1.8.22

लोहे का घर 62

लोहे के घर में अकेले बैठे हों तो कुछ लिखने के लिए मोबाइल पर उँगलियाँ चलने लगती है। लिखने के लिए बड़ा अनुकूल माहौल है। लखनऊ-बनारस शटल एक्सप्रेस की ए.सी. चेयर कार वाली बोगी में 2 नम्बर की बर्थ है। सो नहीं सकते, बैठना मजबूरी है। बैठकर करेंगे क्या? सामने बंद दरवाजे के सिवा कुछ नहीं। अपनी विंडो सीट है, शाम के 6.30 बजने वाले हैं, बाहर अभी उजाला है, बाहर झाँक सकते हैं। अच्छी भली समय से प्लेटफार्म पर लगी ट्रेन को 15 मिनट लेट चलाया मालिक ने! कोई मजबूरी होगी। अभी कबाड़ इलाके से रेंग कर आगे बढ़ रही है, रफ्तार पकड़ेगी तब बाहर झाँकने लायक दृश्य दिखेंगे। 


बगल में 3 नम्बर वाली एक बर्थ पर एक युवा बैठा था, तभी एक प्रौढ़ दम्पती हिलते हुए आकर अनुरोध करने लगे, "वहाँ बैठ जाते तो हम लोग साथ बैठ जाते? हमारी एक सीट, 4 नम्बर यहाँ, एक वहाँ मिल गई है" युवक शरीफ निकला, झट से अपना झोला उठाकर यहाँ से वहाँ हो गया!" शरीफ लोगों से बहुत अनुरोध नहीं करना पड़ता, वे झट से झोला उठाकर चल देते हैं। इसके लिए आपके अनुरोध में दम होना चाहिए। यह नहीं कि शरारतन अगले से कहें,"झोला उठाओ, चले जाओ!" अगला कहेगा,"नहीं जाएँगे, अभी और तुम्हारी छाती पर और मूंग दलेंगे, क्या कर लोगे?"


मेरे पीछे 5,6 नम्बर वाली बर्थ का भी यही आलम था, एक जोड़े की सीट आगे-पीछे हो गई थी। यहाँ भी 'सिंगल' अपना झोला उठाकर चला गया। सिंगल' के साथ अक्सर लफड़ा हो जाता है, जोड़े रंग जमा कर, सार्वजनिक सीट से ऐसे ही उठा देते हैं। भले अपने घर में घुसने के बाद ये जोड़े एक दूसरे का मुँह देखना पसंद न करते हों लेकिन सामाजिक मर्यादा है, क्या किया जाय? कैसे अपनी बीबी को दूसरे युवा के साथ बैठने दिया जाय? मर्यादा भी तो निभानी है! मुझे तो लगता है, आजकल लोग मन से न चाहते हुए भी, मर्यादा पुरुष बने घूमते हैं! 


मैं भी यहाँ सिंगल हूँ लेकिन मेरे साथ यह लफड़ा नहीं हुआ। एक नम्बर सीट पर एक नौजवान आया और अपना झोला रखकर चला गया! ट्रेन चल दी, नहीं आया!!! मैं घबड़ाने लगा, झोला रखकर कहाँ गायब हुआ? कहीं झोले में कुछ गड़बड़ समान तो नहीं! तभी वही युवक काले पैंट-कोट में चार्ट लेकर सामने आ गया,"आपका नाम?" ओह! तो यह टी टी है!!! भगवान कितना दयालु है! इस ट्रेन में, एक नम्बर की बर्थ टी टी की होती है, यह आज पता चला।


बाहर का दृश्य बहुत सुहाना है। हरी भरी धरती, कहीं खेत चरते चौपाए, कहीं भरे पानी मे डूबे धान, बरश चुके बादलों से खाली हुआ साफ आसमान, हरे/घने पेड़, छा रहा अँधेरा, जा रहा उजाला और घास का भारी गठ्ठर सर पर लादे, मेड़-मेड़ जा रही, भउजाई!


