15.7.24

कर्जा वसूली

श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित कहानी संग्रह 'कर्जा वसूली' पढ़ने का सौभाग्य मिला। पुस्तक में कुल 13 कहानियाँ हैं। यह कहानी क्या है, शब्द चित्र हैं। प्रत्येक कहानी में समाज के एक अलग ही दृश्य को हू-ब-हू उकेरा गया है। पढ़ते समय पाठक इसी शब्द चित्र में उलझ कर रहा जाता है और जब कहानी खत्म होती है, उसका दिल धक से कहता है, अरे!कहानी खत्म हो गई!!!

पहली कहानी 'अपने-अपने करावास' में दो प्रेमी दो दशकों बाद मिलकर, एक दूसरे को देखते-मिलते हुए भी अपनी-अपनी जिंदगी की समस्याओं में इतने उलझे रहते हैं कि चाहकर भी एक नहीं हो पाते। दो दशकों की यादों को साझा करते हुए, मिलने की उम्मीद पाले हुए दो प्रेमी अपनी हमेशा समस्याओं से घिरे रहते हैं। दोनो अपने-अपने कारावास में कैद हो चुके हैं, जिससे निकलना संभव नहीं है। पाठक उम्मीद पाले रहता है और कहानी खत्म हो जाती है।

दूसरी कहानी 'साहब के यहाँ तो...' शिक्षा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। इसमें दिखाया गया है कि चपरासी पद पर नियुक्त 'इमरती' वेतन तो स्कूल से पाती है लेकिन अधिक समय मंत्री जी के घर का काम करने में बिताती है और स्कूल में रोब से रहती है, सभी उससे जलते हैं। एक दिन इमरती अपना दर्द बयान करती है कि कैसे वह दो जगह पिसाती रहती है! उसका यह रोब तो सिर्फ दिखाने के लिए है। नौकरी बचाने के लिए उसे कितना परिश्रम करना पड़ता है!

कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी 'कर्जा वसूली' में गांव के ऋणदाता बलिराम जी गांव के ही रामनाथ को कर्ज दिए रहते हैं। अपने दिए कर्ज की वसूली के लिए गांव में ही सबके मजाक का पात्र बनते हैं। बलिराम जी निर्दयी भी नहीं है, रामनाथ की हर आद्र पुकार पर पसीज जाते हैं। कई फसल कट जाती है, कर्ज में दिया धन नहीं मिलता। गांव वाले उनका मजाक उड़ाते रहते हैं अंत में हार कर वसूली के लिए कठोर कदम उठाते हैं। रामनाथ की भैंस उठा लेते हैं लेकिन उनसे रामनाथ की पत्नी दुलारी का विलाप सहन नहीं होता और भैंस को वापस ले जाने का आदेश देते हैं। कहानी का शब्द चित्र इतना समृद्ध है कि बार-बार पंक्ति दोहराने का मन करता है।

चौथी कहानी 'उर्मि नई तो नहीं है घर में' एक मध्यम वर्गीय मास्टर साहब के पारिवारिक जीवन का ऐसा शब्द चित्र है जो बड़ा सजीव लगता है। दोनों पति-पत्नी के मनोभावों का ऐसा मार्मिक शब्द चित्र है कि लगता है हम भी उन्हीं में से एक हैं।

अगली कहानी 'शपथ पत्र' भी शिक्षा विभाग पर बढ़िया व्यंग्य है। जिसमें बताया गया है कि कैसे एक कर्मचारी अपने जी.पी.एफ फंड से अग्रिम लेने के लिए कितना कुछ सहता है।

'पहली रचना' भी सभी मध्यम वर्गीय परिवारों में बच्चों के परिवेश के समय होने वाली आम घटना है मगर गिरिजा जी ने इतने प्रेम से इसको गूंथा है कि पढ़ कर दिल में हूक-सी उठती है और पाठक कुछ देर मौन रहकर खयालों में खो जाता है।

कहानी 'उसके लायक' तो मन बढ़ किशोरों के मुँह में करारा तमाचा है। इसे पढ़कर शायद ही कोई लड़का अपने साथ पढ़ रही किसी बदसूरत लड़की का मजाक उड़ा पाएगा।

