7.1.26

गुजरात यात्रा

..........दिनांक: 17-12-2025 की सुबह.....

लम्बी यात्रा की ट्रेन है, लगभग 3000 किमी, गोहाटी से ओखा। हम इसमे बनारस से चढ़े हैं, द्वारिका पहुँचना है।  सारनाथ के एक दर्जन मन से युवा बने हुए मित्रों के साथ हम भी युवा बन, स्लीपर में चढ़े हैं। इतनी लम्बी यात्रा स्लीपर में करने के लिए तन भी जवान और बलिष्ट होना चाहिए। जाड़े में ठंड से बचने के उपाय तो कर लिए, चादर, स्लिपिंग बैग, तकिया रख लिए, लोअर बर्थ है लेकिन भीड़ का क्या करें? 

भारतीय रेल के दावों के विपरीत जनरल टिकट के यात्री वेटिंग के नाम पर पूरी बोगी में भीड़ की संख्या में घुस आए हैं। कल 10 बजे दिन से शुरू हुई यात्रा आज सुबह के 7 बजने वाले हैँ कोटा से आगे रतलाम आने वाला है लेकिन भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही। 


एक दर्जन साथी हैं लेकिन सभी अलग-अलग बोगी में हैं। गनीमत है कि मेरे सामने लोअर बर्थ में एक सत्तर वर्षीय युवा हैं जो सुबह से 3 बार इस भीड़ में रास्ता बनाकर बाथरूम जा चुके। हर बार लौट कर बड़बड़ाते हैं, "अब कब्बो स्लीपर में यात्रा न करब, बाथरूम जाये में आफत हौ!" 


इस भीड़ में भी चाय बेचने वाले वेंडर रास्ता बनाते हुए चाय बेच रहे हैं, "चाय ले लो भाई चाय, गरम चाय!" क्या मजाल की थोड़ी भी गरम चाय रास्ते में पसरे यात्रियों पर गिरे! सब कुछ संभालना और संतुलन बनाकर चाय बेच देना, बड़ी बात है। ऐसे ही नहीं कोई चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया, विलक्षण प्रतिभा रही होगी। भयंकर भीड़ का सामना करना, चाय-चाय चीखते हुए संतुलन बनाकर चाय बेचना, पैसा लेना और साथी वेंडरों से प्रतिस्पधा करते हुए आगे बढ़ना मजाक नहीं है। भारत में ही संभव है। ट्रम्प भले गाल बजाएँ, अमेरिका ऐसा प्रतिभावान नेता विश्व को दे ही नहीं सकता।

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वडोदरा जंक्शन से लगभग 10 km दूर है छायापुरी स्टेशन। साहित्यकार बहन छाया शुक्ला  को स्टेशन के बारे में वाट्सएप से जानकारी दी। मैने पहली बार नाम सुना तो थोड़ा आश्चर्य हुआ कि बहन के नाम का स्टेशन भी है!

नडियाद रेलवे स्टेशन में जब गाड़ी रुकी तो इसके उटपटांग नाम ने आकर्षित किया। गूगल सर्च किया तो पता चला यह सरदार बल्ल्भ भाई पटेल का जन्म स्थान है। इसके अलावा यहाँ संतराम मन्दिर, माई मन्दिर, स्वामी नारायण मन्दिर और दूसरे भी दर्शनीय स्थान हैं।


दिन के 12.40 हो चुके। अब अगला स्टेशन अहमदाबाद है। जाड़ा कहीं उड़ चुका है। प्रचंड धूप है। लोहे के घर की खिड़की से सूर्य की किरणे प्रवेश कर रही हैं। इनर, स्वेटर, जैकेट सब उतर कर झोले में पैक हो चुका। शर्ट पहनना मजबूरी है। लोहे का घर नीजी नहीं एक सार्वजनिक घर है, यहाँ की अपनी मर्यादा है।


एक पतली नदी पार किया ट्रेन ने। नदी किनारे लकड़ी जल रही थी और कुछ लोग जमा थे। कुछ पक रहा था। मतलब बहरी अलंग का आनंद लेने वाले बनारस में ही नहीं गुजरात में भी हैं। जाड़े की हालत यह है कि यहाँ ट्रेन में वेंडर चिल्ला-चिल्ला कर ठंडा-ठंडा अमूल लस्सी बेच रहे हैं! ट्रेन अहमदाबाद से 15 km पहले देर से रुकी है। अभी निर्धारित समय से बिफोर है शायद इसलिए सिगनल नहीं मिला होगा। 

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अहमदाबाद से आगे विरामगाम स्टेशन अहमदाबाद जिले में स्थित एक कस्बा है। यह तीन तरफ झीलों से घिरा हुआ है। गंगा सागर, धुनियाँ और मुनसर। गूगल में तीनों झीलों के इतिहास के साथ वर्णन मिल जाएंगे। रोचक ऐतिहासिक जानकारियों के अतिरिक्त यह भी पता चला कि धीरू भाई और भाजपा नेता हार्दिक पटेल यहाँ से जुड़े हुए हैं।


आगे सुरेन्द्र नगर रेलवे स्टेशन है जो राजकोट डिवीजन के अंतर्गत आता है। सुरेंद्रनगर का पुराना नाम मुख्य रूप से वाधवान (Wadhwan) था, जिसे पहले वर्धमानपुरी भी कहा जाता था, और यह क्षेत्र झालावाड़ के नाम से भी जाना जाता था; आजादी के बाद, 1947 में तत्कालीन शासक महाराजा सुरेंद्र सिंह जी के सम्मान में इसका नाम बदलकर सुरेंद्रनगर कर दिया गया। 


राजकोट


राजकोट गुजरात का एक प्रमुख नगर है। यह सौराष्ट्र क्षेत्र के बीच में है और राजकोट ज़िले का मुख्यालय भी है। आजी नदी राजकोट के बीच से बहती है और इसे दो भागों में विभाजित करती है। यह जसदण के समीप पहाड़ों में उत्पन्न होती है और 164 किलोमीटर (102 मील) बहकर जामनगर के समीप कच्छ की खाड़ी में बह जाती है। यहाँ रामकृष्ण आश्रम, रानी लक्ष्मीबाई सर्कल, वॉटसन संग्रहालय, शॉपिंग मॉल आदि दर्शनीय स्थल हैं। प्राचीन सभ्यता और आज़ादी की लड़ाई से राजकोट का बहुत नजदीकी संबंध रहा है। राजकोट का सोनी बाज़ार गुजरात में स्थित सोने का सबसे बड़ा बाज़ार है। 'राजकोट छोटे ट्रैक्टरों की जन्मस्थली है।'


राजकोट के रास्ते में जगह जगह पनचक्की दिखाई दे रही थी। अब ट्रेन आगे बढ़ी जाम नगर की ओर। सूर्यास्त हो चुका और बाहर अँधेरा हो चुका। आगे द्वारिका के मार्ग में यह ट्रेन समुन्द्र के किनारे-किनारे चलेगी। अँधेरा हो चुका इसलिए कुछ दिखना असम्भव लगता है।