अब बाहर अँधेरा अधिक हो चुका है। शीशे से बाहर झाँको तो अपनी ही परछाई दिख रही है! बोगी में भीतर उजाला हो चुका है। सभी लाइट जल चुकी है। यही होता है। जब भीतर रोशनी होती है तो बाहर देखना भी चाहो, दर्पण की तरह अपना चेहरा ही दिखने लगता है! पता नहीं, अपने भीतर कब दीपक जलेगा? और जान पाएंगे, 'कौन हैं हम?' कब खतम होगा, मैं?"

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19.7.22

साइकिल की सवारी

दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल चलाने पर प्रतिबंध ही नहीं लगा मेरी मोटरसाइकिल श्रीमती जी द्वारा बेच भी दी गई। मैं दुखी होकर मोटरसाइकिल को जाते हुए देखता रह गया। अब घर से 5 किमी के दायरे में जाने के लिए भी 'पैदल' हो गया। कुछ ही विकल्प थे..पैदल चलो, कार के लिए ड्राइवर बुलाओ या रिजर्व गाड़ी बुलाओ। 3,4 किमी के लिए यह महंगा सौदा था। तभी तय किया कि सायकिल खरीदी जाय। दूर भीड़ वाली सड़क पर न ले जाने के आश्वासन के साथ मुश्किल से साइकिल खरीदने की अनुमति मिली और मैं रोज एक महीने से भोर में सायकिल लेकर निकलने लगा। 


घर से सारनाथ पार्क लगभग 3 किमी की दूरी पर है। भोर में 5 बजे सायकिल लेकर पार्क में जाना, सायकिल खड़ी कर एक घण्टे पार्क में घूमना, साइकिल लेकर चाय पीते, फल/दही खरीदते हुए, आराम-आराम से वापस आना, नहाकर नाश्ते के बाद 7.30 तक ऑफिस जाने के लिए घर छोड़ देना, 1.30 घण्टे बस के सफर में फेसबुक चलाना, 9.30तक ऑफिस पहुँच जाना, दिनचर्या बन गई। 


सन्डे(छुट्टी के दिन) दिनचर्या बदल जाती है। जिस दिन ऑफिस नहीं जाना होता, मन बहक जाता है। आज सन्डे था, सायकिल पर बैठते ही मन उड़ने लगा। लगभग 1 घण्टे, गांव के रास्ते साइकिल चलाकर पहुँच गया खिड़किया_घाट। खिड़किया घाट अब नमो_घाट के रूप में विकसित, बनारस के बेहतरीन घाटों में से एक, भव्य घाट बन चुका है। सड़क मार्ग, जल मार्ग और रेलमार्ग से जुड़ा यह घाट बनारस का सबसे खूबसूरत घाट है। इस घाट के बगल में खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं। राजघाट के पुल के अलावा सन्त रविदास का भव्य मंदिर है, लाल खान का मकबरा है, वरुणा और गंगा का संगम तट, आदिकेशव घाट है और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध बसन्त कॉलेज है। बसंत कॉलेज से आदिकेशव घाट जाने का, हराभरा रमणीक मार्ग है और मार्ग में मिलता है एक जिंदा कुँआ जिसका पानी आज भी बहुत मीठा है।


सारनाथ से आदिकेशव घाट, बसन्त कॉलेज होते हुए राजघाट जाने के मार्ग में और भी बहुत कुछ है।  पँचकोशी परिक्रमा के भीतर स्थित कपिलधारा है, सूर्यदेव_का_मंदिर है, सुंदर तालाब, हनुमानजी, शनि देव और शंकर जी का मंदिर है जिनके चित्र मैं अपने पेज चित्रों का आनंद  में दिखाता रहता हूँ। मार्ग में एक श्मशान घाट और निषाद राज का द्वार भी मिलता है।

 

