17.1.10

जाड़े की धूप


इस कविता का सृजन आज से 25 वर्ष पूर्व, सन 1985 में मकरसंक्रांति के दिन , एक प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को देखकर किया था. आज... जब मैं अपनी पुरानी डायरी पलटने लगा... तो इसे देखकर... उसी दुनियाँ में खो गया. मन हुआ, समर्पित कर दूं इसे अपनी श्रीमती जी को .....वो भी क्या याद करेंगी कि किससे पाला पड़ा है.





जाड़े की धूप


षोडसी को नहलाकर

प्यार से सहलाकर

छत की मुंडेर से

उतरने लगी है

जाड़े की धूप.


स्वेटर बुनती

गोरी उंगलियाँ

आँखों में अनगिन

ख्वाबों की गलियाँ

ऊन के गोले सा

गोरी की बाँहों से

लुढ़कने लगा है

सूरज .


पंछियों में बदल गए

सभी पतंग सहसा

शर्म से

लाल हुआ जाता है

दिन !

10.1.10

आत्मा की बेचैनी और भूखा भेड़िया


आत्मा की बेचैनीः-
आज रविवार है, कविता पोस्ट करने का दिन । मैने रविवार को कविता पोस्ट करने का दिन इसलिए रखा कि यह छुट्टी का दिन है, आराम से कविता पोस्ट करूँगा और दूसरे के ब्लाग में जाकर दिनभर कमेंट टिपटिपाता रहूँगा लेकिन हाय री किस्मत 'बिजली रानी' मेरे इस कवित्त प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर पाई। सौतन बन कहने लगी, "अच्छा तो यह बात है, मैं तेरे जगते ही दिनभर के लिए चली जाउंगी ! वो मेरे निश्चय का दिन और ये बिजली रानी का कातिलाना व्यवहार, मेरे शहर में बिजली सुबह ९ बजे से दिनभर गायब रहती है और देर शाम ढले ६ बजे के बाद मुंह चिढ़ाते हुए आ जाती है ! बेशर्मी से पूछती है, "क्यों बेचैन आत्मा, क्या किया दिन भर ? बड़े आए थे ब्लाग-ब्लाग घूमने....उहं !
मैं भी कहाँ मानने वाला था। मैने भी तय कर लिया कि ब्रह्म-मुहूर्त में ही जागकर कम से कम अपनी कविता तो जरूर पोस्ट कर दुंगा। देखता हूँ ये 'बिजली रानी' मेरा क्या बिगाड़ लेती है ! तब से हर इतवार ब्रम्हमुहूर्त में ही उठकर कविता पोस्ट करता हूँ। लेकिन आज ? हाय !! लगता है सभी सरकारी विभाग मेरी ब्लागरी के दुश्मन बन गए हैं। आज सुबह ४ बजे जब मैने नेट आन किया तो देखा, लिंक ही नहीं मिल रहा है ! फोन की नाड़ी टटोली तो अवाक रह गया एक भी धड़कन सुनाई नहीं दी ! आत्मा बेचैन हो गई। अरे,.. यह तो डेड है ! तो लिंक कैसे मिलेगा ? अरे, करमजले बी०एस०एन०एल, तू ने कब से बिजली रानी से दोस्ती कर ली..? वह तो अभी है, तू कहाँ मर गया ? अब इतनी सुबह कौन आए मेरी मदद करने ! फिर सोंचा, मैं ही चला जाता हूँ किसी साइबर में बैठकर कविता पोस्ट कर दुंगा.. लेकिन इतनी सुबह कौन साइबर खुलेगा !

अब आप कल्पना कर सकते हैं कि मैं सुबह से कितना बेचैन था। साइबर खुला तो आ गया कविता पोस्ट करने लेकिन बेचैनी में कविता की डायरी घर ही भूल गया ! अब मैं क्या करूँ ? सोंचा यही लिख दूँ जो हुआ है। बाकी सब आपकी दुआ है। ईश्वर से मनाइए कि बी०एस०एन०एल० अच्छी सेवा देने लगे, बिजली रानी दिनभर रहे और बेचैन आत्मा की बेचैनी कुछ कम हो।

