बेचैन आत्मा
29.10.09
माँ
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रोज की तरह छत की मुंडेर पर धोती फैलाकर किसी कोने में खुद को निचोड़ती बच्चों की चिंता में दिनभर सूखती रहती है माँ। हवा के झोंके स...
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21.10.09
पिता
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चिड़ियाँ चहचहाती हैं फूल खिलते हैं सूरज निकलता है बच्चे जगते हैं बच्चों के खेल खिलौने होते हैं मुठ्ठी में दिन आँखों में कई सपने होते हैं पि...
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11.10.09
वज़न
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बचपन में 'कागज की नाव' लड़कपन में 'तास के महल' ज़वानी में 'बालू के घर' हमने भी बनाए हैं इनके डूबने, गिरने, या ढह ...
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9.10.09
आभार
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अभी तक तो अंतर्जाल में मात्र हिंद युग्म के लिए ही लिखता था। 'देखा देखी पाप, देखा देखी पुण्य' मैंने भी एक ब्लॉग बना लिया। पाठकों की प...
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6.10.09
देवता
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नारदः नारायण ! नारायण ! विष्णुः कहिए मुनिवर क्या समाचार है ? नारदः आप तो अंतर्यामी हैं प्रभो ! विष्णुः हस्तिनापुर का क्या हाल है...
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4.10.09
सफेद कबूतर
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घर की छत पर बैठे थे कई सफेद कबूतर सबने सब मौसम देखे थे सबके सब बेदम भूखे थे घर में एक कमरा था कमरे में अन्न की गठरी थी मगर कमरा, कमरा क्या थ...
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26.9.09
फाइलें
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फाइलें टेबुल पर बैठी नहीं रहतीं आधिकारियों के घर भी आया जाया करती हैं। अलमारियों में जब ये बंद रहती हैं अक्सर आपस में बतियाया करती ...
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