'एक मौत का विश्लेषण' एक लम्बी कहानी है। पिता के सामने युवा पुत्र की अधिक शराब पीने के कारण लीवर खराब हो जाने से मौत हो जाती है। जब तक पूरा समाज अपने-अपने ढंग से मौत का विश्लेषण करता है, कहानी सामान्य लगती है। लेखिका ने इस कहानी में आगे एक मोड़ दिया, उन्होंने मृतक की आत्मा से मौत के कारणों का विश्लेषण करवाया! इस विश्लेषण में मृतक ने खुद को ही दोषी ठहराया है लेकिन वास्तव में मौत के लिए उसके पिता का झूठा अहंकार और गलत परवरिश जिम्मेदार है।  

अगली कहानी 'नामुराद' पढ़कर नारी पीड़ा की गहरी अनुभूति होती है। अभी दशकों पहले तक गरीब मध्यम वर्ग के आम घरों में नारी का कितना शोषण होता था! हमको यह शोषण तो नहीं दिखा, अपने आस पास हल्का-हल्का महसूस जरूर किया है। पुरुष होने का दम्भ कुछ अपने भीतर भी था, जिसने कभी इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाई, नजरअंदाज किया!  पति की जूठी थाली में भोजन करना, कितने सम्मान की बात समझी जाती थी! पत्नी के मन में कितनी वितृष्णा उपजती थी!!! कहानी पढ़कर इसका एहसास होता है।

शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती, मूल्यांकन प्रक्रिया की धज्जी उड़ाती कहानी है 'ब्लण्डर मिस्टेक'। एक ईमानदार शिक्षक, चमचों और मूल्यांकन के समय पैसा बनाने वालों, जो इस भाव से कॉपी जाँचते हैं कि  "ये तो आँधी के आम हैं' भैया! जितने बटोर सको बटोर लो" के बीच शिक्षा अधिकारियों के समर्थन से कैसे पिसाता है और शर्मिंदगी महसूस करता है, का सटीक विश्लेषण पेश करती है।

'व्यर्थ ही..' छोटी मगर दिल को छू लेने वाली इस सामाजिक कहानी में गरीब घर की बहू और धनी घर की बहू में क्या फर्क होता है, बखूबी समझाया गया है।

'पियक्कड़' गाँव से शहर कमाने आए एक गरीब की कहानी है जो शराबी बन जाता है और गली के गुंडे उसकी पत्नी और बेटी को अपने अनुसार चलाते हैं। उसकी चीख भी एक 'पियक्कड़' की चीख समझ गली वाले नजरअंदाज कर देते हैं।

कहानी संग्रह की अंतिम कहानी है 'बन्द दरवाजा'। यह छोटे कस्बे से 'बैंगलोर' जैसे बड़े शहर में आई एक माँ की कहानी है जो इंजिनियर बेटा और बहू के पास आईं हैं। बच्चे बहुत प्यार करते हैं लेकिन 5 दिन की व्यस्तताओं के बीच साथ रहने के लिए सप्ताह में 2 दिन का ही समय मिलता है। 5 दिन फ्लैट के घर /बरामदे में रहकर माँ पड़ोसियों के बन्द दरवाजों को देखती और अपने समय को याद करती रहती हैं। कहानी बदलती सामाजिक व्यस्था और बड़े शहर की संस्कृति का बखूबी विश्लेषण करती है।

यह कहानी संग्रह 'गिरिजा जी' ने अपने 2 दिनों के वाराणसी ठहराव के समय 'ऋता' जी के साथ सारनाथ घूमते समय मुझे संप्रेम भेंट दिया था और लगभग एक वर्षों से यह मेरे अलमारी में बन्द पड़ी थी। कल शाम से इसे पढ़ना शुरू किया और आज खतम किया।  गिरिजा दी, पुस्तक भेंटकर भूल भी चुकी होंगी। 

इन कहानियों को पढ़कर एक बात समझ में नहीं आई कि एक व्यक्ति कैसे समाज के इतने रिश्तों की, इतनी खूबी से पड़ताल कर सकता है जैसे वह ही इन 

कहानियों का एक पात्र हो! खुद पीड़ा का अनुभव किए बिना कोई कैसे दूसरे के दर्द को जी सकता है!!! 

