18.8.19

लोहे का घर-56

पाण्डे जी का चप्पल
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जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था। चढ़े तो अपनी बर्थ पर किसी को सोया देख, प्रेम से पूछे.…भाई साहब! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? वह शख्स पाण्डे जी की तरह शरीफ नहीं था। हाथ नचाते हुए, मुँह घुमाकर बोला...यहाँ जगह नहीं है, आगे बढ़ो! अब पाण्डे जी को भी गुस्सा आ गया और जोर से बोले..यह मेरी बर्थ है। अब वह आदमी एकदम से सीरियस हो गया! समझ गया कि मुसीबत आ गई है। थोड़ा सिकुड़ते हुए बोला..बैठ जाइए। एक तो रात साढ़े ग्यारह बजे आने वाली ट्रेन तीन घण्टे लेट, रात ढाई बजे आई उप्पर से यह आदमी! पाण्डे जी और जोर से बोले...पहले आप पूरी तरह से उठ जाइए और कोई दूसरी खाली जगह तलाशिए। शोर सुनकर दूसरे यात्रियों की  नींद डिस्टर्ब हो रही थी। तरह-तरह की आवाजें आने लगीं..

अरे भाई साहब! जब यह आपकी बर्थ नहीं है तो उठ क्यों नहीं जाते?, अजीब आदमी है! शराफत से बोलो तो कोई समझता ही नहीं! आदि आदि।

परिस्थियाँ अपने प्रतिकूल पा कर वह आदमी खिसियाते/ बड़बड़ाते हुए उठा..अब साठ किमी बाकी था, लीजिए अपनी सीट, हम खड़े-खड़े चले जाएंगे। पाण्डे जी भी बड़बड़ाये... बड़ी कृपा है आपकी जो इतनी जल्दी समझ गए। सहयात्री भी बड़बड़ाए..अब सो जाइए आप भी, हमको भी सोने दीजिए।
घण्टों प्लेटफॉर्म पर ट्रेन की प्रतीक्षा से थके मादे पाण्डेजी को जैसे ही बर्थ मिली, झोला बगल में दबा कर, गहरी नींद सो गए।

सुबह उठकर जब बाथरूम जाने के लिए चप्पल ढूँढने लगे तो चप्पल गायब! वह यात्री भी नहीं दिखा जिससे झड़प हुई थी। इधर-उधर निगाहें दौड़ाई तो देखा, 4,5 बर्थ आगे बाएँ पैर का चप्पल अकेले बिसुक रहा है! विश्वास जगा, एक है तो दूसरा कहाँ जाएगा!!! एक चप्पल कोई पहन कर थोड़ी न ले जाएगा, भूल से पहनकर चला गया हो तो भी उसका तो होगा, कम से कम नङ्गे पाँव घर तो नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन हाय! पाण्डेजी पूरी बोगी क्या, अगल बगल की सभी बोगियाँ छान आये, दाहिने पैर के चप्पल को नहीं मिलना था, नहीं मिला। कूड़े बीनने वाले किशोर को भी प्रलोभन दिया...मेरा एक चप्पल नहीं मिल रहा, ढूँढ दो तो तुम्हें ईनाम देंगे। लड़के ने बाएँ पैर के चप्पल को गौर से देखा और खून जलाया..ई त एकदम नया लगत हौ! फिर बिजली की फुर्ती से कोना-कोना ढूँढा और दस मिनट में अपना फैसला सुना दिया...चप्पल ट्रेन में नहीं है, किसी ने जानबूझ कर बाहर फेंक दिया है।

लोहे का घर-55

क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?
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न जाने कौन टेसन उतरेगा, बनारस से चढ़ा, पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में घुस कर, सफर कर रहा देसी कुत्ता! सौ/दो सौ किमी की यात्रा के बाद जब वह उतरेगा ट्रेन से तो उस पर कितना भौंकेंगे अनजान शहर के कुत्ते! क्या जी पायेगा चैन से? क्या हो जाएगी वहाँ के कुत्तों से दोस्ती? क्या मान लेंगे वे इसे अपना साथी? और क्या लौट कर देख पायेगा कभी अपनी जन्म भूमि? कैसे पहचानेगा वह, कौन सी है, बनारस जाने वाली ट्रेन?

