आ! बसंत मंजर-सा हँसने
मेरे ताश महल में
पिछले बरस चली थी आँधी
महल उड़ा, तिनके-सा
मैं तो खुद कुछ देख न पाया
बिखर गया मनके-सा
क्यों बिजली हर बार गिरेगी
मेरे आस महल में?
ओरे-बोरे दर्द छुपाया
आँसू कथरी-कथरी
टांका बस पैबंद उम्र भर
भटका नगरी-नगरी
कमी नहीं कोई पाओगे
मेरे चहल-पहल में
क्या निर्धन की किस्मत में है
शीत, ताप ही सहना
क्या अमीर के कब्जे में ही
तुमको हरदम रहना
बना लिया क्या डेरा नियमित
तुमने राज महल में!
.... @देवेन्द्र पाण्डेय।
वाह
ReplyDeleteधन्यवाद।
Deleteकथरी - ने तो बचपन याद करा दिया
ReplyDeleteआपकी लेखनी में जो आंचलिकता झलकती है दर्शनीय होती है
बहुत सुंदर
आभार। 🙏
Deleteबसंत को क्या मिलेगा राजमहल में, वह तो ग़रीब की झोंपड़ी में खिलता है, सुंदर रचना!
ReplyDeleteधन्यवाद।
Deleteवाह
ReplyDeleteधन्यवाद।
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