3.1.24

यात्रा संस्मरण, लोहे का घर 74

लोहेकेघर की लम्बी यात्रा है, बनारस से मुम्बई। हम साइड लोअर बर्थ में लेटे हैं, सामने की सभी बर्थ पर सारनाथ के साथी बैठे हैं। मुंबई से गोवा, गोवा से पुणे, पुणे से मुम्बई, मुंबई से वापस बनारस 10 दिन की घुमक्कड़ी की योजना है। 8 में 5 वरिष्ठ, 3 युवा हैं। यह ट्रेन नम्बर 12168 बनारस से लोकमान्य तिलक जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन की थर्ड ए. सी. बोगी है। सभी अपने- अपने तरीके से आनंद ले रहे हैं। कोई अमरूद काट रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है और कोई आनंद दायक गप्प लड़ाने में मस्त हैं। लगता है सभी घर की कैद से मुक्त हो, दौड़ने वाले लोहे के घर मे आकर बहुत खुश हैं। सुबह-सबेरे आँगन में कलरव करने वाले परिंदों की तरह सभी चहक रहे हैं।

ट्रेन मिर्जापुर में रुकी है। बनारस से अगला स्टॉपेज प्रयागराज है, यह इसका ठहराव नहीं है। यदि अपने निर्धारित स्टेशन पर ही रुके तो फिर भारतीय रेल कैसे रहे! भारतीय रेल जुगाड़ से चलती है, टेसन से पहले और टेसन के बाद भी रूकती है। कब चलेगी, इसकी घोषणा नहीं होती, इनके पास एक ब्रह्म वाक्य है, "यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद है।"

एक भले साथी ने आलू पूड़ी का नाश्ता करा दिया, सभी ने चटखारे लेकर खाए, पान जमाया और अपनी-अपनी मोबाइल खोल ली। जैसे कक्षा में नाश्ते के बाद लड़के पुस्तक पलटने लगते हैं, वैसे ही लोहे के घर में यात्री नाश्ते के बाद मोबाइल खोल लेते हैं। 😃

ट्रेन मानिकपुर से आगे चली है। जब रोज के यात्री थे, दूर से आने वाली लेट ट्रेन, अपने ऑफिस से छुट्टी के समय मिल जाती थी तो खुशी होती थी, आज हम स्वयं दूर के यात्री हैं और अपनी ट्रेन एक घण्टे लेट है तो साथी यात्री मायूस हैं। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जाने पीर पराई! वाली बात है।

इधर एक रोचक घटना घटी। सारनाथ के ही एक यात्री मिल गए। इनकी टिकट कन्फर्म नहीं है, वेटिंग में है। अपने 9 साथियों में एक नहीं आ पाए तो अपने पास एक बर्थ खाली है। इस तरह वेटिंग टिकट वाले यात्री की समस्या का समाधान हो गया, हम लोग भी अपने परिचित साथी को अकस्मात पा कर खुश हुए। मंजिल चाहे जब मिले, सफर का आनंद लेना चाहिए और आनंद मिल गया।

जबलपुर पहुँचने वाली है ट्रेन। हम लोगों ने घर से लाया हुआ भोजन मिलबाँटकर कर लिया। तीन प्रकार की सब्जी और पूड़ी हो गई। अब सभी बिस्तर की तलाश में हैं। पूरे कूपे में हमारे सिवा कोई और है ही नहीं, आठों बर्थ में अपने ही साथी हैं, नई कहानी कहाँ से ढूंढे! बगल के कूपे में लोग खाना आर्डर देकर जबलपुर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका खाना जबलपुर में आएगा। हमारे साथियों ने घर से भरपूर पूड़ी सब्जी लाई थी, हमे खाना मंगाने की जरूरत नहीं पड़ी। अब धीरे-धीरे लोग कंबल, चादर ओढ़/बिछा रहे हैं।

लोहे के घर में सुबह चौंकाने वाली हुई। अलॉर्म चीखने लगा, "कोच में आग है, गलियारे से निकलें!" नींद खुली तो देखा सभी साथी हड़बड़ा कर जग रहे हैं। ट्रेन रुकी थी, अफरा तफरी का माहौल था लेकिन आग कहीं नहीं दिख रही थी। अभी हम सोच ही रहे थे कि बैग लेकर उतरें या छोड़ कर एक साथी बोले, "केहू सिगरेट पीले होई, एमे सेंसर लगल हौ, वही बजत हौ।" तब तक सुरक्षाकर्मी डंडा, टार्च लेकर दौड़ने/देखने लगे। कुछ भीतर कुछ बाहर कोच के नीचे पहियों में टार्च जलाकर देखने लगे। कुछ देर बाद चार कर्मी एक आदमी को पकड़े ले जा रहे थे और पूछ रहे थे, "किसको सिगरेट पीते देखे हो, बताओ?" यहाँ सबको देखने के बाद वे आगे बढ़ गए, अलार्म बजना बंद हुआ, लगभग 30 मिनट बाद ट्रेन चल दी। सभी ने संतोष की सांस ली और सब कुछ सामान्य हो गया।