इस संग्रह की एक खास बात और लगी कि प्रत्येक कहानी के एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य एकदम नपे तुले हैं, न एक कम न एक ज्यादा। मुझे इस कहानी संग्रह को पढ़ाने के लिए गिरिजा दी का बहुत आभार।🙏


हरदौल

श्री वंदना अवस्थी दुबे  जी का उपन्यास हरदौल कल एक बैठकी में पढ़कर खतम किया! वर्षों बाद ऐसा हुआ कि मैने कोई किताब पहले की तरह एक बार में पूरा पढ़ा। यह उपन्यास की शक्ति ही थी जिसने मुझे प्रोत्साहित किया कि अभी मैं पहले की तरह किताबें पढ़ने में समर्थ हूँ। 

एक स्त्री सुजाता, बाबा के मुख से रोज कहानी सुनती है। दोनो सूत्रधार की भूमिका में हैं। ओरछा के ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि में लिखी उपन्यास की कहानी इतनी रोचक है कि सुजाता और बाबा का संवाद भी भारी लगने लगते है, अपना मन भी कहने लगता है, "बाबा! जल्दी से आगे की कहानी सुनाओ, हरदौल का क्या हुआ?" कहानी जब चरमोत्कर्ष पर पहुँचती है, षड्यंत्र, हत्या की साजिश चल रही होती है, उसी बीच हरदौल के विवाह प्रसंग का वर्णन भी भारी लगने लगता है, मन करता है पृष्ठ पलटें, जाने की हरदौल का क्या हुआ?

इस उपन्यास के लिए वंदना जी को बहुत बधाई। जब भी बुंदेलखंड के इस लोक नायक का जिक्र होगा, इस कृति के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा। मेरा विश्वास है कि यदि आपको भी यह पुस्तक मिल जाय तो आप भी इसे एक बार में ही पूरा पढ़कर खतम करेंगे।


11.7.24

साइकिल की सवारी (10)

आज बहुत दिनों के बाद लगभग 20 किमी साइकिल की सवारी हुई। भोर में 5 बजे घर छोड़ने से पहले मोबाइल में Chandan Tiwari  का यूटूब चैनल चला दिया। 'डिम डिम डमरू बजावेला जोगिया' सुनते हुए आगे बढ़ा। एक खतम होता, दूसरा बजने लगता, बीच-बीच में प्रचार भी आता रहा, साइकिल चलती रही। सारनाथ से पंचकोशी चौराहे से जब साइकिल सलारपुर की तरफ मुड़ी तो आशंका थी, क्रांसिंग बन्द होगी लेकिन खुली थी। सलारपुर, खालिसपुर से आगे साइकिल जब कपिल धारा से आगे बढ़ी तो खुला-खुला, खुशनुमा वातावरण था। सूर्यमन्दिर के दरवाजे खुले थे, शनि देव पीपल के नीचे एकदम खाली बैठे थे। ध्यान आया, आज मंगलवार है, हनुमान जी व्यस्त होंगे। शनिवार होता तो भक्त शनिदेव में दिए जला रहे होते, आज हनुमान मन्दिर गए होंगे।

बिना रुके चलता रहा। पुलिया को देखा, एक अजनबी वृद्ध बैठे आराम कर रहे थे। बगल में लंगोटी वाले पीर बाबा (बरगद का विशाल वृक्ष है, भक्तों की मान्यता है कि यहाँ पीर बाबा का वास है, यहाँ भक्त लंगोटी चढ़ाते हैं।) में दो नई लाल लंगोटियाँ चढ़ी हुई थीं। सर झुकाते हुए आगे बढ़े, साइकिल रोकने का प्रश्न नहीं था, गंगा किनारे नमो घाट पर भजन मित्र मंडली का भजन 6 बजे शुरू हो जाता है। घर से बिना रुके पहुँचने में लगभग एक घण्टे लग जाते हैं, लगभग 10 किमी का सफर है।

