16.10.23

सुबह की बातें (14)

धूप निकल आई है। छाँव है घने नीम के नीचे। चहुँ ओर आनंद की वर्षा का आलम है। एक तोता नीम की शाख से हवा में तैरता हुआ अनार के पौधों के बीच-बीच से निकलता हुआ फिर नीम में गुम हो गया। जाते-जाते उसने खण्डहर पर बैठी कौवी को आँख मारी या टाँय से छेड़ दिया कि साथी कौआ देर तक उसी दिसा में मुँह कर काँव-काँव करता रहा। कौए के चोंच इतनी चौडा़ई में खुलते, बंद होते कि लगा खा ही जायेगा तोते को। तोते की तरफ से फिर टाँय-टाँय की आवाज आई और कौआ पंख फैलाकर उड़ता हुआ घुस गया उसी नीम के पेंड़ पर। इधर कौवी उड़ी और हिरण के गरदन के ऊपर बैठ उसके कान में कुछ कहने लगी। हिरण ने हौले-हौले मुंडी हिलाई। कौवी संतुष्ट हो कौए की तलाश में उधर ही उड़ चली।


....

2.10.23

बन्दर

भटकना नहीं चाहते वन-वन,

सीधे पहुंचना चाहते हैं

संकट मोचन!


सभी बन्दर

नहीं खा पाते, 

चने और देसी घी के लडडू।

अधिकांश तो

रोटी के लिए

मारे-मारे फिरते हैं

छत-छत, टेशन-टेशन

घुड़की देते हैं,

छिनैती करते हैं,

पकड़े गए तो

नाचते भी हैं

मदारी के इशारे पर।


इन्हें देख,

यकीन नहीं होता

तनिक भी सोचते होंगे

बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत बोलो।


हमको तो नहीं दिखते

देश के लिए मिटने वाले 

गाँधी जी के तीन बंदर

हमको तो सभी

संकटमोचन जाते दिखते हैं!


तीनों बंदर

अपना दुखड़ा रोने

कहीं राजघाट तो नहीं चले गए

बापू के पास!!!🤔

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28.9.23

लोहे का घर 73

कलकत्ता से वापसी यात्रा में भी हम भाग्यशाली हैं। राजधानी एक्सप्रेस में दोनो लोअर बर्थ मिली है फर्क सिर्फ इतना है कि आमने-सामने न होकर एक साइड लोअर बर्थ है दूसरी लोअर। श्रीमती जी साइड लोअर बर्थ में कब्जा जमाए 3 घण्टे से लगातार फोन में बहन, बेटियों से बातें कर रही हैं, बातें, ढेर सारी बातें....।

हम सुकून से फेसबुक चला रहे हैं, सामने लोअर बर्थ पर व्यवसायी दिख रहे, मेरी तरह वृद्ध होने जा रहे एक युवा, आराम कर रहे हैं। सामने के अपर या साइड अपर बर्थ खाली है। शांत और मनहूस वातावरण में कुछ भद्र सज्जनों के कारण जो मोबाइल जोर-जोर से सुनना पसंद करते हैं, कुछ आवाजें आ रही हैं, शेष सब शांति है। आस पास की शांति भंग करने में भद्र लोगों का बड़ा योगदान होता है। ये सोचते हैं कि हम मजा ले रहे हैं तो सभी मजा लें। इसमें इनकी कोई बदनियति नहीं है, बल्कि परोपकार की भावना है। अब यह अलग बात है कि हमारे जैसे कुछ बेचैन आत्मा को उनका यह प्रेम नहीं समझ आता, शोर करने वालों को ही अभद्र! बेवकूफ! असामाजिक! जाने क्या-क्या बोलते रहते हैं!!!


प्रेम से लिख रहे थे, खाना आ गया। खाना ठंडा न हो, खाने लगे। खाते-खाते धनबाद आ गया। धनबाद से बहुत यात्री चढ़े। छोटे बच्चे, गोदी में रोता बच्चा लिए महिला, बुजुर्ग और युवा भी। हमारे कूपे में तीनों अपर सीट भर गई। हमने जल्दी-जल्दी खाना समाप्त किया और हाथ धोकर, पान घुलाकर बैठ गए। अभी लोग सामान और सीट मिला ही रहे हैं, खूब शोर हो रहा है, गोदी का बच्चा अभी माँ का दूध पीकर खेल रहा है। बगल के कूपे में भी इनके साथ की फौज है। ये लोग भी खाना-खाना कर रहे हैं, ऊपर बैठी महिला बच्चे को गोद में लिए खाना भी खा रही है। कुल मिलाकर स्लीपर बोगी की तरह चहकने लगा यह डिब्बा!


ट्रेन पूरी स्पीड से चल रही है, अगला स्टेशन गया है। गया के बाद अपना स्टेशन पंडित दीन दयाल... मुगलसराय है। इसके मुगलसराय पहुंचने का समय रात्रि 1.15 है। हमको मुगलसराय उतरना है। आज घर पहुंचकर ही सोना नसीब होगा। सब सही रहा तो भोर से पहले घर पहुंच जाएंगे। गलती से सो गए तो दिल्ली पहुंच जाएंगे! दिमाग कह रहा है, अभी सोना नहीं है। शरीर कह रहा है, सो जाओ, अजीब मुसीबत है।


आइसक्रीम आ गया! पहले बताया होता होता तो पान नहीं जमाते, दोनो मेरे प्रिय हैं, कैसे छोड़ दें? पान थूककर आइसक्रीम खा लिया, अब दूसरा पान नहीं है। सुख भी मुसीबत ले कर आती है। एक से अधिक सुख, एक साथ मिल जाय तो क्या छोड़ें, क्या पकड़ें वाले उहापोह में आदमी पड़ जाता है।


मेरे अपर बर्थ वाली महिला अब सुकून से है। बच्चा सो गया है, अब वह भी सोने की तैयारी कर रही है। लोहे के घर में दृश्य तेजी से बदलते हैं। बाहर अंधकार है, खिड़कियों के पर्दे बंद हैं, भीतर रोशनी है लेकिन भीतर के नजारे भी तेजी से बदल रहे हैं। महिला का बच्चा सो चुका है, वह भी अब लेट कर मेरी तरह मोबाइल निकाल चुकी हैं। सामने बैठे यात्री भी मोबाइल चला रहे हैं, सामने साइड लोअर बर्थ में अपनी श्रीमती जी भी चश्मा चढ़ा कर मोबाइल चला रही हैं। आज के जीवन में दो ही सच्चे मित्र बचे हैं, एक मोबाइल दूसरा चश्मा, शेष तो झूठा है यह संसार।

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लोहे का घर 72

सेवानिवृत्ति के बाद कुछ दिनों के लिए लोहे का घर छूटा तो इसका मतलब यह थोड़ी न है कि शरीर सलामत हो, जीवन शेष हो फिर भी इसका साथ छूट जाय! मुझे तो ट्रेन पकड़ने का बहाना मिलना चाहिए। अमृतसर हावड़ा एक्सप्रेस 50टी डाउन में कई बार बैठे लेकिन कभी हावड़ा जाने का अवसर नहीं मिला। भालो-आछे, भालो-आछे कहते हुए जौनपुर से चढ़े और बनारस उतर गए। अब फिफ्टी डाउन बंद हो चुकी है, उसे कोरोना निगल गया। (कोरोना काल में जो बंद हुई कि हमेशा के लिए बंद हो गई।) अब हावड़ा जाने के लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़े तो यह विकल्प अच्छा लगा। आठ घण्टे में, होटल चेक इन के समय लगभग 10 बजे यह हावड़ा पहुंचा देगी।


राजधानी हावड़ा एक्सप्रेस में सुफेद चादर ओढ़कर लेटे हैं। पंडित दीन दयाल..... मुगलसराय से रात 2 बजे चढ़े हैं। सुबह के 6 बज चुके हैं, ट्रेन 509 किमी चलकर, धनबाद से पहले, पारसनाथ स्टेशन पर 2 मिनट रुककर चल चुकी है। जिस प्लेटफार्म में रुकी थी, सन्नाटा फैला था। अपनी बोगी में भी बहुत से बर्थ खाली हैं। कुल मिलाकर सन्नाटे का साम्राज्य है। सामने के लोअर बर्थ में श्रीमती जी और इधर के लोअर बर्थ में हम, ऊपर 2 और सामने 2 और बर्थ हैं, शेष पर्दे में डूबा हुआ। श्रीमती जी खर्राटे भर रही हैं और हमको नींद नहीं आ रही। वैसे भी यह मेरा साइकिल चलाने का समय है। ठीक इस समय नमो घाट, बनारस में भजन चल रहा होगा।


राजधानी एक्सप्रेस में रईसी से यात्रा कर रहे हैं लेकिन ट्रेन भारत के मेहनतकश मजदूरों, किसानों के इलाकों से गुजर रही है। बंद शीशे की खिड़की से बाहर झाँकता हूँ तो दूर दूर तक फैले वृक्षों के जंगल, खेत और हरे भरे मैदान दिख रहे हैं। कभी जब छोटे प्लेटफार्म से कूदती /फादती भागती है अपनी राजधानी तो दूर खेतों में उग आई चिमनियां/ कुछ पक्के मकान दिख जाते हैं। अपनी ट्रेन बोल भी रही है, "हम कुछ ही मिनटों में धनबाद पहुंचने वाले हैं!" मतलब बिहार से हम कोयले के खदानों वाले राज्य झारखण्ड आ गए।


धनबाद हम पहले भी आए हैं। बिटिया ने इसी शहर से MBA किया था। उसके प्रवेश से लेकर एग्जाम पास करके निकलने तक कई बार आना हुआ। एक बार तो वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई थी और हॉस्पीटल में एडमिट करने के बाद उसकी सहेलियों ने फोन किया था, हम भागे-भागे आए थे। तब आजकी तरह राजधानी नहीं पकड़ते थे, लुधियाना धनबाद, किसान एक्सप्रेस पकड़ते थे जो शाम को बनारस से चलती और सुबह में धनबाद पहुँचाती थी।


ट्रेन खूब स्पीड में चल रही है। एक चायवाला आया। पहले तो हमने लोकल ट्रेन का चायवाला समझकर मना कर दिया लेकिन श्रीमती जी के कहने पर बुलाया तो पता चला यह राजधानी एक्सप्रेस की मुफ्त सर्विस है, जिसका पैसा टिकट में लिया जा चुका है! एक ट्रे में दो कप गरम पानी, चाय /दूध /शुगर के छोटे-छोटे पैकेट/सबको अच्छे से मिलाने के लिए सीक और दो बिस्कुट भी! चाय पीने के बाद समझ में आया कि अपन लोकल ट्रेन में चलने वाला रोज का यात्री, रइसों के इन चोचलों को इतनी जल्दी कैसे समझ ले? हमको जब भी अकेले सफर करना पड़ा, हम यही सोचते कि कम पैसे में कैसे जांय? जब परिवार के साथ चले तो यह सोचते कि कम से कम कष्ट में कैसे ले जांय? मेरी ही नहीं शायद सभी मध्यम वर्गीय अकेले गृहस्थी चलाने वाले की यही सोच होती होगी। हम एक महीने की MST बनाते थे तो जितनी भी लेट हो, ट्रेन ही पकड़ते थे, 73 रूपया अतिरिक्त देकर बस से आना गवारा नहीं होता था।


कभी राजधानी एक्सप्रेस के कारण अपनी पैसिंजर किनारे लगा दी जाती और 30-30 मिनट रोक दी जाती तो मन ही मन राजधानी एक्सप्रेस को खूब कोसते, "कहाँ से आ गई यह इस समय!" आज इसी राजधानी एक्सप्रेस से सफर कर रहे हैं जिसके आसनसोल स्टेशन आने की घोषणा हो रही है अब अगला ठहराव हावड़ा ही है।

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दोस्ती

एक जिस्म में मजदूर और कवि दोनो साथ-साथ रहते। काम से लौटकर मजदूर घर आता, रोटी खाते-खाते उसे नींद आने लगती। कवि, मजदूर के बल पर दुनियाँ देखा करता। मजदूर की दर्द भरी दासतां सुनकर, नई कहानियाँ लिखा करता, घर आते ही दोनो साथ खाने पर बैठ जाते। इधर मजदूर का पेट भरता, उधर कवि की कविता की भूख जाग जाती! मजदूर पेट भर खा कर चैन की नींद सोना चाहता लेकिन कविता की भूख का मारा कवि उल्लू की तरह जाग कर मजदूर से अपनी नई कविता सुनने और आज के काम का दर्द बयान करने को कहता।


अमां यार! अभी तो बारह भी नहीं बजा, सुन लो! बड़ी अच्छी कविता है। मजदूर का बस चलता तो कवि की गरदन दबा देता लेकिन बिचारा क्या करता? अपनी गरदन कैसे दबाता? आखिर दोनो एक ही जिस्म में रहते थे।

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10.9.23

बनारसनामा

8 सितम्बर, 2123 को श्री कन्हैया लाल गुप्त स्मृति भवन, रथयात्रा, वाराणसी में स्वर्गीय घनश्याम गुप्त जी की 82वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर काशिका बोली में रचित उनकी छान्दसिक कृति 'बनारसनामा' का भव्य लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर गुरुदेव श्री जितेन्द्र नाथ मिश्र सहित बनारस के कई साहित्यकार, वरिष्ठ पत्रकार और गुप्त जी के परिवार के सदस्य उपस्थित थे। वरिष्ठ गीतकार श्री सुरेन्द्र वाजपेयी जी ने सभा का कुशल संचालन किया।

'बनारस नामा' का प्रकाशन अभिनयम प्रकाशन, वाराणसी द्वारा किया गया है। पुस्तक पृष्ठ, छपाई, और ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है। मूलतः काशिका बोली में प्रकाशित इस कृति को पढ़कर बनारस के इतिहास को समझा जा सकता है। सरसरी तौर पर देखने मात्र से यह समझा जा सकता है कि पुस्तक काफी समृद्ध है और इसमें में तत्कालीन बनारस को जिया गया है।  लेखक बनारस के प्रसिद्ध मिष्टान्न भण्डार 'मधुर जलपान' के मालिक थे, इन दो पंक्तियों में उन्होंने बनारस की जो उपमा दी है, वह मुग्ध करने वाली है....