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दिनांक: 18-12-2025

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देर शाम लगभग 10 बजे द्वारिका पहुँचे। सभी अच्छे भवन, धर्मशालाएं बुक थीं। एक हॉल जैसा बड़ा कमरा 3000/- प्रति रात की दर से मिल गया जिसमें 8 बेड और 4 अतिरिक्त बिस्तर लगे थे और दो बाथरूम थे। न ठण्डी न गर्मी, मौसम सुहाना था। कमरे में 4 सीलिंग फैन लटके थे, जिसकी हवा पर्याप्त थी। सफर के थके सभी कुछ खा कर गहरी नींद सो गए।


सुबह नहा धो कर 20/-प्रति व्यक्ति देकर दो ऑटो से द्वारिकाधीश मन्दिर से सटे गोमती तट पर पहुँचे तो सूर्योदय हो चुका था। जल छिड़काव कर गोमती में स्नान कर लेने का पुण्य भाव लिए हमने द्वारिका दर्शन के लिए निःशुल्क सरकारी सुविधा का उपयोग करते हुए अपनी मोबाइलें जमा करा दी और मन्दिर द्वार से प्रवेश करते हुए पंक्ति बद्ध खड़े हो गए। 


एक लम्बी लाइन के बाद मन्दिर का भव्य दर्शन प्राप्त हुआ। मन्दिर के भीतर पर्दे में द्वारिकाधीश विराजमान थे। बीच-बीच में पर्दा हटता और भक्त दर्शन पा मुग्ध हो जाते। भीतर द्वारिकाधीश का श्रृंगार चल रहा था। मूर्ति में कलात्मक ढंग से चंदन लगाए जा रहे थे। हमको पंक्ति में खड़े-खड़े ही चंदन और मुकुट श्रृंगार देखने का सुख मिला। 

द्वारिकाधीश के दिव्य दर्शन के बाद बाहर निकले तो छोटी बड़ी कई प्रतिमाओं के दर्शन हुए जिनमे देव भिन्न रूपों में सज्ज थे। वहाँ से 56 सीढ़ी उतरकर उसी घाट पर बाहर निकले जहाँ दर्शन के गोमती स्नान किया था।


अपनी-अपनी मोबाइल लेने के बाद सभी बनारसी भक्त एक गुजराती रेस्टोरेंट में जुट कर अपने मन के अनुसार नाश्ता करने लगे। पोहा, जिलेबी, ढोकला, उपमा से लेकर समोसा और कचौरी का भी इंतजाम था। मात्र 700/-में सभी 12 साथियों का भरपूर नाश्ता हो गया। नाश्ते का बाद कुछ लोगों का मन का रूम में जाकर आराम करने का, अधिक लोगों का मन द्वारिका से दूर-दूर स्थिति मंदिरों के दर्शन करने का था। सबका कहना था दूर का काम आज ही निपटा लिया जाय, हालांकि हमारे पास द्वारिका घूमने के लिए 2 रात और 2 दिन थे। 


हमने 300/-प्रति ऑटो की दर से दो ऑटो तय किया जो हम 12 सदस्यों को शाम तक द्वारिका दर्शन कराने वाला था। ऑटो वाले ने सबसे पहले हम लोगों को भड़केश्वर महादेव का दर्शन कराया। जो समुन्द्र तट पर स्थिति एक सुन्दर शिव मन्दिर है। वहाँ एक स्थान पर लिखा था, 'सन सेट प्वाइंट' मैने ऑटो वाले भाई से कहा भी, "यहाँ तुमको शाम को लाना था।" उसने ठीठाई से जवाब दिया, "आप शाम को भी आ जाना।" भड़केश्वर महादेव से रुक्मिणी देवी मन्दिर दर्शन करते हुए पहुँचे शिवराजपुर बीच। शिवराजपुर बीच में हमने नौका विहार किया। गोवा, केरल, तमिलनाडु, जगन्नाथ पूरी समुन्द्र बीच तो बहुत घूमे लेकिन समुन्द्र में छोटा ही सही मोटर बोट से घूमने का पहला अनुभव रहा। हर कांड का पहला अनुभव प्यारा और यादगार होता है, यह भी आनंद दायक रहा।


शिवराजपुर बीच से हम नागेश्वर महादेव दर्शन करने गए। नागेश्वर द्वारिका-गुजरात में स्थिति प्रसिद्ध शिवमन्दिर है जिसे ज्योतिर्लिंग की मान्यता मिली हुई है। नागेश्वर शिव मन्दिर से सटा शिव की एक विशाल प्रतिमा है।  मन्दिर में प्रवेश के लिए लम्बी लाइन है लेकिन मोबाइल पर प्रतिबंध नहीं है। केवल दर्शन करते वक्त, मुख्य शिवलिंग के सामने मोबाइल अपने जेब में रखना पड़ता है। शिवलिंग के अलावा अंदर मंदिर परिसर में शिव, पार्वती, नन्दी की झरना युक्त प्रतिमा है। देवी शक्ति और शनिदेव के मन्दिर हैं। कुछ नाग नागिन की प्रतिमाएं भी हैं। नागेश्वर महादेव में भगवान शंकर का नाग रूप में और देवी पार्वती का नागिन रूप में पूजा होती है। नाग-नागिन का जोड़ा भी चढ़ाया जाता है।


नागेश्वर महादेव से भेंट द्वारिका के रस्ते में सुदर्शन बृज मिला। सुदर्शन सेतु (Sudarshan Setu) भारत का सबसे लंबा केबल-आधारित पुल है, जो गुजरात में ओखा मुख्य भूमि को भेंट द्वारका द्वीप से जोड़ता है। इस पर भगवद गीता के श्लोक और भगवान कृष्ण की छवियां भी हैं।


गुजरात में द्वारका के पास अरब सागर में स्थित एक द्वीप है, जो भगवान कृष्ण का निवास स्थान माना जाता है और पौराणिक कथाओं के अनुसार यहीं पर श्री कृष्ण और उनके मित्र सुदामा की भेंट हुई थी, इसलिए इसे 'भेंट' द्वारका कहते हैं, जहाँ कृष्ण-सुदामा की मूर्तियों वाला मंदिर प्रमुख है और इसे सुदामा द्वारा लाए गए चावल के उपहार के कारण महत्व दिया जाता है। संक्षेप में, भेंट द्वारका एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है जहाँ भक्त भगवान कृष्ण के साथ सुदामा की मित्रता और उनके मिलन की याद में आते हैं, और यह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का केंद्र है।  भेंट द्वारिका में मोबाइल पहले ही रखवा ली जाती है।  भगवान कृष्ण के विभिन्न सुन्दर मूर्तियों का दर्शन करते हुए हम आगे बढ़ते हैं। भीड़ वाली लाइन होती है लेकिन दर्शन आराम से हो जाते हैं। 