भूखा भेड़ियाः-

अभी एक बात और याद हो आई। ताउ डाट काम के फ़र्रुखाबादी विजेता (159) पहेली में एक चित्र था....एक जानवर की चार टांगों के बीच छुपा दूसरा भूखा जानवर । जब मैने चार टांगे देखीं तो दिमाग पर जोर दिया, कहीं यह भारत का लोकतंत्र तो नहीं ! सुना है कि लोकतंत्र की भी चार टांगे होती है। दिमाग में कीड़ा रेंगा- कहीं यह गधा तो नहीं !! ध्यान से देखा.. गधा ही था। अब प्रश्न शेष था कि इन चार टांगो के बीच भूखा जानवर कौन हो सकता है ? मेरे आँखों के सामने बहुत से चित्र आ-जा रहे थे। शरारती दिमाग ने तुरंत पहचान लिया......भूखा भेड़िया !! मैने तुरंत उत्तर लिखा - "गधा और भूखा भेड़िया" । कहना न होगा कि दूसरे दिन मैं ही विजेता घोषित हो गया। क्यों ? है न मजेदार बात ! इसी पर एक कविता लिखने का प्रयास करता हूँ देखिए क्या होता हैः-

भूखा भेड़िया




पहेली में चित्र था

बहुत बढ़िया

गधे की चार टांगों के बीच

भूखा भेड़िया !

सभी ने कहा

गधा,

बंधा है.

परतंत्र है.

मैने कहा

नहींऽऽ

यह

आधुनिक भारत का लोकतंत्र है !

दुःख इस बात का है

कि मेरी बात को आपने

अधूरे मन से माना

लोकतंत्र की चार टांगे तो पहचान लीं

भेड़िये को

अभी तक नहीं पहचाना !

भेड़िये को

अभी तक नहीं पहचाना !

3.1.10

प्रेम



घने कोहरे और कंपा देने वाली ठंड से निकलकर

मूंगफली और छिमी के दाने सा

कीचन में पकते अम्मा के बगोने में पापा के प्यार सा

अमरूद के नीचे जलते अलाव की गर्मी सा

पापा की सुर्ती और अम्मा की फुर्ती सा

बाबा की दाढ़ी और गाढ़ी कमाई सा

मुन्नी की राखी सा

मंदिर की घंटी सा

लो फिर आ गया

घने कोहरे और कंपा देने वाली ठंड से निकलकर

सबके द्वार खटखटाता

प्यारा नववर्ष।


सभी को नववर्ष की एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई। आज रविवार है... कविता पोस्ट करने का दिन । नए वर्ष का पहला रविवार। सफर से पहले, ठहर कर अपनी ताकत अंदाज लेने का अवसर देने वाले मील के पहले पत्थर सा... पहला रविवार। मेरे पिछले पोस्ट को आप सभी ने जो स्नेह दिया उसका तहे दिल से आभारी हूँ। मैने लिखा -प्रथम मास के.. प्रथम दिवस की.. उषा किरण बन.. मैं आउंगा बधाई देने नए वर्ष की.. तुम अपने कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना...अब बहुत से लोग कह रहे हैं कि आज तीन दिन से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ....... रोज कमरे की खिड़कियाँ खुली रखता हूँ....... आखिर कब आओगे...!! अरे, तुम आओ या न आओ कम से कम धूप को तो भेज दो...! उसे भी क्यों पकड़े हुए हो..? बड़ी समस्या है.. हरकीरत 'हीर' लिखती हैं कि देवेन्द्र जी खिड़कियाँ खोल दी हैं ....अब मच्छर या सर्दी ने परेशान किया तो आप जाने ......!! मुझे उनके साथ-साथ अपनी बहुत चिंता सता रही है ...तीन दिन से रोज आसाम जा रहा हूँ उनकी खिड़कियाँ हैं कि बंद ही नहीं हो रहीं !! अब उन्हें कौन समझाए कि
मैं कवि के साथ बेचैन आत्मा भी हूँ ....कुछ भी बन सकता हूँ ..!!! बीमार हो गईं तो नाहक इल्जाम मेरे सर। वैसे भी
कहा गया है-जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे कवि।