काशी कs दिल बहुत बड़ा हौ, इहाँ हौ पूरी दुनिया।

लगेला जैसे रस में डूबल इक दोनिया में बुनिया।।

कोई काम जब टल जाता है तो उसे हमेशा के लिए भुला दिए जाने की पूरी संभावना रहती है लेकिन मृत्यु के 23 वें वर्ष में उनकी पुस्तक का लोकार्पण यह बताता है कि यह बनारस के साहित्य प्रेमियों की और उनके परिवार की कितनी दबी इच्छा थी जो अब तक जीवित थी! पुस्तक घनश्याम गुप्त जी को विनम्र श्रद्धांजलि तो है ही, उनके प्रेमियों में मनुष्यता के जिन्दा रहने का प्रमाण भी है।


19.8.23

चार

घूमते-घूमते एक घने नीम के वृक्ष के नीचे पहुँचा। वैसे तो मैं जंगल में ही था और आसपास कई घने वृक्ष थे लेकिन यह थोड़ा अलग था। किसी ने शाखों को काट छांट कर बकायदा सीढ़ी का आकार दिया था, इससे ऊपर चढ़ना बहुत आसान था। मैं भी अपनी मानसिक उलझन में था, चढ़ता चला गया और ऊपर एक चौड़े शाख पर आराम से बैठकर सुस्ताने लगा। सफर कितना भी आसान हो, चढ़ाई तो चढ़ाई होती है।


बैठकर आसपास के दृष्यों का आनंद ले ही रहा था कि एक युवा कुल्हाड़ी लेकर धड़ल्ले से चढ़ता चला आया और सामने की शाख पर खड़े हो मुझे घूरने लगा! मैने भी उसे ध्यान से देखा।  हृष्ट पुष्ट, गेहूआं रंग, स्वस्थ शरीर, अवस्था 25-30 वर्ष। एक और खास बात थी, उसके हाथ, पैर, और सर में भी जगह-जगह गंदे कपड़े लपेटे हुए थे, कपड़ों में खून के धब्बे लगे थे और वह दर्द से कराह भी रहा था!

मैं कौतूहल से एक टक उसी को देखने लगा। उससे बड़ा नमूना मैने जिंदगी में कभी नहीं देखा था। उसे देख लग रहा था जैसे कालीदास का पुनर्जन्म हो गया है। इसने भी डाल के आगे की तरफ खड़े हो कर कुल्हाड़ी चलानी शुरू करी और हर वार पर जोर से चिल्लाता, "चार!" मुझसे रहा न गया, बोल पड़ा, 'पागल हो चुके हो क्या?' शाख कटेगी तो गिरोगे नहीं?

वह मेरी बात सुनकर जोर से ठहाके लगाने लगा, "जानता था, तुमसे बर्दाश्त नहीं होगा और ज्ञान बाँटने चले आओगे। मैं क्या बोल रहा हूँ इस पर भी ध्यान दो और उसने कुल्हाड़ी चलाते हुए चीखा..."चार!"

शाख कटकर गिरने ही वाली थी, इसी रफ्तार से कुल्हाड़ी चलाता रहा तो अगले दो, तीन वार में यह व्यक्ति शाख के साथ जमीन पर होगा! मैने घबड़ाकर कहा, "ठीक है, काट लेना, आत्महत्या करने का मन है तो तुम्हें कौन रोक सकता है? लेकिन मरने से पहले मेरी जिज्ञासा तो शांत कर दो, कृपया मुझे बताओ कि ऐसा क्यों कर रहे हो और यह "चार-चार" क्या बोले जा रहे हो?"

मेरे विनम्र आग्रह से वह थोड़ा प्रभावित हुआ और शाख काटना छोड़, धच्च से उसी डाल पर बैठ गया और ठहाके लगाते हुए बोलना शुरू किया, "चार -चार का मतलब यह चौथी बार है! वह देखो, तीन शाख काट कर पहले ही गिरा चुका हूँ! इन कपड़ों में जो खून लगा है, मेरे ही हैं और तुम मुझी को समझा रहे हो कि गिर जाओगे? मैं जानता हूँ, तुम अब और परेशान हो चुके होगे, पूछोगे, ऐसा क्यों कर रहे हो? हा हा हा हा... तुम भी करो तो तुम्हें भी इसके आनंद का ज्ञान होगा! जिस डाल पर बैठो, उसी को काटो और धड़ाम से गिर जाओ! जितनी चोट लगेगी, जितना दर्द होगा, उतना आनंद आएगा!

क्या बकते हो! इससे तो जान भी जा सकती है!!! तीन बार भाग्यशाली रहे तो जरूरी थोड़ी न है कि चौथी बार भी बच जाओगे?

हा हा हा हा... मर जाएंगे इससे ज्यादा कुछ नहीं न होगा? जब तक जिन्दा रहेंगे दर्द का आनंद लेंगे। होशोहवाश में अपनी डाल काटने का आनंद ही कुछ और है, कम से कम इसमें पता तो रहता है, गिरेंगे और चोट लगेगी। आजकल जिसे देखो वही अपने पैरों में कुल्हाड़ी चला रहा है, जिस डाल में बैठा है उसी को काट रहा है, गिरता है तो चिल्लाता है, धोखा -धोखा! मैं तो पूरे होश में काट रहा हूँ। चोट भी मुझे ही लगेगी, दर्द भी मुझे ही होगा, उनकी तरह शैतान तो नहीं हूँ न जो पूरा जंगल काट रहे हैं? तुम बताओ, क्या अब किसी नदी का जल पी सकते हो? हवा, पानी सब प्रदूषित हो चुका है, क्या यह जिस डाल में बैठे हैं उसे काटना नहीं हुआ? तुम जंगल में क्यों भटक रहे हो? अपने पैरों में कुल्हाड़ी तो तुमने भी मारी है, गिरे तो तुम भी हो, जंगल में नहीं गिरे तो घर में ही गिरे होगे? धोखा तो तुमने भी खाया है, तुम्हारा दर्द तुम्हें जीने नहीं दे रहा इसलिए जंगल में भटक रहे हो। मैं पूरे होश में यह काम कर रहा हूँ, कोई धोखा नहीं, आनंद ही आनंद। मैं मर गया तो यह कुल्हाड़ी तुम उठा लेना, मैं तो चला डाल काटने, "चार!"
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

16.8.23

काव्य गोष्ठी

कल 15 अगस्त का दिन अत्यधिक व्यस्तता का रहा। सुबह 5 बजे घर से निकला तो रात 10 बजे वापस लौट पाया। सुबह नमो घाट और कुष्ठ आश्रम से लौटने के बाद दिन में राजकीय लाइब्रेरी ( एल टी कॉलेज, कचहरी) में भाई श्री कंचन सिंह परिहार जी और श्री प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी के कुशल संचालन में शानदार काव्य गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि श्री महेन्द्र अलंकार जी ने किया। साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ठ योगदान के लिए 5 प्रतिभाओं को कर्मवीर पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया।

शाम को श्री अख़लाक़ 'भारतीय', श्री अलोक सिंह 'बेताब' एवं श्री विकास पाण्डेय 'विदिप्त' के कुशल संचालन में बरेका वाराणसी के सभागार में एक भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता कविताम्बरा के सम्पादक एवं वरिष्ठ कवि श्री मधुकर मिश्र जी ने किया।

वरिष्ठ गीतकार/गजलकार डॉ शरद श्रीवास्तव, श्री सुरेन्द्र मिश्र, श्री कुंवर सिंह कुंवर एवं श्री शमीम गाजीपुरी के साथ हमको भी दोनो काव्य गोष्ठीयों में भाग लेने का सौभाग्य मिला।

कल का दिन यादगार बनाने के लिए सभी साथियों का आभार।
















यूट्यूब लिंक....

https://youtu.be/u70PefZpzuo

23.5.23

सूरजमुखी के तोते

वैसे तो अमेरिका का देशज फूल है सूर्यमुखी का फूल लेकिन अब बहुत से देशों में पाया जाता है। अपने नाम को सार्थक करता हुआ यह हमेशा सूरज की ओर झुका-झुका, सूरज को देख, खिला-खिला दिखता है। इसके बीज तोतों को बेहद प्रिय हैं। इन्हीं बीजों को खाने के लिए ये प्रायः फूलों पर मंडराते दिख जाते हैं। 

धमेख स्तूप पार्क, सारनाथ के एक छोटे से जमीन के टुकड़े में इनके पौधे लगे हैं। प्रातः भ्रमण के समय, सूर्योदय के साथ इन पर मंडराते तोते दिखने लगते हैं। ये तोते घने नीम के वृक्षों के खोह में कहीं घोंसला बनाकर रहते हैं लेकिन सूर्योदय के साथ कभी स्तूप के ऊपर, कभी फूलों के ऊपर मंडराते दिख जाते हैं। प्रातः भ्रमण करते समय सूर्यमुखी के फूलों पर मंडराते तोतों को देखकर मुझे सरकारी कार्यालयों में बाबुओं के इर्द गिर्द चक्कर लगाने वाले लोग याद आ जाते हैं। अब ये तोते याद आए तो उल्लू  भी याद आने लगे!

सरकारी कार्यालयों में कई प्रकार के बाबू पाए जाते हैं। कुछ तो सूरजमुखी के फूलों की तरह खिले-खिले दिखते हैं। सूर्यमुखी के फूल तो सूरज की ओर झुके चले जाते हैं, ये अधिकारी को देख उनकी ओर खिंचे चले जाते हैं! अधिकारी के कमरों से निकलने के बाद ये और भी खिले-खिले नजर आते हैं! दूसरे प्रकार के वे होते हैं जिनको अधिकारी आते ही घंटी बजाकर अपने कमरे में बुलाता है और उन पर दिन भर के  काम का बोझा लाद देता है या पिछले बताए गए काम के बारे में पूछता है और काम को ठीक से न करने के लिए डांट पिलाता है। ये दुखियारे तो उल्लू की तरह अधिकारी के कमरे से बुझे-बुझे निकलते हैं। सूरज निकलने के बाद जैसे उल्लू बुझा-बुझा रहता है वैसे ही कुछ बाबू अधिकारी को देख मुर्झा जाते हैं।

हमारा ध्यान अभी उल्लुओं पर नहीं, सूर्यमुखी के फूलों की तरफ़ है। खिले-खिले फूलों की तरह खिले-खिले सरकारी बाबू सबको अच्छे लगते हैं। जैसे सूर्यमुखी के फूलों के बीज के लिए  सुबह-सुबह फूलों पर तोते मंडराने लगते हैं वैसे ही ऑफिस खुलते ही कुछ बाबुओं के इर्द गिर्द लोग जमा होना शुरू हो जाते हैं! जैसे कुछ बाबू सूर्यमुखी के फूलों की तरह खिले-खिले दिखते हैं वैसे ही इनके इर्द गिर्द मंडराने वाले लोग भी तोतों की तरह टांय-टांय करते रहते हैं। इन बाबुओं के पास भी सूर्यमुखी के बीजों की तरह कुछ चुंबकीय आकर्षण होता होगा जिसकी तलाश में ये लोग ऑफिस खुलते ही इनकी ओर मंडराने लगते हैं। 

उल्लुओं के पास कम लोग ही जाना पसंद करते हैं। सूर्योदय के साथ जैसे उल्लू बुझे-बुझे रहते हैं, अधिकारी के कमरे से निकलने के बाद कुछ बाबू एकदम से दुखी-दुखी दिखते हैं। अब जो पहले से मुरझाया हो, उसके पास कौन जाना चाहेगा? रात में उल्लू सुखी रहता है लेकिन दिन में किसी के आने की आहट से भी बेचैन हो जाता है। इसीलिए कुछ उल्लू रात में काम करते हैं, शायद इसी से खुश होकर लक्ष्मी ने इनको अपना वाहन बना रखा है। जिस पर लक्ष्मी की कृपा हो उस पर अधिकारी की शेर गुर्राहट का क्या भय!

