कर रही है। इंजन के शोर से फरफरा के उड़ गए धान के खेत में बैठे हुए बकुले। एक काली चिड़िया उम्मी...
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प्रकृति (सब गम भुलाकर जीना सिखाती है)
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बारिश से पहले तेज हवा चली थी झरे थे कदम्ब के पात छोटे-छोटे फल दुबक कर छुप गये थे फर-फर-फर-फर उड़ रहे परिंदे तभी उमड़-घुमड़ आये बदरी...
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22.8.17
भागे रे! #हवा खराब हौ!!!
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कर्फ्यू वाले दिनों में बनारस की गलियाँ आबाद, गंगा के घाट गुलजार हो जाते । इधर कर्फ्यू लगने की घोषणा हुई, उधर बच्चे बूढ़े सभी अपने-अपने घरों...
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18.8.17
नदी
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नदी अब वैसी नहीं रही नदी में तैरते हैं नोटों के बंडल, बच्चों की लाशें गिरगिट हो चुकी है नदी! माझी नहीं होता नदी की सफाई के लिए जिम...
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15.8.17
सृजन और संहार का मौसम
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सच है यह मौसम सृजन और संहार का है। खूब बारिश होती है इस मौसम में लहलहाने लगते हैं सूखे/बंजर खेत धरती में अवतरित होते हैं झिंगुर/म...
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