बेचैन आत्मा
9.5.15
अब भला क्यों सजन, धूप में!
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आग लगती है ठन्डी हवा तुम कहाँ हो? सजन, धूप में हर तरफ बिछ रही चांदनी चल रहा हूँ सजन, धूप में मेरे पलकों ने बादल बुने लो सजन ओढ़ लो, ध...
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17.4.15
गेहूँ
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हम शहरियों के लिए कितना कठिन है धोना सुखाना चक्की से पिसा कर घर ले आना आंटा! उनकी नियति है जोतना बोना उगाना पकने की प्रतीक्षा क...
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11.4.15
गर्मियों के दिन
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रद्दी कागज़ बेचोssss चीखता, निकल गया रद्दी वाला याद आने लगीं बनारस की संकरी गलियाँ पुराना घर दुपहरिया में एक गाय आकर घुसेड़ देती थी प...
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22.3.15
दूर है मंजिल..
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अभी डूबेगा सूरज घर जायेंगे बंजर माटी पर क्रिकेट खेलते बच्चे थक जायेगा मिट्टी ढोते-ढोते ट्रैक्टर आँखों से ओझल हो जायेंगे...
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26.1.15
गणतंत्र दिवस
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एक समय था जब मेरे जैसे निर्धन मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा भी सरकारी स्कूल में न्यूनतम फीस देकर, बिना ट्यूशन किये, पढ़ाई पूरी कर सक...
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11.1.15
हँसते-हँसते रोया कर....
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दिन भर मारा फिरता है रातों में तो सोया कर। कल फिर सूरज निकलेगा कुछ सपनो में खोया कर। नफ़रत के किस्से मत लिख ढाई आखर बोया कर। दर्पण...
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2.1.15
मैं कबीर की इज्जत करता हूँ
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मुझे कोई आइना दिखाता है तो मैं आइने में अपनी शक्ल देखने के बाद मुँह धोने नहीं जाता! दौड़ा कर मारना चाहता हूँ मुझे लगता है आइना दिखाने ...
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