अब नींद पूरी तरह खुल चुकी है। 'लोहे का घर' खुद भी जगा, सबको जगा भी दिया। कुछ अभी अलसाए पड़े हैं, कुछ फ्रेश होकर चाय पी रहे हैं। चाय,पानी बेचने वाले वेंडर लगातार आ/जा रहे हैं। सुबह के सात बजने वाले हैं, कोच के भीतर बल्ब अभी जल रहा है, बाहर भी रौशनी फैल रही है। बाहर/भीतर का अंधकार यूं चुटकियों में दूर हो जाय तो बस आनंद ही आनंद है। ट्रेन भुसावल से आगे चल रही है, अगला स्टेशन 'नासिक रोड' है।

सही समय पर लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुंची अपनी ट्रेन। वहाँ से तिलक नगर स्टेशन से लोकल ट्रेन पकड़कर छत्रपति शिवाजी स्टेशन पहुँचे। अपना सामान 'अमानती घर' में जमा किया और खा/पी कर 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' घूमने निकल पड़े। छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से यह बहुत पास था। गेटवे ऑफ़ इण्डिया के ठीक सामने है 'होटल ताज'। होटल ताज को देखकर आतंकवादी घटना याद आ गई, जिसने पूरे देश को हिला दिया था। जिसके सामने भूतपूर्व प्रधानमंत्री बी पी सिंह की मृत्यु की खबर दब कर रह गई थी।

गेटवे ऑफ़ इण्डिया से घुमते हुए पैदल-पैदल मरीन ड्राइव तक गए। वहाँ लगभग एक घण्टे समुन्द्र के किनारे बैठकर सूर्यास्त का दर्शन किए फिर घूमते हुए वापस स्टेशन। मडगांव के लिए अगली ट्रेन रात 11 बजे थी। अभी ट्रेन में बैठे हैं। यह लगभग 11 बजे मडगांव पहुंचाएगी, वहाँ से गोवा घूमने जाना है।






गोवा घूम लिए। यहाँ का मौसम गर्म है। धूप इतनी तेज है कि काला चश्मा खरीदना पड़ा। बनारस में कड़ाके की ठण्ड और कोहरे का समाचार सुनकर यहाँ हर वर्ष आने की इच्छा हो रही है। शायद इसीलिए लोग हर वर्ष गोवा आते हैं।

वास्को रेलवे स्टेशन के पास रुके थे, यहाँ से कार लेकर एक दिन नार्थ गोवा, दूसरे दिन साऊथ गोवा चले गए। मांडवी रिवर,कोको बीच,कांडोली बीच, कलंगुट बीच,थँडर वर्ड,बाघा बीच, पंजी, शांता दुर्गा मन्दिर, मंगेश शिव मन्दिर, नेवी म्यूजियम, जापानी गार्डेन, कैसीनो पंजी सब घूम लिए। यहाँ Beach बहुत हैं, सबका नाम याद रखना भी कठिन काम है। बाघा बीच में समुन्द्र स्नान भी हुआ। समुन्द्र में नहाने के बाद बाहर निकल कर साफ पानी से भी स्नान किया।

यह 8 मित्रों का जीवंत ग्रुप है। कुछ अधिक जीवंत हैं जिन्हें बियर के बाद स्कॉच भी चाहिए। कुछ शाम तक इंतजार करते हैं, कुछ को सुबह जागने से ही चाहिए होता है। कुछ धार्मिक, शाकाहारी हैं, कुछ मांसाहारी लेकिन किसी को किसी के खान पान से कोई परेशानी नहीं है। सभी आनंद लेने में जुटे हैं। आज दिन में 3 बजे वास्को से पूना के लिए ट्रेन पकड़नी है, ट्रेन कल भोर में पुणे पहुंचेगी, वहाँ 4 दिन रुककर आस पास के इलाकों में घूमने की योजना है।


























