8.2.21

शत्रुता

मैने मांगा, 

जाड़े की धूप

उसने दिया,

घना कोहरा!


मैने पूछा,

"ठंडी कब जाएगी?"

उसने कहा,

"थोड़ी बर्फवारी होने दो।"


मैने पूछा,

"बसंत कहाँ है?"

उसने कहा,

"रुको! एक ग्लेशियर टूट जाने दो!"


मैने कहा,

"जाओ! 

तुमसे बात नहीं करते।"

उसने कहा,

"मित्र! 

तुमसे ही सीखी है यह 

शत्रुता!"

.........

गुलाब


क्या तुम्हें याद है?

पहली बार

गुलाब पकड़ते वक्त

परस्पर

छू गई थीं

हमारी उँगलियाँ

तब क्या हुआ था?

मुझे तो याद है..

गुलाब और गुलाबी हो गया था!


क्या तुम्हें याद है?

तुम्हारी जुदाई में 

कैसे रंग बदलता था गुलाब?

मुझे तो याद है

बिलकुल पीला!

और फिर

मेरे लौट जाने की बात सुनते ही

सफेद!


क्या तुम्हें याद है?

आज किस हाल में है

हमारा गुलाब?

मुझे तो याद है

बिलकुल वैसा 

जैसा पहली बार आया था 

उँगलियों में

लेकिन

मैं उसे देख नहीं सकता।☺️

.............

25.1.21

वसंत

यूं ही नहीं आता वसंत

लड़नी होती है, लंबी लड़ाई

धूप को

कोहरे के साथ।


लगने लगता है

हार गया कोहरा

तभी नहीं दिखती

धूप

लगने लगता है

गई ठंडी

छाने लगता है

घना कोहरा


यूँ ही नहीं आता 

मगर तय है

कोहरे को हराकर

आता है एक दिन

वसंत।

21.12.20

मन बहुत बेचैन मेरा

 मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।


तू धरा में तू गगन में

जर्रे-जर्रे में छुपा तू

है पढ़ा हमने भी लेकिन

वही दिन औ रैन आए!


मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।


मूर्तियाँ तेरी अनेकों

और अनगिन प्रार्थनाएँ

रूप हैं तेरे अनेकों

दे दरश! अब नैन छाए।


मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।


इन खिलौनों पर नज़र

मेरी कहीं टिकती नहीं है

गाँठ बाँधा है तुम्ही ने

दूसरा कैसे छुड़ाए!


मन बहुत बेचैन मेरा

तू मिले तो चैन आए।

.........................

17.12.20

चालाक चिड़ियाँ

एक चिड़िया

नींबू की डाली से उतर

मुंडेर के प्याले पर बैठ गई

इधर-उधर मुंडी हिलाई,

पूँछ उठाई

फिर गड़ा दिए चोंच प्याले में और..

उड़ गई।


हाय!

प्याले में पानी नहीं है।


यह तो वह 

देख ही रही होगी ऊपर से

फिर उसने इतनी मेहनत क्यों की?


शायद

मुझसे पानी मांगने का

उसके पास

यही आसान तरीका था!


मैने दौड़कर

प्याले में पानी भरा और छुपकर 

उसकी प्रतीक्षा करने लगा


चिड़िया फिर आई

प्याले पर बैठी,

इधर-उधर मुंडी हिलाई,

पूँछ उठाई फिर फुदककर 

कूद गई प्याली में!

फर्र-फर्र पंख फड़फड़ाती,

छींटे उड़ाती

पानी से

खेलती रही देर तक।


हांय!

प्यासी नहीं थी,

यह तो बड़ी 

चालक निकली

नहाने लगी!!!


सावधान!

प्यासा समझकर पानी पिलाओ

तो आजकल

नहाने लगती हैं

चिड़ियाँ।

.......

20.10.20

हमारा कुछ न बिगड़ेगा

धीरे-धीरे
कम हो रहा था
नदी का पानी

नदी में
डूब कर गोता लगाने वाले हों या 
एक अंजुरी पानी निकाल कर
तृप्त हो जाने वाले,
सभी परेशान थे..
बहुत कम हो चुका है
नदी का पानी!

बात राजा तक गई
जाँच बैठी
नदी से ही पूछा गया...
पानी क्यों कम हुआ?

नदी ने 
राजा को देखा 
कुछ बोलने के लिए होंठ थरथराए पर...
सहम कर सिल गए!

राजा ने
नदी किनारे
सिपाही तैनात कर दिए
बोला..
अब देखें
कैसे कम होता है
नदी का पानी?

हाय!
नहीं रुका
पानी का घटना 
नदी 
सूखने के कगार तक पहुँच गई
एक दिन
हकीकत जानने के लिए
साधारण ग्रामीण का भेष बना कर
राजा स्वयं 
नदी के किनारे घूमने लगा

अरे! यह क्या!!!
सिपाही मेंढक को क्यों मार रहे हैं?
सुनो भैया!
आप राजा के आदमी होकर
इन निरीह मेढकों को क्यों मार रहे हो?
सिपाही बोले...
ये मेंढक
नदी का पानी पी कर भाग रहे थे!

देखो!
ये जब भी फुदकते हैं
दो बूंद पानी
झर ही जाता है!!!

राजा ने
प्रत्यक्ष देखा था
शक की कोई गुंजाइश नहीं थी
मेंढकों का अपराध 
सिद्ध हो चुका था।

सजा के तौर पर
मेंढक के पैरों में कील ठोंककर
उसका कलेजा निकाला जाना था
यह सब सुनकर
बिलों में छुपे साँप
बाहर निकल आए और..
तट किनारे खड़े
बरगदी वृक्ष की शाखों पर चढ़कर
कानों में
राजा का फैसला सुनाने लगे

खबर सुनकर
बरगद हँसने लगा...
यही होता आ रहा है सदियों से
हमारा कुछ न बिगड़ेगा
तुम सब निश्चिंत रहो।
..................

12.10.20

मुझे आकाश चाहिए

तुम

हवा, जल और धरती का प्रलोभन देते हो

इन पर तो मेरा 

जन्मसिद्ध अधिकार है!


तुमने

सजा रखे हैं 

रंग बिरंगे पिजड़े

और चाहते हो

दाना-पानी के बदले

अपने पंख 

तुम्हारे हवाले कर दूँ?


अपने सभी पिजड़े हटा दो,

मेरे पंख मुझे लौटा दो

मुझे आकाश चाहिए।