पिछले सप्ताह एक और मजेदार वाकया हुआ। मैने श्री रवि रतलामी जी के प्रसिद्घ ब्लॉग रचनाकार में http://rachanakar.blogspot.com/2009/12/blog-post_31.html?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed:+rachanakar+(Rachanakar)आयोजित व्यंग्य लेखन प्रतियोगिता में अपना व्यंग्य लेख व्यंग्य -लेखन पुरस्कार आयोजन – देवेन्द्र कुमार पाण्डेय का व्यंग्य : स्कूल चलें हम -भेज दिया। जब यह प्रकाशित हो गया तो इंतजार करने लगा कि देखें पाठक क्या प्रतिक्रिया देते हैं ! हाय, सिर्फ एक प्रतिक्रिया !! मै बड़ा दुःखी हुआ।
सोंचा ....१५ दिन की मेहनत के बाद एक लेख लिखा......... इतनी मेहनत से टाइप किया और सिर्फ एक प्रतिक्रिया !! फिर सोंचा अपने दो अनुज हैं उन्हे ई-मेल से अवगत कराते हैं कि भाई जरा पढ़ लो.... बताओ कैसा लिखा है मैने ? एक ने पढ़ा कि नहीं पता नहीं... दूसरे ने मेरा छोड़ सभी का पढ़ा फिर ई-मेल कर दिया... कि भैया आपका नहीं मिला तो जो मिला उसी की तारीफ कीए दे रहे हैं !! मैने सर पीट लिया। किसी को न बताने की कसम खाई थी लेकिन ऐसा दर्द किसे कहा जाय ? आप लोगों के सिवा और कोई है जो सुनेगा !! कहेगा ......."सर मत खाओ बाप.... अपनी कविता जाकर किसी और कवि को सुनाओ।"


मेरी बकवास पढ़कर यदि आप बोर हुए हों तो अवश्य लिखें... भविष्य में शार्टकट से काम चला लुंगा। चलिए चर्चा नए वर्ष के प्रथम रविवार की पहली कविता की करें। आज जो कविता मैं पोस्ट करने जा रहा हूँ उसे मैने अपने जीवन साथी की आंखों में पढ़कर हूबहू उतारा है। यह कविता मैं अपनी श्रीमती जी को समर्पित करता हूँ जो मेरी कविताओं की पहली श्रोता व अंतिम संपादक हैं। प्रस्तुत है आज की कविता जिसका शीर्षक हैः-



प्रेम







तुम

एक दिन

उलझे मंझे की तरह

लिपट गए थे

मेरी जिन्दगी से



मैंने

घंटों.....

धूप में खड़े होकर

तुम्हें सुलझाया है ।



आज

जब तुम्हारे सहारे

मन-पतंग

हवा से बातें करता है

तो झट

तुम्हें

अपनी उंगलियों में

लपेटने लगती हूँ ।



डरती हूँ

कि कहीं

किसी की

नज़र न लग जाए........



डरती हूँ

कि कहीं

तू

फिर

उलझ न जाए......!



27.12.09

कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना......


आज रविवार है, नववर्ष के पूर्व का अंतिम रविवार। सिगरेट के आखिरी कश सा प्यारा... अंतिम रविवार। मैं आज आप सभी को नववर्ष की बधाई देता हूँ। वर्ष दो हजार दस आप सभी के लिए मंगलमय हो। आप सभी ने मेरे पिछले रविवारीय पोस्ट "यह गहरी झील की नावें....." को सराहा, इसके लिए मैं सभी का शुक्रिया अदा करता हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप सभी का स्नेह नववर्ष में भी मुझे मिलता रहेगा । प्रस्तुत है आज की पोस्ट:-


बधाई देने....


प्रथम मास के

प्रथम दिवस की

उषा किरण बन

मैं आउंगा बधाई देने नए वर्ष की

तुम अपने कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना।



हौले से आ जाउंगा तुम्हारी खिड़कियों से

तुम्हारी उंनिदी पलकों को सहलाकर

चूमकर अधरों को

फैल जाउंगा तुम्हारे कानों तक

तुम अपनी बाहें फैलाकर मेरा एहसास करना

मैं धूप बन लिपट जाउंगा

तुम्हारे संपूर्ण अंग से

तुम देर तक पीते रहना मुझे

चाय की चुश्कियों में............


मैं आउंगा बधाई देने नए वर्ष की

तुम अपने कमरे की खिड़कियाँ खुली रखना।

20.12.09

ये गहरी झील की नावें .......