मन में, ढेर सारे प्रश्न लेकर, देर तक देखता रहा मैं उसको। उतारना चाहा तो भौंकने लगा! जैसे पूछ रहा हो..तुम क्या सही ट्रेन में बैठे हो? 

अब मैं वाकई सोच रहा हूँ..क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ? अपने हक की रोटी के लिए क्या मुझे कभी नहीं करना पड़ा संघर्ष? क्या कोई, कभी, मुझे काटने नहीं दौड़ा? क्या इस ट्रेन में चढ़ने से पहले मेरे पास कई विकल्प थे? क्या मैं खूब सोच समझ कर चढ़ा हूँ इस ट्रेन में या जो ट्रेन मिली, उसी पर चढ़ गया? क्या मुझे अपनी मंजिल का ज्ञान है? क्या बहुत बड़ा फर्क है उस कुत्ते में और मुझ में? या सिर्फ इतना कि वह कुत्ता है इसलिए पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में, बिना टिकट , सफर कर रहा है और मैं मनुष्य हूँ, इसलिए टिकट कटा कर सीट पर बैठा हूँ। वह गलत दिसा में जा रहा है तो क्या मेरा मार्ग सही है? मैने उसे सही रास्ता दिखाने का प्रयास किया तो वह मुझ पर भौंका! क्या कोई मुझे सही राह दिखाता है तो मैं चुपचाप मान लेता हूँ? क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?

14.7.19

न बिकने वाले घोड़े

वह अस्तबल नहीं, देश का जाना माना, एक प्राइवेट प्रशिक्षण संस्थान था जहाँ देश भर से घोड़े उच्च शिक्षा के लिए आते। संस्थान में कई घोड़े थे। मालिक चाहता कि सभी घोड़े और तेज दौड़ें. और तेज..और तेज। इस 'और' की हवस को पाने के लिए वह अनजाने में ही घोड़ों के प्रति क्रूर होता चला गया। धीरे-धीरे घोड़े भी मालिक के स्वभाव से अभ्यस्त हो गये। दौड़ने का उत्साह जाता रहा।  प्रभु से प्रार्थना करने लगे कि हे प्रभु! कोई सौदागर भेज दे तो इस मालिक से जान बचे। मालिक भी सोचने लगा कि घोड़े अच्छे दामों में बिकें तो संस्थान का और नाम हो, अगले साल सीजन में, और अच्छे घोड़े मिलें, और कमाई हो।

प्रशिक्षण की अवधी समाप्त होने से पहले ही संस्थान में व्यापारी आने लगे। मालिक घोड़ों की पीठ थपथपाता और व्यापारियों से अपने घोड़ों की खूब तारीफ करता मगर सौदागर बार-बार यही कहता---मुझे घोड़े तो दिखाओ! तुमने तो इस अस्तबल में गधे पाल रखे हैं!!!

व्यौपारी, खूब जांच परख कर, घुड़दौड़ के बाद, चैम्पियन घोड़ों पर, गधे का दाम लगाते। घोड़े सोचते..बच्चू! चलो ठीक है, आज तुम्हारी बारी है, कल जब हम बड़े रेस में दौड़ेंगे तो कोई और व्यापारी मिलेगा जो हमारी सही कीमत समझेगा। जो घोड़े बिक जाते वे कुलाँचे भरते हुए पार्टी करते, जो नहीं बिक पाते मायूस हो जाते। न बिकने वाले घोड़े सोचते.. घर वालों ने हमारी पढ़ाई में सब कुछ दांव पर लगा दिया, अब घर किस मुँह से जांय? घर वाले भी कहते..और प्रयास करो, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। 

देश में बढ़ रही हैं कम्पनियाँ, बढ़ रहे हैं प्रशिक्षण संस्थान और बढ़ रहे हैं न बिकने वाले घोड़े। घोड़ों पर दाम लगाने की जिन पर जिम्मेदारी है वे सदियों से यही समझ रहे हैं कि देश में व्यापार बढ़ रहा है। देश हमारे भाषणों से खूब तरक्की कर रहा है।