आज बसन्त कॉलेज के कुएँ (#अमृत_कुण्ड) का पानी पीकर लौटते समय एक पुलिया दिखी। पुलिया में 4 स्थानीय ग्रामीण बैठे हुए हवा खा रहे थे और गप्पें लड़ा रहे थे। उन चारों में नेपाली टोपी पहने बहादुर भी दिखे जो बायीं हथेली पर रखी सुर्ती दाएं हाथ के अंगूठे से रगड़ रहे थे। हम भी थके थे तो वहीं साइकिल खड़ी कर उनसे गप्पें लड़ाने लगे। उन्होंने तीन गांव का नाम लिया और हाथ के इशारे से बताया यह गांव इधर, वह  गाँव उधर और हम जहाँ बैठे हैं, उस गाँव का नाम यह है। गाँव के नाम में क्या रख्खा है, हम भूल गए और याद कर लिख भी दें तो आप कौन सा ज्ञान में वृद्धि कर लेंगे! 


पुलिया में बैठकर, ग्रामीणों से बात कर, बहुत आनन्द आया। मुझे पुलिया वाले श्रीमान कानपुर के अनूप शुक्ल  जी की बहुत याद आई फिर याद आया, वे तो अभी अकेले कश्मीर घूम रहे हैं! अपने दौड़ गुरु श्रीमान Satish Saxena  जी की भी याद आई जो अभी जर्मनी में श्रीमान Raj Bhatia  जी के गाँव में घूम रहे हैं। हम पुलिया पर बैठकर यही सब सोच रहे थे कि नेपाली बहादुर ने खैनी मेरी ओर बढ़ाते हुए पूछा, आप भी लेंगे? दूसरा समय होता तो खुशी-खुशी झट से ले लेता मगर इनकार करते हुए बहादुर को धन्यवाद दिया। ग्रामीणों ने सुर्ती न खाने के लिए जब मेरी बहुत प्रशंसा करी और अपनी आलोचना करी कि सुर्ती खाना गलत बात है लेकिन आदत पड़ गई, क्या करें! तो मुझे अपने न्यूरो डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया जिसने मुझे दवाई चलने तक नशा करने से मना किया हुआ है।


बहुत देर बैठने, गप्पें लड़ाने के बाद जब धूप तेज होने लगी तो मैं पुलिया से उतरा और सबसे विदा लेकर घर की ओर चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, काशी सिर्फ अस्सी घाट, संकटमोचन, BHU, गोदौलिया, बाबा विश्वनाथ जी का दरबार या गलियों की चाय-पान की अड़ी ही नहीं है, काशी में बहुत कुछ है जिसे काशीवासी भी एक जीवन मे पूरा नहीं देख पाते।

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28.6.22

सायली छन्द

(1)

चिड़िया

पानी पीने

मेरे आँगन आई

भरे प्याले

चहचहाई।

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(2)

भूखी

रोटी पकाई

बेटा घर आया

खाना खाया

तृप्त।

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(3)

पतंग

पेंचा लड़ा

लड़के लूटने दौड़े

डोर बंधी

उड़ी।

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(4)

ट्रांसफर

विदाई/स्वागत

पुराने वाले मित्र

नए अभी

अधिकारी!

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(5)

सूरज

कपारे पर

धूप दुआरे पर

बरसे आग

सबेरे।

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(6)

दिल 

आँच चढ़ा

मोम पिघल जाता

खिलौना बना

माटी।

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(7)

उजली

दूध धुली

चाँद परी ख्वाहिशें

छाँव जली

जिंदगी।

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(8)

इंद्रदेव

बिगड़ा बजट

एक गाँव झमाझम

एक गाँव

सूखा।

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29.5.22

आधी रोटी चोर!

