7.7.20

शुभ/अशुभ

बिल्ली ने
दो बच्चे दिए बारिश में
भगा दिया था
दिन में
फिर आकर, रो रहे हैं
रात में

खाली नहीं है शायद
किसी के घर/आँगन का कोई कोना
आ गए हैं
मेरे ही चहारदीवारी के भीतर
रो रहे हैं,
मेरे ही कपारे पर!

बिल्ली को
ऐसा क्यूँ लगता है?
कॉलोनी में
मैं ही सबसे बड़ा दयालू हूँ!

सुनता आया हूँ...
बिल्ली का रोना अशुभ होता है
रोते को चुप कराने की क्षमता न हो तो
आसान है
उसे मारकर भगा देना
लेकिन जैसे ही भगाना चाहता हूँ
पूछती हैं
अँधेरे में चमकती ऑंखें...
चली तो जाऊँ लेकिन इतना बता दो,
किसका रोना शुभ होता है?
..................…................

20.6.20

चीनियाँ बदाम

वे पहले बहुत हँसमुख थे, अब मास्क मुख हो गए हैं। जब तक उनकी झील सी गहरी आँखों में न झाँको, पहचान में ही नहीं आते। बारिश में भीगते हुए, पुलिया पर बैठकर, चीनियाँ बदाम फोड़ रहे थे!

मैने पूछा..पगला गए हैं का शर्मा जी! बारिश में भींगकर कोई मूँगफली खाता है?  

वे क्रोध से आँखें तरेर कर बोले..आपको नहीं न मालूम की जहाँ हमारे सैनिक शहीद हुए हैं, वहाँ कितनी ठंड पड़ती है!

मूँगफली से शहीदों का क्या संबंध? 

ई मूँगफली नहीं, चीनियाँ बदाम है। एक दाना तोड़ते हैं तो ऐसी फिलिंग आती है जैसे चीनियों की खोपड़िया फोड़ रहे हैं! 

मैं गम्भीर हो गया। सचमुच पगला गए हैं शर्माजी! चीनियाँ बादाम को भी चीनियों से जोड़ दिए! 

अपना मोबाइल तो नहीं फोड़ दिए?

मोबाइल क्यों फोड़ेंगे? बुड़बक हैं का? लेकिन तय कर लिए हैं.. चीन का कोई समान नहीं खरीदना है तो नहीं खरीदना है।

तब चीनियाँ बदाम क्यों खरीदे?

ई त हमरे देश की खेती है। इसका नाम चीनियाँ पड़ा तो जरूर इसमें चीन की कोई बात होगी। देखिए! जैसे चीनी नाटे-छोटे, गोल मटोल होते हैं, वैसे ही होते हैं इसके दाने। शायद इसीलिए...

नहीं भाई शर्मा जी! यह बादाम की एक प्रजाति है। अब यह तो हमको भी नहीं पता कि इसका का नाम चीनियाँ क्यों पड़ा लेकिन इतना जानते हैं कि इससे चीन का कोई लेना देना नहीं है। चीन से हम भी नाराज हैं, शहीदों की याद में हम भी दुखी हैं लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि हम बारिश में भीग कर चीनियाँ बदाम फोड़कर समझें कि हमने चीनियों की खोपड़ी फोड़ दी! यह तो पागलपन हुआ।

तब का करें? इस उमर में बंदूक लेकर लद्दाख जाएं?

नहीं.... धैर्य बनाइए और अपने देश के प्रधानमंत्री पर भरोसा कीजिए। वो जो करने को कहें वही कीजिए। अभी तो आप घर जाइए और कोरोना से बचिए। जान है तो जहान है।

आप तो भक्त हैं। आप तो वही करेंगे जो मोदी जी कहेंगे!

अरे भाई! मोदी जी देश के प्रधानमंत्री हैं। किसी देश का प्रधानमंत्री जब बोलता है तो उसके शब्दों में देश के विशेषज्ञों, विद्वान सलाहकारों के विचार शामिल होते हैं। वह सबसे सलाह लेकर ही कुछ बोलता है। हमें चुनावी भाषण और आपातकाल में दिए गए भाषणों में फर्क करना सीखना चाहिए और संकट के समय उनकी कही हर बात माननी चाहिए। इसी में देश की और सभी की भलाई है। जैसे नदी की धार में, नाव पर बैठे यात्री माझी की बात न मानें और उठकर अपने मन से इधर-उधर चलने/बैठने लगें तो नाव पलट जाती है वैसे ही संकट के समय देश के प्रधानमंत्री की सलाह मानने में ही भलाई है। नाव किनारे लग जाय तो फिर गलतियाँ गिनाकर उसे दिनभर कोसते रहना। 

शर्मा जी को मेरी बात समझ में आ गई। वे पुलिया से उतरकर घर चले गए। पता नहीं विरोधियों को यह बात कब समझ में आएगी! 
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14.6.20

जब भी मिलता है सम्मान...

