गंभीर कविताएँ पढ़कर भारी हुए मन को हल्का करने के लिए प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य विधा पर एक कविता जिसका शीर्षक है -मेरी श्रीमती।
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प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।
मुन्ना क्यों कमजोर हो गया ?
शानू को कितना बुखार है ?
राशन पानी खतम हो गया
अब किसका कितना उधार है ?
शानू को कितना बुखार है ?
राशन पानी खतम हो गया
अब किसका कितना उधार है ?
दफ्तर से जब घर जाता हूँ
वह मुझको पढ़ती रहती है।
वह मुझको पढ़ती रहती है।
सब्जी लाए भूल गए क्या ?
चीनी लाए भूल गए क्या ?
आंटा चक्की से लाना था
खाली आए भूल गए क्या !
मुख बोफोर्स बनाकर मुझ पर
बम-गोले जड़ती रहती है।
प्रश्नों से जब घबड़ाता हूँ
कहता अभी थका-मांदा हूँ
कहती कैसे थक सकते हो
तुम नर हो, मैं ही मादा हूँ !
मुझको ही झुकना पड़ता है
वह हरदम चढ़ती रहती है।
पूरे घर की प्राण वही है
हाँ मेरी भी शान वही है
हीरो-होण्डा दिल की धड़कन
चेहरे की मुस्कान वही है
बनके सतरंगी रंगोली
आँगन में कढ़ती रहती है।
प्रश्न-पत्र गढ़ती रहती है
वह मुझसे लड़ती रहती है।