बनारस की एक गली में चीखते-चिल्लाते लड़कों का एक झुण्ड करीब आ रहा था। आगे-आगे एक विक्षिप्त बुढ़िया भागे जा रही थी। लड़के पास आते तो वह जमीन से उठाकर झुण्ड की ओर एक पत्थर फेंकती, लड़के बचते हुए जोर से चीखते...आधी रोटी चोर!!! 
गली से गुजर रहा कोई आदमी लड़कों को डांट कर भगाता, "क्यों परेशान कर हो?" लड़के इधर-उधर गली में बिखर जाते। बुढ़िया संभलती, आदमी को हाथ जोड़ती (शायद शुक्रिया अदा करने का उसका यही अंदाज हो), वहीं एक चबूतरे में थक कर बैठ जाती। पोटली से रोटी निकालकर खाती। ऐसा महीने में कई बार होता! 
एक दिन मैने एक सरदार से पूछ ही लिया, "कौन है यह?"
सरदार बोला, "पागल है, इसका कोई नहीं है। वर्षों पहले गंगा घाट में कहीं से आ गई थी। जब आई थी, जवान थी। पूछने पर कुछ नहीं बता पायी। गली/घाट में कहीं पड़ी रहती। घरों में बरतन साफकर कर अपना गुजारा करती। एक बार गर्भवती हुई! लोगों ने इसको खूब गालियाँ दी। बुरा/भला सब कहा। कोई इसे घर में बुलाने को तैयार नहीं हुआ। गोद में एक बच्चा भी आ गया लेकिन टिका नहीं। बच्चा मर गया तब इसका मानसिक संतुलन और भी बिगड़ गया। लड़के यह सब नहीं जानते, इसको परेशान करने में उनको मजा मिलता है। समय बीतता गया, ऐसे ही मांगते-खाते बूढ़ी हो गई। आप परेशान मत होइए, ऐसे ही मर जाएगी एक दिन।
मैं दुखी होकर घाट की सीढ़ियाँ उतरने लगा। तट पर घण्टों बैठा माँ गंगा से एक प्रश्न पूछता रहा..परेशान होने के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? ऐसा लगा जैसे माँ मुझ पर ही हँस रही हों! कह रही हों,"तुम जानो, तुम्हारा समाज जाने, मुझे  क्यों माँ कहते हो? लड़की की यह हालत क्यों है? इसका उत्तर तो तुम्हें ही देना होगा।
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25.5.22

साधू

एक बार यमराज को कुम्भ मेले में त्रिवेणी दर्शन का मोह जगा। प्रयागराज में गंगा नदी के तट पर एक कुटिया बनाकर रहने लगे। बगल की कुटिया में एक स्वनामधन्य, पहुँचे हुए साधू रहते थे। एक दिन स्नान करते वक्त यमराज जी से पूछ बैठे...

क्या नाम?

यमराज!

साधू नाराज हो गए, क्रोध से बोले, "मूर्ख! मुझसे मजाक करता है!!!" यमराज जी ने विनम्रता पूर्वक कहा, "नहीं महाराज, मजाक क्यों करूँगा? मैं यमराज हूँ, कुम्भ में गंगा स्नान की इच्छा हुई तो साधूभेष बनाकर चला आया।" साधू और भी नाराज, "यमराज हो तो अपना असली रूप दिखाओ।"

'नहीं महाराज। असलीरूप तो तभी दिखाऊंगा जब आपको ले जाना होगा। प्रतीक्षा कीजिए, अभी आपका समय नहीं आया है, समय आने पर देख लीजिएगा।'

अब साधू को चैन कहाँ! परोक्ष में एक ही शब्द जोर से बोले,'मूर्ख!' और चुप लगाकर चले गए लेकिन भीतर तक क्रोध से काँप गए।

उन्हें यकीन ही नहीं था कि यमराज ऐसा भी हो सकता है। अपने चेलों को भेजकर तरह-तरह से यमराज को परेशान करने लगे। इधर यमराज का मन धार्मिकता में पूरी तरह से डूबा हुआ था। गमछा गायब हो जाए, मेहनत से बनाया खाना गायब हो जाय, आँख खुलने पर कुटिया गन्दगी से भरी पड़ी हो, कोई फर्क नहीं। कुटिया की सफाई करते, स्नान करते, ध्यान लगाते और खाना न मिलने पर भूखे ही सो जाते। 