न बिकने वाले घोड़े, गले में प्रशिक्षण प्राप्त होने का पट्टा बांधे, शहर-शहर, सड़क-सड़क, मारे-मारे फिरते हैं। हर वर्ष बढ़ रही है इनकी संख्या। मुझे डर है कि ऐसे ही बढ़ती रही इनकी संख्या तो एक दिन ये जान जाएंगे कि हम गधे या घोड़े नहीं हैं। हम भी व्यौपारियों की तरह, प्रशिक्षकों की तरह, अधिकारियों की तरह, नेताओं की तरह एक आम इंसान हैं और हमें भी, भर पेट रोटी खा कर, जीने का अधिकार है। जिस दिन जान जाएंगे वे दरवाजे तोड़ कर घुसेंगे जरूर..व्यापारियों के घरों में, जिम्मेदारों के सदन में और अगर संतुलन अधिक गड़बड़ाया तो हमारे/आपके घरों में भी। 

12.7.19

लोहे का घर-54

ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, अनचाहे प्लेटफार्म पर, कोई युवा रुक जाता है। ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। मैं बाहर उतरकर देखने लगा..माजरा क्या है? कब होगा हरा सिगनल?

मेरे इस प्रश्न का  उत्तर किसी के पास नहीं था। अनिर्धारित प्लेटफॉर्म पर रुकी ट्रेन कब चलेगी? यह एक यक्ष प्रश्न है। जैसे बेरोजगार युवक को नहीं पता होता कि उसे कब नौकरी मिलेगी? वैसे ही ट्रेन के यात्रियों को भी नहीं पता होता कि लाल सिगनल कब हरा होगा? रुकने का समय पता हो तो यात्री उतने समय का सदुपयोग कर लेंगे। आसान हुआ तो सड़क मार्ग से जल्दी घर पहुँच जाएंगे। चाय नाश्ता कर लेंगे, कोई पिकनिक स्थल हुआ तो घूम आएंगे। जो मर्जी सो कर लेंगे। उन्हें ऐसा नहीं लगेगा कि हम कहाँ कैद हो गए! कितने यात्री तो ऐसे भी होते हैं जिन्हें आगे, मात्र 6 किमी की दूरी पर, निर्धारित प्लेटफार्म से दूसरी ट्रेन पकड़नी है। पता हो, एक घण्टा नहीं जाएगी तो 6 किमी कोई रिक्शा ही पकड़कर  पहुँच जाय। बहुत समय हो तो कहीं खेत में घुसकर पकड़म पकड़ाई ही खेल लें! लेकिन इधर रिक्शे में बैठे, उधर ट्रेन चल दी तो? शायद रेलवे वाले जानते हैं कि आम आदमी के पास बरबाद करने के लिए खूब समय होता है। बेरोजगार को मालूम हो कि जो फॉर्म वह भर रहा है, उसका परिणाम बुढ़ौती में आएगा तो वह फॉर्म भरे ही क्यों? मनमर्जी रोकें मगर रेलवे को यात्रियों को बताने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि ट्रेन जब तक रुकी रहे, लोग अपने सुविधानुसार समय का सदुपयोग कर लें। जैसे ट्रेन के आने/जाने की घोषणा करते हैं वैसे ही यह भी घोषणा करवा दें...यात्रीगण कृपया ध्यान दें! ट्रेन नम्बर 13484 शिवपुर स्टेशन पर एक घण्टे आराम की मुद्रा में खड़ी रहेगी, यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद है। 