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18 दिसम्बर को ही हमने लगभग पूरी द्वारिका घूम ली। दूसरे दिन यानि आज 19 दिसम्बर के लिए कुछ शेष न रहा। ट्रेन भी शाम 8.50 की थी। ओखा वेरावल एक्सप्रेस से जाना था सोमनाथ। सोमनाथ से सबसे निकट का स्टेशन है वेरावल। आराम-आराम से उठते, नश्ता/भोजन करते हमने दिन के 2 बजा दिए।  होटल मालिक दो बार चेक आउट टाइम याद दिलाकर गया तब हमने रूम छोड़ा। यहाँ से स्टेशन मात्र 500 मीटर की दूरी पर था लेकिन धूप तेज था तो कुछ ने ऑटो पकड़ लिया कुछ ने हिम्मत नहीं छोड़ा और पैदल ही स्टेशन पहुँच गए। स्टेशन के प्रतीक्षालय का हमने भरपूर उपयोग किया और अपनी गलतियाँ गिनाते रहे, "जब आज इतना समय था तो एक ही दिन द्वारका घूमने की कल क्या जरूरत थी? कल होटल था, दर्शन के बाद, खाना खा कर आराम से सोते और आज शाम तक द्वारका घूम कर स्टेशन आ जाते!"  ऐसे ही कमियाँ गिनाते, लाभ गुनगुनाते, शाम हो गई और मित्र शाम के नश्ता/ भोजन पैक कराने की बात करने लगे।


ट्रेन सही समय पर, पूरी भीड़ लेकर आईं। चढ़ने में थोड़ी दिक्क़त हुई लेकिन अपने बर्थ पर पहुँचने के बाद कोई परेशानी नहीं। इस बार बर्थ भी आराम दायक थे। 6 एक कूपे में, 6 दूसरे कूपे में। मतलब सभी 12 लोग एक ही बोगी में क्रम से बैठे थे। 


हमको छोड़ सभी आनंद में थे। हमारे साथ समस्या यह थी कि बनारस से चलने से पहले सर्दी जुखाम से पीड़ित थे, धीरे-धीरे ठीक हो रहे थे। यात्रा के भय ने दवाई ले ली, जुखाम तो ठीक हो गया, खांसी बढ़ गई। पूरी रात खाँसते बीतती, दिन घूमते। द्वारिका पहुँचने के साथ जो खाँसी चिपक गई कि आज तक उतरी नहीं। हमारी खाँसी से सभी परेशान हुए, इसका मुझे हमेशा अफ़सोस रहेगा।


अपनी ट्रेन 20 दिसम्बर भोर में ही वेरावल पहुँच गई। यहाँ सोमनाथ दर्शन करने के बाद सड़क मार्ग से दिउ जाने की योजना थी। यहाँ भी दो ऑटो वाले से बात तय हो गई। उससे प्रति ऑटो 1500/-की दर से त्रिवेणी संगम में स्नान कराकर, सोमनाथ के सभी प्रमुख मन्दिरों में दर्शन कराकर सोमनाथ मन्दिर में छोड़ देने की बात तय हो गई। सूर्योदय के समय हम त्रिवेणी संगम तट पर थे, जहाँ ऊपर सुलभ शौचालय बने हुए थे। 


सोमनाथ का त्रिवेणी संगम गुजरात में हिरण, कपिला और पौराणिक सरस्वती नदियों का पवित्र मिलन स्थल है, जहाँ ये नदियाँ अरब सागर में मिलती हैं; यह स्थान भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ स्नान से पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति की मान्यता है। 


हम बनारसियों को सुलभ शौचालय के बाद सूर्योदय के समय संगम तट पर स्नान का अवसर बड़ा ही मनोनुकूल था। 

सभी ने बड़े चाव से तैराकी के हाथ दिखाते हुए संगम स्नान किया और नए वस्त्र धारण कर सोमनाथ घूमने के लिए जल्दी-जल्दी सज्ज हो गए। हमने भी खाँसी भूल संगम स्नान किया और जय सोमनाथ के नारे लगाए।


ऑटो वाले ने हमको नदी किनारे, राधा कृष्ण मन्दिर, बलदेव जी मन्दिर, लक्ष्मी नारायण मन्दिर, श्रीकृष्ण की चरण पादुका, कामनाथ महादेव, राम मन्दिर, श्री कृष्ण का बाल रूप मन्दिर, तालाब आदि रमणीक स्थलों के दर्शन कराए। एक महादेव मन्दिर में वृद्ध माताएं भजन-कीर्तन भी करती दिखीं। दोनो हाथों से झाँझ बजाते हुए गुजराती में भजन गुनगुना रही थीं।


इसके बाद ऑटो वाले ने हमको एक अनोखा नजारा दिखाया जहाँ समुन्द्र के किनारे कुछ दूरी पर दो शिवलिंग स्थापित थे और समुन्द्र की अपार जलराशि शिवलिंग का अनवरत जलाभिषेक कर रही थी। 

इन वीशिष्ट मंदिरों के दर्शन कराने के बाद ऑटो वाले ने अपने वादे अनुसार हमको सोमनाथ मन्दिर के द्वार के पास छोड़ दिया। 


हमने यहाँ भी मितव्ययता का सहारा लिया। सामान, मोबाइल जमा करने के खर्च को भी साफ बचा ले गए। दो मित्रों के भरोसे सब सामान और मोबाइल छोड़ शेष 10 ने मन्दिर में प्रवेश किया। सोमनाथ भव्य मन्दिर का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ। मोबाइल नहीं था, इसलिए फोटोग्राफी नहीं हुई। यहाँ भव्य शिवलिंग का दर्शन करने के बाद बगल में पुराना सोमनाथ मन्दिर है। वहाँ भी लम्बी लाइन लगाकर दर्शन हुआ। यहाँ मोबाइल ले जाना प्रतिबंधित नहीं था लेकिन हम मोबाइल बाहर ही छोड़ आए थे। हाँ, दर्शन करने जाते हुए का एक वीडियो एक पंजाबी परिवार से बनवा कर अपने मोबाइल पर मंगवाने में सफलता मिल गई। हमने उनका बहुत आभार व्यक्त किया।


सोमनाथ मन्दिर में दोपहर 11 से 3 बजे तकप्रसाद वितरण का समय होता है। शाम को पुनः 7 बजे काउंटर खुलता है।प्रसाद के नाम पर भर पूर निःशुल्क भोजन बँटता है। एक आदमी गया, पर्ची कटाई, थाली मिल गई। थाली में 2 रोटी, दो प्रकार की सब्जी, दाल, हलुआ, अचार सब कुछ। एक थाली से पेट न भरे तो पुनः थाली आगे कर और ले लीजिए। जब आपका पेट भर जाय, थाली रखकर पानी पी लीजिए। हाथ धो कर एक दान काउंटर पर सवेच्छा से 100/-, 200/-, 500/- दान कर आइए। पैसा न हो तो इसकी भी जरूरत नहीं। हम सभी ने प्रसाद लिया और सवेच्छा से दान भी किया। एक नया अनुभव हुआ। जब तक हम सामान तक पहुँचते, वहाँ रुके दो साथी, दूसरे आए साथियों को सामान दिखाकर दर्शन करने जा चुके थे। कुल मिलाकर भोजन गर्म, सादा, शाकाहारी था। वितरण और सफाई की व्यवस्था बढ़िया थी। इतनी बड़ी संख्या को रोज भोजन कराना भी बड़ी बात है। 


