30.8.22

साइकिल की सवारी

भोर में साइकिल लेकर बाहर घूमने के लिए निकले तो ध्यान था कि आज सन्डे है, रोज तो सारनाथ घूमते ही हैं, दूर चला जाय। बाहर अँधेरा था, आकाश में बादल घिरे थे, रेन कोट का ऊपर का हिस्सा पीछे साइकिल के कैरियर में यह सोचकर दबा दिया कि बारिश हुई तो काम आएगा। 


अकेले घूमने का यही आनन्द है, जो मर्जी करो, जहाँ दिल करे जाओ, कोई रोकने वाला नहीं। हम सारनाथ से आशापुर, पँचकोशी चौराहे से बाएँ मुड़कर सलारपुर वाली क्रासिंग पार किए ही थे कि बारिश शुरू हो गई। साइकिल रोककर रेन कोट के ऊपर वाला हिस्सा पहने और नीचे पहले से हाफ बरमूडा पहन कर चले ही थे, भीगने की चिंता तो थी नहीं। हाँ, मोबाइल भीगने की चिंता थी, उसे रुमाल से लपेट कर रख लिए, जो होगा, देखा जाएगा। 


बारिश में सायकिल चलाने का आनन्द ही और है लेकिन रेन कोट में मजा नहीं आ रहा था। बारिश से ज्यादा तो पसीने से भीग चुके थे। आगे आदिकेशव घाट से पहले जहाँ वरुणा, गंगा से मिलती हैं, साइकिल/मोटर सायकिल जाने लायक चार लेन का पक्का पुल बना है। यहीं से बसंत कॉलेज( महिला महाविद्यालय) जाने का रास्ता शुरू होता है। यह सड़क कृष्ण मूर्ति फाउंडेशन की निजी जमीन पर बना है शायद इसीलिए यहाँ प्रबंध संस्थान ने चार पहिया जाने लायक पुल निर्माण की अनुमति नहीं दी। अच्छा ही हुआ, इससे इस मार्ग का वातावरण आज भी भीड़ भाड़ से दूर शांत, रमणीक है। सड़क के दोनों तरफ हरियाली है और कैंपस बने हुए हैं।


मन नहीं माना तो रेनकोट उतार कर फिर पीछे कैरियर से दबा दिए और बारिश में भींगते हुए/ साइकिल चलाते हुए खिड़किया घाट पहुँचे। यहाँ का नजारा अलग था। पार्किंग की जगह भी बंद कर दी गई थी। गंगा में आई बाढ़ के कारण घूमने के सभी रास्ते बंद थे। राजघाट पुल के ठीक नीचे, एक स्थान पर छांव में लोग रुककर बारिश और बाढ़ के पानी का आनन्द ले रहे थे। हमने भी सायकिल वहीं किनारे खड़ी करी और रुककर नजारे लेने लगे। 


ध्यान आया, गेट पर खड़े चौकीदार नीचे जाने से मना कर रहे हैं, वहीं एक किनारे गोवर्धनदास (श्री कृष्ण जी ) का मंदिर भी है। भारत में मंदिर जाने से तो कोई मना कर नहीं सकता। सीधे गेट पर गया और बोला, "मन्दिर जाना है।" द्वारपाल ने तुरत गेट खोल दिया और बोला, "जाइए, मन्दिर जाने की मनाही नहीं है लेकिन गंगा घाट की ओर मत जाइएगा, नदी में बाढ़ है।" मैं मन्दिर पहुँचा तो देखा वहाँ अच्छी खासी संख्या में लोग जमा हैं। खुले हॉल में योग की कक्षा चल रही है। पुरुष/महिला दोनो जमा हैं। तब समझ में आया केवल मैं ही बहादुर नहीं हूँ,  ध्यान/योग के शौकीन काशी में बहुत हैं।