उधर साधू ने समझा कि अब तो बुद्धि सही हो गई होगी, एक दिन फिर पूछा, "क्या नाम है तुम्हारा, अब तो अपना असली नाम बता दो?
सुनकर यमराज मुस्कुरा दिए, "जब हम तुमको लेने आएंगे तभी याद होगा कि हम कौन हैं, उससे पहले न स्मरण रहेगा न विश्वास होगा। जो दिन बचे हैं, अनासक्त हो, प्रभु भजन में बिताओ। मुझे तो तुम भी साधू भेषधारी सांसारिक प्राणी लगते हो।"

अब साधू गुस्से से पागल हो गया। इसी पागलपन में भाँग के साथ ढेर सारा धतूरा पीसकर निगल गया। ऐसा बीमार पड़ा कि चेलों ने बहुत इलाज करवाया लेकिन डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। मृत्यु निकट आई तो उसे लेने यमराज द्वार पर आए। यमराज को देखकर साधू के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान खिल गई, कांपते हुए अपने चेलों से कहने लगा," देखो!यमराज ऐसा होता है, वह दुष्ट कह रहा था, हम यमराज हैं। जाओ! बगल की कुटिया से उसे पकड़ कर ले आओ।" यमराज से बोला, "महाराज! मैं चलने को तैयार हूं लेकिन उसे भी साथ ले चलिए।" 

चेलों ने बगल की कुटिया छान मारी, अपने को यमराज कहने वाले साधू का कहीं पता नहीं था। खाली हाथ लौटकर बोले," महाराज! वहाँ तो कोई नहीं है!!! इतने में यमराज हँसकर बोले, 'मैं यहाँ हूँ महाराज, आपके कारण मुझे साधू भेष का त्याग करना पड़ा और कुंभ का आनन्द भी नहीं ले पाया। चलिए, चला जाय। सुना था, आप त्रिकालदर्शी हैं, इसीलिए आप से झूठ नहीं बोल पाया।" 

सुनते ही साधू के प्राण निकल गए, यमराज भी कुटिया से गायब हो गया, चेलों को कुछ भी समझ में नहीं आया। न उन्होंने यमराज को देखा न यमराज से हुई अपने 'साधू महाराज' की बात सुनी। उन्हें बस यह लगा कि हमारे 'महाराज' के मरने में, बगल वाले कुटिया में रहने वाले 'साधू' का कोई हाथ है। 
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

19.5.22

घड़ा

पीपल के पेड़ पर माटी के कलश लटके होते हैं। माना जाता है कि मरने के बाद आदमी 12 दिनों तक प्रेत योनि में भटकता है, तेरहवें दिन श्राद्ध हो जाने के बाद वह पितरों की श्रेणी में शामिल हो जाता है। 12 दिनों तक मृत आत्माओं को पानी देने के लिए माटी के कलश, पीपल के शाखों पर बांध देते हैं और मृतात्मा के लिए पुत्र/वारिश रोज सुबह/शाम घट में जल भरता रहता है। 


हम काशी की गलियों में बसे एक मोहल्ले ब्रह्माघाट में रहते थे। घाट से गंगा की सीढ़ियाँ उतरते समय बायीं तरफ आज भी पीपल का एक विशाल वृक्ष है जिसमें माटी के घट लटके होते हैं। हम लड़के, किशोरावस्था में घाट की सीढ़ियाँ चढ़ते/उतरते बड़े ध्यान से इन घटों को देखते रहते थे। कोई कहता,"पीपल का पेड़ है, इसमें भूत रहते हैं।" हम शुरू से ही भूत/प्रेत पर विश्वास नहीं करते थे तो इन तर्कों को शुरू से खारिज कर देते थे। बात ही बात में किसी ने बाजी लगा दी,"रात को 12 बजे यहाँ आकर दिखाओ तो माने कि भूत नहीं होते!" हम कहाँ हारने वाले थे! उत्साह में बोल दिए,"आएंगे क्या, एक घट भी उतार लाएँगे, तुम लोगों को विश्वास हो जाय कि हम आए थे। तुम लोग दूर चबूतरे पर बैठे रहना।" 