जब सभी साथी आ गए तो हमने यहाँ से दिउ जाने के लिए 2000/- प्रति कार, दो कार बुक कर ली। प्रत्येक में एक आगे, 3 बीच में, 2 पीछे कुल 6 यात्री आराम से बैठ सकते थे। सोमनाथ से दिउ की दूरी 90 km है। शनिवार, रविवार होने के दिउ में कमरा थोड़ा महंगा मिला। 1500/- की दर से डबल बेड कमरे लेकर 2 रात दिउ में आराम किया गया। गुजरात में शराब प्रतिबंधित है, दिउ में केंद्र शासित प्रदेश होने के कारण, खुली छूट के साथ बहुत सस्ती भी है। शराब के शौकीन गुजरात भ्रमण के बाद दिउ जरूर जाना चाहते हैं। दिउ में 2 बीच प्रसिद्ध हैं, घोघला बीच और नागोवा बीच।

घोघला बीच लम्बे चौड़े बलूई मार्ग के लिए और नागोवा बीच तैराकी के लिए जाना जाता है। 

क्रमशः

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(20-12-2025)


शाम 4 बजे तक हम लोग दिउ बस स्टैंड के पास ही एक होटल में कमरे लेकर व्यवस्थित हो चुके थे। 2 घण्टे आराम करने के बाद पास के घोघला बीच में अपनी शाम कटी। शाम की सुनहरी किरणों, समुन्द्र की लहरों और बीच घूमने आए दूसरे पर्यटकों ने बढ़िया समा बाँधा वरना बीच कोई बहुत खूबसूरत नहीं लगा। मन साफ हुआ, नीयत साफ हुई। पास के शराब की दुकान से सबने मन मुताबिक खरीददारी कर ली और कमरे में लौटकर शुरू हो गए। रात के भोजन के लिए दूर नहीं जाना पड़ा, जहाँ रुके थे, सामने ही सब इंतजाम था। पीते-पीते ही यह तय हुआ कि कल सुबह गंगेश्वर महादेव मन्दिर चलना है।


सुबह नहा धोकर दो ऑटो से हम गंगेश्वर महादेव पहुँच गए। विशाल गेट के भीतर प्रवेश किए तो सामने मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा था। बाएं समुन्द्र तट के पास एक संकरा मार्ग था जहाँ से होकर मन्दिर प्रवेश के लिए नीचे सीढ़ियां उतरनी थी। नीचे गुफा में गणेश जी के साथ 3,4 शिवलिंग विराजमान थे। भक्त श्रद्धा से जलाभिषेक कर रहे थे। बगल में अपार समुन्द्र की लहरें किलोल कर रही थीं। समुन्द्र की अपार जलराशि में सूर्यदेव की किरणे चमचमा रही थीं। भक्ति और श्रद्धा का माहौल था। दर्शन कर बाहर निकलकर हम एक स्थान पर एकत्रित हुए और हर हर महादेव का उदघोष किए। सभी का मन आनंद से भरा हुआ था।


गंगेश्वर महादेव दर्शन के बाद कमरे में आते ही सब गिरगिट की तरह रंग बदल चुके थे। भक्ति का नशा उतर चुका था, मदिरा का नशा चढ़ने लगा था। सब ऐसे पीने में जुट गए जैसे पीने के लिए आज का ही दिन अंतिम दिन है। कल लौट जाना है और गुजरात की सीमा में प्रवेश करते ही शराब प्रतिबंधित है, पीने क्या, चखने भी नहीं मिलेगा। गनीमत यह थी कि दिन में इतना नहीं पिया कि शाम को चल ही न सकें। शाम को सभी नागोवा बीच चलने के लिए तैयार थे।


नागोवा बीच में उतरते ही चौराहे पर एक महिला की मूर्ति ने स्वागत किया। हम महिला के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए बीच तट तक पहुँच गए। बीच खूबसूरत था। नहाने वालों के लिए स्वर्ग था, भीड़ जुटी थी। तट पर कई प्रकार की कलाएं दिख रही थीं। एक परिवार रेती पर विशाल शिवलिंग बना रहा था। स्कूल से बीच घूमने आई छात्राओं का दल पंक्तिबद्ध हो चला जा रहा था। लहरों में बहुत सी नावें कालाबाजी करती हुई इधर से उधर दौड़ रही थीं। नहाने वाले कई प्रकार से नहा रहे थे। सभी प्रकार की लीलाओं को देखते हुए तट पर चलते-चलते हम दूसरे छोर तक पहुँच गए जहाँ दो टापू नुमा पहाड़ी दिखलाई पड़ रही थी। दो में से एक टापू पर हम चढ़ गए और वहाँ से नागोवा बीच का वीडियो बनाने लगे। वहाँ से दूसरे टापू का और समुन्द्र का नजारा कुछ अलग दिख रहा था। अपने यहाँ के झाँवा पत्थर की तरह, कुछ खोखले हो रहे पत्थर भी दिखे। चलते-चलते साथी सब छूट गए, हम अकेले रह गए। वहाँ से उसी रास्ते से साथियों की खोज में लौटते हुए एक गाय दिखी जिसे लोग प्रेम से भुट्टा जैसा कुछ खिला रहे थे। सभी साथी उसी स्थान पर मिल गए जहाँ से हमने बीच में प्रवेश किया था।


देर शाम रूम में लौटते ही वही महाभारत फिर शुरू हो गई। सबको अपनी बोतल खतम करनी थी, किसी के पास बोतल लेकर जाने की हिम्मत नहीं थी क्योंकि आते समय सबने चेकपोस्ट का नजारा अपनी आँखों से देखा था। सब जानते थे, सस्ते के चक़्कर में बोतल रखना महँगा सौदा है। 


दूसरे दिन नाश्ते के बाद हमने फिर दो गाड़ी ले लिया और सीधे सोमनाथ मन्दिर का रुख किया। शाम को मन्दिर के पास सामान रखकर फिर वही कहानी दोहराई गई। कुछ लोग सामान देखने लगे, कुछ फिर दर्शन करने चले गए और कुछ इधर-उधर घूमने लगे। हम मन्दिर के सामने समुन्द्र तट और मन्दिर का नजारा लेते हुए वीडियो बनाने में व्यस्त रहे।


सोमनाथ के वेरावल स्टेशन से रात की ट्रेन पकड़ कर हम लोग सुबह गुजरात की राजधानी गांधीनगर पहुँच गए जो साबरमती के तट पर बसा हुआ एक सुनियोजित नगर है। यहाँ से लगभग 30km दूर अहमदाबाद है जहाँ से शाम को 10 साथियों को उज्जैन के लिए और हमको एक साथी के साथ बनारस के लिए ट्रेन पकड़नी थी। 


गाँधी नगर में भी हमने गाँधी वादी तरीके से स्नान ध्यान का स्थान ढूंढ लिया और नहा धो कर भूखे पेट अक्षरधाम मन्दिर जाने की लाइन में लग गए। सुबह 10 बजे जब मन्दिर का गेट खुला तो साथियों के साथ भीतर प्रवेश करने वाले हम पहले भक्त थे। भव्य अक्षरधाम मन्दिर का दिव्य दर्शन हुआ। 