ट्रेन से उतरकर पटरी-पटरी आगे बढ़ने लगा। इंजन के पास, जनरल बोगी के बाहर बहुत अधिक भीड़ थी। खीरा वाले, आइसक्रीम वाले, लस्सी वाले, पकौड़ी वाले, ठंडा पानी/मैंगोजूस वाले, गुटखा/पान वाले सभी तैनात थे। ऐसा लग रहा था जैसे गांव का कोई मेला लगा है! पास जाकर खीरे वाले से पूछा..क्या बात है? उस बोगी के सामने इतनी भीड़ क्यों लगी है? खीरे वाले ने जो जवाब दिया वह चौंकाने वाला था...एक मिली के लइका भयल हौ! (एक महिला को पुत्र पैदा हुआ है)! मुझे लगा, मुझे अपने यक्ष प्रश्न का उत्तर मिल गया। गम्भीर हो कर बोला..अच्छा! तभी ट्रेन इतने देर से रुकी है? दुकानदार झल्ला गया...नाहीं मालिक! ट्रेन रुकल हौ, एहसे ओहके यहीं लइका हो गयल। ( नहीं भाई! ट्रेन रुकी है, इसलिए महिला को यहीं लड़का हो गया!) मैं सोचने लगा..ट्रेन घंटों से न रुकी होती तो शायद महिला को अस्पताल में बच्चा होता। तब? क्या वह स्वस्थ है? तभी लोकल ग्रामीण महिलाओं का दल आता दिखा। उन्होने घोषणा किया.. जच्चा/बच्चा दोनो स्वस्थ हैं। जो-जो जरूरी काम था हम लोगों ने बोगी में चढ़ कर पूरा कर दिया! 

ग़ज़ब का देश है यह! ऐसा केवल भारत में ही सम्भव होगा। ट्रेन इतनी लेट हुई कि रास्ते में ही महिला को लड़का हो गया! और ट्रेन कब तक रुकेगी नहीं पता लेकिन लोकल ग्रामीण महिलाएं ट्रेन में चढ़कर सकुशल डिलीवरी करा कर उतर भी गईं! मैने लस्सी पी, पान खाया और अपना माथा पकड़ कर बगल के एसी कोच में घुस गया। यहाँ का नजारा एकदम भिन्न! यहाँ किसी को कोई फिकर नहीं! किसी को कुछ पता नहीं कि बगल की बोगी में एक महिला ने बच्चा जना! सभी अपने अपने मोबाइल में डूबे हुए! यह तो वही बात हुई कि घर में कोई बीमार पड़े और बीमार को पड़ोसी अस्पताल ले जांय लेकिन घर वालों को पता ही न हो! बहुत देर बाद एक ने मोबाइल से गरदन निकालकर पूछा...यह कौन सा स्टेशन है? 

22.6.19

लोहे का घर-53




इस मौसम की पहली बारिश हुई जफराबाद स्टेशन में। झर्र से आई, फर्र से उड़ गई। ढंग से सूँघ भी नहीं पाए, माटी की खुशबू। प्रयागराज जाने वाली एक पैसिंजर आ कर भींगती हुई खड़ी हो गई। बड़ी इठला रही थी! गार्ड ने हरी झण्डी दिखाई तो कूँ€€€ चीखते, शोर मचाते/भींगते चली गई। अभी थोड़ी दूर नहीं गई होगी कि रुक गई बारिश। उमसिया गई होगी। गरम तवे पर, छन्न से भाप बन कर उड़ने वाले पानी के छीटों की तरह, नहाई होगी, पैसिंजर।

खुश थे कुछ धूल भरे पत्ते, मिट्टी से उठ ही रही थी सोंधी-सोंधी खुशबू, तभी रुक गई बारिश। आ गई अपनी फिफ्टी डाउन। एक घण्टे देर कर दी आज आने में। जरूर बारिश में नहाने के चक्कर मे रुक गई होगी कहीं।

बड़ी उमस वाली गर्मी है। पसीने-पसीने हुए हैं लोग। ट्रेन चले तो हवा भीतर आये। चलने पर राहत है। खेतों की मिट्टी में दिख रही है नमी। लगता है दूर तक हुई है, थोड़ी-थोड़ी बारिश। लगता है राजा ने न्याय किया है! सभी को बराबर-बराबर बांटा है बारिश का पानी। असली खबर तो मीडिया बताएगी। जब घर जा देखेंगे समाचार।



देर से रुकी है #ट्रेन अनिर्धारित प्लेटफार्म पर। मौके का फायदा उठा रहा है एक #छोकरा। साइकिल में बेच रहा है पानी। मैने कहा..एक फोटू खिंचवाओ! उसने बेफिक्री से कहा..हींच लो.।