कोटवा, मोहन सराय, तथागत भूमि से होते हुए वरुणा गंगा के संगम तट पर बने पुल को पार करते हुए, बसंत महाविद्यालय की सड़कों पर चले तो बहुत से अपरिचित मॉर्निग वॉकर तेज चलते हुए या दौड़ते हुए दिखे। रास्ते में अमृत कुण्ड के जगत पर कुछ प्राणी प्रेमी, कौवों, कुत्तों, गायों को नमकीन, बिस्कुट, गुड़ खिलाते हुए दिखे। इन सबके दर्शन करते हुए जब अपनी साइकिल नमो घाट के गोवर्धन मन्दिर पर खड़ी हुई तो 6 बजने में 5 मिनट शेष थे।

नव निर्मित नमोघाट एक विशाल, खूबसूरत घाट है। यहाँ सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। अच्छी पार्किंग, सी एन जी गैस भराने की व्यवस्था, हाथ का सकल्पचर, गोवर्धन मन्दिर, क्रीड़ा क्षेत्र, विशाल हैलिपैड और 2,3 किमी में फैला सुंदर, चौड़ा मार्ग। यहाँ आसपास के लोग प्रातः भ्रमण के लिए रोज आते हैं। आगे वरुणा-गंगा संगम तट पर स्थित प्रसिद्ध आदिकेशव घाट तक जाने का मार्ग है। लगभग 50 मीटर का मार्ग निर्माणाधीन है, शेष बन चुका है। यहाँ एक तरफ भजन मंडली भजन प्रारम्भ करने की तैयारी कर रही थी और हम पसीना पोंछते हुए, समय से पहुँच गए।

सबके साथ बैठकर, ताली बजाते हुए, लगभग 30 मिनट सीताराम-सीताराम... का गायन हुआ, लौटते समय आराम-आराम से जगह-जगह रुकते हुए लौटे । कुएँ का पानी पिये, पीर बाबा की पुलिया पर कुछ समय बैठ कर आराम किया, पंचकोशी चौराहे से ताजे फल खरीदते हुए घर पहुँचे हैं तो शरीर में 12 और घड़ी में लगभग 8 बज चुके थे।

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https://youtu.be/U-MToJ1lJ64?si=YrkS3-B4vBaeKIbp





O9 जुलाई 2024

18.6.24

कोरोना काल (2)

एकाकी जीवन 

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एकाकी जीवन की शुरुआत जुलाई 2020 से हुई। जौनपुर में अलग कमरा लेकर रहने लगा। बिस्तर तो मेरे पास था ही, कमरे में चौकी, पंखा पहले से था। 2-4 दिन रिस्क लेकर होटल में खाना खाया फिर धीरे-धीरे किचन के लिए सब आवश्यक सामान खरीद लिया। गैस सिलेंडर एक सहयोगी कर्मचारी ने उपलब्ध करा दिया। खाना पकाने का थोड़ा बहुत अनुभव तो पहले से था, जब फंसता तो फेसबुक में पोस्ट डाल देता जैसे...भुजिया/सब्जी बनाते समय करेला छिलना चाहिए कि नहीं? कोरोना काल में मित्र मानो खाली ही बैठे होते, कमेंट से कई सलाह दे देते। 

एक दिन सुबह चाय बनाने के लिए एक दिन पहले शाम का रखा एक पाव दूध उबाला तो फट गया! बहुत देर तक फटे दूध को उबलते देखता रहा फिर उसमें थोड़ा गुड़ झोंक दिया। चम्मच से तब तक हिलाता रहा जब तक लाल पेड़ा नहीं बन गया। रात की दो बासी रोटियाँ के साथ गुड़ पनीर को लपेट कर खा गया। मान लेता, यह मोदी जी की सलाह पर आफत को अवसर में बदलना हुआ।