गांधीनगर का अक्षरधाम मंदिर स्वामीनारायण संप्रदाय को समर्पित एक भव्य आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिसर है, जो अपनी अद्भुत गुलाबी पत्थर की नक्काशी और लोहे के बिना बनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ भगवान स्वामीनारायण की प्रतिमा के साथ कई प्रदर्शनियाँ, जल शो और बगीचे हैं। यह मंदिर भक्ति, शिक्षा और संस्कृति का संगम है। लोहे का इस्तेमाल न होना मन्दिर का प्रमुख आकर्षण है। दर्शन के बाद हमने वहीं भोजन की पंजाबी थाली का आनंद लिया और  हल्की खरीददारी के साथ वापस लौट आए। 


सभी के दर्शन करते-करते दिन के 1 बज गए। मन्दिर के पास से ही बस पकड़कर हम शाम होने से पहले अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पहुँच गए। अहमदाबाद घूमने के लिए बहुत समय था लेकिन शरीर में ताकत शेष नहीं थी। अब जैसे तैसे समय काटना था और ट्रेन पकड़नी थी। शाम को 10 साथी उज्जैन जाने वाली ट्रेन में चले गए और हम अहमदाबाद की प्रसिद्ध फाफड़ा जिलेबी की तलाश में भटकते रहे। स्टेशन से चलकर 2 km पैदल घूम लिए लेकिन फाफड़ा जिलेबी नहीं मिली। बड़ी मुश्किल से एक जिलेबी की दुकान मिली जहाँ कुछ ग्राहक जूटे थे लेकिन दुकानदार ने खुद कहा, "यह फाफड़ा जिलेबी नहीं है, आपको उधर 4 km जाना होगा।" जिलेबी का स्वाद भी कुछ खास नहीं था। अब स्टेशन में एक साथी को सामान के साथ अकेला छोड़ अधिक देर तक बाहर घूमना ठीक नहीं था तो हम वैसे ही स्टेशन लौट आए। 


रात में 11 बजे अपनी ट्रेन साबरमती एक्सप्रेस प्लेटफार्म नम्बर 6 पर आई तो यात्रियों की भीड़ से पूरा प्लेटफार्म भरा हुआ था। उसी भीड़ में रास्ता बनाते हुए जब हमने आमने सामने की अपनी लोअर बर्थ पर कब्जा जमाया, ट्रेन चल दी। ट्रेन चलने के साथ सभी समस्या का समाधान अपने आप हो गया।  सभी सह यात्री गुजराती और एक कम्पनी के कर्मचारी थे जो अयोध्या, काशी दर्शन के लिए निकले थे। उनके साथ दो दिन का सफर कैसे कट गया पता ही नहीं चला। अहमदाबाद की फाफड़ा जिलेबी तो नहीं मिली लेकिन उदार यात्रियों के टिफिन बॉक्स से गुजरात की बनी कई प्रकार की मिठाईयों का स्वाद जरूर मिला।

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6.11.25

काव्य गोष्ठी


वरिष्ठ साहित्यकार एवं अधिवक्ता श्री प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी के घर एक छोटी मगर यादगार काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। जिसमें मेरे अलावा सर्वश्री धर्मेन्द्र गुप्त साहिल, केशव शरण, महेन्द्र नाथ अलंकार एवं श्रीमती कंचन लता चतुर्वेदी जी ने प्रतिभाग किया। 










3.11.25

अध्यक्ष

क कविता की पुस्तक का लोकार्पण होना था। लोकार्पण का भार प्रकाशक को निभाना था। प्रकाशक ने योजना बनाई, आफत मेरे सर आई! शाम को प्रकाशक महोदय का फोन आया, "बनारस में हैं?" बहुत दिनों बाद हमको फोन करने वाले अक्सर पहला प्रश्न यही करते हैं। जानते हैं कि सेवा निवृत्त होने के बाद यह आदमी घूमता ही रहता है। मैने कहा, "हाँ, अभी तो हैं, नींद लग गई तो पता नहीं कहाँ चले जांय।" प्रकाशक घबड़ा गए, "ट्रेन में हैं? कब आएंगे?" मैने कहा, "नहीं भाई, घर पर हैं, सोने जा रहे हैं। नींद में स्वप्न भी आ सकते हैं, स्वप्न में हम कहीं भी जा सकते हैं। इसीलिए कहा नींद लग गई तो पता नहीं कहाँ चले जांय।"

प्रकाशक हँसने लगे, "मजाक नहीं, ध्यान से सुनिए, कल एक पुस्तक का लोकार्पण है, आपको अध्यक्षता करनी है। गाड़ी आपको ले जाएगी और ले आएगी, चिंता मत कीजिए।"

मैने कहा, "अरे! सभी वरिष्ठ साहित्यकार अत्यधिक व्यस्त हैं क्या? मुझसे बहुत वरिष्ठ साहित्यकार उपलब्ध हैं बनारस में, आपके फोन पर आ भी जाएंगे, मुझे कहाँ फंसाते हैं? कल रविवार है, बच्चों की छुट्टी है, बच्चों का बाहर घूमने का प्रोग्राम है, मुझे बक्श दीजिए।" 


प्रकाशक महोदय भी जिद पर अड़े रहे। कहने लगे, "हमने किसी और को फोन नहीं किया है, हम लोगों के लिए आप ही वरिष्ठ हैं। घर में बात करके कन्फर्म कीजिए। आपको आना है।" 


अब प्रकाशक मेरे मित्र हैं। उनके पास मेरे व्यंग्य संग्रह की पाण्डुलिपि धरी है। मैं अपनी पुस्तक प्रकाशित कराने की जल्दी में हूँ, नाराज करना भी ठीक नहीं। यही सब सोच रहा था कि फिर उनका फोन आ गया, "मैने आपका नाम फाइनल करके प्रेस में भेज दिया, आ रहे हैं न?" मुझे दबी जुबान से कहना पड़ा, "ठीक है।"


अब मेरी नींद उड़ गई! सोचने लगा, "कहाँ फँस गए! अध्यक्ष से निरीह प्राणी कौन होता है भला! किसी भी आयोजन में संचालक द्वारा सबसे पहले बुलाकर, सबके सामने, आसन के बीच में बिठा दिया जाता है। बिठाने के बाद संचालक की ऑंखें ऐसे चमकती हैं मानो सबसे कह रहा हो, "देख लो! आज का उल्लू यही है! माँ सरस्वती की तस्वीर के आगे दीप जलाना, माला पहनाना और पुष्प अर्पित करना तो अच्छा लगता है लेकिन उसके बाद बैठकर दो घण्टे के आयोजन को 5 घण्टे के बाद भी खतम न होते देखकर मन ही मन खूब कलपता है। बस दस मिनट, दस मिनट कहते घंटों बीत जाते हैं और वह हाथों को मलने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। अब किससे कहे कि दस मिनट के लिए तुम अध्यक्ष बन जाओ। आयोजक कहेगा, "अच्छा मजाक है, पूरे कार्यक्रम की अध्यक्षता आपने की अब दस मिनट के लिए दूसरा अध्यक्ष कहाँ से लांय? कौन तैयार होगा? "