सूरज का उगना, सूरजमुखी के फूलों का सूर्य की ओर आकर्षित होना, तोतों का बीजों के लोभ में सूर्यमुखी के फूलों के इर्द गिर्द मंडराना और बीज की तलाश में आए तोतों से अपना जिस्म नुचवाना, उल्लुओं का अंधेरे में देखना, दिन में अंधे होकर लक्ष्मी की आराधना करना शास्वत सत्य है। कार्यालय में कार्य करने की प्रवृत्ति, संसाधन बदल सकते हैं लेकिन उल्लू और सूरजमुखी के फूल तो हमेशा पाए जाएंगे। जब तक सूरजमुखी के फूल हैं, सूरजमुखी पर मंडराने वाले तोते भी दिखते रहेंगे। 

सूरजमुखी के फूलों को समझना चाहिए कि तोते उनके पास सिर्फ इसलिए आते हैं कि उन्हें उनसे नहीं, उनके बीजों से प्रेम है। बीजों का खत्म होना मतलब समूल नष्ट हो जाना। अधिकारियों को देखकर खिलें मगर हमेशा यह याद रहे कि ये तोते उनके मित्र नहीं हैं।

https://youtu.be/Olkq4om9un8 


18.5.23

व्यवस्था

वह बड़ा आदमी है

सबसे ऊँची मढ़ी पर बैठ 

नदी में फेंकता है

पत्थर!


कई लहरें उठती हैं

गिनता है

एक, दो...सात, आठ, नौ दस...बस्स!

पुनः प्रयास करता है,

बड़ा पत्थर फेंका जाय

और लहरें उठेंगी!!!


छोटा आदमी

छोटी मढ़ी पर बैठ

फेंकता है पत्थर

गिनता है लहरें

वह भी संतुष्ट नहीं होता

तलाशता है

और बड़ा पत्थर!


नदी किनारे

नीचे घाट पर बैठे बच्चे भी

देखते-देखते सीख जाते हैं

नदी में कंकड़ फेंकना!


पैतरे से

हाथ नचा कर

नदी में ऐसे कंकड़ चलाते हैं

कि एक कंकड़

कई-कई बार

डूबता/उछलता है!

कंकड़ के

मुकम्मल डूबने से पहले

बीच धार तक

बार-बार 

बनती ही चली जाती हैं लहरें!!!


न बड़े थकते हैं

न बच्चे रुकते हैं

बनती/बिगड़ती रहती हैं लहरें!


पीढ़ी दर पीढ़ी

खेल चलता रहता है

बस नदी

थोड़ी मैली,

थोड़ी और मैली 

होती चली जाती है।

........@देवेन्द्र पाण्डेय।

8.5.23

महाब्राह्मण

भारतीय, खासकर अपने पूर्वांचल के जाति जंजाल की बेबाकी से पड़ताल करता है महाब्राह्मण। यह इतना रोचक और उत्तेजित करने वाला उपन्यास है कि जिसे शुरू करने के बाद खतम किए बिना चैन नहीं पड़ता और खतम होने के बाद अंत हैरान कर देता है! इस पुस्तक को पढ़ने से पहले तक मैं इस जाति जंजाल से सर्वथा अपरिचित तो नहीं था, थोड़ा बहुत सुना भर था लेकिन इसके दर्द की जरा भी अनुभूति नहीं थी। 


जब आप इस उपन्यास को पढ़ना प्रारंभ करेंगे तो शुरु के पन्नों से ही यह उपन्यास आपको बुरी तरह से जकड़ लेगा। कभी आप रासलीला में मगन हो जाएंगे, कभी कामलीला में उत्तेजित हो जाएंगे और कभी महापातरों के झगड़े का हिस्सा बन उलझ जाएंगे, कभी नायक से गहरी सहानुभूति हो जाएगी, कभी उसकी सज्जनता पर क्रोध आएगा और जब उपन्यास खतम होगा तो सबसे ज्यादा गुस्सा इस उपन्यास के लेखक पर ही आएगा! यदि यह सच है तो इतना सच लिखने की क्या जरूरत थी?  


गुस्से के साथ कई प्रश्न उभरेंगे मगर किसी प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिलेगा। निराश होकर एक ही प्रश्न करेंगे कि जाने/अनजाने हमारे पूर्वजों ने जाति/उपजाति में जकड़े ऐसे समाज का निर्माण क्यों किया? हम कब तक इस जाति दंश को झेलते रहेंगे? और कब सिर्फ मनुष्य बन कर जी पाएंगे? मैं इसके लेखक, गुरूदेव श्री त्रिलोक नाथ पाण्डेय  को उनके श्रम और अनूठी कृति के लिए अभी कोई बधाई देने की स्थिति में नहीं हूं क्योंकि मैने अभी उपन्यास खतम किया है और अंत पढ़कर मैं गुस्से में हूं।


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5.5.23

साइकिल की सवारी 9

चाणक्य के जासूस पढ़ने के बाद से ही इस पुस्तक के लेखक 'श्री त्रिलोक नाथ पांडेय' सर के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने की इच्छा थी। महीनों से मन में एक अपराध बोध था कि गुरुदेव इसी शहर में रहते हैं और मैं उनसे आज तक नहीं मिल पाया। दूसरे शहर में नौकरी और छुट्टी के दिन प्रातः की साइकिलिंग, भ्रमण, घर के काम और शाम को साहित्यिक गोष्ठियों में जाने के शौक के कारण मित्रों से भी मुलाकात के लिए समय निकालना कठिन हो जाता है। बहुत सोचने के बाद तय किया कि क्यों न एक छुट्टी के दिन साइकिल गुरुदेव के घर की ओर मोड़ दिया जाय! अपनी साइकिलिंग/प्रातः भ्रमण भी हो जाएगी, गुरुदेव का आशीर्वाद भी मिल जाएगा।

आज बुद्ध पुर्णिमा की छुट्टी थी तो मन ही मन आज भोर का दिन तय किया। गुरुदेव DLW मार्ग में निराला नगर कॉलोनी, महमूरगंज के पास रहते हैं।  भोर में उठकर गूगल सर्च किया तो मैप मेरे घर से निराला नगर की दूरी 11 किमी दिखा रहा था। सोचा, नमो घाट १० किमी दूर है, वहां तक तो जाता ही रहता हूं, बस एक कि.मी. ही अधिक चलना पड़ेगा, जाया जा सकता है, इतनी सुबह गुरुदेव मिल ही जाएंगे।

जब घर से निकला, भोर के 4.30  हुए थे, आकाश में भोर वाले तारे और पूनम का चांद खिला हुआ था,सड़कों पर लैंप पोस्ट की सभी बत्तियां जल रही थीं, बनारस शहर के मध्य मार्ग से जाना था, भीड़ तो होनी ही थी लेकिन अभी वाहन कम थे और इक्का दुक्का मॉर्निंग वॉकर भी दिखाई दे रहे थे। 

पांडेपुर चौराहे से होते हुए वरुणापुल, चौकाघाट पहुुंच कर वरुणा नदी के दर्शन करने लगा। पुल के दोनो ओर झालर जल रहे थे, G20 के कारण शहर की सजावट की गई थी, वह अभी दिख रही थी। रुककर एक तस्वीर खींचकर ज्यों ही आगे बढ़ा, साइकिल ने चलने से इनकार कर दिया! उतरकर देखा तो चकित रह गया, पिछले पहिए में हवा ही नहीं थी! यह कैसे हुआ? घर से निकलने से पहले मैंने खूब हवा भरी थी, कहीं कोई कील तो नहीं धंस गई!!! पहिया घुमाकर ध्यान से देखने पर जल्दी ही एक लम्बी कील हाथ में आ गई। समझ गया, भरत मिलाप से पहले लंका कांड यहीं हो गया। वरुणापुल पर बैठे एक ठेले वाले से पंचर बनाने वाले के बारे में पूछा तो उसने ठगा सा जवाब दिया, "आठ बजे से पहिले केहू ना मिली, इतना सबेरे के आई?" 

अब मेरे सामने दो ही विकल्प था, पैदल वापस लौट चलूं या हिम्मत कर आगे बढूं, शायद कोई पंचर बनाने वाला मिल जाय! वापस लौटना बुजदिली होती, मैने हिम्मत दिखाई और पैदल पैदल आगे बढ़ चला। सोचा, कोई पंचर बनाने वाले की दुकान दिख जाय बस, वह नहीं होगा तो साइकिल वहीं लॉक करके ऑटो पकड़ लुंगा, गुरुदेव से मिलकर वापस लौट कर पंचर बनवाऊंगा। 

चौका घाट चौराहा पार कर लगभग 100 मीटर आगे बढ़ा तो पटरी पर बाईं तरफ एक पंचर बनाने वाला दिख गया! उस समय मुझे वह बहुत प्यारा लगा। साइकिल वहीं खड़ी कर मैने सबसे पहले उसका नाम पूछा, उसने न केवल  प्रेम से अपना नाम बताया, बल्कि मेरे साइकिल का ट्यूब भी खोलने लगा। ट्यूब की जांचकर ओम प्रकाश ने बताया, "दू जगह कटिया छेद कइले हौ।" मैने कहा, "तू मिल गइला, अब कउनों चिंता नाहीं, दू जगह पंचर होय या तीन जगह, कै बजे दुकाने आवला?" उसने हंसते हुए कहा, "हम त भोरिए में पांचे बजे आ जाइला मालिक!"

वहीं चबूतरे पर बैठे-बैठे मन ही मन वरुणापुल के ठेले वाले की बात याद करने लगा, "आठ बजे से पहिले केहू ना मिली, इतना सबेरे के आई?" अगर उसकी बात से डर कर लौट गया होता तो कितनी बड़ी बेवकूफी होती! आम आदमी जिस विषय में कोई ज्ञान नहीं होता, वहां भी वह अपनी राय देने से नहीं चूकता! नहीं पता हो तो कह सकता था, 'हमको नहीं पता' लेकिन नहीं, उस विषय में भी ज्ञान देना है जिसकी उसको कोई जानकारी नहीं!!!"

पंचर बनवाकर लगभग 2 किमी आगे मलदहिया चौराहे से काशी विद्यापीठ का मार्ग पकड़ा तो दिखा, दाईं ओर फूलों की मंडी सजी हुई थी, गेंदों के फूलों की बड़ी-बड़ी मालाएं बिक रही थीं, और भी कई प्रकार के फूल थे, वहीं रुककर सब नजारे देखने लगा फिर सोचा, इतनी सुबह बिना बताए किसी के भी घर जाना अच्छी बात तो नहीं, पता नहीं गुरुदेव किस हाल में होंगे! जगे भी होंगे या नहीं, आज बुद्ध पुर्णिमा है कहीं गंगा स्नान को निकल गए होंगे तो जाना बेकार ही होगा! हालांकि गुरुदेव से फेसबुक चैट के माध्यम से बहुत पहले घर का पता और मोबाइल नंबर ले लिया था लेकिन सोचा, पता पूछने के बहाने कम से कम अपने आने की सूचना दे दी जाय और गुरुदेव का हाल तो ले ही लिया जाय, न होंगे तो यहीं से लौटने में भलाई है, अभी भी गूगल 4 किमी की दूरी बता रहा है, पर्याप्त साइकिलिंग तो हो ही चुकी।  यही सब सोचते सोचते मैने मोबाइल लगा ही दिया।

गुरूदेव अभी सो कर उठे थे। खूब उत्साह से उन्होंने रास्ता बताया और आने के लिए स्वागत किया। यह उनकी विनम्रता है कि फेसबुक मित्र सूची में होने के कारण वे मुझे मित्र संबोधित करते हैं, यह अलग बात है कि उनकी उम्र और योग्यता के आगे नतमस्तक होने के कारण मैं उन्हें गुरुदेव मानता हूं। उनकी बातें सुनकर मेरा उत्साह दूना हो गया और साइकिल की पैडिल तेज चलने लगी। 

बनारस के पक्के महाल की गलियों की तरह संकरी गलियों से गुजरते हुए, उनके बताए पते पर जब मैं पहुंचा तो वे घर के दरवाजे पर ही खड़े मिले। खूब आत्मीयता से उन्होंने मेरा स्वागत किया और घर की एक मंजिल ऊपर बने बैठके में प्रेम से बिठाया। सबसे पहले तो घर की बनी मिठाई और पानी ले आए फिर कहा, "दूर से साइकिल चलाकर आए हैं, पहले आराम कीजिए। चाय कैसी पिएंगे? शुगर फ्री या चीनी वाली?" वे फुर्ती से एक मंजिल उतरकर पानी लाते, चाय लाते और मैं शर्म से गढ़ा जा रहा था, "आज मैने देव को कितना कष्ट दिया!" 