वीरापट्टी में, दो सहेलियों की तरह अगल बगल खड़ी हो, देर से बतिया रही हैं, दून और फिफ्टी। दोनो के बीच मे खड़े हैं रोज के यात्री। जो पहले चलेगी, उसी में चढ़ेंगे! ट्रेने हैं कि चलने का नाम ही नहीं ले रही। इनकी बातें खतम ही नहीं हो रही। 

फिफ्टी ने दून से कहा..हाय दून! अभी तक यहीं हो! इतनी लेट? दून झल्ला रही है...तुम राइट टाइम हो न? फिर क्यों खड़ी हो? बात करती हो। क्या चलना, रुकना हमारे हाथ में है?  फिफ्टी ने कहा..सुनो न, यात्री लोग कित्ती गन्दी-गन्दी गाली दे रहे हैं हमको। ये नादान हैं, नहीं जानते कि अपने बस में कुछ भी नहीं, सबकी डोर ऊपर वाले के हाथ मे है।


वीरपट्टी के बाद अगले स्टेशन शिवपुर में, फिर रुकी देर तक #दून। पता चला, अभी मालगाड़ी आगे गई है। #फिफ्टी अभी वीरपट्टी में ही होगी। यहाँ भी इसका स्टॉपेज नहीं है। बकायदा लस्सी, पान की दुकानें खुल गई हैं इस वीराने में भी। पता नहीं, इन लोकल दुकानदारों की स्टेशन मास्टर से कोई सेटिंग तो नहीं है! कि जैसे ही कोई एक्सप्रेस आये, मालगाड़ी छोड़ देना!!!

18.6.19

पिता जी



        गंगा की लहरें, नाव, बाबूजी और तीन बच्चे। इन तीन बच्चों में मैं नहीं हूँ। तब मेरा जन्म ही नहीं हुआ था।

पिताजी के साथ अपनी बहुत कम यादें जुड़ी हैं लेकिन जो भी हैं, अनमोल हैं। सबसे छोटा होने के कारण मैं उनका दुलरुआ था। इतना प्यारा कि शायद ही कोई मेरा बड़ा भाई हो जिसने मेरे कारण पिटाई न खाई हो। साइकिल चलाना, गंगाजी में तैरना सिखाना, यहाँ तक कि सरकारी प्राइमरी स्कूल में दाखिला दिलाने भी पिताजी नहीं गए। मेरी टांग टूटे या खोपड़ी फूटे, बुखार आए या पेट झरे, सब जगह बड़े भाई ही दौड़ते। वे सिर्फ डांटते और पैसा देते। उनका मानना था कि सारी मुसीबतें मेरी ही बुलाई हुई हैं। मैं यह समझता हूँ कि पिताजी के पैसे पेड़ में उगते हैं जिन्हें खर्च कराना ही मेरा एकमात्र उद्देश्य है!  प्रत्यक्ष पिताजी कुछ नहीं करते थे लेकिन उनका होना ही मेरे लिए सब कुछ था।

जब तक वे थे मैं आस्तिक था, जब वे नहीं रहे, नास्तिक हो गया। जवानी में कदम रखने से पहले ही वे भगवान के घर चले गए। पिताजी क्या गए मैने उनके सभी भगवानो की छोटी मूर्तियों को, पॉलिथीन में रखा और बक्से में बंद कर दिया। जब पिताजी को नहीं बचा सकते तो भगवान का क्या काम?

