2.2.26

शतरंज

कड़ाकी ठण्ड में 
पने राजा, अपनी रानी और अपने सिपाहियों के साथ 
श्वेत, श्याम रंग के
कुछ जानवर 
एक डिब्बे में कठुआए 
एक दूसरे से चिपके पड़े थे
न कोई झगड़ा, न कोई रगड़ा
ॐ शान्ति।

तभी

काला, सफेद चौसँठ खाने वाला बोर्ड लेकर

दो आदमी आए 

सभी में प्राण फूँक जगाए

आमने-सामने बैठ कर रंग बाँट लिए

तुम काला, हम सफेद,

दोनो राजा

आपस में लड़ने लगे!


एक-एक कर

कभी पैदल, कभी घोड़ा....

सभी शहीद होने लगे

तभी

एक आदमी बोला-मात!

दूसरे ने मायूस होकर स्वीकार किया अपनी हार।


अगले ही पल

दोनो आदमी

मोहरों को डिब्बे में भरने लगे

राजा-रानी के साथ

सभी जानवर, पहले की तरह

कठुआए, एक दूसरे से चिपककर गहरी नींद सो गए।


यह सब देख 

आकाश में विचरण करते देवता 

ठहाके लगाने लगे-

हमने मनुष्य बनाए 

लेकिन उनको

लड़ना/लड़ाना तो नहीं सिखाया था

यह खेल इन्होने 

अपने से सीखा है।

......

बनारस

बिछी लाशें और जलती चिताओं के ऊपर
एक पतंग उड़ रही थी,
कोई
ठुमका लगा रहा था और वह
ठुमक-ठुमक
उछल रही थी!
मणिकर्णिका घाट था वह।

बगल में
हर हर महादेव के नारे लग रहे थे
गंगा स्नान के बाद
भक्त
दर्शन के लिए जा रहे थे
विश्वनाथ धाम था वह।
मणिकर्णिका के बगल में
सिंधियाघाट 
ऊपर संकठा माता का मन्दिर 
अन्नकूट का शृंगार था वहाँ।

यह कोई
नई बात नहीं थी,
चिताएं कभी बुझती नहीं, 
पतंग रोज उड़ता है,
हर हर महादेव के नारे रोज लगते हैं
अन्नकूट न सही
माँ संकठा की आरती 
रोज होती है।

बनारस 
जितना मरना जानता है उतना जीना जानता है
उसे मालूम है,
"राम नाम सत्य है।"
........

31.1.26

बनारस की एक शाम

 











कवि सम्मेलन

रविदास पार्क में मनाई जा रही है रविदास जयंती। चल रहा है कवि सम्मेलन। असि घाट में नृत्य, संगीत और गंगा आरती। बनारस के गंगा घाटों पर सुबह ही नहीं शाम भी बेहद खूबसूरत होती है। कवि सम्मेलन के वीडियो यू ट्यूब चैनल bechainatma में है।













29.1.26

बोधिश्री

 आज 28 जनवरी 2026 को अपराह्न "  बौद्धायन सोसाइटी "   संस्था के  प्रकल्प 'बोधिश्री' (बुजुर्गों को भावनात्मक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से गठित संस्था) के बैनर तले मासिक बैठक हुई  जिसका नाम 'चिड़ पिड़ चूँ चूँ' दिया गया। इसका उद्देश्य बोधिश्री के अंग देवेन्द्र पाण्डेय जी की सद्य:प्रकाशित व्यंग्य पुस्तक 'चिड़ पिड़ चूँ चूँ' " के लिये बधाई  और प्रथम कैलेण्डर वर्ष का अभिनन्दन  करना था जिसके लिये बैठक में  डॉ अभय जैन,वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल सिंह,  योगेन्द्र सिन्हा ,श्री शिवपूजन मौर्य,देवेन्द्र पाण्डेय  ,श्री राजीव गौड़ ,श्रीमती शशि श्रीवास्तव  शामिल थे। 

इस अवसर पर  वरिष्ठ सदस्य डाॅ अभय जैन  जी ने देवेन्द्र पाण्डेय जी को शाॅल ओढ़ाकर सम्मानित और प्रोत्साहित किया ।  पाण्डेय जी की पुस्तक  का जनार्पण भी हुआ। स्वादिष्ट अल्पाहार के पश्चात पुस्तक पर थोड़ी 'चिड़ पिड़ चूँ चूँ'  मतलब चर्चा हुई। अगली बैठक में पुस्तक पर विस्तृत चर्चा/समीक्षा होने की उम्मीद है।

