बेचैन आत्मा

18.8.19

लोहे का घर-56

›
पाण्डे जी का चप्पल ................................. जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था।...
9 comments:

लोहे का घर-55

›
क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ? ................................. न जाने कौन टेसन उतरेगा, बनारस से चढ़ा, पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में...
1 comment:
14.7.19

न बिकने वाले घोड़े

›
वह अस्तबल नहीं, देश का जाना माना, एक प्राइवेट प्रशिक्षण संस्थान था जहाँ देश भर से घोड़े उच्च शिक्षा के लिए आते। संस्थान में कई घोड़े थे। माल...
7 comments:
12.7.19

लोहे का घर-54

›
ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, ...
7 comments:
22.6.19

लोहे का घर-53

›
इस मौसम की पहली बारिश हुई जफराबाद स्टेशन में। झर्र से आई, फर्र से उड़ गई। ढंग से सूँघ भी नहीं पाए, माटी की खुशबू। प्रयागराज जान...
6 comments:
18.6.19

पिता जी

›
         गंगा की लहरें, नाव, बाबूजी और तीन बच्चे। इन तीन बच्चों में मैं नहीं हूँ। तब मेरा जन्म ही नहीं हुआ था। पिताजी के साथ अपनी ...
7 comments:

लोहे का घर-52

›
गरमी के तांडव से घबराकर घुस गए ए. सी. बोगी में। दम साधकर बैठे हैं लोअर बर्थ पर। बाहर प्रचण्ड गर्मी, यहाँ इतनी ठंडी कि यात्री चादर ओढ़े लेटे...
2 comments:
‹
›
Home
View web version
Powered by Blogger.