बहुत देर तक गुरूदेव से पारिवारिक/सेवा/लेखन संबधी बातें हुईं, शरीर स्वस्थ, मन प्रसन्न और आत्मा तृप्त हुई। गुरूदेव ने बताया, "देर से सोते हैं, देर से उठते हैं, आपकी तरह घूमने कहीं नहीं जाते, घर में ही पड़े रहते हैं। अभी मेरे और पत्नी के अलावा घर में कोई नहीं रहता, बच्चे अपने-अपने काम के स्थान पर हैं।" 

गुरुदेव किसी परिचय के मोहताज नहीं, जितना श्रम उन्होंने सेवा के समय किया होगा, उसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने लेखन शुरू किया और एक से  बढ़कर एक साहित्यक सृजन अनवरत जारी है। अंग्रेजी का विद्वान सेवानिवृत्ति के बाद हिंदी साहित्य को इतना कुछ दे रहा है, यह अचरज की बात है। प्रेम लहरी, चाणक्य के जासूस, खुपिया गिरी युगे-युगे, काशी कथा जैसी अनवरत जारी इस शृंखला में 'चाणक्य के जासूस' पढ़कर मैं इनका मुरीद तो बहुत पहले हो चुका हूं, अभी 'राज कमल प्रकाशन' से प्रकाशित एक ताजा कृति 'महाब्राह्मण' पढ़ने के लिए मेरे पास धरी है। बातों ही बातों में पता चला कि अभी हनुमान जी की आत्मकथा पर उनकी लेखनी चल रही है!   इतना कुछ पढ़ने/लिखने के बाद भी कितनी सहजता से कहते हैं, "कुछ नहीं करता, घर पर ही पड़ा रहता हूं!" जीवन में अपनी थोड़ी सी उपलब्धि पर गौरवान्वित होने और अहंकार में डूब जाने वाले व्यक्ति बहुत देखे हैं लेकिन इतना सफल जीवन जीने के बाद, इतनी सरलता कम ही लोगों में दिखती है। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि उनको खूब लम्बा और स्वस्थ जीवन दे ताकि हमें उनसे बहुत कुछ पढ़ने/सीखने को मिले।

भोर में साइकिल चलाना आनंद दायक है, धूप निकलने के बाद साइकिल चलाना कष्टप्रद होता है। सुबह के 7.30 होने जा रहे थे, धूप सर पर सवार हो चुकी होगी, अब निकलना चाहिए, सोचकर मैने देव से जाने की अनुमति मांगी और फिर आने का वादा कर आशीर्वाद लिया और घर की ओर लौट चला। आज की साइकिलिंग सबसे अच्छी और यादगार रही।

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25.4.23

साइकिल की सवारी 8

रोज की तरह आज भी साइकिल उठाकर भोर में घूमने के लिए निकल पड़े। दरवाजे से बाहर आते ही मोबाइल में घड़ी देखी तो सुबह के 4 बजने में अभी 15 मिनट शेष था! यह तो बहुत जल्दी है!!! अभी तो सारनाथ का बुद्ध मन्दिर या धमेख स्तूप पार्क सब बंद होगा। आज छुट्टी भी नहीं है कि दूर चला जाय लेकिन घर से निकल लिए तो फिर लौटना मतलब घर जा कर सो जाना, नींद आ गई, तो गए काम से, घूमना भी नहीं हो पाएगा। इसी उधेड़बुन में लगे रहे और मन ही मन तय किया कि गंगाजी चलते हैं, जो होगा देखा जाएगा। कभी अपना लिखा याद आया...

सड़क पर घूमते पहिये, गगन में चाँद तारे थे
सुबह जब घूमने निकले, परिंदे भोर वाले थे।

सड़क पर कुछ कुछ घूमते पहिए और चांद तारों का साथ लेकर 4,5 कि.मी. कम रोशनी में साइकिल चलाते रहे, कुत्तों के झुण्ड भौंकते हुए आते और साइकिल वाला देखकर लौट जाते। मुझे लगा शायद इन आवारा कुत्तों को साइकिल वालों से प्रेम होता है, अंधेरे में बाइक वालों या कार वालों पर अधिक गुस्साते हैं और भौंकते हुए पीछा करते हैं, साइकिल वाले को कैसे छोड़े जा रहे है! आवारा कुत्तों को साइकिल वालों से इतना प्रेम क्यों होता है? यह शोध का विषय है।

सारनाथ से नमो घाट जाने के कई मार्ग हैं। एक रास्ता गांव- गांव घूमते हुए, पंचकोशी मार्ग से कपिलधारा, सराय मोहाना, वरुणा-गंगा के संगम तट, आदि केशव घाट, बसंता कॉलेज होते हुए जाता है, एक आशापुर से सीधे कज्जाकपुरा रेलवे क्रासिंग होते हुए जाता है, एक पांडेयपुर, चौकाघाट होते ही राजघाट की ओर मुड़ता है और चौथा नख्खी घाट होते हुए, वरुणा पुल पार करता है। अंधेरा होने के कारण गांव वाले रास्ते को छोड़ दिया हालांकि अधिक दूर होते हुए भी वह रमणीक और शहर के कोलाहल से दूर शांत मार्ग है। पांडेयपुर, चौकाघाट वाला मार्ग कार से जाने के लिए अच्छा है, साइकिल से जाने के लिए दूर भी है और शहरी प्रदूषण वाला भी। कज्जाकपुर क्रासिंग वाले मार्ग में ओवरब्रिज निर्माण का कार्य प्रगति पर है इसलिए उससे भी जाना असंभव था। अब एक ही नजदीक वाला मार्ग बचा 'नख्खी घाट',  हमने चलते-चलते उधर ही साइकिल मोड़ दी।

कुत्तों से डरते/बचते हुए जब नख्खी घाट रेलवे क्रासिंग के पास पहुंचे तो दिमाग घूम गया। न केवल रेलवे क्रासिंग बंद थी बल्कि यहां भी निर्माण का कार्य चल रहा था, क्रासिंग खुलने की कोई संभावना नहीं थी! सबको पहले से पता होगा इसलिए लोग भी कम थे, कोई भीड़ नहीं थी। मायूस होकर सोचने लगा, "अब क्या किया जाय, लौट चला जाय?" तभी आशा कि एक किरण दिखाई दी! एक ग्रामीण बंद रेलवे, क्रासिंग के नीचे से साइकिल निकालकर कुछ दूर पटरी-पटरी जा रहा था! मैने तत्काल उनका अनुसरण किया, साइकिल झुकाकर मैं भी पटरी- पटरी चलने लगा। आगे साइकिल लाइन पारकर, रेलवे क्रासिंग भी पार करते हुए, सड़क पार कर चुकी थी। न किसी ने रोका न टोका! हम मुख्य सड़क पर आ चुके थे। रास्ते में आई बाधा ग्रामीण की प्रेरणा से दूर हो चुकी थी। यहां से वाराणसी सिटी स्टेशन पार करते हुए हम तेजी से राजघाट की ओर बढ़ चले।

राजघाट के बगल में ही नमो घाट है। नमो घाट पहुंचकर जब पार्किंग में साइकिल खड़ी की, सुबह के 5 बजने में अभी 15 मिनट बाकी थे और भोर का उजाला हो रहा था। राजघाट पुल की बत्तियां जल रही थीं, इक्का दुक्का प्रातः भ्रमण वाले स्थानीय नागरिक आने शुरू ही हुए थे। नमो घाट, नया और खूबसूरत घाट है। एक चक्कर लगाने के बाद राजघाट पुल के नीचे घाट की सीढ़ियां उतरते चले गए और जहां से नाव पकड़ने के लिए घाट किनारे पानी में न डूबने वाले पीपे के चौकोर चकत्ते लगे हैं, वहीं पूर्व दिशा की ओर मुंह करके, पलेठी मारकर, इत्मीनान से बैठ गया। मन ही मन बोला,"आइए सूर्यदेव! आज हम आपके स्वागत के लिए बिलकुल सही समय पर तशरीफ रख चुके हैं।"

सूर्यदेव अपने समय पर निकले और हम अपलक सूर्योदय का दर्शन करते रहे। मोबाइल से खूब तस्वीरें खींची, वीडियो बनाए और सेल्फी भी ली। घर से, स्नान की तैयारी से निकले ही नहीं थे, स्नान होना भी नहीं था लेकिन मां गंगा की गोद में, ध्यान और देव दर्शन दोनो हो गया। गंगा किनारे जन्म होने और जवान होने तक का संबंध हो या कुछ और गंगा तट पर आज भी थोड़ी देर के लिए बैठने या घाट घूमने का सौभाग्य मिल जाता है तो मन अतिरिक्त ऊर्जा से भर जाता है। गंगा तट पर मन उदास हो, ऐसा नहीं हुआ।

आजकल सूर्यदेव कुछ समय के लिए ही मोहक लगते हैं, ज्यों- ज्यों समय बीतता जाता है, सर पर सवार हो, आग उगलने लगते हैं। यही सोचकर सूर्यदेव को नमस्कार किया और लौट चला। घाट की सीढ़ियां चढ़कर जैसे ही पुनः नमो घाट पहुंचा, अजय बाबू (नींबू की चाय वाले) ने आवाज लगाई, "आज यहां कैसे? आज तो मंगलवार है!" अजय बाबू जानते हैं कि मैं दूर से आता हूं और छुट्टी के दिन के सिवा नहीं आ सकता। मैने उन्हे हाथ से अभी आने का वादा किया और घाट के एक चक्कर लगाने लगा। अब घूमने का शौक नहीं बचा था लेकिन डर था कि सूर्यदेव और ऊपर चढ़ गए तो मोबाइल से उनकी तस्वीरें उतारना संभव नहीं।

एक चक्कर घूम कर सूर्यदेव की खूब तस्वीरें लीं, जहां पर तीन हाथ जोड़ने वाली मुद्रा में पक्की मूर्तियां बनीं हैं, उसी के सामने ला कर रखे, बालू के ढेर पर कलाकारों ने हाथ जोड़ने वाली मूर्तियों की नकल करते हुए बालू पर खूबसूरत कलाकारी कर रखी है और उस पर लिखा है, G 20 मैने उसकी भी तस्वीरें लीं और घूमते हुए अजय बाबू के पास वापस आ कर, वहीं बने एक चबूतरे पर बैठकर, नींबू की चाय सुड़कते हुए, सूर्यदेव, गंगा जी और घाटों की सुंदरता को हृदय से लगाने लगा।

मोबाइल में घड़ी देखी, सुबह के 6 बज चुके थे, आज ऑफिस भी जाना है, अब रुकने का समय शेष नहीं था। समय हो तब भी सूर्योदय के बाद जाड़े की तरह घाटों में अधिक देर घाट- घाट नहीं घूमा जा सकता, साइकिल निकाली और पैदल ही चल दिया। दरअसल नमो घाट से मुख्यमार्ग तक पहुंचने के लिए लगभग 100 मीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है, उतरते समय तो मजा आता है लेकीन चढ़ते समय, साइकिल चलाकर नहीं चढ़ा जा सकता। जैसे सुख के दिन ढलान की तरह कब खतम हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता और दुःख के दिन मेहनत से काटने पड़ते हैं वैसे ही हमने मुश्किल से साइकिल चढ़ाई और मुख्य मार्ग पर पहुंचकर बसंत महिला महाविद्यालय वाला, गांव-गांव जाने वाला रास्ता पकड़ा। अब सुबह हो चुकी थी, इस मार्ग से जाना अच्छा था, यह शहर के कोलाहल और प्रदूषण से मुक्त मार्ग है।

देर हो रही थी इसलिए रास्ते में पड़ने वाले जिंदा कुआं (अमृतकुंड) की तरफ देखा भी नहीं, आदिकेशव घाट के पास बने पुल को पार करते हुए, गंगा वरुणा के संगम तट पर एक निगाह दौड़ाई और चलता चला गया लेकिन  पुलिया तक पहुंचते पहुंचते शरीर ने जवाब दे दिया। पुलिया पर बैठकर वहीं आराम करने लगा, पुलिया में मेरे अलावा कोई नहीं था,  पिछली साइकिल की सवारी में जो लोग मिले थे, पुलिया में उनसे से भी कोई नहीं आया था। कुछ समय थकान मिटाने  और दो कुत्तों की दोस्ती देखने के बाद वहां से चला तो रास्ते में नेपाली टोपी पहने, पुलिया की ओर आ रहे श्री खम बहादुर सिंह' दिख गए। मेरे पास समय नहीं था इसलिए रुका नहीं, केवल हाथ उठाकर 'जय नेपाल' किया, उन्होंने भी मुझे देखा और पहचान कर/ खुश होकर 'जय नेपाल' बोला। मेरे लिए यही बड़ी बात थी। एक बार दस मिनट की पुलिया पर बैठकर होने वाली बातचीत के बाद कोई आदमी आपको राह चलते पहचान ले तो यह खुशी की बात है! शायद स्वाभाविक प्राणी प्रेम है। यहां से आगे बढ़ने के बाद घर पहुंचकर ही दम लिया। अभी बहुत देर नहीं हुई थी, घड़ी में सुबह के सात बजे थे, अभी ऑफिस जाने के लिए शरीर में ताकत कम थी लेकिन घड़ी में बहुत समय बाकी था।
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22.4.23

सोने के सिक्के

जहां वह खड़ा था वहां दूर-दूर तक, जिधर निगाह जाती, मिट्टी गीली थी। हल्की-फुल्की जमीन धंस भी रही थी लेकिन कहीं दलदल नहीं दिखा। आराम-आराम से धंसते-उठते चल पा रहा था। एक नया अनुभव था, रोमांच हो रहा था! जब चलना प्रारंभ किया, शुरू शुरू में डर लगने लगा लेकिन अब कोई भय नहीं था, उल्टे मजा आ रहा था।


एक स्थान पर मिट्टी से सने कुछ सिक्के दिखाई दिए, लपक कर उठा लिया और रूमाल निकाल कर मिट्टी पोंछने लगा। मिट्टी गीली थी, सिक्के जल्दी ही चमकने लगे। सिक्के देखकर मन ही मन खुशी से चीख पड़ा,"अरे! ये तो सोने के हैं!!!" 