थोड़ी देर बैठने, योग का नजारा लेने, दर्शन करने के बाद मैं अपने असली उद्देश्य में लग गया। गंगा में आई बाढ़ की तस्वीरें खींचने लगा। घाट बचे ही नहीं थे तो जाता कैसे? सब पानी में डूब चुके थे। खिड़किया घाट पर लगा नमो नमः का स्कल्पचर भी डूब चुका था, केवल कलाई से जुड़े तीन हाथ दिख रहे थे। फोटो खींच कर लौट आया। 


बारिश में साइकिल लेकर चढ़ाई चढ़ने लगा तो याद आया, आते समय क्या मौज से साइकिल पर बैठकर फर्राटे से लुढ़कते हुए नीचे उतरा था! वही राह, वही दूरी लेकिन चढ़ते समय हँफरी छूट गई, उतरते समय कितना मजा आ रहा था!!! ज्ञान हुआ, जीवन के एक ही मार्ग पर, एक समान रास्ते पर चलते हुए भी कभी ढलान/ कभी चढ़ाई मिलती है। हम ढलान पर बहुत खुश और चढ़ाई देख बहुत दुखी हो जाते हैं, जबकी एक के बाद दूसरे से सामना होना ही है। सारनाथ से राजघाट तक लगभग 20  किमी जाते/जाते जितनी चढ़ाई मिली होगी, ठीक उतनी ही ढाल मिली होगी। न एक इंच कम न एक इंच ज्यादा लेकिन ढलान पर लुढ़कते समय पता नहीं चला, चढ़ाई भारी लगने लगी। यही होता है, सुख के पल बीत जाते हैं, पता नहीं चलता। दुःख के पल काटने भारी पड़ जाते हैं। सभी आदमी साइकिल चलाए तो यह ज्ञान हो जाय, जीवन जीना कितना आसान है!


बसन्त महाविद्यालय से निकलते समय अमृत कुंड वाला कुँआ भी मिला लेकिन बारिश के कारण न कोई वहाँ था न पानी पीने की इच्छा ही थी। हम सायकिल चलाते हुए लौट चले। आदिकेशव घाट पर विष्णुजी की बहुत सुंदर प्रतिमा और बढ़िया मन्दिर है। घूमने का मोह छोड़ नहीं पाया। बारिश का आनन्द लेते हुए फोटो भी खींचा और दर्शन भी किया। वहीं  एक आदमी घाट पर प्रेम से गोता लगा रहा था। पूछने पर अपना नाम झींगुर बताया। यह रोज इसी घाट पर नहाने आता है। नदी में बाढ़ आने या बारिश होने का उसपर कोई प्रभाव नहीं था।


यहाँ से पुल पार कर आगे लौट चले तो सराय मोहाना, कोटवा के बाद पड़ने वाली पुलिया का खयाल आया। अब बारिश बहुत कम हो चुकी थी। हलकी बूंदाबांदी हो रही थी। सोचा, वहीं आराम करेंगे, शिवराम मिलेंगे। पुलिया पर पहुंचा तो वहाँ कोई न था। कुछ देर अकेले बैठा तो सोचा, शायद बारिश के कारण आज शिवराम नहीं आये। उनसे कहा तो था कि अगले अतवार को मिलेंगे! फिर सोचा, वो कोई सरकारी नौकर थोड़ी हैं, उनके लिए कैसा इतवार और सोमवार। जिस दिन मौसम खराब उस दिन छुट्टी, जिस दिन आकाश साफ, चले मजूरी पर। अब शिवराम ही नहीं मिले तो आगे क्या लिखें, जय राम जी की।