अगले महीने भ्रमण पर जाने का प्रस्ताव भी रखा गया । 

सभी का हार्दिक धन्यवाद 

डाॅ मञ्जरी पाण्डेय 

सचिव, बौद्धायन






काशी काव्य संगम

 26 जनवरी, काशी काव्य संगम की काव्य गोष्ठी में व्यंग्य संग्रह चिड़ पिड़ चूँ चूँ के लिए सम्मानित किया गया।








26.1.26

चिड़ पिड़ चूँ चूँ

राजकीय पुस्तकालय, वाराणसी में वरिष्ठ साहित्यकारों के कर कमलों द्वारा बसंत पंचमी के दिन हुआ पुस्तक 'चिड़-पिड़ चूँ-चूँ' का भव्य विमोचन।






















हिंदी व्यंग्य का तीखा, सजीव और सशक्त दस्तावेज़ — चिड़ पिड़ चूँ चूँ

समकालीन हिंदी व्यंग्य साहित्य में एक सशक्त और विशिष्ट हस्तक्षेप के रूप में वरिष्ठ कवि, व्यंग्यकार एवं यात्रा-वृत्त निबंधकार देवेंद्र पांडेय ‘बेचैन आत्मा’ की नवीनतम कृति “चिड़ पिड़ चूँ चूँ” पाठकों के सम्मुख उपस्थित है। यह पुस्तक केवल व्यंग्यों का संग्रह नहीं, बल्कि आधुनिक समाज, व्यवस्था और व्यक्ति की मानसिकता का ऐसा एक्स-रे है, जो मुस्कान के साथ-साथ गहरी बेचैनी भी पैदा करता है।

इस संग्रह में छोटे-छोटे सैकड़ों व्यंग्य सम्मिलित हैं—जो आकार में भले ही लघु हों, किंतु प्रभाव में अत्यंत व्यापक, तीक्ष्ण और दूर तक असर करने वाले हैं। लेखक ने इनमें सामाजिक विसंगतियों, नैतिक पतन, अवसरवादिता, दिखावटी सभ्यता, राजनीतिक छल, प्रशासनिक जड़ता और आम आदमी की विवशताओं को अत्यंत सहज, मारक और व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है। हर व्यंग्य एक ऐसा दर्पण है, जिसमें पाठक हँसते-हँसते स्वयं को और अपने आसपास की व्यवस्था को पहचानने लगता है।

देवेंद्र पांडेय ‘बेचैन आत्मा’ की व्यंग्य दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि पाठक को सोचने, सवाल करने और आत्ममंथन के लिए विवश करती है। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और आम बोलचाल के बेहद निकट है, जिससे व्यंग्य सीधे पाठक के मन तक पहुँचता है। कटाक्ष, प्रतीक, संकेत, विडंबना और सहज हास्य का संतुलित प्रयोग इस पुस्तक को न केवल पठनीय, बल्कि स्मरणीय भी बनाता है।

यह महत्वपूर्ण कृति स्याही प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है—जो समकालीन हिंदी साहित्य में गुणवत्तापूर्ण, विचारोत्तेजक और मूल्यवान पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्रतिष्ठित नाम है। पुस्तक का संपादन देश के वरिष्ठ संपादक एवं साहित्यकार पंडित छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ द्वारा किया गया है। उनकी सूक्ष्म दृष्टि, भाषा-संवेदना और साहित्यिक अनुशासन ने इस संग्रह को एक सुसंगठित, प्रभावशाली और संग्रहणीय स्वरूप प्रदान किया है।

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अब हिंदी व्यंग्य प्रेमियों के लिए यह महत्वपूर्ण पुस्तक “चिड़ पिड़ चूँ चूँ” देश-विदेश में सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध है। पाठक इसे प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से आसानी से मँगवा सकते हैं—

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क्यों पढ़ें “चिड़ पिड़ चूँ चूँ”?
✔ यदि आप केवल हँसना नहीं, बल्कि सच्चाई से रूबरू होना चाहते हैं।
✔ यदि आप समाज और व्यवस्था को व्यंग्य की पैनी दृष्टि से समझना चाहते हैं।
✔ यदि आप हल्के शब्दों में कही गई गहरी बातों का आस्वाद लेना चाहते हैं।

👉 “चिड़ पिड़ चूँ चूँ” एक ऐसी व्यंग्य पुस्तक है, जो आपको मुस्कुराने के साथ-साथ सोचने के लिए भी विवश करेगी।
आज ही अपने पुस्तकालय में शामिल करें—क्योंकि हर दौर को उसका व्यंग्य चाहिए।