मैं सोचने लगा कि आखिर मुझमे क्या योग्यता है कि मुझे अध्यक्ष बनाया गया? मुझसे वरिष्ठ साहित्यकार और कई पुस्तकों के लेखक बनारस में सहज उपलब्ध हैं। सहज इसलिए की उनकी संख्या बहुत है। कोई न कोई तो मिल ही जाता। प्रखर वक्ता भी मैं नहीं हूँ। बैठे-बैठे पुस्तक पलट कर एक घण्टे भाषण दे सकूँ। इतना शाहखर्च भी नहीं हूँ कि संस्था के लिए 100 रुपिए की रसीद काट सकूँ। ऐसी कोई ख्याति भी नहीं कि मेरे आने की खबर सुनकर श्रोता बढ़ जाएंगे। आखिर मुझे अध्यक्ष बनाया क्यों गया? यही सब सोंचते-सोंचते कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। 


सुबह प्रातः भ्रमण के समय पार्क के अपने उल्लुओं को गरदन घुमाए अकड़ कर बैठे देखा तो अचानक ही मुँह से निकल गया, "इतना अकड़ क्यों दिखा रहे हो? कहीं के अध्यक्ष बना दिए गए हो?" उल्लुओं ने तो कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे मेरे प्रश्नों का उत्तर मिल गया। मुझे पता चल गया कि मुझे अध्यक्ष क्यों बनाया गया है? दरअसल जो मुझमे अवगुण हैं, वही मेरी योग्यता है। 

पुस्तक के लोकार्पण समारोह में जो बहुत ज्ञानी होता है उसे प्रखर वक्ता बनाया जाता है। उसे पुस्तक दो दिन पहले इस अनुरोध के साथ उपलब्ध करा दी जाती है कि आपको इस पुस्तक के लोकार्पण में बोलना है। या वह इतना ज्ञानी होता है कि वहीं बैठकर, पुस्तक के कुछ पन्ने पलट कर तब तक माइक पर बोलता रहता है, जब तक संचालक इशारे से बैठने का अनुरोध न करे। 


मुख्य अतिथि या वरिष्ठ अतिथि वह बन सकता है जिसका समारोह से कोई स्वार्थ हो या वह संस्था का आर्थिक भला चाहता हो। वह इतना आदरणीय भी हो सकता है जिसको देखकर ही मन में आदर का भाव जगे और चरण वंदन का मन करे। जिसके आने की खबर सुनकर समारोह में चार चाँद लग जाय।


पूरे समारोह में उल्लू की तरह अकड़ के बैठने के सिवा अध्यक्ष का क्या काम? अंत तक सबको सुने और सौभाग्य से जब कार्यक्रम का वास्तविक अंत आए तो उसका नाम बुलाया जाय। सभी नवोदित या वरिष्ठ कवियों को ध्यान से सुनने के बाद सभी की प्रशंसा करते हुए बधाई देना और इतनी शुभकामनाएँ देना कि कवि बैठे-बैठे उड़कर चाँद में पहुँच जाय। आने वाले सभी श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए उनके धैर्य की भी प्रशंसा करना कि जो कार्यक्रम छोड़ कर बीच में चले गए उनका बचाव करते हुए कहना कि उनको किसी आवश्यक कार्य से जाना पड़ा लेकिन आप अंत तक डटे रहे इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है। इससे ज्यादा बोले तो हो सकता है श्रोताओं में वही शेष बचे जिसकी पुस्तक का लोकार्पण होना है। अध्यक्ष को अधिक बोलने वाला नहीं होना चाहिए, सबसे अच्छा अध्यक्ष वही होता है जिसे धन्यवाद के सिवा कुछ बोलने आता ही न हो। उल्लुओं को देखकर मुझे पक्का विश्वास हो गया कि इसी गुण को देखकर मुझे अध्यक्ष बनाया गया है। ये उल्लू सुनते सबकी हैं,पर कभी बोलते नहीं हैं।

.....@देवेन्द्र पाण्डेय।

जीत के लिए...

 























11.10.25

उल्लू पुराण 3

पोस्ट 2 से आगे....

उल्लू प्रेम निस्वार्थ होते हुए भी मोह जगाता है। जबसे पढ़ा है छोटे उल्लुओं की उम्र 2 से 4 वर्ष होती है, इनसे बिछड़ने की आशंका होती है। प्रातः उद्यान में प्रवेश करते ही इन्हें देखने की इच्छा होती है। 

आज दशहरा है। मित्रों ने वाट्सएप में नीलकंठ की तस्वीरें भेजी हैं। ऐसा माना जाता है कि नीलकंठ पंछी के दर्शन शुभ होते हैं। नीलकंठ को साक्षात भोलेनाथ का अवतार माना जाता है। रावण से युद्ध के लिए जाते हुए भगवान राम को नीलकंठ के दर्शन हुए थे मतलब इस पंछी का दर्शन विजय का प्रतीक है। इतना ही नहीं यह भी माना जाता है कि नीलकंठ के दर्शन मात्र से धन की प्राप्ति होती है। 


आजकल खुद वन-वन, बाग-बाग, ताल-तलइया घूमना तो होता नहीं, वाट्सएप खोलो और धड़ाधड़ नीलकंठ की तस्वीरें मित्रों को फॉरवर्ड करो! यदि वास्तव में नीलकंठ की तस्वीर देखना इतना लाभकारी होता तो यह भी पंछी की तरह दुर्लभ हो जाता। जिसे मिलता वह तस्वीर मढ़ा कर सात तालों में सुरक्षित रखता और रोज सुबह उठकर दरवाजा बन्द कर, अकेले तस्वीर निहारता रहता। यहाँ तो "हर्रे लगे न फिटकिरी, रंग भी चोखा होय!" वाला हाल है। मित्रों को मुफ्त में बताना है कि हम कितना तुम्हारा भला चाहते हैं। हकीकत में तो लोग 100 रुपिया मित्र पर खर्च करने से पहले सौ बार सोचते हैं, यह 100 रुपए की कृपा पाने लायक मित्र है भी कि नहीं? कहीं मेरा रुपिया व्यर्थ तो नहीं खर्च हो रहा है?


आज वन विभाग से सटे धमेख स्तूप पार्क में घूमते समय नीलकंठ तो नहीं, अनुज को एक नया उल्लू दिखा। उसने मुझे बुलाया, "भैया! उल्लू!!!" यह आकार में पहले की तरह छोटा ही था लेकिन दूसरा था। मित्र जान चुके हैं कि मैं उल्लू प्रेमी हूँ इसलिए कहीं उल्लू दिखा तो मुझे बता देते हैं। मैने देखा तो मुझे यह मेरी पुरानी उल्ली की तरह चंचल लगा। मैने सोचा इसका साथी भी कहीं होगा लेकिन खूब ढूंढने के बाद भी नहीं दिखा। इसे देख मुझे इस बात की खुशी हुई कि सारनाथ की धरती से जहाँ भगवान बुद्ध ने सबको उल्लू से बुद्धिमान बनाने का प्रयास किया, पूरी तरह सफल नहीं हुआ है। अभी भी उपदेश स्थली में बहुत से उल्लू रहते हैं। जब प्रथम उपदेश स्थली सारनाथ में इतने उल्लू हैं तो हमारे देश में कितने होंगे! जब हमारे देश में इतने उल्लू हैं तो विश्व में कितने होंगे!!! नहीं, नहीं खाली अमेरिका और ट्रम्प को याद मत कीजिए, हर देश, हर शहर क्या हर शाख में उल्लू बैठे हैं। ऐसे ही विश्व का माहौल खराब नहीं चल रहा। कुछ और नीलकंठ पैदा हों, कुछ और सिद्धार्थ बुद्ध बनें तो विश्व का कल्याण हो। 

......