....@देवेन्द्र पाण्डेय।

(चित्र चित्रों का आनंद में है।

http://mereephotoo.blogspot.com/2022/08/blog-post_28.html?m=1 ) 

http://mereephotoo.blogspot.com/2022/08/blog-post_24.html?m=0

1.8.22

लोहे का घर 62

लोहे के घर में अकेले बैठे हों तो कुछ लिखने के लिए मोबाइल पर उँगलियाँ चलने लगती है। लिखने के लिए बड़ा अनुकूल माहौल है। लखनऊ-बनारस शटल एक्सप्रेस की ए.सी. चेयर कार वाली बोगी में 2 नम्बर की बर्थ है। सो नहीं सकते, बैठना मजबूरी है। बैठकर करेंगे क्या? सामने बंद दरवाजे के सिवा कुछ नहीं। अपनी विंडो सीट है, शाम के 6.30 बजने वाले हैं, बाहर अभी उजाला है, बाहर झाँक सकते हैं। अच्छी भली समय से प्लेटफार्म पर लगी ट्रेन को 15 मिनट लेट चलाया मालिक ने! कोई मजबूरी होगी। अभी कबाड़ इलाके से रेंग कर आगे बढ़ रही है, रफ्तार पकड़ेगी तब बाहर झाँकने लायक दृश्य दिखेंगे। 


बगल में 3 नम्बर वाली एक बर्थ पर एक युवा बैठा था, तभी एक प्रौढ़ दम्पती हिलते हुए आकर अनुरोध करने लगे, "वहाँ बैठ जाते तो हम लोग साथ बैठ जाते? हमारी एक सीट, 4 नम्बर यहाँ, एक वहाँ मिल गई है" युवक शरीफ निकला, झट से अपना झोला उठाकर यहाँ से वहाँ हो गया!" शरीफ लोगों से बहुत अनुरोध नहीं करना पड़ता, वे झट से झोला उठाकर चल देते हैं। इसके लिए आपके अनुरोध में दम होना चाहिए। यह नहीं कि शरारतन अगले से कहें,"झोला उठाओ, चले जाओ!" अगला कहेगा,"नहीं जाएँगे, अभी और तुम्हारी छाती पर और मूंग दलेंगे, क्या कर लोगे?"


मेरे पीछे 5,6 नम्बर वाली बर्थ का भी यही आलम था, एक जोड़े की सीट आगे-पीछे हो गई थी। यहाँ भी 'सिंगल' अपना झोला उठाकर चला गया। सिंगल' के साथ अक्सर लफड़ा हो जाता है, जोड़े रंग जमा कर, सार्वजनिक सीट से ऐसे ही उठा देते हैं। भले अपने घर में घुसने के बाद ये जोड़े एक दूसरे का मुँह देखना पसंद न करते हों लेकिन सामाजिक मर्यादा है, क्या किया जाय? कैसे अपनी बीबी को दूसरे युवा के साथ बैठने दिया जाय? मर्यादा भी तो निभानी है! मुझे तो लगता है, आजकल लोग मन से न चाहते हुए भी, मर्यादा पुरुष बने घूमते हैं! 


मैं भी यहाँ सिंगल हूँ लेकिन मेरे साथ यह लफड़ा नहीं हुआ। एक नम्बर सीट पर एक नौजवान आया और अपना झोला रखकर चला गया! ट्रेन चल दी, नहीं आया!!! मैं घबड़ाने लगा, झोला रखकर कहाँ गायब हुआ? कहीं झोले में कुछ गड़बड़ समान तो नहीं! तभी वही युवक काले पैंट-कोट में चार्ट लेकर सामने आ गया,"आपका नाम?" ओह! तो यह टी टी है!!! भगवान कितना दयालु है! इस ट्रेन में, एक नम्बर की बर्थ टी टी की होती है, यह आज पता चला।


बाहर का दृश्य बहुत सुहाना है। हरी भरी धरती, कहीं खेत चरते चौपाए, कहीं भरे पानी मे डूबे धान, बरश चुके बादलों से खाली हुआ साफ आसमान, हरे/घने पेड़, छा रहा अँधेरा, जा रहा उजाला और घास का भारी गठ्ठर सर पर लादे, मेड़-मेड़ जा रही, भउजाई!