एक कमरा, एक किचन, एक बरामदा, लैट्रिन, बाथरूम और थोड़ी खाली जगह बस इतनी ही जगह थी। शाम को छत में घूम सकते थे। मेरे कमरे में बहुत शांति रहती थी। इतनी शांति साधारण मनुष्यों के लिए दुर्लभ थी। ध्वनिप्रदूषण फैलाने वाले जड़/चेतन दोनो प्रकार के यंत्र नहीं थे। मित्र सलाह देते हैं, "बीबी नहीं ला सकते लेकिन टी.वी. तो ला सकते हो? 5, 7 हजार में मिल जाएगी।"

हम सोचते, सीरियल देखना नहीं है, समाचार चैनलों के निर्धारित कार्यक्रमों को सुनने और प्रचार देखने के लिए काहे अपना पैसा खर्च करें? 

इन चैनलों के मालिक, व्यापारियों को या राजनैतिक दलों को चाहिए कि आम जनता को मुफ्त में घर-घर टीवी बांटें और अनुरोध करें कि हमने आपको टी.वी. सप्रेम भेंट किया है तो कृपया मेरा वाला समाचार चैनल जरूर देखिए! 

दूसरा कहे...अच्छा! आपके घर टी.वी. लगाने में फलाने चैनल ने बाजी मारी तो क्या, हम आपको टाटा स्काई या डिश टी.वी. का एक साल का नेटवर्क मुफ्त भेंट करते हैं। आधे समय हमारा वाला चैनल देखिएगा! 

कोई दूसरा चैनल वाला झण्डू बाम या विक्स वेपोरब इस अनुरोध के साथ दे जाय कि हमारे चैनल में शाम को "खास टाइम" या "दंगल" देखने से जो सर दर्द हो जाय तो इसका इस्तेमाल करें!

इन चैनलों को विज्ञापन देने वाले व्यापारियों को भी चाहिए कि विज्ञापन के साथ कुछ पैकेट आम जनता को भी वितरित करें।

मतलब हम पैसा खर्च कर के टी.वी. लाएं, हम नेटवर्क की फीस भरें और देखें क्या, आपका एजेंडा? क्यों भाई, कब तक मूरख बनाओगे? 

बहुत शांति रहती थी कमरे में। पड़ोस में भी शांति थी। लगता था पड़ोसी भी समाचार नहीं देखते। भले चैनल हर समय समाचार दिखाता रहता हो। सुबह काम पर जाने वाले या स्कूल जाने वाले बच्चों के माता पिता, कितनी रात तक समाचार देखेंगे?  बहुत शांति थी पास पड़ोस में भी। सीलिंग फैन की आवाज भी न आती तो पता ही नहीं चलता कि हम धरती के प्राणी हैं!

एक बार एक अधिकारी और दो कर्मचारी के कोरोना पॉजिटिव होने के कारण ऑफिस लॉक हो गया।  समय मिला तो मन मचला। बैगन, टमाटर, आलू भूनकर चोखा बनाने का मन किया। गैस चूल्हे पर रखकर भूनने वाली जाली खरीदने बाजार चले गए। जाली के साथ, एक लोहे की छोटी वाली कड़ाही भी खरीद लिए। सोचा, बारिश हुई और पकौड़ी खाने का मन किया तो फिर कड़ाही के लिए दुबारा आना होगा। 

बरतन बेचने वाली एक महिला थीं। मैने पूछा बैगन, टमाटर तो जाली में रखकर भून लेंगे लेकिन आलू कैसे भूनेंगे? उसने बढ़िया आइडिया दिया, "आलू तो बिना पानी डाले कूकर में पका सकते हैं! आलू को बिना छिले धो कर दो फाँक कर लीजिए और एक चम्मच तेल कूकर में डालकर, उस पर आलू रखकर चढ़ा दीजिए। एक सीटी में आलू पक जाएगा।"

कमरे में आकर दिन में बनारसी अंदाज में बैगन, टमाटर भूनकर, हरी मिर्च, प्याज और कच्चे सरसों के तेल के साथ खूब स्वादिष्ट चोखा बनाया। अरहर की गाढ़ी दाल को देशी घी, जीरा से छौंक दिए। दाल, चावल और चोखा। वाह! उस दिन का लंच लाजवाब था ।

