बेचैन आत्मा
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9.9.17
परहित सरिस धर्म नहीं भाई..
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धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं... परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।। परोपकार के बड़ा कोई धर्म...
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