आज रविवार है, कविता पोस्ट करने का दिन। आलोचना के प्रस्ताव में आप सभी की प्रतिक्रिया बेहद रोचक रही। यह बात सच है कि बहुत से लोग मात्र कविता का आनंद लेते हैं, कविता की समीक्षा या आलोचना करना विद्वानों का काम है। यह बात भी समझ में आ गई कि मेरी तरह बहुत से कवि भावों की अभिव्यक्ति को ही सर्वोपरी मानते हैं भाषा-व्याकरण के विद्वान नहीं हैं लेकिन यह बात भी सत्य है कि अपने को कविता जैसी लगती है वैसी ही प्रतिक्रिया होनी चाहिए। हम एक दूसरे को उनकी त्रुटियाँ का ग्यान, स्वस्थ मन से कराते रहें तो मेरी समझ से सभी का भला होगा। यह भी जरूरी नहीं कि कमियाँ बताने वाला सही ही हो. वह, उस समय उसे जैसा लगता है, वैसा लिख रहा होता है, इसमें किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिए। बहरहाल मेरा एक उद्देश्य आप सभी से संवाद कायम करना भी था जिसमें मैं पूर्णतया सफल हूँ तथा आपकी प्रतिक्रियाओं से अति उत्साहित भी .

आज एक गीत पोस्ट करने का मन है। मैं एक बार 'नेपाल' के खूबसूरत पहाड़ी पर्यटन स्थल 'पोखरा' गया था। वहाँ की सुंदरता ने मुझे मोहित कर दिया। सभी का वर्णन करने लगूँ तो यह पोस्ट अधिक लम्बी हो जाएगी। वहाँ हरी-भरी पहाड़ियाँ तो हैं ही कंचनजंगा की खूबसूरत हिम-श्रृंखलाओं से घिरी इस पहाड़ी घाटी में तीन खूबसूरत झीलें भी हैं। बनारस की गंगा नदी में नाव चलाने वाले बनारसी ने जब वहाँ के 'फेवा ताल' में अपनी नैया चलाई तो मन में कुछ ऐसे भाव जगे कि गीतकार न होते हुए भी इस गीत ने जन्म ले लिया। प्रस्तुत है गीत...........



ये गहरी झील की नावें....



ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

रहती हैं ये पहरों में,
डरती हैं ये लहरों से।
उछलती हैं किनारों में,
थिरकती हैं हवाओं से।

जो आशिक हैं किनारों के
भला मझधार क्या जाने !

वो गिरना तुंग शिखरों से,
अज़ब का दौड़ मैदानी।
फ़ना होना समन्दर में,
गज़ब का प्रेम हैरानी।

ये ठहरे नीर की नावें
नदी का प्यार क्या जानें !

अगर है मौत रूकना तो,
बहना ही तो जीवन है।
यदि हों शूल भी पथ में,
चलना ही तो जीवन है।

जो डरते हैं खड़े हो कर
भला संसार क्या जाने !

ये गहरी झील की नावें
नदी की धार क्या जानें !

13.12.09

"दंश"

आज रविवार है कविता पोस्ट करने का दिन। आपकी प्रशंसा से अभिभूत हूँ। लेकिन एक बात समझ में नहीं आई कि एक भी टिप्पणी आलोचनात्मक समीक्षा के रूप में सामने नहीं आई। यह संभव नहीं लगता कि मैने इतनी सारी कविताएँ पोस्ट कीं उनमें कहीं कोई त्रुटि न हो । भाषा की अग्यानता, टंकण संबधी त्रुटियाँ या वैचारिक मतभेद.... कुछ तो अवश्य होंगे। मात्र प्रशंसा के पीछे ब्लागर्स बंधुओं का यह भय भी हो सकता है कि यदि आलोचना करी तो फिर यह मेरे ब्लाग में नहीं आएगा या यह मेरी आलोचना शुरू कर देगा लेकिन मैं आप सभी को आश्वस्त करना चाहता हूँ कि अपनी कमियाँ जानकर मेरा आपके प्रति स्नेह और भी बढ़ेगा। मैं गज़ल नहीं लिख पाता लेकिन आपकी प्रशंसा के कारण एक शेर अनायास जेहन में उतर गया-
यूँ तो चढ़ाइए ना चने की झाड़ पर
सर जमीन पर हो पैर आसमान पर
कहने का मतलब यह नहीं कि कल से मेरी निंदा करना शुरू कर दीजिए लेकिन यह अवश्य चाहता हूँ कि मेरी कमियाँ उजागर हों और मैं कुछ और सीख सकूं। इतिहास साक्षी है कि स्वस्थ आलोचना से कवि का सदैव भला ही हुआ है। यदि आपको मेरी बातें अच्छी न लगीं हों तो इसके लिए क्षमा चाहता हूँ ।
आपका ज्यादा समय नष्ट किया अतः कविता की भूमिका में न जाते हुए प्रस्तुत है आज की कविता जिसका शीर्षक है--