जब भी
मिलता है सम्मान
कहता
भीतर का इंसान
तूने
रूप बनाया है!
तूने
झूठ सुनाया है!
दिल में खंजर रख कर सबको
गले लगाया है।

जब भी मिलता है सम्मान.....

तेरा
होता है सब काम
बाबू
करते सभी सलाम
तूने
चाय पिलाया है
तूने
पान खिलाया है
सूटकेस में गड्डी भर-भर,
घर पहुँचाया है।

जब भी मिलता है सम्मान....

तेरा
जगमग है दिनमान
चाहे
डगमग हिंदुस्तान
मंदी में भी तेरी चउचक
चलती है दुकान!

जब भी मिलता है सम्मान....

तूने
ग़दर मचाया है
तूने
शहर जलाया है
धर्म, जाति के नाम पे सबको
खूब लड़ाया है।

जब भी मिलता है सम्मान.....
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

28.5.20

लोहे के घर की खिड़की से

लोहे के घर की खिड़की से
बगुलों को
भैंस की पीठ पर बैठ
कथा बाँचते देखा।

धूप में धरती को
गोल-गोल नाचते देखा।

घर में लोग बातें कर रहे थे...
किसने कितना खाया?
हमने तो बस फसल कटे खेत में
भैस, बकरियों को
आम आदमी के साथ भटकते देखा।

खिड़की से बाहर चिड़ियों को
दाने-दाने के लिए,
चोंच लड़ाते देखा।

सूखी लकड़ियाँ बीनती,
माँ के साथ कन्धे से कन्धा मिलाये भागती
छोरियाँ देखीं। 

गोहरी पाथती,
पशुओं को सानी-पानी देती,
घास का बोझ उठाये
खेत की मेढ़ पर
सधे कदमों से चलती
ग्रामीण महिलायें देखीं।

लोहे के घर की खिड़की से
तुमने क्या देखा यह तुम जानो, 
हमने तो
गन्दे सूअर के पीछे शोर मचा कर भागते
आदमी के बच्चे देखे।
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24.5.20

बच्चे

रोटी पर बैठकर
उड़े थे
कोरोना खा गया रोटी
पैदल हो गए
सभी बच्चे

तलाश थी
ट्रेन की, बस की
कुचले गए
पटरी पर, सड़क पर

हम
धृतराष्ट्र की तरह
अंधे नहीं थे
देखते रहे दूरदर्शन
देखते-देखते
मर गए
कई बच्चे!

शहर से
पहुँचे हैं घर
बीमार हैं, लाचार हैं
जागते/सोते
देखते हैं स्वप्न...
रोटी का सहारा हो तो
उड़ चलें
फिर एक बार
यहाँ तो
डर है! नफरत है!
कैसे रहें?
..........

20.5.20

बह रही उल्टी नदी.....


तुम नदी की धार के संग हो रहे थे
फेंककर पतवार भी तुम सो रहे थे।

बह रही उल्टी नदी, अब क्या करोगे?
क्या नदी के धार में   तुम फिर बहोगे?

चढ़ नहीं सकती पहाड़ों पर नदी
है   बहुत  लाचार देखो यह सदी।

डूब जाएंगे सभी घर, खेत, आंगन
या तड़प, दम तोड़ देगी खुद अभागन!

किंतु सोचो तुम भला अब क्या करोगे?
बच गए जो भाग्य से क्या फिर बहोगे?

बहना पड़े गर धार में, इतना करो तुम
पतवार भी यूँ भूलकर मत फेंकना तुम

फिर नदी उल्टी बही तो, लड़ सकोगे
जब तलक है प्राण, आगे बढ़ सकोगे।
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18.5.20

दृष्टि

हम सभी को मिली है
दृष्टि संजय की!
देख सकते हैं दशा
कुरुक्षेत्र की।

धृतराष्ट्र बन पूछते
कितने मरे?
आज तक घायल हुए
कितने बताओ?

चल रहे हैं सड़क पर
मजदूर सारे
लड़ रहे हैं निहत्थे
क्रूर पल से।

ठीक है किंतु अब तुम
यह बताओ?
क्या कोई, अपना/सगा
घायल पड़ा है?

दूर है काल फिर तो
भय नहीं है
दृष्टि बदलो अब जरा
गाना सुनाओ।