एक बार, पिताजी के कंधे पर बैठ, नाटी ईमली का भरत मिलाप देखने गया था। नाटी इमली का भरत मिलाप मतलब बनारस का लख्खा मेला। लाखों की भीड़ में घंटों कंधे पर बिठा कर घुमाने वाला पिताजी के अलावा दूसरा कौन हो सकता था! वे पिता जी ही थे।

जब गणित के किसी सवाल में अटकता, पूछने पर, पिताजी बता देते। वे अधिक नहीं पढ़े थे लेकिन उनके पास मेरे सभी प्रश्नों का हल होता था।

जब हाई स्कूल का रिजल्ट आया, गणित में सौ में 92 नम्बर देख बहुत खुश थे। खुश होकर बोले..मैं तुम्हें ईनाम दूँगा। शाम को मेरे लिए एक टेबल लैम्प ले कर आए! पहले ईनाम में पिज्जा/बर्गर खिलाने या मोबाइल दिलाने का चलन नहीं था।

पिताजी शतरंज के दुश्मन और ब्रिज के खिलाड़ी थे। ब्रिज के खेल में चार खिलाड़ी होते हैं। जब वे तीन होते तो मुझे बुलाकर अपना पार्टनर बना लेते। मैं केवल पत्ते पकड़ता और कलर की  बोली बोलता। बोली फाइनल होते ही मेरे पत्ते या तो बिछ जाते या पिता जी के हाथों चले जाते।

पिताजी एक नम्बर के धोबी और तमोली थे। सुबह उठकर पान के छोटे-छोटे टुकड़े काटते, पान के बीड़े बनाते और उन्हें एक छोटे से लाल कपड़े में लपेट कर, स्टील के पनडब्बे में सहेजते। झक्क सुफेद धोती, कुर्ता पहन कर ऑफिस जाने से पहले घर भर के कपड़े धोना, नील और टीनोपाल से चमकाना उनकी आदत थी। वे भयंकर परिश्रमी थे। उनकी कंजूसी से उनके ईमानदारी का पता चलता था। दस पैसा बचाने के लिए एक दो कि.मी. पैदल चलना आम बात थी।

बाबू जी के मित्र थे स्व0 अमृत राय जी। शायद अपनी साहित्यिक गतिविधियों से पीछा छुड़ाकर यदा-कदा बाबूजी से मिलने ब्रह्माघाट आते। शाम को नैया खुलती और लालटेन की रोशनी में देर शाम तक जाने क्या बातें होती!

तब मैं छोटा बच्चा था। मेरी समझ में कुछ न आता। अमृत राय से बाबूजी की कैसी मित्रता! बाबूजी को धर्मयुग, हिन्दुस्तान, सारिका, कादम्बिनी पढ़ने के अतिरिक्त अन्य किसी साहित्यिक गतिविधी में हिस्सा लेते नहीं देखा। मैं भी अमृत राय के बारे में कुछ जानता न था। उन्हें कभी भाव नहीं देता। वे परिहास करते-कभी तुम्हारे बाबूजी से मेरी कुश्ती हो तो कौन जीतेगा? मैं ध्यान से दोनों को देखता। अमृत राय, बाबूजी से खूब लम्बे, मोटे-तगड़े थे। मैं उनकी बातें सुन हंसकर भाग जाता। कई बार ऐसा हुआ तो एक दिन मुझसे भी रहा न गया। झटके से बोल ही दिया-बाबा आपको उठाकर पटक देंगे!

बाबूजी मेरा उत्तर सुन अचंभित हो मुझे डांटने लगे-तुमको पता भी है किससे बात कर रहे हो? ये मुंशी प्रेम चन्द्र जी के पुत्र हैं। जिनकी कहानियाँ तुम्हारे कोर्स की किताब में पढ़ाई जाती है। चलो! माफी मागो। मैं कुछ कहता इससे पहले अमृत राय जी ने मुझे गोदी में उठा लिया और हंसकर बोले-अरे! बिलकुल ठीक उत्तर दिया लड़के ने। यही उत्तर मैं इसके मुँह से सुनना चाहता था।

पिताजी की मृत्यु 8 जून 1980 के बाद अमृत राय जी का एक अन्तरदेसीय शोक सन्देश आया था और कुछ याद नहीं।

वे कहा करते..रिटायर होते ही हम भी चले जाएंगे। हम सोचते..पता नहीं कहाँ जाएंगे! भारतीय जीवन बीमा निगम से रिटायर होते ही एक दिन वे बीमार पड़े और फिर नहीं उठे। पन्द्रह दिनों की बीमारी के बाद हमे ही उन्हें उठाना पड़ा। उनके शरीर मे कितने रोग थे यह उनके बीमार पड़ने पर डॉक्टरों से ही पता चल पाया। जब तक जीवित थे, मेरे शक्तिमान थे।