अब बाहर अँधेरा अधिक हो चुका है। शीशे से बाहर झाँको तो अपनी ही परछाई दिख रही है! बोगी में भीतर उजाला हो चुका है। सभी लाइट जल चुकी है। यही होता है। जब भीतर रोशनी होती है तो बाहर देखना भी चाहो, दर्पण की तरह अपना चेहरा ही दिखने लगता है! पता नहीं, अपने भीतर कब दीपक जलेगा? और जान पाएंगे, 'कौन हैं हम?' कब खतम होगा, मैं?"

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19.7.22

साइकिल की सवारी

दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल चलाने पर प्रतिबंध ही नहीं लगा मेरी मोटरसाइकिल श्रीमती जी द्वारा बेच भी दी गई। मैं दुखी होकर मोटरसाइकिल को जाते हुए देखता रह गया। अब घर से 5 किमी के दायरे में जाने के लिए भी 'पैदल' हो गया। कुछ ही विकल्प थे..पैदल चलो, कार के लिए ड्राइवर बुलाओ या रिजर्व गाड़ी बुलाओ। 3,4 किमी के लिए यह महंगा सौदा था। तभी तय किया कि सायकिल खरीदी जाय। दूर भीड़ वाली सड़क पर न ले जाने के आश्वासन के साथ मुश्किल से साइकिल खरीदने की अनुमति मिली और मैं रोज एक महीने से भोर में सायकिल लेकर निकलने लगा। 


घर से सारनाथ पार्क लगभग 3 किमी की दूरी पर है। भोर में 5 बजे सायकिल लेकर पार्क में जाना, सायकिल खड़ी कर एक घण्टे पार्क में घूमना, साइकिल लेकर चाय पीते, फल/दही खरीदते हुए, आराम-आराम से वापस आना, नहाकर नाश्ते के बाद 7.30 तक ऑफिस जाने के लिए घर छोड़ देना, 1.30 घण्टे बस के सफर में फेसबुक चलाना, 9.30तक ऑफिस पहुँच जाना, दिनचर्या बन गई। 


सन्डे(छुट्टी के दिन) दिनचर्या बदल जाती है। जिस दिन ऑफिस नहीं जाना होता, मन बहक जाता है। आज सन्डे था, सायकिल पर बैठते ही मन उड़ने लगा। लगभग 1 घण्टे, गांव के रास्ते साइकिल चलाकर पहुँच गया खिड़किया_घाट। खिड़किया घाट अब नमो_घाट के रूप में विकसित, बनारस के बेहतरीन घाटों में से एक, भव्य घाट बन चुका है। सड़क मार्ग, जल मार्ग और रेलमार्ग से जुड़ा यह घाट बनारस का सबसे खूबसूरत घाट है। इस घाट के बगल में खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं। राजघाट के पुल के अलावा सन्त रविदास का भव्य मंदिर है, लाल खान का मकबरा है, वरुणा और गंगा का संगम तट, आदिकेशव घाट है और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध बसन्त कॉलेज है। बसंत कॉलेज से आदिकेशव घाट जाने का, हराभरा रमणीक मार्ग है और मार्ग में मिलता है एक जिंदा कुँआ जिसका पानी आज भी बहुत मीठा है।


सारनाथ से आदिकेशव घाट, बसन्त कॉलेज होते हुए राजघाट जाने के मार्ग में और भी बहुत कुछ है।  पँचकोशी परिक्रमा के भीतर स्थित कपिलधारा है, सूर्यदेव_का_मंदिर है, सुंदर तालाब, हनुमानजी, शनि देव और शंकर जी का मंदिर है जिनके चित्र मैं अपने पेज चित्रों का आनंद  में दिखाता रहता हूँ। मार्ग में एक श्मशान घाट और निषाद राज का द्वार भी मिलता है।

 