वो किशोरावस्था की शैतानियों के दिन थे। बात आई/गई हो गई लेकिन जब भी मित्रों को मौका मिलता, चिढ़ाने से नहीं चूकते,"पाण्डेय! घण्टा कब उतारोगे?" हम सुनकर कट के रह जाते और मौके की तलाश करते। एक दिन मौका मिल ही गया।


गलियों में 'नूतन बालक समिति' की ओर से 'गणेश विद्या मंदिर' स्कूल (जो ब्रह्माघाट से थोड़ी दूर घासी टोला मुहल्ले में स्थित था) और मोहल्ले के ही एक विशाल भवन जो 'आंग्रे का बाड़ा'  के नाम से प्रसिद्ध था, में धूमधाम से गणेश जी की प्रतिमा स्थापित होती और कई दिनों तक भांति-भांति के सांस्कृतिक समारोह आयोजित होते थे। इन्ही समारोहों में एक दिन बड़े पर्दे पर फिल्म भी दिखाई जाती। हम किशोर, भले दूसरे आयोजनों में न जांय, फिल्म देखने जरूर जाते।  


उस दिन आंग्रे के बाड़े में शाम को एक फ़िल्म दिखलाई जाने वाली थी। उन दिनों जब टीवी नहीं थी, हम किशोरों के लिए यह एक बहुत बड़ा आयोजन था। वह कौन सी फ़िल्म थी, याद नहीं लेकिन फ़िल्म थी, यही बहुत था। सभी मित्र फिल्म देखने के लिए जमा हुए थे और घरों से भी गणेशजी के नाम पर समारोह में जाने की पूरी छूट थी। 


फिल्म रात 12 बजे के आसपास समाप्त हुई और हम शोर करते हुए घर जाने के लिए बाहर चबूतरे पर जमा हुए। तभी मैने मौका ताड़ा और घोषणा कर दी, "हम पीपल के पेड़ से घण्ट उतारने जा रहे हैं, तुम लोग यहीं बैठो, 5 मिनट में आ रहे हैं।" सभी मित्र अवाक हो, मेरा चेहरा देखने लगे! और चीखने लगे,"पागल हो गए हो क्या? पीपल के पेड़ पर भूत रहते हैं।" मैने हँसते हुए कहा, "कोई भूत नहीं रहता, चिंता मत करो, अभी आ रहे हैं।"


हम दौड़ते हुए घाट की सीढ़ियाँ उतर गए। पीपल के पेंड़ के पास पहुँचकर, ठिठक कर खड़े हो गए। घट तो बहुत ऊँचाई पर हैं, कैसे उतारें? सोचते-सोचते कोई उपाय नजर नहीं आया। घट वाकई मेरी ऊँचाई से बहुत ऊपर थे! आस पास कोई नहीं था, जो मदद करे। कोई होता भी तो ऐसे कामों में क्यों मदद करता? मारकर भगा देता। तभी नीचे जड़ों के पास एक खाली घड़ा दिखाई दिया! मुझे मन माँगी मुराद मिल गई। घड़ा उठाया और भाग कर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। चबूतरे के पास पहुँचे तो यह क्या! मेरे सभी मित्र कहाँ गए? मैं घड़ा वहीं चबूतरे पर रखकर आवाज जोर-जोर से आवाजें लगाने लगा, "कहाँ हो? देखो! घड़ा ले आए। कोई है?" हारकर वहीं चबूतरे पर बैठ गए। सोचने लगे, "सभी डरपोक हैं, चलो!  घड़ा घर ले चलते हैं, कल दिखाएंगे।" घड़ा उठाने के लिए ज्यों ही मुड़े, वहाँ कोई घड़ा नहीं था! डर के मारे मेरी घिघ्घी बंध गई। अरे! यहीं तो रक्खा था, घड़ा कहाँ गया?