एक दिन शाम को बारिश तो नहीं हुई लेकिन एक मित्र तिवारी जी आ गए।  किचन में रखी, नवकी छोटकी कड़ाही बुलाने लगी। तिवारी जी आधा प्याज और एक बैगन काटकर, दो साबूत हरी मिर्च थाल में सजा दिए। इधर बेसन घुला, उधर कड़ाही चढ़ी आँच पर। वाह! मजा आ गया। खूब स्वादिष्ट पकौड़ी और चाय। हम भी मस्त, तिवारी जी भी खुश।

बेसन ज्यादा घुल गया था तो अंत मे उसे भी कड़ाही में उड़ेल कर पका दिए। रात में बेसन की सब्जी बन कर तैयार हो गई। लेकिन अब न भूख लग रही थी न रोटी बनाने का मन ही हो रहा था। किचन को शुभरात्रि बोला और सो गया। भूख लगेगी तब देखा जाएगा। 

जिस वक्त शाम को हम मोबाइल चार्जिंग में लगाकर खाना पका रहे होते, हमारे शुभचिंतक मित्र खाना पकने की प्रतीक्षा में खुद पक रहे होते। कोई काम तो रहता नहीं, फोन मिलाकर मेरा हाल चाल पूछने लगते थे! उनसे बतियाते हुए, खाना पकाने के चक्कर में सब्जी में कभी नमक ज्यादा हो जाता था, कभी मसाला जल जाता था। मोबाइल भी ठीक से चार्ज न हो पाए। फिर यह निश्चय किया कि खाना पकाते समय मोबाइल स्विच ऑफ रखना है। अब मोबाइल भी चार्ज हो जाती, खाना भी पक जाता। बुद्धि अनुभव से ही आती है। 

एक दिन सोच रहा था, दूध पी लूँ। दूध गाय का है या भैंस का मुझे नहीं पता था। इतना जानता था कि दूध प्लास्टिक के पैकेट में था और मैने दुकानदार से सिर्फ यह पूछा था.. दूध है? पैकेट किस कम्पनी का है, पैकेट के ऊपर क्या लिखा है, कुछ नहीं पढ़ा। फाड़ा, उबाला, उबल गया तो एक कप चाय बनाया और शेष ढक कर रख दिया था। रात के बारह बजा चाहते थे , सोच रहा था, दूध पी लूँ। फ्रिज नहीं था, सुबह तक फट जाएगा, पैसा बर्बाद हो जाएगा। सोच रहा था पलकें बन्द होने, नींद के आगोश में जाने से पहले दूध पी ही लूँ।  इतना आसान भी नहीं था दूध पीना। 5 घण्टे हो चुके थे, ठंडा हो चुका था, फिर उबालना नहीं पड़ेगा क्या? उबलने का इन्तजार करना फिर ठंडे होने का इन्तजार करना, बार-बार उबालने से जो बरतन जल जाता, उसे मांज कर रखना, सब आसान था क्या? जितनी आसानी से सोच लिया..दूध पी लो, उतना सरल था क्या? सरल तब लगता है जब श्रीमती जी रख देती हैं लाकर, टेबुल पर। अकेले घर में, दूध पीना आसान था क्या?

यू ट्यूब में पनीर और शिमला मिर्च की रेसिपी देखूँ या लाइव कविता सुनूँ? बड़ी समस्या थी। वहाँ कोई टोकने/रोकने वाला नहीं था। जितनी मर्जी फेसबुक चलाऊँ या फिर मिर्जापुर पार्ट 2 देखूँ या कोई पसंद की कोई किताब पढूं लेकिन जो आलू गोभी खरीद कर लाता उसे कच्चा तो खाया नहीं जा सकता था!

