19.7.22

साइकिल की सवारी

दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल चलाने पर प्रतिबंध ही नहीं लगा मेरी मोटरसाइकिल श्रीमती जी द्वारा बेच भी दी गई। मैं दुखी होकर मोटरसाइकिल को जाते हुए देखता रह गया। अब घर से 5 किमी के दायरे में जाने के लिए भी 'पैदल' हो गया। कुछ ही विकल्प थे..पैदल चलो, कार के लिए ड्राइवर बुलाओ या रिजर्व गाड़ी बुलाओ। 3,4 किमी के लिए यह महंगा सौदा था। तभी तय किया कि सायकिल खरीदी जाय। दूर भीड़ वाली सड़क पर न ले जाने के आश्वासन के साथ मुश्किल से साइकिल खरीदने की अनुमति मिली और मैं रोज एक महीने से भोर में सायकिल लेकर निकलने लगा। 


घर से सारनाथ पार्क लगभग 3 किमी की दूरी पर है। भोर में 5 बजे सायकिल लेकर पार्क में जाना, सायकिल खड़ी कर एक घण्टे पार्क में घूमना, साइकिल लेकर चाय पीते, फल/दही खरीदते हुए, आराम-आराम से वापस आना, नहाकर नाश्ते के बाद 7.30 तक ऑफिस जाने के लिए घर छोड़ देना, 1.30 घण्टे बस के सफर में फेसबुक चलाना, 9.30तक ऑफिस पहुँच जाना, दिनचर्या बन गई। 


सन्डे(छुट्टी के दिन) दिनचर्या बदल जाती है। जिस दिन ऑफिस नहीं जाना होता, मन बहक जाता है। आज सन्डे था, सायकिल पर बैठते ही मन उड़ने लगा। लगभग 1 घण्टे, गांव के रास्ते साइकिल चलाकर पहुँच गया खिड़किया_घाट। खिड़किया घाट अब नमो_घाट के रूप में विकसित, बनारस के बेहतरीन घाटों में से एक, भव्य घाट बन चुका है। सड़क मार्ग, जल मार्ग और रेलमार्ग से जुड़ा यह घाट बनारस का सबसे खूबसूरत घाट है। इस घाट के बगल में खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं। राजघाट के पुल के अलावा सन्त रविदास का भव्य मंदिर है, लाल खान का मकबरा है, वरुणा और गंगा का संगम तट, आदिकेशव घाट है और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध बसन्त कॉलेज है। बसंत कॉलेज से आदिकेशव घाट जाने का, हराभरा रमणीक मार्ग है और मार्ग में मिलता है एक जिंदा कुँआ जिसका पानी आज भी बहुत मीठा है।


सारनाथ से आदिकेशव घाट, बसन्त कॉलेज होते हुए राजघाट जाने के मार्ग में और भी बहुत कुछ है।  पँचकोशी परिक्रमा के भीतर स्थित कपिलधारा है, सूर्यदेव_का_मंदिर है, सुंदर तालाब, हनुमानजी, शनि देव और शंकर जी का मंदिर है जिनके चित्र मैं अपने पेज चित्रों का आनंद  में दिखाता रहता हूँ। मार्ग में एक श्मशान घाट और निषाद राज का द्वार भी मिलता है।

 

आज बसन्त कॉलेज के कुएँ (#अमृत_कुण्ड) का पानी पीकर लौटते समय एक पुलिया दिखी। पुलिया में 4 स्थानीय ग्रामीण बैठे हुए हवा खा रहे थे और गप्पें लड़ा रहे थे। उन चारों में नेपाली टोपी पहने बहादुर भी दिखे जो बायीं हथेली पर रखी सुर्ती दाएं हाथ के अंगूठे से रगड़ रहे थे। हम भी थके थे तो वहीं साइकिल खड़ी कर उनसे गप्पें लड़ाने लगे। उन्होंने तीन गांव का नाम लिया और हाथ के इशारे से बताया यह गांव इधर, वह  गाँव उधर और हम जहाँ बैठे हैं, उस गाँव का नाम यह है। गाँव के नाम में क्या रख्खा है, हम भूल गए और याद कर लिख भी दें तो आप कौन सा ज्ञान में वृद्धि कर लेंगे! 


पुलिया में बैठकर, ग्रामीणों से बात कर, बहुत आनन्द आया। मुझे पुलिया वाले श्रीमान कानपुर के अनूप शुक्ल  जी की बहुत याद आई फिर याद आया, वे तो अभी अकेले कश्मीर घूम रहे हैं! अपने दौड़ गुरु श्रीमान Satish Saxena  जी की भी याद आई जो अभी जर्मनी में श्रीमान Raj Bhatia  जी के गाँव में घूम रहे हैं। हम पुलिया पर बैठकर यही सब सोच रहे थे कि नेपाली बहादुर ने खैनी मेरी ओर बढ़ाते हुए पूछा, आप भी लेंगे? दूसरा समय होता तो खुशी-खुशी झट से ले लेता मगर इनकार करते हुए बहादुर को धन्यवाद दिया। ग्रामीणों ने सुर्ती न खाने के लिए जब मेरी बहुत प्रशंसा करी और अपनी आलोचना करी कि सुर्ती खाना गलत बात है लेकिन आदत पड़ गई, क्या करें! तो मुझे अपने न्यूरो डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया जिसने मुझे दवाई चलने तक नशा करने से मना किया हुआ है।


बहुत देर बैठने, गप्पें लड़ाने के बाद जब धूप तेज होने लगी तो मैं पुलिया से उतरा और सबसे विदा लेकर घर की ओर चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, काशी सिर्फ अस्सी घाट, संकटमोचन, BHU, गोदौलिया, बाबा विश्वनाथ जी का दरबार या गलियों की चाय-पान की अड़ी ही नहीं है, काशी में बहुत कुछ है जिसे काशीवासी भी एक जीवन मे पूरा नहीं देख पाते।

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