दिनांक 14 फरवरी 2026, उदगार सभागार में प्रियंका तिवारी के ग़ज़ल संग्रह तुम्हारी ग़ज़ल के लोकार्पण समारोह की कुछ तस्वीरें।
बेचैन आत्मा
15.2.26
12.2.26
बसंत
आ! बसंत मंजर-सा हँसने
मेरे ताश महल में
पिछले बरस चली थी आँधी
महल उड़ा, तिनके-सा
मैं तो खुद कुछ देख न पाया
बिखर गया मनके-सा
क्यों बिजली हर बार गिरेगी
मेरे आस महल में?
ओरे-बोरे दर्द छुपाया
आँसू कथरी-कथरी
टांका बस पैबंद उम्र भर
भटका नगरी-नगरी
कमी नहीं कोई पाओगे
मेरे चहल-पहल में
क्या निर्धन की किस्मत में है
शीत, ताप ही सहना
क्या अमीर के कब्जे में ही
तुमको हरदम रहना
बना लिया क्या डेरा नियमित
तुमने राज महल में!
.... @देवेन्द्र पाण्डेय।
9.2.26
2.2.26
शतरंज
तभी
काला, सफेद चौसँठ खाने वाला बोर्ड लेकर
दो आदमी आए
सभी में प्राण फूँक जगाए
आमने-सामने बैठ कर रंग बाँट लिए
तुम काला, हम सफेद,
दोनो राजा
आपस में लड़ने लगे!
एक-एक कर
कभी पैदल, कभी घोड़ा....
सभी शहीद होने लगे
तभी
एक आदमी बोला-मात!
दूसरे ने मायूस होकर स्वीकार किया अपनी हार।
अगले ही पल
दोनो आदमी
मोहरों को डिब्बे में भरने लगे
राजा-रानी के साथ
सभी जानवर, पहले की तरह
कठुआए, एक दूसरे से चिपककर गहरी नींद सो गए।
यह सब देख
आकाश में विचरण करते देवता
ठहाके लगाने लगे-
हमने मनुष्य बनाए
लेकिन उनको
लड़ना/लड़ाना तो नहीं सिखाया था
यह खेल इन्होने
अपने से सीखा है।
......
बनारस
कोई
ठुमका लगा रहा था और वह
ठुमक-ठुमक
उछल रही थी!
मणिकर्णिका घाट था वह।
बगल में
हर हर महादेव के नारे लग रहे थे
गंगा स्नान के बाद
भक्त
दर्शन के लिए जा रहे थे
विश्वनाथ धाम था वह।
मणिकर्णिका के बगल में
सिंधियाघाट
ऊपर संकठा माता का मन्दिर
अन्नकूट का शृंगार था वहाँ।
यह कोई
नई बात नहीं थी,
चिताएं कभी बुझती नहीं,
पतंग रोज उड़ता है,
हर हर महादेव के नारे रोज लगते हैं
अन्नकूट न सही
माँ संकठा की आरती
रोज होती है।
बनारस
जितना मरना जानता है उतना जीना जानता है
उसे मालूम है,
"राम नाम सत्य है।"
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