लालची मनुष्य! इतने से संतुष्ट नहीं हुआ। चारों तरफ निगाह दौड़ाने लगा, 'शायद कहीं कुछ और हों!' चलते-चलते आखिर एक स्थान पर कुछ सिक्के और मिल गए, वे भी सोने के थे!! अब लालच और बढ़ गया। अनुमान लगाने लगा, 'यह पूरा इलाका ही सोने के सिक्कों से भरा होगा, मिट्टी गीली है इसलिए नहीं दिख रहा!"


अब वह चलते-चलते, सिक्के बीनते-बीनते पूरी तरह थककर चूर हो चुका था। उसके दोनो जेब सोने के सिक्कों से भर चुके थे। गीली मिट्टी की कोई सीमा नहीं दिख रही थी! अभी भी जहां तक दृष्टि जाती, मिट्टी ही मिट्टी! अब तो उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसने कहां से चलना शुरू किया था? पलटकर पीछे देखता, दाएं देखता, बाएं देखता, जिधर देखता गीली/ धंसती मिट्टी ही मिट्टी! 


धंसते-उठते पैरों ने अब चलने से इनकार करना शुरू कर दिया था। जब थोड़ा रुकता, थोड़ा और धंसने लगता, जल्दी से वापस पैर खींच कर भागने लगता, अब रोमांच, लालच सब खतम हो चुका था। मेहनत से बीने सिक्के भी बोझ लगने लगे थे! अब उसे सिर्फ भूख और जान बचाने की चिंता थी। 


सोने के सिक्के हाथों से छूटकर वापस मिट्टी में मिलने लगे! सिक्के क्या, अब तो वह भी मिट्टी में धंसने लगा!!तभी अचानक चमत्कार हुआ। लंबी गरदन, बड़ी चोंच और पूरी तरह मिट्टी से सने 8 पैरों वाला एक पंछी सामने आया और पूछने लगा, "सोना चाहिए या अभी और जीना चाहते हो?" रोते हुए उसके मुख से एक ही वाक्य निकला, "मुझे बचाओ! लंबी गरदन वाले पंछी ने दया दिखाई, उसे अपनी चोंच से पकड़ कर पीठ में बिठाया और पलक झपकते ही उड़ चला। 


आदमी की नींद खुली तो उसने अपने आपको गंगा किनारे गीली मिट्टी में पड़ा पाया। यहां सोने के सिक्के नहीं थे लेकिन सामने रेत पर ककड़ी/खरबूजे/ तरबूजे बिखरे पड़े थे जो सोने के सिक्कों से अधिक अच्छे लग रहे थे और यहां की मिट्टी भी नहीं धंस रही थी! सामने मेहनती पुरुष और महिलाएं खेतों में काम कर रही थीं। 

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14.4.23

लोहे का घर 71

शाम के 6.10 बज चुके हैं। दून अभी जफराबाद में खड़ी है। इसे खड़ी कर एक मालगाड़ी को पास दिया गया है। अब मालगाड़ी अगले स्टेशन पर पहुंचेगी तब इसे छोड़ेगा। आज बोगी में खूब भीड़ है, रोज के यात्रियों (बंगालियों) के बीच बैठे हैं, सब चर्चा में लीन हैं। एक का ट्रांसफर बनारस हो गया है, सब उसी साथी की चर्चा कर रहे हैं और ट्रेन को कोस रहे हैं। 

पानी वाले वेंडरों की चांदी हो चुकी है। घूम-घूम कर पानी बेच रहे हैं। ट्रेन का अनायास देर तक रुकना इनके लिए सौभाग्य है, अच्छी बिक्री हो जाती है। 'खाना' वाले वेंडर भी अपना ऑर्डर ले रहे हैं। ट्रेन अपने निर्धारित समय से लगभग 4 घंटे विलम्ब से चल रही है। 

ट्रेन का हॉर्न बजा, चलने का सिग्नल हुआ और ट्रेन चल दी। दुखी यात्रियों के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वे इसी बात पर खुश हैं कि केवल एक मालगाड़ी को पास दिया। कभी-कभी तो तीन-तीन मालगाड़ियों के गुजरने के बाद चलती है! आज तो एक के बाद ही छोड़ दिया!!! हर लेट ट्रेन के आगे एक मालगाड़ी होती है, अपने आगे भी एक चल रही है।

अभी बाहर उजाला है, खेतों में चरती बकरियां दिख रही हैं। एक आदमी लुंगी और बनियाइन में पगडंडी-पगडंडी चल रहा है, उसके पीछे एक ग्रामीण महिला हाथ में टोकरी लिए चल रही है। ट्रेन की रफ्तार तेज हुई और दृश्य बदल गए। मैं खिड़की के पास बैठा हूं और लिखते-लिखते बाहर भी नजर दौड़ा रहा हूं। कहीं खेतों के बीच सजा कर रखे उपलों के गट्ठर दिख रहे हैं, कहीं झोपड़ी और नाद से बंधे भैंस दिख रहे हैं। 

मेरे सामने एक नवयुवक बैठा है। रुड़की से BBA कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में दमदम में रहता है। रुड़की से हरिद्वार गया और वहां से यह ट्रेन पकड़ा। ट्रेन में चढ़ते समय मेरा चश्मा कहीं गुम हो गया था। बैठने पर पता चला जेब में चश्मा नहीं है! इसी युवक ने ढूंढकर चश्मा लाया और मुझे पकड़ा दिया। इस तरह मेरी एक बला टली और मैं लिख पा रहा हूं, मैने लड़के को खूब धन्यवाद दिया। लड़का बोल रहा है, "हॉस्टल में खाना मसालेदार मिलता है, खाना पसंद नहीं है, हॉस्टल छोड़ने भी नहीं दे रहे और खाना भी अच्छा नहीं बना रहे हैं।" वेस्ट बंगाल से phonics grup of institution में जाकर अपने को फंसा हुआ महसूस कर रहा है।  पहले सेमेस्टर की परीक्षा देकर घर जा रहा है। एक/दो महीने बाद लौटेगा, कोई छुट्टी नहीं लेकिन अभी पढ़ाई भी नहीं होगी।  वेस्ट बंगाल में BBA करने के लिए कॉलेज है लेकिन फीस बहुत ज्यादा है। जहां पढ़ रहा है, फीस कम है, इसलिए इतनी दूर रुड़की में पढ़ रहा है। 

ट्रेन जलालपुर से आगे हवा से बातें कर रही है, मैं लड़के से बातें कर रहा था। लोहे के घर में अनजान यात्रियों से बातें करो तो नई-नई कहानी मिलती है। अब बाहर खूब अंधेरा हो चुका है। ट्रेन खालिसपुर में रूक गई है, यहां इसका स्टॉपेज नहीं है। इस रूट पर चलने वाली ट्रेनें स्टॉपेज पर ही रुकेगी, यह जरूरी नहीं है। आगे चल रही मालगाड़ी इसे हर स्टेशन पर रुकने के लिए बाध्य कर रही है। 

चलती ट्रेन की खिड़की से बाहर अंधेरे में झांको तो टिमटिमाते बल्ब दिख रहे हैं। इस पूरे रास्ते में जंगल नहीं हैं, खेत हैं और तेजी से गांवों का शहरी करण हो रहा है। झोपड़ियां कम दिखती हैं, दूर दूर तक पक्के मकान और मकानों में जलते बल्ब दिख ही जाते हैं। लोहे के घर के भीतर खूब उजाला है। बंगाली बतियाने में मस्त हैं। बतियाने के लिए कोई न कोई विषय मिल ही जाता है। एक रोज के यात्री खूब चाव से अपने पढ़ाई के समय का संस्मरण सुना रहे हैं। सामने बैठे लड़के ने जो अपने कॉलेज का हाल बताया कि पूरा माहौल ही शिक्षा और कॉलेजों की चर्चा पर केंद्रित हो गया। साथी अपने कॉलेज का संस्मरण सुना रहे हैं। पश्चिम के कॉलेजों के वर्क कल्चर की तारीफ हो रही है। 

ट्रेन रुकते/चलते कभी स्पीड से, कभी मंथर चाल से चल रही है। अब बाबतपुर से आगे चली है। लगता है आज बनारस पहुंचने में शाम के आठ बज जाएंगे। रोज के यात्रि इस बात से खुश हैं कि कल तो अंबेडकर जयंति की छुट्टी है, कल नहीं आना है। इसे ही कहते हैं दुःख में सुख ढूंढना। रोज के यात्रि ऐसे ही दुःख में सुख ढूंढ लेते हैं।


लोहे का घर 70

जफराबाद से चली है दून। शाम के साढ़े पांच बजना चाहते हैं, धूप का ताप कम नहीं हुआ है, खिड़कियों से किरणें झांक रही हैं। जिस बोगी में बैठा हूं, मेरे अलावा 5 यात्री और हैं। सामने शाहगंज से चढ़े एक प्रौढ़ सज्जन धीरे-धीरे बिस्कुट कुतर रहे हैं। जब सब बिस्कुट कुतर चुके, प्लास्टिक खिड़की से बाहर लोका दिया और पानी की बोतल खोल दी। पानी पीकर खैनी रगड़ रहे हैं। मुझे लिखता देखकर रोज के एक सहयात्री बोर हो कर दूसरे डिब्बे में साथी तलाशते हुए, निकल लिए। उनके जाने से मुझे यह राहत मिली कि आराम से पैर फैलाकर लेट गया। दिनभर बैठने के बाद यात्रा में ऐसे लेटने मिल जाय तो आनंद आना स्वाभाविक है। साइड लोअर में दो यात्री बैठे हैं और साइड अपर बर्थ में एक यात्री लेटे हैं। सामने वाले सज्जन खैनी जमाकर मोबाइल झांक रहे हैं। उन्हें हावड़ा तक जाना है।  सभी बंगाली मतलब रोज के यात्री एक जगह जमा हो चुके हैं। यहां शांति का माहौल है।

ट्रेन एक स्टेशन आगे जलालपुर पहुंच रही है। इस रूट में इसके कई स्टॉपेज हैं। यहां से चली तो आगे बाबतपुर भी रुकेगी। आज किस्मत अच्छी लग रही है, अपने समय से भले लेट हो, ट्रेन यहां से भी चल दी। ऐसे ही चलती रही तो आज की दौड़ जल्दी ही खतम हो जाएगी। 

सुरुज नारायण अभी ताप बनाए हुए हैं। ढलने के मूड में दिख रहे हैं लेकिन अभी ढले नहीं हैं, पियरा गए हैं लेकिन आकाश में दिख रहे हैं। सामने बैठे सज्जन की टी शर्ट पर पड़ रही किरणों के कारण मैं लेटे-लेटे अनुमान लगा रहा हूं। किरणों से आदमी उजला-उजला नजर आ रहा है। उसे इस बात का जरा भी एहसास नहीं कि किरणों की कृपा से वह कितना खिला- खिला दिख रहा है। हम उजले दिख रहे हैं या मलीन यह हमे देखने वाला ही बता सकता है, हम कभी नहीं जान पाते। हमारी कमियां या गुण दूसरा ही बता पाता है, हम तो हमेशा आत्ममुग्ध रहते हैं। 

ट्रेन खालिसपुर में रुकी है। यहां इसे नहीं रुकना चाहिए लेकिन रुक गई तो कोई क्या कर सकता है! अब किरणें गुम हो चुकी हैं लेकिन बाहर अभी उजाला फैला है। सूर्यदेव दिन का सबसे बड़ा अधिकारी होता है, डूबने के बाद भी उसका ताप/उजाला कम होने में समय लगता है। 