आज बारिश हो रही है। कल से बारिश हो रही है। आज जब नींद खुली तो देखा, बारिश हो रही थी। कल शाम, सोने से पहले देखा था, बारिश हो रही थी। कल सुबह पार्क घूमकर, उल्लू देखकर आए, बारिश नहीं हो रही थी। कल दिन हुआ ही नहीं, बारिश शुरू हो गई। आज सुबह हुई है लेकिन दिन की संभावना नहीं दिखती। कभी टिप-टिप, टिप-टिप, टपकतीं हैं बूंदें, कभी झर-झर, झर-झर झरती हैं बूंदें। 


मैं आज उल्लू देखने नहीं गया। बारिश ने मुझे उल्लू बनाकर घर के दरवाजे के भीतर, झूले में बिठा रक्खा है। आँगन के सब पेड़ पौधे मुझे ही देख रहे हैं। अमरुद, अशोक, नीबू की शाखें तो लचक मटक कर देख ही रही हैं, गमले के सभी पौधे मुझे ही देख रहे और हँस रहे हैं। कह रहे होंगे, "आज यह उल्लू देखने नहीं जा पाया, खुद ही उल्लू बना बैठा है।"


बारिश में भीग रहा होगा उल्लू का जोड़ा। कोटर में दुबक गया होगा या किसी शाख के बीच में सटा/चिपका पत्तों से बूँद-बूँद टपकते पानी का मजा ले रहा होगा, कह नहीं सकते। यहाँ तो पंछी सब दुबके पड़े हैं, दिख नहीं रहे। कभी-कभी एक गिल्लू तना पकड़ ऊपर नीचे कर रही है। 


मेरे घर में श्री विनोद कुमार शुक्ल के काल्पनिक घर की तरह दीवार में एक खिड़की नहीं रहती। आज इस मौसम में उस खिड़की की बहुत याद आ रही है। होती तो कूदकर बाहर चला जाता जहाँ तालाब किनारे खिली-खिली धूप बिछी होती। बुढ़िया दादी गरम चाय लेकर आतीं और कहतीं, "पहले चाय पीलो, ठण्डी हो जाएगी, फिर नहाना।" दादी की बात सुनकर मेरे उल्लू हँसने लगते और आपस में दुबक जाते। हाय! मेरे घर के किसी दीवार में ऐसी एक भी खिड़की नहीं है। 🤔

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आज उल्ली अपने कोटर में अकेले बैठे मिली। उसका साथी उल्लू नहीं दिखा। कहीं शिकार में गया होगा या उल्ली से झगड़कर  ऊपर शाख में पत्तों के बीच छुप गया होगा। उल्ली से बहुत बात करने का प्रयास किए लेकिन वह समझ गई लगी कि यह आदमी किसी काम का नहीं है। प्रकाशक ने हमें उल्लू बनाया तो यह मजे ले रहा है। आजकल दोस्त ऐसे ही होते हैं, अपना दर्द सुनाओ तो थोड़ी सहानुभूति प्रकट करेंगे लेकिन बहुत दिनों तक चटखारे लेकर मित्र की दुर्दशा का बखान करते हुए मजे लेंगे। प्रकाशक ने उल्लू बनाया और यह वीडियो बना रहा है! बेकार ही इसे अपना दर्द साझा किया। 


मुझे उल्ली की बेरुखी से ऐसा ही प्रतीत हुआ। यह मेरा 'चोर की दाढ़ी में तिनका' वाला वहम भी हो सकता है। हो सकता है ऐसा कुछ भी न हो। कवि तो ठीक लेकिन उल्ली क्या जाने  की वीडियो क्या होता है!


इसे छोड़ आगे बढ़े तो एक दूसरे घने नीम की शाख पर दूसरा उल्लू बैठा था। आकार में थोड़ा बड़ा था लेकिन अकेले था। कुछ दिनों पहले दिखे चंचल उल्ली का साथी लग रहा था। इससे मैने बहुत पूछा कि तुमको उल्लू किसने बनाया? प्रकाशक ने या किसी नेता ने? इसने कुछ नहीं बताया। हो सकता है इसे शासक दल के किसी बड़े नेता ने उल्लू बनाया हो और मुझे नाम बताने से डर रहा हो! कहीं नाम बताया तो मेरा एनकाउंटर न हो जाय!!! कुछ भी हो सकता है। आज इससे पहली मुलाकात थी, कल फिर प्रयास करेंगे। अभी तो यह निरीह जनता की तरह मुझे नेता समझ कर मुझे ही घूर रहा था। 🤔

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क्रमशः





28.9.25

उल्लू पुराण 2

https://devendra-bechainaatma.blogspot.com/2025/09/blog-post_26.html?m=1 
गत अंक से आगे....







एक दिन साथ प्रातः भ्रमण करने वाले मेरे मित्रों ने मेरी यह हरकत देख ली। उन्होने मुझे वृक्ष से बहुत देर बात करते देखा तो आश्चर्य से पूछने लगे, "पंडित जी! वहाँ का हौ?" मैने उन्हें पूरी बात नहीं बताई कि कवियों के एक जोड़े को प्रकाशक ने उल्लू बना दिया है, बस इतना ही कहा, "वहाँ उल्लू का एक जोड़ा रहता है।" मित्र कवि नहीं, व्यापारी हैं। ऐसी मान्यता है कि सुबह-सुबह उल्लू का दर्शन बड़ा शुभ होता है। उल्लू लक्ष्मी का वाहन होता है। उल्लू दर्शन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। उनके लिए यह जानना खुशी की खबर थी कि उस नीम के वृक्ष में एक उल्लू का जोड़ा रहता है। सुनते ही वे दौड़ पड़े। सभी ने जोड़े के दर्शन किए और मुझे बहुत धन्यवाद दिया। खुश हो कर बोले, "पंडित जी कई  दिनन से माल काटत हउअन, आज राज कs बात पता चलल।"

हमने अपना माथा पीट लिया। जिस लक्ष्मी के चक़्कर में प्रकाशक ने कवियों को उल्लू बनाकर छोड़ दिया, पैसे के आभाव में ये बुद्धिजीवी उल्लू बनकर भटक रहे हैं, उन्हें ही लक्ष्मी का वाहन कहा जा रहा है! यह कैसी विडंबना है, किसी का दुर्भाग्य, किसी का सौभाग्य बन जाता है। कोई मरता है तो किसी की लकड़ी बिकती है। दर्द तो वही महसूस कर सकता है जो दुःख भोगता है। कितना कटु सत्य है!