दिसम्बर का महीना था, कोरोना का आतंक कम हुआ था लेकिन अकेले रहने की आदत पड़ चुकी थी। एक दिन बाहर घना कोहरा था और सुबह से लोकल फाल्ट के कारण बिजली कटी हुई थी। पड़ोसी परेशान होकर सामने बरामदे में टहल रहा था। उसका परिवार बड़ा था और कई किराएदार थे। सुबह से बड़बड़ा रहा था ... भोर में पानी नहीं चलाए, पता नहीं बिजली कब आएगी! लेकिन हम मस्त थे। हमको सिर्फ एक बाल्टी पानी चाहिए थी । स्व0 नीरज याद आ रहे थे ....जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा!

एक दिन सोच रहा था, सभी खिड़कियाँ/दरवाजे बन्द होने पर भी कमरे में धूल कहाँ से आ जाते हैं? मेरे कमरे में जाले बुनने के लिए मकड़ियाँ कहाँ से आती है? सफाई न करूँ तो मेरे स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा? मटर के दाने चावल में और टमाटर दाल में डालकर पका दिया जाय तो सब्जी बनाने की क्या जरूरत है? सोच रहा था, आज इतना सोच लिया, शेष कल सोचेंगे। वास्तव में क्या होना चाहिए!

एकाकी जीवन के अनुभव ने एक ज्ञान दिया, "मन ठीक न हो तो खाना बेकार बनता है। दाल में नमक अधिक हो सकता है, सब्जी कच्ची रह सकती है, भात जल सकता है। इसलिए जब खाना खराब हो तो पत्नी पर नाराज होने के बजाय यह पता लगाने का प्रयास करो कि उसका मन दुखी क्यों हैं?"

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17.6.24

काव्यगोष्ठी (Udgar)

दिनांक 16 जून 2024 को udgar साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्था की 100 वीं काव्य गोष्ठी, स्याही प्रकाशन के कार्यालय में मनाई गई। 























https://gaongiraw.in/joyous-conclusion-of-the-100th-poetry-seminar-of-udgaar/ 

12.6.24

कोरोना काल (1)

कोरोना काल में हम रोज के यात्रियों का बनारस से जौनपुर जाना-आना असम्भव हो गया था। ट्रेने बंद हो चुकी थीं और बस भी कम ही चलती थी। कोरोना का इतना आतंक था कि मास्क और सेनिटाइजर के प्रयोग के बाद भी किसी कोरोना वाले के सम्पर्क में आ जाने का खतरा बना हुआ था। रोज के यात्रियों की संख्या 100 से अधिक ही थी। हर आदमी का जौनपुर में अलग-अलग फ्लैट लेकर रहना कठिन था लेकिन नौकरी तो करनी थी। न जौनपुर में इतने फ्लैट थे न सभी के लिए पूरे संसाधन जुटा कर अकेले रहना ही संभव था। परिणाम यह हुआ कि 5/7 की संख्या में अपने-अपने ग्रुप बनाकर लोगों ने जौनपुर में कमरा लेकर रहना शुरू किया।

हम पाँच मित्र(जिसमें सभी अधिकारी थे) को जल्दी ही एक महलनुमा घर की तीसरी मंजिल में एक बड़ा हॉल, एक बड़ा किचन, उचित दाम में किराए पर मिल गया। घर बहुत बड़ा था और जिस मंजिल में हम रहते थे, उसमें और दूसरा कोई परिवार न था। बरामदे में नहाओ, गलियारे में नाचो, छत में घूमो, कोई पूछने वाला न था। बिस्तर-चादर सब अपने-अपने घर से ले आए थे और किचन का सामान, बर्तन भी थोड़ा-थोड़ा सभी घर से ले आए थे। विकेंड में या किसी छुट्टी के एक दिन पहले हम मोटर साइकिल चला कर, कभी कार से जौनपुर-बनारस जाते-आते थे। कोरोना काल में उस समय हमे यह सबसे सुरक्षित लगा। मास्क, हेलमेट पहनने के बाद, सुनसान सड़क पर बाइक चलाना, संभावित कोरोना से बचने का सरल उपाय था। 