आज बसन्त कॉलेज के कुएँ (#अमृत_कुण्ड) का पानी पीकर लौटते समय एक पुलिया दिखी। पुलिया में 4 स्थानीय ग्रामीण बैठे हुए हवा खा रहे थे और गप्पें लड़ा रहे थे। उन चारों में नेपाली टोपी पहने बहादुर भी दिखे जो बायीं हथेली पर रखी सुर्ती दाएं हाथ के अंगूठे से रगड़ रहे थे। हम भी थके थे तो वहीं साइकिल खड़ी कर उनसे गप्पें लड़ाने लगे। उन्होंने तीन गांव का नाम लिया और हाथ के इशारे से बताया यह गांव इधर, वह  गाँव उधर और हम जहाँ बैठे हैं, उस गाँव का नाम यह है। गाँव के नाम में क्या रख्खा है, हम भूल गए और याद कर लिख भी दें तो आप कौन सा ज्ञान में वृद्धि कर लेंगे! 


पुलिया में बैठकर, ग्रामीणों से बात कर, बहुत आनन्द आया। मुझे पुलिया वाले श्रीमान कानपुर के अनूप शुक्ल  जी की बहुत याद आई फिर याद आया, वे तो अभी अकेले कश्मीर घूम रहे हैं! अपने दौड़ गुरु श्रीमान Satish Saxena  जी की भी याद आई जो अभी जर्मनी में श्रीमान Raj Bhatia  जी के गाँव में घूम रहे हैं। हम पुलिया पर बैठकर यही सब सोच रहे थे कि नेपाली बहादुर ने खैनी मेरी ओर बढ़ाते हुए पूछा, आप भी लेंगे? दूसरा समय होता तो खुशी-खुशी झट से ले लेता मगर इनकार करते हुए बहादुर को धन्यवाद दिया। ग्रामीणों ने सुर्ती न खाने के लिए जब मेरी बहुत प्रशंसा करी और अपनी आलोचना करी कि सुर्ती खाना गलत बात है लेकिन आदत पड़ गई, क्या करें! तो मुझे अपने न्यूरो डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया जिसने मुझे दवाई चलने तक नशा करने से मना किया हुआ है।


बहुत देर बैठने, गप्पें लड़ाने के बाद जब धूप तेज होने लगी तो मैं पुलिया से उतरा और सबसे विदा लेकर घर की ओर चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, काशी सिर्फ अस्सी घाट, संकटमोचन, BHU, गोदौलिया, बाबा विश्वनाथ जी का दरबार या गलियों की चाय-पान की अड़ी ही नहीं है, काशी में बहुत कुछ है जिसे काशीवासी भी एक जीवन मे पूरा नहीं देख पाते।

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28.6.22

सायली छन्द

(1)

चिड़िया

पानी पीने

मेरे आँगन आई

भरे प्याले

चहचहाई।

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(2)

भूखी

रोटी पकाई

बेटा घर आया

खाना खाया

तृप्त।

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(3)

पतंग

पेंचा लड़ा

लड़के लूटने दौड़े

डोर बंधी

उड़ी।

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(4)

ट्रांसफर

विदाई/स्वागत

पुराने वाले मित्र

नए अभी

अधिकारी!

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(5)

सूरज

कपारे पर

धूप दुआरे पर

बरसे आग

सबेरे।

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(6)

दिल 

आँच चढ़ा

मोम पिघल जाता

खिलौना बना

माटी।

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(7)

उजली

दूध धुली

चाँद परी ख्वाहिशें

छाँव जली

जिंदगी।

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(8)

इंद्रदेव

बिगड़ा बजट

एक गाँव झमाझम

एक गाँव

सूखा।

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29.5.22

आधी रोटी चोर!