लोहे का घर-52

गरमी के तांडव से घबराकर घुस गए ए. सी. बोगी में। दम साधकर बैठे हैं लोअर बर्थ पर। बाहर प्रचण्ड गर्मी, यहाँ इतनी ठंडी कि यात्री चादर ओढ़े लेटे हैं बर्थ पर! ए. सी.बोगी में गरमी तांडव नहीं कर पाती, गेट के बाहर चौकीदार की तरह खड़ी हो, झुनझुना बजाती है। पैसा वह द्वारपाल है जो हर मौसम को अपने ठेंगे पर रखता है।

भीतर दो यात्री बैठने के प्रश्न पर तांडव मचा रहे हैं। लोअर बर्थ वाला बैठना चाहता है, मिडिल बर्थ वाला लेटना चाहता है। मिडिल बर्थ वाला कहता है.. मेरी बर्थ है, मैं क्यों गिराऊँ? मुझे नहीं बैठना, लेटना है। लोअर बर्थ वाला नियम बता रहा है..सुबह छः बजे से शाम दस बजे तक आप सो नहीं सकते। आपको बर्थ गिराना होगा। मन कर रहा है, जाकर नियम की जानकारी दूँ। बुद्धि कहती है.. चुपचाप बैठो रहो, झगड़े में पड़े और किसी ने पूछ लिया..आपकी कौन सी बर्थ है तो? जो खुद गलत हो उसे दूसरे को सही/गलत का उपदेश नहीं देना चाहिए। कछुए की तरह मुंडी घुसाकर हरि कीर्तन करना चाहिए। खैर कुछ सही लोग भी थे अगल-बगल जिन्होंने मामला सुलझाया और झगड़ा आगे नहीं बढ़ा।
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शाम के 6 बज चुके हैं लेकिन लोहे के घर की खिड़कियों से घुसी चली आ रही हैं सूर्य की किरणें। ढलते-ढलते भी, दहक/चमक रहे हैं, सुरुज नरायण! भीड़ है लोहे के घर में। एक स्लीपर बोगी के लोअर बर्थ में एक महिला लेटी हुई थीं। न वो उठने को तैयार हुईं न किसी की दाल गली। मैने कहा..आप आराम से लेटिए, मुझे बस, मिडिल बर्थ उठाने दीजिए। वो तैयार हो गईं। अब मैं भी लेटा हूँ मिडिल बर्थ में, वो भी सो रही हैं आराम से। जो महिला को उठाने का प्रयास कर रहे थे, मुँह बनाकर आगे बढ़ चुके। थोड़ा दिमाग चलाओ, प्रेम से बोलो तो बिगड़े काम भी बन सकते हैं। झगड़ने या कानून बताने से आसान काम भी कठिन हो जाता है।

गरमी का हाल यह है कि किसी टेसन में जब गाड़ी रुकती है तो प्यासे यात्री, खाली बोतल लेकर, पानी की तलाश में, प्लेटफॉर्म पर दौड़ते/भागते नजर आते हैं। इनमें मिडिल क्लास के मध्यमवर्गीय हैं, जनरल बोगी के गरीब हैं। इनमें सबके वश में नहीं होता, ए. सी. क्लास की तरह मिनिरल वाटर खरीदना। हैंडपम्प के इर्द-गिर्द गोल-गोल भीड़ की शक्ल में जुटे सभी यात्रियों में एक समानता है, सभी आम मनुष्य हैं। पलटकर बार-बार देखते रहते हैं ट्रेन। कहीं चल तो नहीं दी! कान खरगोश की तरह इंजन के हॉर्न पर, निगाहें अर्जुन के तीर की तरह बूँद-बूँद गिर रहे पानी पर। जिसकी बोतल भर जाती है, जरा उसकी विजयी मुद्रा तो देखिए! आह! जनम का प्यासा लगता है। खड़े-खड़े घुसेड़ देना चाहता है पूरी बोतल, अपने ही मुँह में! गट गट, गट गट।