भोर में उठकर घूमने जाते, चाय पीने के बाद लौटकर बरामदे में मोटे पानी की धार से नहाते, मिलकर भोजन बनाते और ऑफिस जाते। ऑफिस से आने के बाद नहाना, चाय, तास और रोज एक पार्टी। शुक्र है कि कोरोना काल में बियर/शराब की दुकाने खुल गई थीं। सभी के घर वाले चिंतित रहते कि पता नहीं कैसे रहते होंगे, कैसे बनाते, खाते होंगे और हम रोज मौज उड़ा रहे थे जिसका ज्ञान घर वालों को न था। हमने एक बड़ी आपदा को अवसर में बदल दिया था। 

यह सब अधिक दिन नहीं चला। अति हर चीज की बुरी होती है। पार्टी सप्ताह/पंद्रह दिन में एक दिन ठीक होती है लेकिन यह रोज-रोज की पार्टी से मैं घबड़ाने लगा। मेरे पढ़ने, लिखने के शौक में यह बड़ी बाधा थी। रोज शाम को अकेले में मन कचोटता, यह क्या कर रहे हो? ऑफिस के पास एक कमरे का फ्लैट ढूंढने लगा। 2/3 महीने के भीतर ही मन मुताबिक एक फ्लैट मिल गया और मैं सबसे क्षमा मांगते हुए ग्रुप से अलग हो गया। धीरे-धीरे 'एकाकी जीवन' मुझे रास आने लगा।


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23.5.24

सुबह की बातें (15)

पार्क में, खूब ध्यान से देख रहा था पंछियो/हिरणों की मौज मस्ती। 

ठुमक-ठुमक कर मॉर्निंग वॉक कर रहा एक मोर, चलते-चलते दौड़ने लगा, दौड़ते -दौड़ते ठहर कर पँख फैला दिया और फिर बड़ी अदा से नृत्य करने लगा!

एक दूसरा मोर अनार के पौधों से लाँग जम्प करता हुआ आया और टहल रहे मोर से बतियाने लगा। 

दूर, लोहे के सलाखों से घिरे हिरण पार्क में मोरनियाँ मिट्टी से चुग रहे थीं अपना आहार।  

नीम की शाख में टांय-टांय कर रहे थे बहुत से तोते। कुछ डाल पकड़कर झूला झूल रहे थे, कुछ चोंच लड़ा रहे थे। 

एक कउआ उड़ता हुआ चोंच में एक तिनका दबाए हुए आया और बैठ गया हिरण की पीठ पर। उछलते-उछलते गरदन पर चढ़ गया और कान में तिनका घुसेड़ने लगा। हिरण घबड़ा कर दौड़ा और कउआ उड़ चला!

एक नीम के खोते में बैठा था उल्लूओं का जोड़ा, मैं जैसे-जैसे पास जाता, उनकी ऑंखें चौड़ी होती जाती! मैने सोचा, उजाले में उल्लू कहाँ देख पाते हैं और पास चलते हैं। पास जा कर फोटू खींचने लगा तो फुर्र से उड़ गए!!! 

कुछ तोते, कुछ कबूतर, कुछ हीरन कर रहे थे चहल कदमी। मुझे देख तेजी से भागने लगे मोर। तब तक कुछ और दो पाये भी आ गये थे पार्क में। देखते ही देखते मोर उड़ कर हो गए शालाखों के पार, वन विभाग की जमीन पर।

एक कोने में टप-टप टपक रही थी नल की टोंटी। चीख रही थीं, चरखी चिड़ियाँ। एक-एक कर उड़-उड़ बैठतीं टोंटी के ऊपर, लटकातीं गरदन और खोल देतीं अपनी चोंच। टप-टप टपकता पानी वरदान था उनके लिये। चौड़े मुँह वाले पात्र में, पास ही रखा था पानी। कूद-कूद भिंगोती पंख, फुर्र-फुर्र उड़तीं और फिर-फिर बैठतीं टपकते नल की टोंटी के ऊपर। 

अब मैं उनको सुनना चहता हूँ जिनकी बोली समझ में नहीं आती। अब मैं उनसे बतियाना चाहता हूँ जो मेरी बोली नहीं समझते। जिनकी बोली समझता हूँ, उनकी बोली इतनी मीठी नहीं लगती! 

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