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14.5.22

इत्र की शीशियाँ

वर्षों पहले की बात है। तब टीवी, मोबाइल नहीं था, भारत को आजाद हुए दो दशक ही बीते थे। चेतगंज में घर था, कोई रिक्शा नहीं मिला तो हम दो भाई बनारस कैंट स्टेशन से इंग्लिशिया लाइन की तरफ पैदल ही जा रहे थे। रात के 11 बज चुके थे। खुशगवार बसन्त का मौसम था। रात होने के कारण सड़क पर भीड़ कम थी। चलते-चलते आगे दूसरी पटरी पर एक पुलिया दिखी। पुलिया पर एक आदमी झक्क सुफेद कुर्ता पैजामा पहने हुए बैठा था। सर पर सुफेद टोपी, पांवों में नक्काशीदार चप्पल। उसने हमे जाते हुए देखा तो इशारे से अपनी ओर बुलाया...


इतनी रात को कहाँ जा रहे हो? 

घर जा रहे हैं। 

पैदल क्यों जा रहे हो?

क्या करते, कोई रिक्शा ही नहीं मिला?

रिक्शा तुम्हारे पीछे ही तो खड़ा है! जाओ, बैठ जाओ।

हम लोग अवाक हो कर देखने लगे, एक रिक्शा पीछे ही खड़ा था और बैठने का इशारा भी कर रहा था!

हम पलटकर रिक्शे पर बैठने जाने लगे तो उस आदमी ने कहा..

सुनो! तुम्हारी जेब में इत्र की शीशियाँ हैं, निकालो, लगाया जाय।

हम दोनो आश्चर्य से एक दूसरे का मुँह देखने लगे! इसे कैसे पता चला कि हमारे पास इत्र की शीशियाँ हैं? खैर...एक छोटी शीशी निकाली और उसे दे दिया। उसने बड़े प्रेम से अपने हाथ- मुँह में लगाया और खूब तारीफ करी। हम रिक्शे पर बैठकर पुलिया पर बैठे हुए आदमी को देखने लगे तो आदमी गायब! अब उसी आदमी के बारे में सोचने लगे। दिमाग में यही प्रश्न गूंज रहा था...वह आदमी कहाँ गया? उसे कैसे पता चला कि जेब में इत्र  की शीशियाँ हैं? इतने में रिक्शा चेतगंज आ गया।


रात के 12 बज रहे थे। रिक्शे से उतरने के बाद रिक्शेवाले को देने के लिए फुटकर पैसे नहीं थे तो सोचा एक बीड़ा पान जमाया जाय, फुटकर भी हो जाएगा। वहीं एक पान की दुकान खुली थी। हम दोनों ने एक-एक बीड़ा पान जमाया और रिक्शेवाले को पैसा देने के लिए पलटे तो देखते क्या हैं कि रिक्शावाला गायब! दूर-दूर तक देखे तो रिक्शेवाला कहीं नजर नहीं आया।


हम आश्चर्य करते हुए घर जाने के लिए गली में मुड़े तो अँधरे में एक चबूतरे पर सुफेद कुर्ते-पैजामे वाला वही आदमी बैठा हुआ था। हमें देखते ही चहका..अमा यार! बड़ी जल्दी आ गए!!! तुम्हारे जेब में तो इत्र की और भी शीशियाँ हैं, एक और देना जरा। हम स्तब्ध हो उसे देखने लगे, उसके बगल में एक सफेद घोड़ा भी खड़ा था।

.................

