बेचैन आत्मा
25.4.23
साइकिल की सवारी 8
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रोज की तरह आज भी साइकिल उठाकर भोर में घूमने के लिए निकल पड़े। दरवाजे से बाहर आते ही मोबाइल में घड़ी देखी तो सुबह के 4 बजने में अभी 15 मिनट श...
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22.4.23
सोने के सिक्के
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जहां वह खड़ा था वहां दूर-दूर तक, जिधर निगाह जाती, मिट्टी गीली थी। हल्की-फुल्की जमीन धंस भी रही थी लेकिन कहीं दलदल नहीं दिखा। आराम-आराम से धं...
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14.4.23
लोहे का घर 71
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शाम के 6.10 बज चुके हैं। दून अभी जफराबाद में खड़ी है। इसे खड़ी कर एक मालगाड़ी को पास दिया गया है। अब मालगाड़ी अगले स्टेशन पर पहुंचेगी तब इसे...
लोहे का घर 70
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जफराबाद से चली है दून। शाम के साढ़े पांच बजना चाहते हैं, धूप का ताप कम नहीं हुआ है, खिड़कियों से किरणें झांक रही हैं। जिस बोगी में बैठा हूं,...
10.4.23
लोहे का घर 69
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मेरी गाड़ी पटरी पर चल रही है। चलते-चलते, बचपन और जवानी के कई स्टेशन आए, चेन पुलिंग भी हुई, भिड़े भी, गिरे भी, बिन स्टेशन के घंटों रुके भी ले...
लोहे का घर 68
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कामायनी एक्सप्रेस ............................ लम्बी यात्रा है, कामायनी एक्सप्रेस है, बनारस से जा रहे हैं भोपाल। रोज की यात्रा भले स्लीपर ...
9.4.23
साइकिल की सवारी 7
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अपनी सुबह तो रोज ही खूबसूरत होती है, आज तो बहुत खूबसूरत हो गई। रोज 2 कि.मी. साइकिल चलाकर सारनाथ पार्क में जाते हैं, आज संडे है तो सोचा कुछ ह...
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