16.10.23

सुबह की बातें (14)

धूप निकल आई है। छाँव है घने नीम के नीचे। चहुँ ओर आनंद की वर्षा का आलम है। एक तोता नीम की शाख से हवा में तैरता हुआ अनार के पौधों के बीच-बीच से निकलता हुआ फिर नीम में गुम हो गया। जाते-जाते उसने खण्डहर पर बैठी कौवी को आँख मारी या टाँय से छेड़ दिया कि साथी कौआ देर तक उसी दिसा में मुँह कर काँव-काँव करता रहा। कौए के चोंच इतनी चौडा़ई में खुलते, बंद होते कि लगा खा ही जायेगा तोते को। तोते की तरफ से फिर टाँय-टाँय की आवाज आई और कौआ पंख फैलाकर उड़ता हुआ घुस गया उसी नीम के पेंड़ पर। इधर कौवी उड़ी और हिरण के गरदन के ऊपर बैठ उसके कान में कुछ कहने लगी। हिरण ने हौले-हौले मुंडी हिलाई। कौवी संतुष्ट हो कौए की तलाश में उधर ही उड़ चली।


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2.10.23

बन्दर

भटकना नहीं चाहते वन-वन,

सीधे पहुंचना चाहते हैं

संकट मोचन!


सभी बन्दर

नहीं खा पाते, 

चने और देसी घी के लडडू।

अधिकांश तो

रोटी के लिए

मारे-मारे फिरते हैं

छत-छत, टेशन-टेशन

घुड़की देते हैं,

छिनैती करते हैं,

पकड़े गए तो

नाचते भी हैं

मदारी के इशारे पर।


इन्हें देख,

यकीन नहीं होता

तनिक भी सोचते होंगे

बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो।


हमको तो नहीं दिखते

देश के लिए मिटने वाले 

गाँधी जी के तीन बंदर

हमको तो सभी

संकटमोचन जाते दिखते हैं!


तीनों बंदर

अपना दुखड़ा रोने

कहीं राजघाट तो नहीं चले गए

बापू के पास!!!🤔

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