ट्रेन यहां से भी चल दी। लोहे का घर ऐसे ही दुःख और खुशी देता रहता है। हमारे जैसे रोज के यात्री न इसके रुकने से बेचैन होते हैं न चलने से खुश। बेचैन इसलिए नहीं होते कि अनचाहे स्टेशन पर रुकना तो इसका रोज का काम है, खुश इसलिए नहीं होते कि क्या पता आगे फिर रूक जाय! घर पहुंचकर इकट्ठे खुश या दुखी होते हैं। एक/दो घंटे में घर पहुंच गए तो खुश, रात हो गई तो दुखी। दुःख भी क्षणिक ही होता है, एक ही वाक्य बोलते हैं, "चलो! आज देर हो गई, सोया जाय, कल फिर चलना है।" 

ट्रेन बनारस पहुंचने से पहले अपने अंतिम स्टेशन बाबतपुर पहुंच रही है। यहां से आगे बढ़े तो हम भी एलर्ट मूड में हो जाएंगे। साइड लोअर में बैठे यात्री ट्रेन को पानी पी कर गाली दे रहे हैं। उनके हिसाब से ट्रेन बहुत लेट हो चुकी है। बोल रहे हैं, "यहां से चले और आगे शिवपुर न रुके, बनारस पहुंचा दे तो बढ़िया है।" हम सोच रहे हैं जैसे जौनपुर इनके दुर्भाग्य और मेरे सौभाग्य से लेट आई और हम पकड़ पाए वैसे शिवपुर रूक जाए तो हम उतर कर भाग भी जाएं। एक ही घटना किसी के लिए सुख और किसी के लिए दुःख का कारण होता है। 'राम नाम सत्य' न हो तो श्मशान की लकड़ी कैसे बिके? ट्रेन चल दी, अब लिखना बंद करता हूं, जय राम जी की।

10.4.23

लोहे का घर 69

मेरी गाड़ी पटरी पर चल रही है। चलते-चलते, बचपन और जवानी के कई स्टेशन आए, चेन पुलिंग भी हुई, भिड़े भी, गिरे भी, बिन स्टेशन के घंटों रुके भी लेकिन थक कर बैठे नहीं, हारे नहीं, चलते रहे। लोग कह रहे हैं, "अगला स्टेशन बुढ़ापा है, कितना चलोगे? कोई आश्रम ढूंढों, हरिभजन का समय आ गया है, उतर जाओ।" मैं कहता हूं, "जिसने गाड़ी को ही घर बना लिया हो, उसे किस बात से डराते हो? मंजिल आएगी तो चार लोग मिलकर खुद ही उतार देंगे! मंजिल से पहले क्यों उतरें? जब उतरेंगे, जहां उतरेंगे, समझ लेना वही मेरी मंजिल थी। मंजिल किस चिड़िया का नाम है? जब तक जिस्म में सांस है, कोई स्टेशन आखिरी नहीं होता।"


गोधुली बेला है, सूर्यास्त हो चुका लेकिन रोशनी शेष है। एक बच्चा लोहे के घर की खिड़की से बाहर झांक रहा है। पास के वृक्ष पीछे छूट रहे हैं, दूर के साथ चलते प्रतीत हो रहे हैं। जब ट्रेन किसी छोटे स्टेशन पर रुकती है, खुशी के पल की तरह, काले पंखों वाली चिड़िया किसी शाख पर फुदकती है। गाड़ी चल देती है, चिड़िया भी गुम हो जाती है। खुशी के हों या दुःख के हों, पल कभी टिकते नहीं। गाड़ी चलती है, दृश्य बदल जाते हैं। 


धीरे-धीरे बाहर अंधेरा, भीतर रोशनी होती जा रही है। लंबी यात्रा के बाद ही इसका एहसास होता है। छोटी दूरी के यात्री या वे जिन्हें मंजिल पाने की हड़बड़ी होती है, भीतर के उजाले को महसूस ही नहीं कर पाते। जब चांद निकलता है, साथ साथ चलता है, आंखों से ओझल नहीं होता! सूर्योदय से पहले होता भी नहीं। बच्चे को खिड़की झांकने में अब मजा नहीं आ रहा, लोहे के घर के भीतर की रोशनी अच्छी  लग रही है, मोबाइल अच्छा लग रहा है।


मैं एक ही गोल के या विभाग के यात्रियों के समूह को चार बंगाली कहता हूं। चार बंगाली इसलिए कि अक्सर अपने रूट पर बंगाल जाने वाले यात्री मिल जाते हैं। वे अपनी बोली में/अपने धुन में मस्त रहते हैं। न दूसरे उनकी बात समझ पाते हैं, न इन्हें दूसरों की कोई परवाह रहती है। राजनीति की बहस छिड़ गई तो अपने ही धुन में आलोचना/समर्थन करने में/ बहस करने में/ मशगूल रहते हैं। उनकी बहस सुनकर लगता है, खूब समाचार देखते हैं और टी वी के एंकरों की तरह मोर्चा संभाले रहते हैं। उन्हें किसी की कोई चिंता नहीं होती। मैं जैसे टी वी में समाचार नहीं देखता वैसे उनकी बातें भी नहीं सुनता। चाय, ब्रेड, अंडे, पानी और मैंगोजूस पीने वाले वेंडर भी उन्हें देख आगे बढ़ जाते हैं, जानते हैं, ये एक पैसे की खरीददारी नहीं करेंगे, इनसे पूछना ही बेकार है। हिजड़े भी इन्हें देख हाय! हाय! करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। 

...@देवेन्द्र पाण्डेय।

लोहे का घर 68

 कामायनी एक्सप्रेस 

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लम्बी यात्रा है, कामायनी एक्सप्रेस है, बनारस से जा रहे हैं भोपाल। रोज की यात्रा भले स्लीपर में करें, लंबी यात्रा में अपन ए.सी. बोगी में बर्थ रिजर्व करा लेते हैं। कोई एक घण्टे की यात्रा तो है नहीं, खड़े-खड़े भी हो जाएगी, पूरे 16 घण्टे निर्धारित हैं, अधिक भी हो सकते हैं! लंबी दूरी की यात्रा में, ए.सी. में बर्थ न मिले तो चढ़ना ही नहीं है, कौन स्लीपर में चढ़कर फजीहत मोल ले! 

लफड़ा यह है कि अपनी साइड अपर है और अभी मुझे ऊपर चढ़ने और नीचे उतरने में तकलीफ होती है। फिलवक्त साइड लोअर में ही लेटा हूँ, बर्थ का मालिक अभी आया नहीं है। हमसे भी बुजुर्ग हुए तो हमको ही ऊपर जाना पड़ेगा, कम उम्र के हुए तो उन्हीं से ऊपर जाने का अनुरोध किया जाएगा। बहरहाल जो भी हो, अच्छा ही होगा। प्रयागराज तक तो सफर ऐसे ही चलेगा।

मेरे सामने के बर्थ में सभी आ चुके लगते हैं, एक के टिकट में कुछ लोचा है, उसे नींद भी आ रही थी, मेरी बर्थ पर लेटा है, मैने भी कह दिया है, "जब तक कोई मुझे नहीं उठाएगा, आप आराम से अपनी नींद पूरी कर लीजिए।"

ट्रेन में बैठते ही कुछ लोगों को भूख लगती है या दूसरों को बताना चाहते हैं कि हम टिफिन वाले हैं, टिफिन खोल कर बैठ जाते हैं और चटखारे लेकर खाने लगते हैं! मेरे सामने बैठे युवकों की भी जब टिफिन खतम हुई तो उनकी सिसकियों को देख मैने अपना झोला आगे बढ़ा दिया, "मिठाई है, खाना चाहें तो खा सकते हैं, वैसे अजनबियों का दिया कभी नहीं खाना चाहिए, आपकी मर्जी!" वे पेट पकड़ कर हँसने लगे, "अंकल जी! आप भी कमाल करते हैं, दोनो बातें करते हैं! अब कोई कैसे खाएगा?" मैने कहा, "मर्जी आपकी, मैने तो अपना दोनो फर्ज निभाया है। आपको सिसकते भी नहीं देख सकता, गलत आदत भी नहीं डाल सकता! मैं इसी डिब्बे से खा रहा हूँ, शेष हिम्मत आपको करना है, वैसे अजनबियों के हाथ से वाकई कुछ नहीं खाना चाहिए!" 

वे हँसते रहे, अपने बोतल से निकालकर पानी पीते रहे, मेरी मिठाई नहीं खाई। इस तरह सबका कल्याण हो गया, उन्हें नसीहत भी मिल गई, मेरी मिठाई भी बच गई, वैसे मेरे पास बहुत मिठाई है, वे खतम करना चाहें तो भी खतम नहीं होगा, हिम्मत उनकी, मैं क्या कर सकता हूँ!

अब सूर्यास्त हो चुका है, बाहर अँधेरा छाने को है, भीतर रोशनी हो चुकी है। लोहे के घर में, शाम के समय, रोज ऐसा होता है, जितना बाहर अँधेरा छाने लगता है, भीतर उतनी रोशनी फैलती जाती है। असल जीवन मे भी ऐसा हो तो कितना आनन्द आ जाय! जब-जब हम अंधेरों से घिरें, भीतर रोशनी हो जाय। 

प्रयागराज में वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था, एक दम्पत्ति आए और महिला का हवाला देकर, मेरे साइड अपर की बर्थ में जाने से साफ इनकार कर दिया। मुझे ही अपने बर्थ पर ऊपर चढ़ना पड़ा। ट्रेन लगभग 30 मिनट प्रयागराज में खड़े होने के बाद अब चल चुकी है। 

जब तक खुद ऊपर न जाओ, स्वर्ग नहीं मिलता। यहाँ बहुत आनन्द है। सभी बर्थ पर निगाह पड़ रही है और उनकी बातें सुनाई पड़ रही हैं। एक समय ऐसे ही ऊपर लेटा था तो कल्पना में सही, सभी ब्लॉगरों को एक साथ यात्रा करते हुए देख लिया था! अभी एक महिला पूड़ी का डिब्बा खोलने की खूब कोशिश कर रही हैं, बोली अवधी है, अपने जौनपुर साइड की। बड़ी मेहनत से महिला ने डिब्बा खोला, पूड़ी अखबार में बिछाई और तुरंत उनके श्रीमान जी दोनो हाथों से शुरू हो गए! बनाने/रखने में इनका कोई योगदान नहीं दिखा, अब खाने में भरपूर साथ निभा रहे हैं। हम उनसे कुछ नहीं कहेंगे, हम बोले तो ये हम पर ही चढ़ बैठेंगे, "कमा कर लाया कौन है?" बस चुप होकर लीला देखने और बातें सुनने में आनन्द है। 

अब सभी ने अपना टिफिन खाली कर लिया है और सुफेद चादर चढ़ा कर लेट चुके हैं। देखा देखी हमने भी यह नेक काम कर लिया, टिफिन खाली करी और चादर चढ़ा ली। कोरोना काल के बाद बहुत दिनों तक ट्रेनों में कम्बल/चादर नहीं मिलता था, रंग बिरंगे चादर दिखते थे। अब फिर वही सुफेद चादर वाले जिस्म दिखने लगे! हाँ, लोग अभी मेरी तरह मोबाइल चला रहे हैं, किसी से बात कर रहे हैं या वीडियो देख रहे हैं तो पोस्टमार्टम हाउस में एक के ऊपर एक डिब्बों में रखे जिस्मो जैसा भयावह माहौल नहीं है। अभी तो आवाज आ रही है, "कहाँ पहुंच्या?"

अब वेंडर खाना-खाना चिल्लाते हुए घुसे हैं! इस कूपे के सभी लोग खा/पी चुके, कोई खाना नहीं मांग रहा। एक यात्री ने पूछा,"नॉन वेज में क्या है?" वेंडर ने साफ इंकार कर दिया, "भाई साहब! यहाँ केवल वेज मिलता है!" सुनकर अच्छा लगा, "प्रयागराज के वेंडर भी शाकाहारी हैं!" 

खाना-खाना वाले गए अब पानी-पानी वाले आ गए। इनका तालमेल अच्छा है। 'खाना' के बाद 'पानी' तो चाहिए ही होगा! यह अलग बात है कि इस कूपे के सभी लोग अपनी टिफिन, अपनी पानी की बोतल वाले थे! अब वेंडर बिचारे मुँह बनाकर जाने के सिवा कर ही क्या सकते हैं!

