बेचैन आत्मा
11.4.13
ज़िंदगी
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सबेरा बच्चे सा हँसने लगा कभी पंछी कभी तितली कभी फूल धूप खि ली जानवर हो गया! बदलने लगा गिरगिट की तरह रंग कभी कुत्ता ...
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30.3.13
संभावना
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अटके हो किसी के आस में तो झरो! जैसे झरते हैं पत्ते पतझड़ में रूके हो किनारे साथी की तलाश में तो बहो! तेज धार वाली नदी में बिन मा...
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28.3.13
कहाँ गई होली...!
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बसंत आया सरसों के फूल खिले गेहूँ की बालियाँ लहलहाईं झूमने लगे अरहर सूखी सनाठी को पकड़कर इक-दूजे से लिपटने लगीं लताएँ धरती माँ न...
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17.2.13
दुन्नो हाथे लढ्ढू
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दुन्नो हाथे में लढ्ढू 'हीरो' कब्बो ना मिली लड़की चहबे फैंटास्टिक, नखरा झेले के परी। दुन्नो हाथे में लढ़्ढू 'राजा' कब्ब...
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11.2.13
आलू-चना।
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अच्छा खासा रविवार था। अच्छा इसलिए कि छुट्टी थी और खासा इसलिए कि मुझे कोई खास काम नहीं था। फरवरी की उतरती ठंड थी, नहाया था और स्वच्छ वस्त्...
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10.2.13
ब्लॉगर को सम्मान
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जनसंदेश टाइम्स, बनारस के 6 फरवरी 2013 को एक वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में शनीवार, 9 फरवरी को बनारस के होटल आइडियल टॉवर में एक भव्य समारोह...
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9.2.13
शब्दों की रोशनी
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अंधेरी राह में घने वृक्षों के पास कुछ शब्द दिखे गुच्छ के गुच्छ! जुगनुओं की तरह आपस में टकराते, बिखरते, फिर लौट आते... शायद वहीं ज...
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