गोवा एक्सप्रेस में बैठ गए। यह 3 बजे 'वास्को डी गामा' स्टेशन से चलकर 'निजामुद्दीन' तक जाएगी, हमको पूना जाना है। यह पुणे कल सुबह 4.15 पर पहुंचाएगी। ग्रुप में 5 वरिष्ठ नागरिक हैं लेकिन सभी अपर या मिडिल अपर बर्थ मिली है। पता नहीं इस बार रेलवे ने वरिष्ठ नागरिकों का कोई ध्यान क्यों नहीं रखा! बनारस से मुम्बई होते हुए गोवा चले आए लेकिन कहीं कोई जाँच नहीं हुई। मुम्बई में जब 'गेटवे ऑफ़ इण्डिया' में घूम रहे थे और ताज होटल को देख रहे थे तो यह खयाल आया कि यहाँ अपनी कोई जाँच नहीं हुई! पुलिस आतंकवादी घटना के बाद कितनी सक्रीय हो गई थी!!! मतलब घटना के बाद जाँच होती है, पहले नहीं।

हमारी बोगी जहाँ है, एक स्पीकर तेज आवाज में लगातार अपनी ट्रेन की घोषणा कर रहा है। अब इसकी घोषणा से खीझ हो रही है। सुन-सुन कर कान दर्द करने लगा। ट्रेन यहीं से बनकर चलती है, हम लोग होटल से 12 बजे चेक आउट कर गए, कहाँ जाते!ट्रेन आ गई तो बैठ गए। आधे घण्टे पहले बैठने का परिणाम यह हुआ कि ट्रेन चलने तक मराठी, हिंदी और अंग्रेजी में लगातार की जाने वाली घोषणा सुननी पड़ेगी। घोषणा खत्म हुई, इंजन का हारन बजा, ट्रेन चल दी। बाय-बाय गोवा, फिर मिलेंगे।

भयंकर भीड़ है गोवा एक्सप्रेस में। जो भीड़ चढ़ चुकी है वे मराठी के अलावा दूसरी भाषा भी बोल रहे हैं। भोलपन से कहते हैं, "जनरल समझ कर चढ़ गए!" टी टी भी परेशान है, एक डिब्बे से भगाता हैं, दूसरे में चले जाते हैं। दरवाजे के पास चपे हुए हैं। हड़काता है, "अगले स्टेशन में उतर जाओ, नहीं तो पेनाल्टी लगाएंगे।" ये सर्वहारा दिखते हैं, फाइन देने लायक भी नहीं दिखते। लोअर बर्थ वाले परेशान हैं, सभी चढ़े जा रहे। अब लगता है रेलवे ने बड़ी कृपा करी कि हमको अपर बर्थ दे दिया। बीच से भगाए गए तो ये अब दरवाजे के पास जमा हैं। इस डिब्बे में लगभग 200 से ज्यादा बिना बर्थ वालों की संख्या है। कुछ देर में ये जमीन पर सो भी जाएंगे। यह स्लीपर बोगी है।

हमारे साथी इधर-उधर बिखरे हैं। सभी की यहाँ-वहाँ अपर बर्थ है। इधर ठंड नहीं होगी, एक रात की यात्रा है, मानकर इन्होने स्लीपर में रिजर्वेशन करा लिया। ठंड तो नहीं है, भीड़ ज्यादा है। घाटप्रभा स्टेशन में ट्रेन रुकी है, टी टी सबको उतार रहा है। उतारते-उतारते ट्रेन चल दी! अब कैसे उतारेगा!!! बाहर तो फेंक नहीं सकता। अब फाइन मांग रहा है। पुलिस को बुलाने की धमकी दे रहा है। आसान नहीं है टी टी की नौकरी। हमको इस भीड़ का खूब अनुभव है लेकिन जो परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं, परेशान हैं।

एक वेंडर वाला बड़ा पाव लेकर आया। मैने पूछा, "कितने का है?" बोला, "30/-का 2 बड़ा, 2 पाव।" मैने पूछा, "बड़ा कितने का, पाव कितने का?" वो बोला, "बड़ा 25/-का 2। मैने कहा, "5/- का 2 पाव देना!" वह मुकर गया! हड़बड़ा कर बोला, "ऐसा थोड़ी न होता है।" मैं हँसने लगा, "मैं दाम तो तुम्हारे ही हिसाब से दे रहा हूँ, बड़ा 25/- का तो पाव 5/-का ही न हुआ? वह बड़बड़ाते हुए चला गया, "लेना हो तो पूरा लो!" नीचे बैठे सभी यात्री हँसने लगे। दूसरा वेंडर बड़ा पाव लेकर आया, उसने दाम बताया, 2बड़ा 20/-का, 2पाव 10/-का। मैने 20/-में 2 बड़ा खरीद लिया। नीचे बैठे यात्री हँसने लगे, एक बोला, "अभी तो आपको 2पाव चाहिए था!" मैं भी हँसने लगा, "नहीं, हमको 2 बड़ा चाहिए था, यह ईमानदार वेंडर है, इसलिए ले लिया।" लोग फिर हँसने लगे! पता नहीं मेरी बातों से लोग क्यों हँसने लगते हैं!🤔