बनारस की एक गली में चीखते-चिल्लाते लड़कों का एक झुण्ड करीब आ रहा था। आगे-आगे एक विक्षिप्त बुढ़िया भागे जा रही थी। लड़के पास आते तो वह जमीन से उठाकर झुण्ड की ओर एक पत्थर फेंकती, लड़के बचते हुए जोर से चीखते...आधी रोटी चोर!!! 
गली से गुजर रहा कोई आदमी लड़कों को डांट कर भगाता, "क्यों परेशान कर हो?" लड़के इधर-उधर गली में बिखर जाते। बुढ़िया संभलती, आदमी को हाथ जोड़ती (शायद शुक्रिया अदा करने का उसका यही अंदाज हो), वहीं एक चबूतरे में थक कर बैठ जाती। पोटली से रोटी निकालकर खाती। ऐसा महीने में कई बार होता! 
एक दिन मैने एक सरदार से पूछ ही लिया, "कौन है यह?"
सरदार बोला, "पागल है, इसका कोई नहीं है। वर्षों पहले गंगा घाट में कहीं से आ गई थी। जब आई थी, जवान थी। पूछने पर कुछ नहीं बता पायी। गली/घाट में कहीं पड़ी रहती। घरों में बरतन साफकर कर अपना गुजारा करती। एक बार गर्भवती हुई! लोगों ने इसको खूब गालियाँ दी। बुरा/भला सब कहा। कोई इसे घर में बुलाने को तैयार नहीं हुआ। गोद में एक बच्चा भी आ गया लेकिन टिका नहीं। बच्चा मर गया तब इसका मानसिक संतुलन और भी बिगड़ गया। लड़के यह सब नहीं जानते, इसको परेशान करने में उनको मजा मिलता है। समय बीतता गया, ऐसे ही मांगते-खाते बूढ़ी हो गई। आप परेशान मत होइए, ऐसे ही मर जाएगी एक दिन।
मैं दुखी होकर घाट की सीढ़ियाँ उतरने लगा। तट पर घण्टों बैठा माँ गंगा से एक प्रश्न पूछता रहा..परेशान होने के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? ऐसा लगा जैसे माँ मुझ पर ही हँस रही हों! कह रही हों,"तुम जानो, तुम्हारा समाज जाने, मुझे  क्यों माँ कहते हो? लड़की की यह हालत क्यों है? इसका उत्तर तो तुम्हें ही देना होगा।
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25.5.22

साधू

एक बार यमराज को कुम्भ मेले में त्रिवेणी दर्शन का मोह जगा। प्रयागराज में गंगा नदी के तट पर एक कुटिया बनाकर रहने लगे। बगल की कुटिया में एक स्वनामधन्य, पहुँचे हुए साधू रहते थे। एक दिन स्नान करते वक्त यमराज जी से पूछ बैठे...

क्या नाम?

यमराज!

साधू नाराज हो गए, क्रोध से बोले, "मूर्ख! मुझसे मजाक करता है!!!" यमराज जी ने विनम्रता पूर्वक कहा, "नहीं महाराज, मजाक क्यों करूँगा? मैं यमराज हूँ, कुम्भ में गंगा स्नान की इच्छा हुई तो साधूभेष बनाकर चला आया।" साधू और भी नाराज, "यमराज हो तो अपना असली रूप दिखाओ।"

'नहीं महाराज। असलीरूप तो तभी दिखाऊंगा जब आपको ले जाना होगा। प्रतीक्षा कीजिए, अभी आपका समय नहीं आया है, समय आने पर देख लीजिएगा।'

अब साधू को चैन कहाँ! परोक्ष में एक ही शब्द जोर से बोले,'मूर्ख!' और चुप लगाकर चले गए लेकिन भीतर तक क्रोध से काँप गए।

उन्हें यकीन ही नहीं था कि यमराज ऐसा भी हो सकता है। अपने चेलों को भेजकर तरह-तरह से यमराज को परेशान करने लगे। इधर यमराज का मन धार्मिकता में पूरी तरह से डूबा हुआ था। गमछा गायब हो जाए, मेहनत से बनाया खाना गायब हो जाय, आँख खुलने पर कुटिया गन्दगी से भरी पड़ी हो, कोई फर्क नहीं। कुटिया की सफाई करते, स्नान करते, ध्यान लगाते और खाना न मिलने पर भूखे ही सो जाते। 