मित्रों को उल्लुओं का कवि के रूप में या अपनी कविताओं के श्रोता के रूप में परिचय देना व्यर्थ था। एक समस्या यह भी थी कि मेरे कवि मित्र जान जाएंगे कि यहाँ दो उल्लू श्रोता रहते हैं तो वे भी आकर उल्लुओं को कविता सुनाने लगेंगे और सब कवियों से भड़क कर, उल्लू कहीं दूसरे शहर में भाग गए तो मेरा क्या होगा! इतने अच्छे श्रोता फिर कहाँ मिलेंगे? मैने चुप रहना ही अच्छा समझा और उनकी हाँ में हाँ मिलाया, "सही बात है,उल्लू को देखना बड़ा शुभ होता है। आजकल किस्मत से उल्लू मिलते हैं, वरना तो गुरु ही मिलते हैं। वह भी काशी में! जहाँ छोटे गुरु, बड़े गुरु, आश्वासन गुरु, भवकाली गुरु आदि सभी प्रकार के गुरुओं की भरमार है, उल्लुओं का दिखना, किस्मत की बात है।


मुझे उल्लू, चमगादड़ बहुत मिलते हैं। एक बार भोपाल के एकांत पार्क में घूमते हुए भोर में 5 बजे ही पहुँच गया था। चार ईमली में ठहरा हुआ था और एकांत पार्क आवास से एक, दो किमी दूर ही था। घने वृक्षों के कारण पार्क में बहुत अँधेरा था। एक वृक्ष की शाख पर इतने चमगादड़ लटके मिले कि आनंद आ गया। मैने उनसे बात करने का प्रयास किया लेकिन वे भीड़ में थे और बुरी तरह चीख-चिल्ला रहे थे, कोई भाव नहीं दे रहे थे। ऐसा लगा जैसे बड़े अधिकारियों का झुण्ड अँधेरे में अपनी सल्तनत कायम होने का जश्न मना रहा है! सभी अपने साथियों के साथ आमोद प्रमोद में मस्त थे। उनकी अलग दुनियाँ थी, अलग खेल थे। हल्का-हल्का उजाला होने लगा तो इनकी चीख चिल्लाहट कम हुई और मैं मुग्ध भाव से उनकी लीलाएं देखकर अपने आवास वापस आ गया। मुझसे मेरे बेचैन आत्मा ने धीरे कहा,"निशाचरी करेंगे तो उल्लू चमगादड़ नहीं तो क्या हँस दिखेंगे?" मैने आत्मा को समझाया, "सभी प्राणियों से प्रेम करना चाहिए, किसी को कष्ट नहीं दोगे तो कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ेगा। जंगली जानवर कोई मनुष्य थोड़ी न हैं कि पेट भरा होने के बाद भी भविष्य के संग्रह के लिए लूट मचाएंगे।"


एक बार की बात है, जाड़े की भोर में, सारनाथ के इसी म्यूजियम वाले उद्यान में, एक घने नीम वृक्ष की शाख से एक बड़ा सुफेद उल्लू लटका दिखाई दिया! पहले तो अँधेरे में लगा कोई बेचैन आत्मा है लेकिन ध्यान से देखा तो पाया यह एक बड़ा सा सुफेद उल्लू है जो पतंग के मँझे से फँसा, असहाय लटका हुआ है। 


नहीं, नहीं, वह कोई कवि नहीं था, सच्ची घटना है, उल्लू ही था। इतना असहाय उल्लू ही हो सकता है। मैने पार्क के साथी कर्मचारियों को फोन लगाया और इस उल्लू को बचाने का आग्रह किया। दो साथी, तत्काल एक लम्बी सीढ़ी लेकर आ गए और उल्लू को नीचे जमीन पर उतार लाये। छूटने के प्रयास में उल्लू ने अपने पूरे शरीर को मँझे से जख्मी कर लिया था और पूरी तरह उलझा हुआ था। पुरातत्व विभाग के दोनो कर्मचारियों ने बहुत मेहनत से उल्लू को मँझे से मुक्त किया, मरहम लगाया और छत में रख दिया। वह इतना लाचार था कि उड़ नहीं सकता था और जमीन पर रखने का मतलब कुत्ते मार देते। छत पर रखकर हम निश्चिन्त हो गए कि अब यह बच जाएगा। हुआ भी यही, कुछ देर बाद वह उड़कर अपनी दुनियाँ में चला गया। 


जब उल्लू के इस जोड़े को देखता हूँ तो सभी उल्लू, चमगादड़ याद आते हैं। सभी उल्लू प्रकाशक के मारे नहीं होते, कुछ अपने ही रिश्तेदारों के द्वारा सताए, कुछ हालात के शिकार भी होते हैं। प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी के सताए उल्लुओं को देखकर फिर भी हँसी आती है लेकिन कलेजा काँप जाता है जब अनाथ आश्रम में अपने ही बच्चों के द्वारा सताए लाचार बुजुर्ग, उल्लू की तरह दिन में भी रोते दिखलाई पड़ते हैं।


बहुत दिनों बाद या कहें कई वर्षों बाद एक दिन अचानक घने नीम वृक्ष के कोटर में बैठा उल्लू का यह जोड़ा दिखलाई दिया। इनके यहाँ दिखने की कहानी भी रोचक है। हुआ यूँ कि बगल के नीम वृक्ष पर तोते का एक जोड़ा रहता था। मैं उनसे हमेशा बातें करता। कभी कहता, "गोपी कृष्ण कहो बेटू, गोपी कृष्ण।" तोते बोलते, "टें टें!" कभी कहता, "जय श्री राम " तोते बोलते, "टें टें", अच्छा बोलो, "जय भीम, बुद्धम शरणम गच्छामि,  आजादी-आजादी" तोते हर बार बोलते, "टें टें! टें टें! टें टें!" उनके इस व्यवहार से मुझे यह ज्ञान हुआ कि जो तोते वास्तव में आजाद होते हैं वे अपनी ही बोली बोलना पसंद करते हैं! गोपी कृष्ण, जय श्री राम, जय भीम या आजादी-आजादी वाले तोते वे होते हैं जिन्हें पढ़ाया, सिखाया, रटाया जाता है। 


एक रात इसी नीम के वृक्ष पर भयानक बिजली गिरी! बिजली इतनी शक्तिशाली थी कि घना वृक्ष दो भागों में बँट गया। एक हिस्सा तो जमीन पर धराशायी हो बिछ गया, दूसरा हिस्सा जड़ें पकड़ कर खड़ा रहा। दूसरी सुबह प्रातः भ्रमण के समय मैने एक हिस्से को धरती पर बिखरा पाया तो देखते ही समझ गया, कल रात इस पर बिजली गिरी है। बीच में तोते के जोड़े का घोंसला या तोते का जोड़ा कहीं नजर नहीं आया। बहुत ढूँढा, कहीं नजर नहीं आया। इसी तोते के जोड़े को ढूंढने के प्रयास में बगल की शाख पर  बैठा यह उल्लू का जोड़ा दिख गया! 


मैं इनसे वैसे ही बातें करने लगा जैसे तोतों से करता। धीरे-धीरे कई महीने बीत गए, मुझे अब इन उल्लुओं से प्यार हो गया है। जब से यह ज्ञान हुआ है कि ये उल्लू बनने से पहले बुद्धिजीवी कवि थे, एक प्रकाशक ने इन्हें उल्लू बनाया है तो मेरी सहानुभूति इनसे और बढ़ गई है। और जब से महागुरु गूगल ने बताया है कि छोटे उल्लुओं की उम्र 2 से 4 वर्ष होती है, मैं इनसे बिछड़ने की आशंका से दुखी हूँ। इनसे मिले लगभग 2 वर्ष तो हो ही चुके हैं, क्या ये भी गुम हो जाएंगे?

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