कामायनी सही समय से चल रही है। अभी सुबह के 5.15 हुए, भोपाल से लगभग 150 किमी दूर, 'बीना' स्टेशन में खड़ी है। रात अच्छी नींद आई। मुझे नींद अच्छी ही आती है। रात 10 बजे के बाद कोई जगा नहीं सकता, सुबह 4 के बाद कोई सुला नहीं सकता। अब अपवाद हर नियम में होते हैं, अब बीती रात को ही याद करें तो बीच-बीच में चढ़ने वाले टॉर्च जलाकर अपनी सीट ढूँढने के लिए और उतरने वाले खुशी में आपस मे बतियाते हुए जगा ही रहे थे! फिर भी, जो नींद मिली वो अच्छी ही माननी चाहिए।

सफर में नींद पूरी होने का एहसास हुआ! यही क्या कम है? सब चाय वाले की कृपा है। नहीं, सच कह रहा हूँ, जैसे अभी करीब से चाय-चाय चीखते हुए, एक चाय वाला गुजरा, वैसे रात भर गुजरते तो कौन सो पाता भला? एक भी चाय वाला रात्रि जगाने नहीं आया, हम सो पाए, यह उसी की कृपा है। सब महसूस करने की बात है, रात सो लिए तो अच्छे दिन अपने आप आ जाएंगे! बिना चाय वाले की कृपा से अच्छे दिन आ ही नहीं सकते, यह ज्ञान कोई चाय की अड़ी नहीं, लोहे का घर ही दे सकता है।

लेकिन यह ट्रेन अभी तक 'बीना' में ही क्यों खड़ी है? 5.10 सही समय पर आई, 5.54 हो गए! इसे तो 5 मिनट रुक कर चल देना चाहिए था!!! 50 मिनट से रुकी है। कोई कारण होगा, ट्रेन अकारण कभी नहीं रुकती, इसीलिए अभी भी इसकी यात्रा सुरक्षित मानी जाती है, अब अपवाद तो हर नियम में होते हैं, कुछ भी पूर्ण नहीं होता। 

कोई-कोई मौका ताड़कर बाथरूम जा रहा है, शेष अभी सोने के मूड में लगते हैं। सूर्योदय का समय हो तो बर्थ से नीचे उतरकर दरवाजे के पास चला जाय, आज सूर्यदेव का दर्शन नहीं किया तो दिन कुछ अधूरा-अधूरा लगेगा। उगते सूर्य और घटते/बढ़ते चाँद का दर्शन तो हर व्यक्ति को रोज करना चाहिए, इससे ही तो एहसास होता है कि हम धरती के प्राणी हैं! नदियाँ, झरने, पहाड़, समुंदर और बाग-बगीचे तो किस्मत की बात है। कुछ न मिले तो लोहे के घर से ही उगते सूर्य का दर्शन करना चाहिए। कोई ट्रेन सामने से आई है, लगता है, अब अपनी वाली चलेगी।













...@देवेन्द्र पाण्डेय।

05/06 मार्च 2023 की पोस्ट है।


9.4.23

साइकिल की सवारी 7

अपनी सुबह तो रोज ही खूबसूरत होती है, आज तो बहुत खूबसूरत हो गई। रोज 2 कि.मी. साइकिल चलाकर सारनाथ पार्क में जाते हैं, आज संडे है तो सोचा कुछ हिम्मत का काम किया जाय। लगभग 10 कि.मी. साइकिल चलाकर, गांव-गांव घूमते हुए सारनाथ से नमोघाट पार्किंग में साइकिल खड़ी कर, ताला लगाकर, यू ट्यूब बंद कर, मोबाइल में घड़ी देखा तो सुबह के 6 बज रहे थे और पहुंचने में 50 मिनट लग चुके थे। यू ट्यूब में डाउन लोड किए, कबीर और गोरखनाथ के सभी भजन खतम हो चुके थे।


सूर्यदेव के दर्शन के लिए पलकें ऊपर उठानी पड़ रही थीं, मतलब हमको 30 मिनट पहले घर छोड़ना चाहिए था। आकाश में बादल के टुकड़े भी छाए थे, देव ताप नहीं बरसा रहे थे, अभी तक शीतलता बनी हुई थी। नमो घाट में घूमते हुए प्रहलाद घाट वाले अजय बाबू और उनकी नींबू की चाय तलाशने लगा लेकिन आज वे भी नहीं दिखे। हम भी कई हफ्ते बाद आए थे। समय एक सा नहीं रहता, पहले जाड़ा था, नींबू की चाय खूब बिकती थी, अब गर्मी आ चुकी, क्या पता, बेल का शरबत बेच रहे हों!!! कुछ भी हो सकता है। 


नमो घाट में भीड़ वैसी ही थी। लोग उगते सूरज, राजघाट पुल, हाथ जोड़ती मूर्तियों और एक दूसरे की तस्वीरें खींचने में आत्ममुग्ध थे। बच्चे एक गाइड के निर्देशन में स्केटिंग सीख रहे थे। हरतरफ खुशनुमा माहौल था। नमो घाट, नया बना बड़ा घाट है, हम जितना देख पाए उतना ही लिख सकते हैं, बहुत कुछ ऐसा भी हो रहा होगा जो हम नहीं देख पाए। 


राजघाट पुल के नीचे से होते हुए नमो घाट से आगे बढ़े तो संत रविदास के भव्य मंदिर के सामने घाट पर बड़े नावों, बजड़ों पर लगे बड़े-बड़े स्पीकरों से भजन का कान फाड़ू शोर सुनाई दिया! भजन को भी मधुर होना चाहिए, कर्ण प्रिय होना चाहिए, संगीतमय होना चाहिए, उतने ही वॉल्यूम में बजाना चाहिए कि कर्ण प्रिय लगे, हम प्रयास करके सुनें और सुनकर हमें अच्छा लगे। यह न हो कि भजन के अलावा हमें कुछ भी सुनाई न दे। हम मजबूर होकर भजन ही सुनते रहें जो भजन न होकर एक शोर लगे। भजन के नाम पर होने वाले इस ध्वनि प्रदूषण पर प्रतिबंध लगना चाहिए। 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का प्रत्यक्ष पाठ पढ़ाने वाले महामानव ' संत रविदास' के भव्य मंदिर के सामने तो यह शोर और भी विरोधाभाषी लग रहा था। मरणोपरांत महामानव का मन्दिर बना कर भगवान बना देने से कुछ नहीं होगा, हमको उनके द्वारा दी गई शिक्षा पर भी कुछ अमल करना चाहिए। हम जल्दी-जल्दी वहां से आगे बढ़े कि शायद दूर से अच्छा लगे लेकिन हाय! मुझे तो संगीत दूर से भी कर्ण प्रिय नहीं लगा। 


थोड़ा और आगे बढ़ कर एक घाट पर शांति से बैठकर गंगा की कल-कल, नावों के चप्पुओं की छल-छल, पंडों के मंत्रोच्चारण और गंगा स्नान के बाद भक्तों के खुशी के अतिरेक में लगाए गए नारों 'हर हर महादेव' 'हर हर गंगे' की आवाज जब कानों में पड़ने लगी तो शोर सुनकर अशांत हुआ अपना मन कुछ शांत हुआ। आज गंगा स्नान, दर्शन/भक्ति के मूड में नहीं था, घूमने और साइकिलिंग के मूड में था, कुछ देर बैठकर लौट चला। स्पीकर के शोर से बचते बचाते अपने साइकिल तक पहुंचा और साइकिल लेकर लौट चला।


बसंत महाविद्यालय की सड़क पकड़ कर आगे चला और अपने प्रिय 'जीवित कुएं' के पास साइकिल खड़ी की। जीवित कुआं इसलिए लिखा की बहुत से कुएं अब मर चुके हैं। घर-घर में मशीन के द्वारा बोरिंग से पानी की निकासी होती है। ऐसे में किसी समाज ने कोई कुआं अभी तक जिंदा रखा है तो वह पूरा समाज ही साधुवाद का पात्र है। कुएं की शक्लोसूरत और सीरत आज भी 50 वर्षों पुरानी है जब हम बचपन में गली के बाल सखाओं के साथ पानी पीने के लिए आते थे। थोड़ा परिवर्तन यह हुआ है कि इसको लोहे की जाली से ढक दिया गया है और पानी निकालने के लिए चापाकल (हैंड पाइप) लगा दिया गया है। एक आदमी 'चापाकल' चलाता है, दूसरा पानी पीता है। हम कुछ देर पास बने चबूतरे पर बैठे और थोड़ी देर सुस्ताने के बाद पेट भर पानी पिए। जिसने पानी पिलाया उसने बकायदा नीचे चप्पल उतारा, बड़ी श्रद्धा से कुएं की जगत को छू कर नमन किया और हैंड पाइप चलाया। पानी पिलाते हुए बोल रहा था,  "ऐ भैय्या! भगवान जी यही न हउअन!" अब इतनी श्रध्दा और विश्वास आपको हर स्थान पर कहां मिलेगा? पानी तो मीठा था ही, मुझे तो पिलाने वाला भी भगवान का कोई दूत लग रहा था। मैने अमृत नहीं पिया इसलिए नहीं कह सकता कि पानी अमृत के समान था लेकिन इतना तो कह ही सकता हूं कि पानी पी कर मन भी तृप्त हो जाता है। शायद इसीलिए इसे 'अमृतकुंड' कहते हैं।


 पानी पीकर, आदिकेशव घाट और उसके बगल में बने शमशान घाट को पार कर साइकिल चलाते हुए वरुणा गंगा के संगम तट पर बने पुल से गुजरते हुए, थाना सराय मोहाना, गांव कोटवा पार करते हुए अपने चिरपरिचित पुलिया पर बैठ गया। आज भक्ति/दर्शन के मूड में नहीं था तो आदिकेशव मन्दिर नहीं गया। बिना नहाए मन्दिर में प्रवेश की इच्छा नहीं होती, बचपन में पड़ा संस्कार कभी पीछा नहीं छोड़ता। मन्दिर में विष्णु भगवान की सुन्दर प्रतिमाएं हैं और घाट भी खूबसूरत बना है।


पुलिया में पहले से चार लोग बैठे हुए थे। एक वृद्ध नेपाली टोपी पहनकर बैठे हुए थे, उन्होंने अपना नाम 'घन बहादुर सिंह' बताया। मैने उनका परिचय पूछा तो बताने लगे कि वे 2005 में नलकूप विभाग से सेवानिवृत हुए हैं, यहीं पास ही गांव में घर बनाकर वर्षों से रह रहे हैं। 18 वर्ष तो सेवानिवृत्त हुए हो चुके, पत्नी का देहांत हो चुका, बिटिया और दामाद भी पास रहते हैं, 11 साल का तो नाती हो चुका। मैने कहा, "यह दिन तो सभी को देखना है, दो में से किसी न किसी को तो पहले जाना ही होगा, आप पहले जाते तो उनको अकेले रहना पड़ता, जो भगवान करते हैं, अच्छा ही करते हैं, आप तो पुलिया पर बैठकर, खैनी खाते हुए, आपस में बतियाते हुए जीवन काट रहे हैं, आपके स्थान पर आपकी श्रीमती जी होतीं तो उन्हें इस समाज में जीवन जीना और भी कठिन होता। ईश्वर ने आपको खूब स्वस्थ रखा है, आपको देखकर तो लगता ही नहीं कि आप इतने बुजुर्ग हैं!" मेरी बात सुनकर वे प्रसन्न दिखे, शेष तीनों ने भी मेरी बात का समर्थन किया, इस तरह पुलिया में बैठे-बैठे मेरी थकान भी दूर हुई और अजनबियों से मीठी बातें भी हो गईं। 


दोस्तों से मीठी बातें करना आसान है, बड़ी बात तो तब है जब अजनबियों से मीठी बातें हों। रोज-रोज लोहे के घर में अजनबियों से बतियाने के अनुभव ने मुझे ढीठ बना दिया है, अजनबी से भी खूब बातचीत हो जाती है। एक बात मैने और अनुभव किया कि जितनी सहजता और प्रेम से गरीब/अनपढ़ वर्ग के लोग खुलकर बतियाते हैं, यह अपनापन पढ़े लिखे रईसों और शिक्षित वर्ग में ढूंढे नहीं मिलता। शिक्षित रईसों में कभी एकाध लोग प्रेम से बोलने वाले मिल जाएं तो भाग्य की बात है। उनके अपने गुरूर और सिद्धांत होते हैं, वाम मार्गी या दाम मार्गी होते हैं, पूर्वमुखी या दक्खिन मुखी होते हैं, वे अपने अहंकार के तले इतने डूबे होते हैं कि सामने वाले को तुक्ष जीव समझते हैं। 


ग्रामीण परिवेश में सीधे/सरल लोगों से बातें करके मन एकदम हल्का हो गया। उनसे विदा लेकर, फिर किसी संडे को मिलने का वादा करके जब मैं वापस चला तो मेरी साइकिल सड़क पर दौड़ रही थी और मन हवा में उड़ रहा था। आज की सुबह बहुत खुबसूरत थी।