बोगी की भीड़ कुछ कम करने में टी टी को सफलता मिल गई। रात के 10 बज रहे हैं, लोगों ने अपना बर्थ सजा लिया है। ट्रेन 46मिनट विलम्ब से रायाबाग पहुंची है। अब हम भी लिखना बंद कर सोते हैं, सुबह 4 बजे उठना है।

गोवा एक्सप्रेस अपने सही समय भोर में पूना पहुँच गई। ट्रेन में ही पुणे के एक यात्री की सलाह पर पूना रेलवे स्टेशन से 2km दूर 'पंद्रह अगस्त चौक' पर होटल 'टूरिष्ट' मिल गया, वहाँ 4दिन रुके। पहले दिन तो खूब आराम किया गया और पूना शहर में दगड़ू सेठ गणेश जी' का दिव्य दर्शन किया गया और आस पास शहर में ही घूमा गया।

दूसरे दिन एक कार लेकर वहाँ से 123 किमी दूर छठें ज्योतिर्लिंग 'भीमा शंकर' का दर्शन किया गया। वहाँ एक अलग प्रकार की अव्यवस्था देखने को मिली। मन्दिर से 2 किमी पहले ही दूर से आने वाली गाड़ियों को रोक दिया जा रहा था और वहाँ से दूसरे लोकल वाहन से प्रति व्यक्ति 20/- लेकर मन्दिर तक पहुंचाया जा रहा था। इस व्यवस्था का लाभ स्थानीय वाहनों को खूब मिल रहा था। मन्दिर से बहुत पहले से ही लम्बी लाइन शुरू हो गई थी। पंक्तिबद्ध घंटों खड़े होकर शिवलिंग का दिव्य दर्शन हुआ। काशी विश्वनाथ में तो अब हम काशी वासी शिवलिंग को छू नहीं पाते लेकिन यहाँ 'स्पर्श दर्शन' का सुख मिला। एक साथी तो वहीं शिवलिंग पकड़कर दण्डवत लेट गए। लौटने के रास्ते में सीढ़ियों के किनारे कई प्रकार की दुकाने सजी थीं। मुख्य रूप से खोए से बने खाद्य पदार्थों, निम्बूरस पिलाने वालों की अधिकता थी।

तीसरे दिन लोनावला और खंडाला घूमने गए। पुणे से लोकल ट्रेन मात्र 15/- रुपए के टिकट पर लोनावला पहुंचाती है। साथियों की राय बनी कि आने/जाने में कार में हजारों रुपिया क्यों खर्च किया जाय! वहाँ पहुँच कर गाड़ी ले लेंगे। हम लोगों ने यही किया। लोकल ट्रेन में खूब भीड़ थी लेकिन बैठने की जगह मिल गई, लोकल ट्रेन में घूमने का यह नया आनंद दायक अनुभव था। बैठने की सीट मिल जाय तो लोकल ट्रेन में यात्रा करना कोई बुरा नहीं है लेकिन दोनो बांहों से सिक्कड़ पकड़ कर, धक्के खाते हुए, खड़े होना पड़े तो भारी पड़ता है। रोज लोकल ट्रेन में यात्रा करने वालों को शायद ही सीट मिल पाती होगी।

लोनावला पहुँच कर एक ऑटो से हम 4 लोग 4 घण्टे घूमते रहे। हम 8 लोगों के ग्रुप में 4 साथी पूना न आकर, 'दमन दीप' चले गए। 4 लोगों के साथ घूमना थोड़ा आसान पड़ता है, जहां जाओ, गाड़ी आसानी से मिल जाती है। सोचे थे, खंडाला में मौसम ठंडा होगा लेकिन यहाँ भी धूप/गर्मी थी। जैकेट बांहों में लेकर घूमना पड़ा। एक बात और समझ में आई कि पूना से लोनावला जाने के बजाय, लोनावला में ही होटल लेकर सुबह/ शाम घूमते तो पहाड़ों में घूमने का और आनंद आता, लेकिन 31 दिसम्बर/1जनवरी का दिन होने के कारण यह लगा कि वहाँ होटल बहुत मंहगा मिलेगा, पूना से जाया /आया जाय, पूना का होटल बढ़िया है, इसे न छोड़ा जाय। खंडाला से पुणे लौटने में शाम हो गई।