उधर साधू ने समझा कि अब तो बुद्धि सही हो गई होगी, एक दिन फिर पूछा, "क्या नाम है तुम्हारा, अब तो अपना असली नाम बता दो?
सुनकर यमराज मुस्कुरा दिए, "जब हम तुमको लेने आएंगे तभी याद होगा कि हम कौन हैं, उससे पहले न स्मरण रहेगा न विश्वास होगा। जो दिन बचे हैं, अनासक्त हो, प्रभु भजन में बिताओ। मुझे तो तुम भी साधू भेषधारी सांसारिक प्राणी लगते हो।"

अब साधू गुस्से से पागल हो गया। इसी पागलपन में भाँग के साथ ढेर सारा धतूरा पीसकर निगल गया। ऐसा बीमार पड़ा कि चेलों ने बहुत इलाज करवाया लेकिन डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। मृत्यु निकट आई तो उसे लेने यमराज द्वार पर आए। यमराज को देखकर साधू के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान खिल गई, कांपते हुए अपने चेलों से कहने लगा," देखो!यमराज ऐसा होता है, वह दुष्ट कह रहा था, हम यमराज हैं। जाओ! बगल की कुटिया से उसे पकड़ कर ले आओ।" यमराज से बोला, "महाराज! मैं चलने को तैयार हूं लेकिन उसे भी साथ ले चलिए।" 

चेलों ने बगल की कुटिया छान मारी, अपने को यमराज कहने वाले साधू का कहीं पता नहीं था। खाली हाथ लौटकर बोले," महाराज! वहाँ तो कोई नहीं है!!! इतने में यमराज हँसकर बोले, 'मैं यहाँ हूँ महाराज, आपके कारण मुझे साधू भेष का त्याग करना पड़ा और कुंभ का आनन्द भी नहीं ले पाया। चलिए, चला जाय। सुना था, आप त्रिकालदर्शी हैं, इसीलिए आप से झूठ नहीं बोल पाया।" 

सुनते ही साधू के प्राण निकल गए, यमराज भी कुटिया से गायब हो गया, चेलों को कुछ भी समझ में नहीं आया। न उन्होंने यमराज को देखा न यमराज से हुई अपने 'साधू महाराज' की बात सुनी। उन्हें बस यह लगा कि हमारे 'महाराज' के मरने में, बगल वाले कुटिया में रहने वाले 'साधू' का कोई हाथ है। 
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

19.5.22

घड़ा

पीपल के पेड़ पर माटी के कलश लटके होते हैं। माना जाता है कि मरने के बाद आदमी 12 दिनों तक प्रेत योनि में भटकता है, तेरहवें दिन श्राद्ध हो जाने के बाद वह पितरों की श्रेणी में शामिल हो जाता है। 12 दिनों तक मृत आत्माओं को पानी देने के लिए माटी के कलश, पीपल के शाखों पर बांध देते हैं और मृतात्मा के लिए पुत्र/वारिश रोज सुबह/शाम घट में जल भरता रहता है। 


हम काशी की गलियों में बसे एक मोहल्ले ब्रह्माघाट में रहते थे। घाट से गंगा की सीढ़ियाँ उतरते समय बायीं तरफ आज भी पीपल का एक विशाल वृक्ष है जिसमें माटी के घट लटके होते हैं। हम लड़के, किशोरावस्था में घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते/उतरते बड़े ध्यान से इन घटों को देखते रहते थे। कोई कहता,"पीपल का पेड़ है, इसमें भूत रहते हैं।" हम शुरू से ही भूत/प्रेत पर विश्वास नहीं करते थे तो इन तर्कों को शुरू से खारिज कर देते थे। बात ही बात में किसी ने बाजी लगा दी,"रात को 12 बजे यहाँ आकर दिखाओ तो माने कि भूत नहीं होते!" हम कहाँ हारने वाले थे! उत्साह में बोल दिए,"आएंगे क्या, एक घट भी उतार लाएँगे, तुम लोगों को विश्वास हो जाय कि हम आए थे। तुम लोग दूर चबूतरे पर बैठे रहना।" 