ट्रेन का हारन बजा, रेंगने लगी प्लेटफॉर्म पर। भीड़ काई की तरह छंट गई। जो खाली बोतल लिए लौटे उनके चेहरे ऐसे लटके हुए थे जैसे धर्मराज जूएँ में हस्तिनापुर हार गए हों! जो बोतल भर कर लौटे वे ऑस्ट्रेलिया को विश्वकप में हराने वाली क्रिकेट टीम की तरह उछल रहे थे! गरमी का और आनन्द लेना हो तो जनरल बोगी में चढ़ना पड़ेगा। जब पड़ती है मौसम की मार तब पता चलता है कि आदमियों के कई प्रकार होते हैं। एक लोहे के घर में कई प्रकार की बोगियाँ होती हैं। स्वर्ग भी यहीं है, नर्क भी यहीं है। 

भगवान का नहीं, उत्तर रेलवे के नियंत्रक का शुक्र है कि ट्रेन हवा से बातें कर रही है। हवा भी ट्रेन से बातें करते-करते, खिड़कियों के रास्ते मुझे छू कर निकल रही है। गर्म है तो क्या! हवा तो हवा है। नियंत्रक सो जाय या किसी काम में डूबा सिगनल देना भूल जाए तो ट्रेन रुक सकती है। ट्रेन के रुकते ही हवा भी रुक सकती है। सूरज के साथ नियंत्रक ने भी तांडव दिखाया तो आम आदमी हवा के लिए भी मोहताज हो जाएंगे। अब चीजें मुफ्त नहीं मिलतीं। धूप, हवा और पानी मुफ्त लुटाने वाले भगवान को भी नहीं पता कि उनके बाद धरती पर नियंत्रक और भी हैं। 
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सुबह 9 बजे का समय है। वाराणसी कैंट से आगे बढ़ चुकी है, हावड़ा-अमृतसर। बहुत ही शानदार दृश्य है। पाँच पंजाबी महिलाएं मिस्सी रोटी और आम का अचार खा रही हैं और खाते-खाते आपस में खूब बतिया रही हैं। आप कहेंगे इसमें शानदार क्या है?
शानदार यह है कि तीन महिलाएं, सामने के तीन बर्थ पर, एक के ऊपर एक क्रम से बैठी हैं और दो, साइड लोअर/साइड अपर बर्थ पर, एक के ऊपर एक। मैं तस्वीर खींचने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। सभी बहुत हट्टी-कट्टी हैं। 
बगल की बोगी से एक और आ गयीं..ओए! कित्थे बैठी है? अब छवों महिलाएं, भंयकर अंदाज में, रहस्यमयी बातें कर रही हैं! अपने इलाके की महिलाएं भी जब रहस्यमयी अंदाज में आपस में, बतियाती हैं तो कोई बात अपने पल्ले नहीं पड़ती, यह तो पंजाबन हैं। इनके हाथ नचाने के ढंग, आँखें फाड़ कर चौंकने का अंदाज और किसी को कोसने जैसा हावभाव देख कर लगता है कि छठी महिला ने जरूर कोई नई खबर शेयर करी है, जिससे ये अपनी मिस्सी रोटी हाथों में धरे-धरे बतियाने में मशगूल हो गई हैं।
छठी महिला अपना काम कर के जा चुकी हैं। अब पाँचों फिर से चटखारे ले कर मिस्सी रोटी खा रही हैं और नई जानकारी पर बहस कर रही हैं। एक चाय वाला आया और सभी चाय-चाय चीखते हुए, चाय लेकर पीने लगीं। चाय पी कर लेट गईं और अब लेटे-लेटे बतिया रही हैं। इनको फोन से बात न हो पाने और नेटवर्क न मिलने का काफी मलाल है। सभी अपनी- अपनी कम्पनी को कोस रही हैं। हाय रब्बा! कोई नई मिलदा नेटवर्क!!! सही बात है, आपस में कितना बतियाया जाय? नेटवर्क मिलता तो कुछ दारजी से भी बातें हो जातीं।