थका देने वाली यात्रा के बाद चौथे दिन कहीं दूर घूमने की इच्छा नहीं हुई। पूना में ही शाम के समय 'सारस बाग' घूमने गए। 'सारस बाग' में सारस नहीं मिला, गणेश जी का मन्दिर और मूर्तियों का संग्रह मिला। पार्क खूबसूरत है, एक तालाब भी है। तालाब में कमल थे, कछुए थे। पार्क के पीछे की तरफ एक मेला लगा था। खाने /पीने की दुकाने सजी हुई थीं। साल का पहला दिन होने के कारण खूब भीड़ थी। 'सारस बाग' से निकल कर मन हुआ एक बार फिर दगडू सेठ भव्य गणेश जी का दर्शन किया जाय। यहाँ भी खूब भीड़ थी। मंदिरों में भीड़ देखकर लगा कि सनातनियों ने पहली जनवरी को एक बड़े त्योहार के रूप में अंगिकृत कर लिया है! अब होटल जा कर आराम करना था, रात में हमलोगों की मुंबई जाने वाली ट्रेन थी।
































रात की ट्रेन पकड़कर 2 जनवरी को, भोर में लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुँचे। यहाँ अमानती में अपना सामान जमा कर 60-70 किमी दूर जीवदायिनी देवी के दर्शन का प्रोग्राम बना। साथियों को लोकल ट्रेन में चलने का आनंद मिल चुका था। मात्र 20/- प्रतिव्यक्ति की टिकट कटा कर हम लोग तिलक नगर टर्मिनल से कुर्ला, दादर में लोकल ट्रेन बदलते हुए 'वीरार' पहुँचे। वीरार से 2 किमी की दूरी पर ऑटो रिक्शे से 'जीवदायिनी मन्दिर' पहुँचे। माता जी का मन्दिर बहुत ऊँचाई पर है। मन्दिर तक पहुँचने के लिए रोप वे, लिफ्ट की सुविधा है। माताजी का दिव्य दर्शन करने के बाद हम लोग फिर लोकल ट्रेन पकड़ कर दादर आ गए। तबतक आधा दिन बीत चुका था, लोकमान्य तिलक टार्मिनल से अपनी ट्रेन देर शाम 10.45 पर थी।

दादर में भोजनपरान्त एक कार ले लिया और मुम्बा देवी, महालक्ष्मी मन्दिर दर्शन करते हुए, समुन्द्र के किनारे- किनारे वापस लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुँच गए। जहाँ से रात में ट्रेन पकड़नी थी।

इस समय ट्रेन इटारसी पहुँचने वाली है। आरक्षण बढ़िया मिला है। पूरे कूपे की आठों बर्थ पर हम आठ साथियों का कब्जा है। सभी आनंद से अपनी यात्रा का संस्मरण करते हुए फोन से अपने-अपने घर बतिया रहे हैं। हम संस्मरण लिख रहे हैं। खबर लगी है, बनारस में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है, कल बारिश भी हुई थी। रात 2 बजे अपनी ट्रेन बनारस पहुँचेगी। लग रहा है बनारस पहुँचते ही सबकी गर्मी निकल जाएगी।
















16.10.23

सुबह की बातें (14)

धूप निकल आई है। छाँव है घने नीम के नीचे। चहुँ ओर आनंद की वर्षा का आलम है। एक तोता नीम की शाख से हवा में तैरता हुआ अनार के पौधों के बीच-बीच से निकलता हुआ फिर नीम में गुम हो गया। जाते-जाते उसने खण्डहर पर बैठी कौवी को आँख मारी या टाँय से छेड़ दिया कि साथी कौआ देर तक उसी दिसा में मुँह कर काँव-काँव करता रहा। कौए के चोंच इतनी चौडा़ई में खुलते, बंद होते कि लगा खा ही जायेगा तोते को। तोते की तरफ से फिर टाँय-टाँय की आवाज आई और कौआ पंख फैलाकर उड़ता हुआ घुस गया उसी नीम के पेंड़ पर। इधर कौवी उड़ी और हिरण के गरदन के ऊपर बैठ उसके कान में कुछ कहने लगी। हिरण ने हौले-हौले मुंडी हिलाई। कौवी संतुष्ट हो कौए की तलाश में उधर ही उड़ चली।


....

2.10.23

बन्दर

भटकना नहीं चाहते वन-वन,

सीधे पहुंचना चाहते हैं

संकट मोचन!