"दंश"
गली के मोड़ पर
उजा़ले में
कुतिया ने बच्चे दिए
जाड़े में

एक-दो नहीं पूरे सात
ठंड से बचाती रही वह उन्हें
पूरी रात
सबके सब सुंदर प्यारे थे
माँ की आँखों के तारे थे
सुबह तक एक खो चुका था
शायद अल्लाह का प्यारा हो चुका था

बचे छः
सह गयी वह
कष्ट दुःसह।

कोई पास से गुजरता तो गुर्राती
दिन भर यहाँ-वहाँ छुपाती
फिर आती हाड़ कंपा देने वाली काली रात
बच्चों को चिपकाती अपने स्तन से
सारी रात
उफ !
रात भर उसका रोना
मुश्किल था हमारा सोना

सुबह तक एक और खो चुका था
शायद किसी का हो चुका था

यमराज ले जाए या आदमी
बच्चे गुम हो रहे थे
कुतिया को गिनती नहीं आती
पर इतना जानती
कि बच्चे
कम हो रहे थे

कातर निगाहों से
उन्हीं से मदद की उम्मीद करती
जो अब
हल्की गुर्राहट से भी डरने लगे हैं
हाथों में डंड़ौकी ले
घरों से निकलने लगे हैं।

दिन गुजरते जाते हैं
एक-एक कर पिल्ले गुम होते जाते हैं।

एक दिन बर्तन माजने वाली बताती है-
कुतिया का सिर्फ एक पिल्ला बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा....!

मेरी पत्नी पूछती है-
पिल्ले को छोड़, तू बता
तेरा छोटू आज काम पर क्यों नहीं आया ?
वह बताती है-
उसका बाप उसे मुम्बई ले गया है
वहाँ एक बहुत बड़ा साहब रहता है
अब वह वहीं रहेगा
एक हैजा से मर गया
दूसरा अपने से भाग गया
यही बचा था
इसे भी इसका बाप ले गया
कहते-कहते उसकी आँखें डबडबा गईं।

मैने सुना
बर्तन मांजते-मांजते

बीच-बीच में बड़बड़ाती जाती है-

कुतिया का सिर्फ एक बच्चा बचा
उसे भी उठा ले गए
पान वाले चचा..!

मैने महसूस किया
एक वफादारी
दूसरे निर्धनता का दंश
झेल रहे हैं।

6.12.09

लिंग भेद


हमारे एक मित्र हैं यादव जी
बड़े दुःखी थे
पूछा तो बोले-
सुबह-सुबह मन हो गया कड़वा
बहू को लड़की हुई भैंस को 'पड़वा'।

मैने कहा-
अरे, यह तो पूरा मामला ही उलट गया
लगता है 'शनीचर' आपसे लिपट गया !
फिर बात बनाई
कोई बात नहीं
लड़का-लड़की एक समान होते हैं
समझो 'ल‌क्ष्मी' आई।

सुनते ही यादव जी तड़पकर बोले-
अंधेर है अंधेर !
लड़की को लक्ष्मी कहें
तो पड़वा को क्या कहेंगे ?
कुबेर !

पंडि जी-
झूठ कब तक समझाइयेगा
हकीकत कब बताइयेगा ?

आज जब कन्या का पिता
अपनी पुत्री के लिए वर ढूंढने निकलता है
तो
वर का घर "दुकान"
वर का पिता "दुकानदार"
वर "मंहगे सामान" होते हैं
कैसे कह दूँ कि लड़का-लड़की एक समान होते हैं।

आपने जीवन भर
लड़की को लक्ष्मी
लड़के को खर्चीला बताया
मगर जब भी
अपने घर का आर्थिक-चिट्ठा बनाया
पुत्री को दायित्व व पुत्र को
संपत्ति पक्ष में ही दिखाया।

मैने कहा-
ठीक कहते हैं यादव जी
पाने की हवश और खोने के भय ने
ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है
जहाँ-

बेटे
'पपलू' बन आते हैं जीवन में
बेटियाँ
बेड़ियाँ बन जती हैं पाँव में
भैंस को मिल जाती है जाड़े की धूप
पड़वा ठिठुरता है दिन भर छाँव में।
इक्कीसवीं सदी का भारत आज भी
बहरा है शहर में
गूँगा है गाँव में।
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पड़वा- भैंस का नर बच्चा ।
पपलू- ताश के एक खेल का सबसे कीमती पत्ता.