7.5.22

हाथ

 एक दिन दाएं हाथ ने चुपके से एक मुसीबत के मारे की मदद कर दी। बाएं हाथ को पता चल गया लेकिन कुछ न बोला। एक दिन बाएं हाथ ने भी एक मुसीबत के मारे की मदद कर दी। दाएं को भी पता चल गया लेकिन कुछ न बोला। दुर्भाग्य से दोनो हाथों का मालिक मुसीबत में पड़ गया। उसने ईश्वर से प्रार्थना करी... हे प्रभु! मुझे ठीक कर दो। ईश्वर ने उसकी पुकार झट से सुन ली। उसने दोनो हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया। इस बार दोनो हाथ एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।

......

15.4.22

सोचो तो....


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और साफ थीं गङ्गा जी

पोतते थे जिस्म में मिट्टी, तैरते थे घण्टों और

भूख लगने पर 

खा लेते थे 

ककड़ी, हिरमाना, खरबूजा,

प्यास लगने पर

डुबकी मार के

पी लेते थे

पेट भर पानी।


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और बोतल का पानी नहीं था

गली के चबूतरे पर बैठा होता था प्याऊ,

घर-घर में होता था कुआँ,

गली-गली में

सरकारी नल या चापाकल।


वे दिन भी क्या दिन थे!

हम थे, तुम थे और कोरोना नहीं था।

न मुख मास्क का झंझट न सेनेटाइजेशन की चिंता

चाट लेते थे, एक दूसरे की

जूठी आइसक्रीम भी।


सोचो तो..

अचानक से नहीं आया कोरोना

पहले मैली हुईं नदियाँ,

सूख गए तालाब और कुएँ,

बोतल में बिकने लगा पानी और तब आया

कोरोना।


सोचो तो..

क्या-क्या देखेंगे आगे

अगर बचे रह गए 

हम तुम।

...........@देवेन्द्र पाण्डेय।

12.2.22

प्रेम


अँधेरी राह में

घने वृक्षों के तले

अक्षर दिखे

गुच्छ के गुच्छ!


जुगनुओं की तरह

आपस में टकराते,

बिखर जाते।


तेजी से

बन/बिगड़ रहे थे

शब्द

हो रहा था

चमत्कार!


कठिन तपस्या के बाद

बस एक शब्द समझ पाया..

प्रेम!


मुग्ध हो

खोया रहा 

रात भर

हाय!

मुँह से

बोल ही नहीं फूटे।


चाहता था, चीखना...

देखो!

प्रेम मरा नहीं है,

अँधेरे में

जुगनुओं की तरह

आज भी

टिमटिमा रहा है।

....................

10.2.22

बनारस की गलियाँ-12


बनारस की गलियों में तरह-तरह की शैतानियाँ देखने को मिलती थीं। एक गली के चबूतरे पर प्रौढ़ सरदार 'भइयो' बैठता था। जिस घर से सटा यह चबूतरा था उस घर में एक लड़का रहता था। लड़का थोड़ा हचक कर चलता था इसलिए लोग उसे लंगड़ कहते थे। लड़के का नाम शंकर था। उसकी दो बहनें थीं...एक सांवली और एक गोरी। उसके पिता जी काम तो बनिया का करते थे लेकिन चंदन-मंदन लगा कर खूब भक्ति भाव से रहते थे। भइयो, चबूतरे पर बैठ कर दिन के समय बड़े तरन्नुम में एक गीत गाता था...


काली माई करिया

भवानी माई गोर

शिव बाबा लंगड़

पुजारी बाबा चोर।


कहना न होगा कि उसका गाया यह गीत उनके परिवार को ज़हर की तरह चुभता। इसके कारण आये दिन झगड़ा होता रहता। शंकर चीखता..


ई का गात हउआ? तोहें शरम नाहीं लगत? 

सरदार कहता.."काहे? हम तोहे तs कुछो नाहीं कहली..! हम त भजन गात हई।"


मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि इस गाने का कोई दूसरा भी अर्थ भी हो सकता है!

................