सभी बन्दर

नहीं खा पाते, 

चने और देसी घी के लडडू।

अधिकांश तो

रोटी के लिए

मारे-मारे फिरते हैं

छत-छत, टेशन-टेशन

घुड़की देते हैं,

छिनैती करते हैं,

पकड़े गए तो

नाचते भी हैं

मदारी के इशारे पर।


इन्हें देख,

यकीन नहीं होता

तनिक भी सोचते होंगे

बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो।


हमको तो नहीं दिखते

देश के लिए मिटने वाले 

गाँधी जी के तीन बंदर

हमको तो सभी

संकटमोचन जाते दिखते हैं!


तीनों बंदर

अपना दुखड़ा रोने

कहीं राजघाट तो नहीं चले गए

बापू के पास!!!🤔

................

28.9.23

लोहे का घर 73

कलकत्ता से वापसी यात्रा में भी हम भाग्यशाली हैं। राजधानी एक्सप्रेस में दोनो लोअर बर्थ मिली है फर्क सिर्फ इतना है कि आमने-सामने न होकर एक साइड लोअर बर्थ है दूसरी लोअर। श्रीमती जी साइड लोअर बर्थ में कब्जा जमाए 3 घण्टे से लगातार फोन में बहन, बेटियों से बातें कर रही हैं, बातें, ढेर सारी बातें....।

हम सुकून से फेसबुक चला रहे हैं, सामने लोअर बर्थ पर व्यवसायी दिख रहे, मेरी तरह वृद्ध होने जा रहे एक युवा, आराम कर रहे हैं। सामने के अपर या साइड अपर बर्थ खाली है। शांत और मनहूस वातावरण में कुछ भद्र सज्जनों के कारण जो मोबाइल जोर-जोर से सुनना पसंद करते हैं, कुछ आवाजें आ रही हैं, शेष सब शांति है। आस पास की शांति भंग करने में भद्र लोगों का बड़ा योगदान होता है। ये सोचते हैं कि हम मजा ले रहे हैं तो सभी मजा लें। इसमें इनकी कोई बदनियति नहीं है, बल्कि परोपकार की भावना है। अब यह अलग बात है कि हमारे जैसे कुछ बेचैन आत्मा को उनका यह प्रेम नहीं समझ आता, शोर करने वालों को ही अभद्र! बेवकूफ! असामाजिक! जाने क्या-क्या बोलते रहते हैं!!!


प्रेम से लिख रहे थे, खाना आ गया। खाना ठंडा न हो, खाने लगे। खाते-खाते धनबाद आ गया। धनबाद से बहुत यात्री चढ़े। छोटे बच्चे, गोदी में रोता बच्चा लिए महिला, बुजुर्ग और युवा भी। हमारे कूपे में तीनों अपर सीट भर गई। हमने जल्दी-जल्दी खाना समाप्त किया और हाथ धोकर, पान घुलाकर बैठ गए। अभी लोग सामान और सीट मिला ही रहे हैं, खूब शोर हो रहा है, गोदी का बच्चा अभी माँ का दूध पीकर खेल रहा है। बगल के कूपे में भी इनके साथ की फौज है। ये लोग भी खाना-खाना कर रहे हैं, ऊपर बैठी महिला बच्चे को गोद में लिए खाना भी खा रही है। कुल मिलाकर स्लीपर बोगी की तरह चहकने लगा यह डिब्बा!


ट्रेन पूरी स्पीड से चल रही है, अगला स्टेशन गया है। गया के बाद अपना स्टेशन पंडित दीन दयाल... मुगलसराय है। इसके मुगलसराय पहुंचने का समय रात्रि 1.15 है। हमको मुगलसराय उतरना है। आज घर पहुंचकर ही सोना नसीब होगा। सब सही रहा तो भोर से पहले घर पहुंच जाएंगे। गलती से सो गए तो दिल्ली पहुंच जाएंगे! दिमाग कह रहा है, अभी सोना नहीं है। शरीर कह रहा है, सो जाओ, अजीब मुसीबत है।


आइसक्रीम आ गया! पहले बताया होता होता तो पान नहीं जमाते, दोनो मेरे प्रिय हैं, कैसे छोड़ दें? पान थूककर आइसक्रीम खा लिया, अब दूसरा पान नहीं है। सुख भी मुसीबत ले कर आती है। एक से अधिक सुख, एक साथ मिल जाय तो क्या छोड़ें, क्या पकड़ें वाले उहापोह में आदमी पड़ जाता है।


