14.6.15

लड़के

एक लड़का
घर के दरवाजे
धूप में खड़ा
घर से निकला दूसरा
हँसते-खिलखिलाते
दोनों
आपस में मिले

दो लड़के
घर के दरवाजे
धूप में खड़े
घर से निकला तीसरा
हँसते-खिलखिलाते
तीनों
आपस में मिले

तीन लड़के
असाढ़ की धूप में
घर के दरवाजे
धूप में खड़े
घर से निकला चौथा
अब चारों
हँसते-खिलखिलाते
आपस में मिले

सभी
पढ़ने वाले
अच्छे लड़के
घर के दरवाजे
सभी के लिए खुले
घर बुलाता.. ...
आओ, बैठो
कुछ खा-पी लो
बैठ कर बातें करो !

चारों लड़के
नहीं चाहते
घर में बैठना
आपस में बतियाते
जाने क्या-क्या
देर तक
धूप में खड़े!

 ...................


11.6.15

ठहरो! इतना आग मत उगलो


मेरी पलकों से पहले
खुलती हैं
तुम्हारी पलकें
उठकर देखता हूँ
फेंक चुके हो
अंधेरे की चादर
गिरा चुके हो
लाल चोला
मेरे मुँह धोने, खाने-पीने, कपड़े पहनकर काम पर निकलने तक तो
टंच हो
झक्क सफेद धोती-कुर्ता पहन
घोड़े के रथ पर बैठ
दौड़ने लगते हो आकाश में
न जाने कहाँ जाना रहता है तुम्हें !
मियाँ की दौड़ मस्जिद तक
पूरब से निकलते हो
पश्चिम में ओझल हो जाते हो
न नमाज़ी सी  सहृदयता न ईश्वर का भय
है तो बस
रावणी अहंकार!

ठहरो!
इतना आग मत उगलो
अभी असाढ़ है
आगे....
सावन, भादों

तुम्हें
कीचड़  में डुबो कर
गेंद की तरह खेलेंगे
गली के बच्चे
मेरे देश में
किसी की तानाशाही
नहीं चलती ।
..........

9.6.15

धूप

लोहे के घर में
खिड़की से बाहर
धूप है,
प्रचण्ड धूप....

झील-झरने, ताल-तलैया, नदियाँ-समुंदर
सब मिलकर भी
नहीं बुन पा रहे
बादलों की चादर
नहीं टाँक पा रहे इंद्रधनुष
बेलगाम हो चुकी हैं
आवारा किरणें

सूखी बंजर धरती और
खेतों में उग रहे कंकरीट के मकानों के बीच
भयभीत खड़े हैं
घने वृक्ष!

नीचे
कसाई वक़्त से बेखबर
उछल रही हैं
छोटी बकरियाँ। 

9.5.15

अब भला क्यों सजन, धूप में!

आग लगती है ठन्डी हवा
तुम कहाँ हो? सजन, धूप में

हर तरफ बिछ रही चांदनी
चल रहा हूँ सजन, धूप में

मेरे पलकों ने बादल बुने
लो सजन ओढ़ लो, धूप में

बन के बदरी अगर तू चले
फिर घनी छाँव है, धूप में

दिन ढला, साँझ दीपक जले
अब कहाँ हो? सजन, धूप में

जाने कब से खड़ा द्वार पर
अब भला क्यों सजन, धूप में!

17.4.15

गेहूँ

हम शहरियों के लिए
कितना कठिन है
धोना
सुखाना
चक्की से पिसा कर
घर ले आना
आंटा!

उनकी नियति है
जोतना
बोना
उगाना
पकने की प्रतीक्षा करना
काटना
दंवाई करना
खाने के लिए रखकर
बाजार तक ले जाना
गेहूँ!!!

हमारे पास विकल्प है
हम
बाज़ार से
सीधे खरीद सकते हैं
आंटा
उनके पास कोई विकल्प नहीं
उन्हें
उगाना ही है
गेहूँ

हम खुश हैं
उनकी मजबूरी के तले
हमारे सभी विकल्प
सुरक्षित हैं!

11.4.15

गर्मियों के दिन

रद्दी कागज़ बेचोssss
चीखता, निकल गया रद्दी वाला
याद आने लगीं
बनारस की संकरी गलियाँ
पुराना घर

दुपहरिया में
एक गाय आकर
घुसेड़ देती थी पूरी गरदन
गली में खुलते
कमरे के दरवज्जे को धकेल कर
पी जाती थी
एक बाल्टा पानी
हँसता था
सामने
चबूतरे पर बैठा
प्याऊ!
चहकती थीं
ऊपर
बिजली के तार पर बैठीं
गौरैया!

चना जोर गरम बेचता था
लूला
कुहनी के ऊपर से ही
गायब थे उसके
दोनों हाथ
जिसमे बंधे होते थे
स्टील के बड़े-बड़े चम्मच
इन्हीं चम्मचों को पीटकर
बुलाता था ग्राहक
तौलता, बेचता था
चने

शनीवार के दिन
आते थे
शनी देव वाले बाबा
आइसक्रीम वाला
काले-काले जामुन
और भी दूसरे फेरी वाले
मगर यहाँ
कॉलोनी में
सिर्फ एक
रद्दी कागज़ बेचोssss

22.3.15

दूर है मंजिल..

अभी 
डूबेगा सूरज 
घर जायेंगे 
बंजर माटी पर क्रिकेट खेलते बच्चे 
थक जायेगा 
मिट्टी ढोते-ढोते 
ट्रैक्टर 
आँखों से ओझल हो जायेंगे 
गेहूँ, अरहर और जौं  की खड़ी फ़सल के ऊपर 
उड़ रहे कौए
भेड़-बकरियाँ 
वही करेंगी, जो कहेगा मालिक  
अभी 
थरथाई है ट्रेन 
गुजरी है 
पुल के ऊपर से 
अभी 
दूर है मंजिल।