बेचैन आत्मा
26.1.15
गणतंत्र दिवस
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एक समय था जब मेरे जैसे निर्धन मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा भी सरकारी स्कूल में न्यूनतम फीस देकर, बिना ट्यूशन किये, पढ़ाई पूरी कर सक...
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11.1.15
हँसते-हँसते रोया कर....
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दिन भर मारा फिरता है रातों में तो सोया कर। कल फिर सूरज निकलेगा कुछ सपनो में खोया कर। नफ़रत के किस्से मत लिख ढाई आखर बोया कर। दर्पण...
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2.1.15
मैं कबीर की इज्जत करता हूँ
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मुझे कोई आइना दिखाता है तो मैं आइने में अपनी शक्ल देखने के बाद मुँह धोने नहीं जाता! दौड़ा कर मारना चाहता हूँ मुझे लगता है आइना दिखाने ...
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30.12.14
नई सुबह कभी तो आएगी
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वे पहले हाथ मलते हैं फिर अपनी चाल चलते हैं इधर कोशिश अपनी दाल गल जाये उधर उम्मीद बकरा हलाल हो जाये हम सोचते हैं नई सुबह कभी तो ...
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28.12.14
ओ दिसम्बर!
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आजकल शाम होते ही कोहरे की मोटी चादर ओढ़ सोने लगती है धरती मुर्गा समय पर देता है बांग पंछी नहीं भूलते चहचहाना छटपटाने लगते हैं दो प...
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लोहे का घर-१ (बनारस से बलिया)
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वाराणसी और बलिया के बीच कई छोटी-छोटी नदियाँ मिलती हैं। राजवाऱी स्टेशन से आगे बढ़ते ही गोमती, नन्द गंज से पहले गांगी, गाजीपुर घाट के बाद बेस...
14.12.14
ईश्वर!
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हे ईश्वर! कड़ाकी ठण्ड में कैसा है रे तू ? गरम पानी मिलता है क्या नहाने को ? मैं तो रजाई में दुबका फेसबुक का मजा ले रहा...
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