मेरे अपर बर्थ वाली महिला अब सुकून से है। बच्चा सो गया है, अब वह भी सोने की तैयारी कर रही है। लोहे के घर में दृश्य तेजी से बदलते हैं। बाहर अंधकार है, खिड़कियों के पर्दे बंद हैं, भीतर रोशनी है लेकिन भीतर के नजारे भी तेजी से बदल रहे हैं। महिला का बच्चा सो चुका है, वह भी अब लेट कर मेरी तरह मोबाइल निकाल चुकी हैं। सामने बैठे यात्री भी मोबाइल चला रहे हैं, सामने साइड लोअर बर्थ में अपनी श्रीमती जी भी चश्मा चढ़ा कर मोबाइल चला रही हैं। आज के जीवन में दो ही सच्चे मित्र बचे हैं, एक मोबाइल दूसरा चश्मा, शेष तो झूठा है यह संसार।

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लोहे का घर 72

सेवानिवृत्ति के बाद कुछ दिनों के लिए लोहे का घर छूटा तो इसका मतलब यह थोड़ी न है कि शरीर सलामत हो, जीवन शेष हो फिर भी इसका साथ छूट जाय! मुझे तो ट्रेन पकड़ने का बहाना मिलना चाहिए। अमृतसर हावड़ा एक्सप्रेस 50टी डाउन में कई बार बैठे लेकिन कभी हावड़ा जाने का अवसर नहीं मिला। भालो-आछे, भालो-आछे कहते हुए जौनपुर से चढ़े और बनारस उतर गए। अब फिफ्टी डाउन बंद हो चुकी है, उसे कोरोना निगल गया। (कोरोना काल में जो बंद हुई कि हमेशा के लिए बंद हो गई।) अब हावड़ा जाने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़े तो यह विकल्प अच्छा लगा। आठ घण्टे में, होटल चेक इन के समय लगभग 10 बजे यह हावड़ा पहुंचा देगी।


राजधानी हावड़ा एक्सप्रेस में सुफेद चादर ओढ़कर लेटे हैं। पंडित दीन दयाल..... मुगलसराय से रात 2 बजे चढ़े हैं। सुबह के 6 बज चुके हैं, ट्रेन 509 किमी चलकर, धनबाद से पहले, पारसनाथ स्टेशन पर 2 मिनट रुककर चल चुकी है। जिस प्लेटफार्म में रुकी थी, सन्नाटा फैला था। अपनी बोगी में भी बहुत से बर्थ खाली हैं। कुल मिलाकर सन्नाटे का साम्राज्य है। सामने के लोअर बर्थ में श्रीमती जी और इधर के लोअर बर्थ में हम, ऊपर 2 और सामने 2 और बर्थ हैं, शेष पर्दे में डूबा हुआ। श्रीमती जी खर्राटे भर रही हैं और हमको नींद नहीं आ रही। वैसे भी यह मेरा साइकिल चलाने का समय है। ठीक इस समय नमो घाट, बनारस में भजन चल रहा होगा।


राजधानी एक्सप्रेस में रईसी से यात्रा कर रहे हैं लेकिन ट्रेन भारत के मेहनतकश मजदूरों, किसानों के इलाकों से गुजर रही है। बंद शीशे की खिड़की से बाहर झाँकता हूँ तो दूर दूर तक फैले वृक्षों के जंगल, खेत और हरे भरे मैदान दिख रहे हैं। कभी जब छोटे प्लेटफार्म से कूदती /फादती भागती है अपनी राजधानी तो दूर खेतों में उग आई चिमनियां/ कुछ पक्के मकान दिख जाते हैं। अपनी ट्रेन बोल भी रही है, "हम कुछ ही मिनटों में धनबाद पहुंचने वाले हैं!" मतलब बिहार से हम कोयले के खदानों वाले राज्य झारखण्ड आ गए।


धनबाद हम पहले भी आए हैं। बिटिया ने इसी शहर से MBA किया था। उसके प्रवेश से लेकर एग्जाम पास करके निकलने तक कई बार आना हुआ। एक बार तो वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी और हॉस्पीटल में एडमिट करने के बाद उसकी सहेलियों ने फोन किया था, हम भागे-भागे आए थे। तब आजकी तरह राजधानी नहीं पकड़ते थे, लुधियाना धनबाद, किसान एक्सप्रेस पकड़ते थे जो शाम को बनारस से चलती और सुबह में धनबाद पहुँचाती थी।