वो किशोरावस्था की शैतानियों के दिन थे। बात आई/गई हो गई लेकिन जब भी मित्रों को मौका मिलता, चिढ़ाने से नहीं चूकते,"पाण्डेय! घण्टा कब उतारोगे?" हम सुनकर कट के रह जाते और मौके की तलाश करते। एक दिन मौका मिल ही गया।


गलियों में 'नूतन बालक समिति' की ओर से 'गणेश विद्या मंदिर' स्कूल (जो ब्रह्माघाट से थोड़ी दूर घासी टोला मुहल्ले में स्थित था) और मोहल्ले के ही एक विशाल भवन जो 'आंग्रे का बाड़ा'  के नाम से प्रसिद्ध था, में धूमधाम से गणेश जी की प्रतिमा स्थापित होती और कई दिनों तक भांति-भांति के सांस्कृतिक समारोह आयोजित होते थे। इन्ही समारोहों में एक दिन बड़े पर्दे पर फिल्म भी दिखाई जाती। हम किशोर, भले दूसरे आयोजनों में न जांय, फिल्म देखने जरूर जाते।  


उस दिन आंग्रे के बाड़े में शाम को एक फ़िल्म दिखलाई जाने वाली थी। उन दिनों जब टीवी नहीं थी, हम किशोरों के लिए यह एक बहुत बड़ा आयोजन था। वह कौन सी फ़िल्म थी, याद नहीं लेकिन फ़िल्म थी, यही बहुत था। सभी मित्र फिल्म देखने के लिए जमा हुए थे और घरों से भी गणेशजी के नाम पर समारोह में जाने की पूरी छूट थी। 


फिल्म रात 12 बजे के आसपास समाप्त हुई और हम शोर करते हुए घर जाने के लिए बाहर चबूतरे पर जमा हुए। तभी मैने मौका ताड़ा और घोषणा कर दी, "हम पीपल के पेड़ से घण्ट उतारने जा रहे हैं, तुम लोग यहीं बैठो, 5 मिनट में आ रहे हैं।" सभी मित्र अवाक हो, मेरा चेहरा देखने लगे! और चीखने लगे,"पागल हो गए हो क्या? पीपल के पेड़ पर भूत रहते हैं।" मैने हँसते हुए कहा, "कोई भूत नहीं रहता, चिंता मत करो, अभी आ रहे हैं।"


हम दौड़ते हुए घाट की सीढ़ियाँ उतर गए। पीपल के पेंड़ के पास पहुँचकर, ठिठक कर खड़े हो गए। घट तो बहुत ऊँचाई पर हैं, कैसे उतारें? सोचते-सोचते कोई उपाय नजर नहीं आया। घट वाकई मेरी ऊँचाई से बहुत ऊपर थे! आस पास कोई नहीं था, जो मदद करे। कोई होता भी तो ऐसे कामों में क्यों मदद करता? मारकर भगा देता। तभी नीचे जड़ों के पास एक खाली घड़ा दिखाई दिया! मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। घड़ा उठाया और भाग कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। चबूतरे के पास पहुँचे तो यह क्या! मेरे सभी मित्र कहाँ गए? मैं घड़ा वहीं चबूतरे पर रखकर आवाज जोर-जोर से आवाजें लगाने लगा, "कहाँ हो? देखो! घड़ा ले आए। कोई है?" हारकर वहीं चबूतरे पर बैठ गए। सोचने लगे, "सभी डरपोक हैं, चलो!  घड़ा घर ले चलते हैं, कल दिखाएंगे।" घड़ा उठाने के लिए ज्यों ही मुड़े, वहाँ कोई घड़ा नहीं था! डर के मारे मेरी घिघ्घी बंध गई। अरे! यहीं तो रक्खा था, घड़ा कहाँ गया?



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