... @देवेन्द्र पाण्डेय।







नीचे यूट्यूब के लिंक हैं। वीडियो इसमें पोस्ट नहीं हुआ तो यू टयूब में पोस्ट कर लिंक लगा दिए हैं, चाहें तो देख सकते हैं। लिखा हुआ और स्पष्ट समझ में आएगा।

https://youtu.be/0jglPN3fvwo 


https://youtu.be/7SsJivpWwfg

https://youtu.be/uYfXfV8dkWo

https://youtu.be/mDkqik22eIY

26.3.23

साइकिल की सवारी-6

5 बजे प्रातः भ्रमण के लिए निकलने की तैयारी कर रहा था, याद आया आज तो रविवार है। ऑफिस जाने की कोई जल्दी नहीं, कुछ साहसिक काम किया जाय। साइकिल चला कर दूर निकला जाय। बनारस मंदिरों का शहर है, घूम-घूम कर दर्शन किया जाय। दर्शन करने के लिए नहाना जरूरी है, नहा लिया जाय। जब नहा लिए तो सोचा, पहले घर के देवता की पूजा कर ली जाय, पता नहीं घूमने में कितना समय लगे। पूजा करके निवृत्त हुआ तो घड़ी में सुबह के 6.30 बज रहे थे, लेकिन अभी पूरी तरह उजाला नहीं हुआ था, आकाश में बादल छाए थे लेकिन जब मूड बना लिया तो बना लिया। साइकिल लेकर निकल पड़ा घर से बाहर। 

साइकिल बढ़िया चल रही थी, पिछले दिनों की तरह दम नहीं लगाना पड़ रहा था। चलते-चलते कुछ अलग करने का मूड हुआ, हमेशा की तरह आशापुर, कपिलधारा, सरायमुहाना, बसंता कॉलेज होते हुए नमोघाट जाने का विचार त्याग दिया और साइकिल लेढूपुर, सँस्कृत विश्वविद्यालय, आदर्श कॉलेज होते हुए महामृत्युंजय मन्दिर की तरफ मोड़ दिया। साइकिल बढ़िया चल रही हो और घर से नहाकर निकले हों तो सीधे मन्दिर का ही रास्ता दिखता है।

सुबह-सुबह मृत्युंजय महादेव मन्दिर के सामने फूल वाले की दुकान पर साइकिल खड़ी कर ताला लगाने लगा तो बोला, "जा!ताला काहे बन्द करत हौआ! हम हई न।" हमने भी उस पर विश्वास कर एक माला खरीदी और अंदर चला गया। रविवार को शिवजी के मन्दिर में भीड़ कम होती है, दिव्य दर्शन हुआ। यहीं अपने बचपन का मित्र श्रीकांत रोज आता है और बाबा की आराधना करता है। अधिक नहीं ढूँढना पड़ा, पाठ करते मिल गया। हम दोनो एक दूसरे को देख खुश हुए। वह अपने पाठ में लीन था,  हाल चाल, सब ठीक है के बाद बस इतना ही बोल पाया, 'कभी घर आओ।' हमने भी घर जल्दी ही आने का वादा किया और निकल पड़े। बाहर साइकिल वैसे ही खड़ी थी। उसी ने बताया, "उनकर नाँव सुपाड़ी गुरु हौ!" यह मेरे लिए नई बात थी, मित्र श्रीकांत से 'सुपाड़ी गुरु' कब हो गया! समय कैसे अपनों को बदल देता है और हम जान ही नहीं पाते!

मृत्युंजय महादेव से आगे बढ़े तो भैरोनाथ से पहले गुजरात विद्या मंदिर में अपनी साइकिल खड़ी कर दी। जानता था, रविवार को बनारस शहर के कोतवाल, भैरोनाथ जी के मन्दिर में भयंकर भीड़ होती है। भीड़ से अपना मन घबड़ाता है, भगवान से फुरसत में मिलने की इच्छा होती है, पतली गली पकड़ कर भीड़ से रास्ता बनाते आगे बढ़ गया। भीड़ के साथ मन्दिर को दूर से प्रणाम किया, मन ही मन बोला, "भैरो बाबा की जय।" हम कोई VIP  तो हैं नहीं कि भीड़ में बिना लाइन लगाए दर्शन पा जाएंगे! और फिर जिस दिन इतने फरियादी जुटे हों, भैरोबाबा मेरी ही क्यों सुध लेंगे! उन्हें धर्मसंकट में डालना ही क्यों? वे शहर कोतवाल हैं, मैं कोई नेता हूँ?

चौखम्भा, गोपालमन्दिर होते हुए संकठा जी के मन्दिर का रास्ता पकड़ लिया। जानता था आज माँ फुरसत में होंगी, उनके दरबार में शुक्रवार को भीड़ होती है, आज रविवार है। बनारस में सुबह-सुबह नहाकर घूमने निकले हों या गंगा जी नहाने जा रहे हों तो मिजाज ही कुछ और होता है। लगता है जैसे हमने सब काम कर लिया, अब प्रभु दर्शन ही शेष है। 

संकठा जी के मन्दिर में भीड़ बहुत कम थी, अभी सुबह के 8.15 हो रहे थे, माँ एकदम फुरसत में थीं, बस दौड़कर गोदी में नहीं उठाया, दिव्य दर्शन से आह्लादित कर दिया। मन्दिर में गणेश जी, शिवलिंग और आँगन में नवग्रह विद्यमान हैं। बाहर निकलते समय एक सिंह की विशाल प्रतिमा है। प्रवेश करते समय एक बड़ा सा नगाड़ा दिखता है। 9 बजे के आसपास मिश्रा जी अपने ढोलक के साथ आते हैं और मन्दिर में खूब भजन गाते हैं। बचपन से इस मन्दिर में आते रहने के कारण भी यह मन्दिर मुझे अतिशय प्रिय है। यहाँ आकर लगता है सचमुच माँ के दरबार मे आ गए। यदि दिल में कोई दर्द हो तो कुछ देर बैठकर ध्यान करने के बाद आँखों से पानी अपने आप बहने लगते हैं। आज तो मन पहले से प्रसन्न था, और प्रसन्न हो गया।

संकठा जी का मन्दिर सिंधियाघाट के ऊपर है, सिंधियाघाट के बगल में विश्वप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट है। मन्दिर से बाहर निकल कर घाट की तरफ न जा कर, बाईं ओर दस कदम मुड़ें तो गंगामहल मिलता है। महल का कुछ हिस्सा ढह चुका है लेकिन घुसते ही सामने आँगन में राधा कृष्ण की खूबसूरत प्रतिमा अभी विद्यमान है। इस मन्दिर के पुजारी अभी रोज पूजा/ आरती करते हैं। बगल में एक बरामदा खुलता है, जहाँ से गंगा घाट और गंगा जी का दिव्य दर्शन होता है। यहाँ भीड़ नहीं होती, बस मेरे जैसे कुछ जानने वाले स्थानीय लोग ही आते हैं। हम जब यहाँ पहुँचे आरती शुरू होने ही वाली थी। मुझे भी आरती में शामिल होने प्रसाद पाने का सौभाग्य मिला।

गंगामहल से उतरकर सिंधियाघाट की सीढियाँ उतरने लगा तो देखा घाट पर कुछ लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं। किशोरावस्था में गलियों में रहते समय कभी हम भी ऐसे ही क्रिकेट खेला करते थे। सिंधियाघाट के बगल मे मणिकर्णिका घाट का अपना अलग ही रंग था। लाशें आ रही थीं, राम नाम सत्य है की ध्वनि निरन्तर सुनाई पड़ रही थी, शिवलिंग सजे हुए थे, चिताएँ जल रही थीं, इन्ही से होकर, बगल से रास्ता बनाते हुए, नव निर्मित विश्वनाथ कॉरिडोर के सामने जा कर खड़े हो गए। यहाँ आने पर मुख से अनायास निकल पड़ता है...हर हर महादेव।

अपने स्वास्थ्य और उम्र के हिसाब से थककर चूर हो गए थे, बाहर से हाथ जोड़कर लौटने का मन था लेकिन जब लोगो को यह कहते सुना, 'आज भीड़ बहुत कम है!'  दर्शन का लालच आ ही गया और एक-एक कर सीढियाँ चढ़ने लगा। अंदर भीड़ वास्तव में रोज की तुलना में कम थी, आकाश में बादल भी घिरे थे, बारिश की संभावना थी, शायद भीड़ कम होने के पीछे यही कारण हो। जो भी हो, दर्शन का मूड बन गया तो करके ही लौटना था, चाहे जितनी देर लगे। जहाँ तक कैमरा ले जाने की अनुमति थी, वहाँ तक फोटो खींचने के बाद कैमरा  और जूता जमा किया, दर्शन के लिए लाइन में लग गए।

खुशकिस्मती से अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा। जहाँ से दर्शन करना शुरू किया, कोई VIP आगे-आगे जा रहे थे, हम भी उनके अनुयायियों में शामिल हो गए और पाँच मिनट में दिव्य दर्शन करके बाहर आ गए। मुख से फिर निकला, 'हर हर महादेव' आज दिन अच्छा लग रहा है!

जूते पहन कर मोबाइल लेने के बाद जब विश्वनाथ कॉरिडोर की सीढियाँ एक-एक कर उतरने लगे तब समझ में आया आज तो अति हो चुकी है, शरीर थककर जवाब दे चुका था, अभी 3, 4 किमी पैदल चलकर साइकिल तक पहुँचना और 10 किमी साइकिल चलाकर सारनाथ वापस जाना था। 

पुनः मणिकर्णिका घाट से होते हुए लौटने लगे तो एक मुर्दा फूँकने के लिए लकड़ी बेचने वाली दुकान पर बड़ी सी तराजू टँगी देख मन मे खयाल आया, क्या यह बता सकता है, "मुझे फूँकना हो तो कितनी लकड़ी की आवश्यकता है?" डरकर नहीं पूछा, बनारसी है, पलटकर गाली देगा, "आवा! पहिले तोहें मुहाई तब न बताई!" मित्र की तरह थोड़ी न कहेगा, "शुभ-शुभ बोलिए, ऐसी बातें नहीं सोचते।" 

आगे बढ़े तो वहीं मणिकर्णिका घाट पर दो गौरैयों के बीच जमकर झगड़ा हो रहा था! जैसे कोई दो सौतन एक पुरूष के लिए झगड़ रही हों! चुपचाप वीडियो बनाने लगा लेकिन वे मानने को तैयार ही नहीं थीं, इतने में दो चिड़ा और आकर बीचबचाव करने लगे लेकिन वे तभी हटीं जब किसी आदमी ने उन्हें भगाया। 

वहाँ से आगे बढ़कर सिंधियाघाट की सीढ़ियाँ एक एक कर मुश्किल से चढ़ने लगा, शरीर थककर चूर हो चुका था, सोच रहा था, ऊपर चढ़कर पहले कुछ देर चबूतरे पर बैठकर आराम करता हूँ तभी लियाकत भाई का फोन आ गया...."एक दुखद समाचार है पाण्डेजी, वियोगी जी नहीं रहे, हम सब उनके आवास शिवपुर की ओर जा रहे हैं!" खबर सुनकर हम वहीं सीढ़ी पर धम्म से बैठ गए। 

वियोगी जी का पूरा नाम श्री योगेन्द्र नारायण चतुर्वेदी था। वे 'वियोगी' उपनाम से साहित्य सृजन करते थे। हमसे उम्र में 10 वर्ष से अधिक बड़े होंगे लेकिन वजन में कम थे। साहित्य गोष्ठियों में उनकी उपस्थिति पूरे माहौल को हरसमय खुशनुमा बनाए रखती थी। उनके गीत, छंद और श्रृंगार रस में लिखे मुक्तक सभी को आनंदित करते थे। इधर कुछ समय से बीमार चल रहे थे। दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल में भर्ती थे, हमने मिलने का समय भी निकाला लेकिन दुर्भाग्य यह कि जब तक पहुँचते प्रीत भाई का फोन आया, 'वे डिसचार्ज होकर घर जा चुके हैं, परेशान मत होइए।' हमने समझा अब ठीक हो चुके होंगे, तभी आज यह समाचार सुनने को मिला। मुझसे ही क्या, सभी पर उनका प्रगाढ़ स्नेह था। उनको देखकर ही ऊर्जा का संचार होता था। उनकी कमी बनारस के सभी साहित्यकारों को बहुत दिनों तक खलती रहेगी। 

सोचता रहा, "सामने मणिकर्णिका घाट है, कुछ घण्टों बाद वे यहीं लाए जाएंगे, फोन के एक कॉल से कैसे समय बदल जाता है! अभी तक हो रही आनन्द दायक घुमाई, विनम्र श्रद्धांजलि में बदल गई। अभी सोच रहा था, अपने लिए कितनी लकड़ी लगेगी? अभी वियोगी जी के लिए पूछना पड़ेगा, "कितनी लकड़ी लगेगी?" एक राम नाम ही सत्य है, बाकी झूठा है यह संसार। वियोगी जी को श्रद्धांजलि देने का सबसे उपयुक्त स्थान तो यही है, "ईश्वर उनको मोक्ष प्रदान करे, विनम्र श्रद्धांजलि।"😢

22-01-2023 की पोस्ट है।