ट्रेन खूब स्पीड में चल रही है। एक चायवाला आया। पहले तो हमने लोकल ट्रेन का चायवाला समझकर मना कर दिया लेकिन श्रीमती जी के कहने पर बुलाया तो पता चला यह राजधानी एक्सप्रेस की मुफ्त सर्विस है, जिसका पैसा टिकट में लिया जा चुका है! एक ट्रे में दो कप गरम पानी, चाय /दूध /शुगर के छोटे-छोटे पैकेट/सबको अच्छे से मिलाने के लिए सीक और दो बिस्कुट भी! चाय पीने के बाद समझ में आया कि अपन लोकल ट्रेन में चलने वाला रोज का यात्री, रइसों के इन चोचलों को इतनी जल्दी कैसे समझ ले? हमको जब भी अकेले सफर करना पड़ा, हम यही सोचते कि कम पैसे में कैसे जांय? जब परिवार के साथ चले तो यह सोचते कि कम से कम कष्ट में कैसे ले जांय? मेरी ही नहीं शायद सभी मध्यम वर्गीय अकेले गृहस्थी चलाने वाले की यही सोच होती होगी। हम एक महीने की MST बनाते थे तो जितनी भी लेट हो, ट्रेन ही पकड़ते थे, 73 रूपया अतिरिक्त देकर बस से आना गवारा नहीं होता था।


कभी राजधानी एक्सप्रेस के कारण अपनी पैसिंजर किनारे लगा दी जाती और 30-30 मिनट रोक दी जाती तो मन ही मन राजधानी एक्सप्रेस को खूब कोसते, "कहाँ से आ गई यह इस समय!" आज इसी राजधानी एक्सप्रेस से सफर कर रहे हैं जिसके आसनसोल स्टेशन आने की घोषणा हो रही है अब अगला ठहराव हावड़ा ही है।

.......

दोस्ती

एक जिस्म में मजदूर और कवि दोनो साथ-साथ रहते। काम से लौटकर मजदूर घर आता, रोटी खाते-खाते उसे नींद आने लगती। कवि, मजदूर के बल पर दुनियाँ देखा करता। मजदूर की दर्द भरी दासतां सुनकर, नई कहानियाँ लिखा करता, घर आते ही दोनो साथ खाने पर बैठ जाते। इधर मजदूर का पेट भरता, उधर कवि की कविता की भूख जाग जाती! मजदूर पेट भर खा कर चैन की नींद सोना चाहता लेकिन कविता की भूख का मारा कवि उल्लू की तरह जाग कर मजदूर से अपनी नई कविता सुनने और आज के काम का दर्द बयान करने को कहता।


अमां यार! अभी तो बारह भी नहीं बजा, सुन लो! बड़ी अच्छी कविता है। मजदूर का बस चलता तो कवि की गरदन दबा देता लेकिन बिचारा क्या करता? अपनी गरदन कैसे दबाता? आखिर दोनो एक ही जिस्म में रहते थे।

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10.9.23

बनारसनामा

8 सितम्बर, 2123 को श्री कन्हैया लाल गुप्त स्मृति भवन, रथयात्रा, वाराणसी में स्वर्गीय घनश्याम गुप्त जी की 82वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर काशिका बोली में रचित उनकी छान्दसिक कृति 'बनारसनामा' का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर गुरुदेव श्री जितेन्द्र नाथ मिश्र सहित बनारस के कई साहित्यकार, वरिष्ठ पत्रकार और गुप्त जी के परिवार के सदस्य उपस्थित थे। वरिष्ठ गीतकार श्री सुरेन्द्र वाजपेयी जी ने सभा का कुशल संचालन किया।

'बनारस नामा' का प्रकाशन अभिनयम प्रकाशन, वाराणसी द्वारा किया गया है। पुस्तक पृष्ठ, छपाई, और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है। मूलतः काशिका बोली में प्रकाशित इस कृति को पढ़कर बनारस के इतिहास को समझा जा सकता है। सरसरी तौर पर देखने मात्र से यह समझा जा सकता है कि पुस्तक काफी समृद्ध है और इसमें में तत्कालीन बनारस को जिया गया है।  लेखक बनारस के प्रसिद्ध मिष्टान्न भण्डार 'मधुर जलपान' के मालिक थे, इन दो पंक्तियों में उन्होंने बनारस की जो उपमा दी है, वह मुग्ध करने वाली है....

काशी कs दिल बहुत बड़ा हौ, इहाँ हौ पूरी दुनिया।

लगेला जैसे रस में डूबल इक दोनिया में बुनिया।।

कोई काम जब टल जाता है तो उसे हमेशा के लिए भुला दिए जाने की पूरी संभावना रहती है लेकिन मृत्यु के 23 वें वर्ष में उनकी पुस्तक का लोकार्पण यह बताता है कि यह बनारस के साहित्य प्रेमियों की और उनके परिवार की कितनी दबी इच्छा थी जो अब तक जीवित थी! पुस्तक घनश्याम गुप्त जी को विनम्र श्रद्धांजलि तो है ही, उनके प्रेमियों में मनुष्यता के जिन्दा रहने का प्रमाण भी है।