बेचैन आत्मा

15.4.22

सोचो तो....

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वे दिन भी क्या दिन थे! हम थे, तुम थे और साफ थीं गङ्गा जी पोतते थे जिस्म में मिट्टी, तैरते थे घण्टों और भूख लगने पर  खा लेते थे  ककड़ी, हिरमान...
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12.2.22

प्रेम

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अँधेरी राह में घने वृक्षों के तले अक्षर दिखे गुच्छ के गुच्छ! जुगनुओं की तरह आपस में टकराते, बिखर जाते। तेजी से बन/बिगड़ रहे थे शब्द हो रहा था...
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10.2.22

बनारस की गलियाँ-12

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बनारस की गलियों में तरह-तरह की शैतानियाँ देखने को मिलती थीं। एक गली के चबूतरे पर प्रौढ़ सरदार 'भइयो' बैठता था। जिस घर से सटा यह चबूतर...
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31.12.21

सुबह की बातें-9

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रजाई से  सर बाहर निकाल कर दोनों कानों को   बन्द खिड़की के उस पार फेंको! कुछ सुनाई दिया?  बारिश! नहीं sss  ओस की बूंदें हैं  थाम नहीं पा रहे ...
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सुबह की बातें-8

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नाच मेरी बुलबुल! तुझे पैसा मिलेगा। इत्ते जाड़े/कोहरे में क्यों नाचें? ये चावल के दाने बहुत हैं। आज रात को नया साल आने वाला है। खुशी मनाओ। हा...
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2.12.21

कथरी

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पाठकों की मांग पर, कथरी का काशिका से हिंदी में अनुवाद... कथरी -1 .............. कैसी तबियत है माँ? कहारिन ठीक से आपकी सेवा कर रही है न? क्य...
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14.11.21

बाल दिवस

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आज सन्डे न होता तो स्कूल जाने वाले बच्चे अपने बस्ते का भारी बोझ पटक कर गहरी सांस लेते तब गुरुजी उन्हें बता देते कि आज बाल दिवस है। लोहे के घ...
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