15.7.24

कर्जा वसूली

श्रीमती गिरिजा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित कहानी संग्रह 'कर्जा वसूली' पढ़ने का सौभाग्य मिला। पुस्तक में कुल 13 कहानियाँ हैं। यह कहानी क्या है, शब्द चित्र हैं। प्रत्येक कहानी में समाज के एक अलग ही दृश्य को हू-ब-हू उकेरा गया है। पढ़ते समय पाठक इसी शब्द चित्र में उलझ कर रहा जाता है और जब कहानी खत्म होती है, उसका दिल धक से कहता है, अरे!कहानी खत्म हो गई!!!

पहली कहानी 'अपने-अपने करावास' में दो प्रेमी दो दशकों बाद मिलकर, एक दूसरे को देखते-मिलते हुए भी अपनी-अपनी जिंदगी की समस्याओं में इतने उलझे रहते हैं कि चाहकर भी एक नहीं हो पाते। दो दशकों की यादों को साझा करते हुए, मिलने की उम्मीद पाले हुए दो प्रेमी अपनी हमेशा समस्याओं से घिरे रहते हैं। दोनो अपने-अपने कारावास में कैद हो चुके हैं, जिससे निकलना संभव नहीं है। पाठक उम्मीद पाले रहता है और कहानी खत्म हो जाती है।

दूसरी कहानी 'साहब के यहाँ तो...' शिक्षा व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है। इसमें दिखाया गया है कि चपरासी पद पर नियुक्त 'इमरती' वेतन तो स्कूल से पाती है लेकिन अधिक समय मंत्री जी के घर का काम करने में बिताती है और स्कूल में रोब से रहती है, सभी उससे जलते हैं। एक दिन इमरती अपना दर्द बयान करती है कि कैसे वह दो जगह पिसाती रहती है! उसका यह रोब तो सिर्फ दिखाने के लिए है। नौकरी बचाने के लिए उसे कितना परिश्रम करना पड़ता है!

कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी 'कर्जा वसूली' में गांव के ऋणदाता बलिराम जी गांव के ही रामनाथ को कर्ज दिए रहते हैं। अपने दिए कर्ज की वसूली के लिए गांव में ही सबके मजाक का पात्र बनते हैं। बलिराम जी निर्दयी भी नहीं है, रामनाथ की हर आद्र पुकार पर पसीज जाते हैं। कई फसल कट जाती है, कर्ज में दिया धन नहीं मिलता। गांव वाले उनका मजाक उड़ाते रहते हैं अंत में हार कर वसूली के लिए कठोर कदम उठाते हैं। रामनाथ की भैंस उठा लेते हैं लेकिन उनसे रामनाथ की पत्नी दुलारी का विलाप सहन नहीं होता और भैंस को वापस ले जाने का आदेश देते हैं। कहानी का शब्द चित्र इतना समृद्ध है कि बार-बार पंक्ति दोहराने का मन करता है।

चौथी कहानी 'उर्मि नई तो नहीं है घर में' एक मध्यम वर्गीय मास्टर साहब के पारिवारिक जीवन का ऐसा शब्द चित्र है जो बड़ा सजीव लगता है। दोनों पति-पत्नी के मनोभावों का ऐसा मार्मिक शब्द चित्र है कि लगता है हम भी उन्हीं में से एक हैं।

अगली कहानी 'शपथ पत्र' भी शिक्षा विभाग पर बढ़िया व्यंग्य है। जिसमें बताया गया है कि कैसे एक कर्मचारी अपने जी.पी.एफ फंड से अग्रिम लेने के लिए कितना कुछ सहता है।

'पहली रचना' भी सभी मध्यम वर्गीय परिवारों में बच्चों के परिवेश के समय होने वाली आम घटना है मगर गिरिजा जी ने इतने प्रेम से इसको गूंथा है कि पढ़ कर दिल में हूक-सी उठती है और पाठक कुछ देर मौन रहकर खयालों में खो जाता है।

कहानी 'उसके लायक' तो मन बढ़ किशोरों के मुँह में करारा तमाचा है। इसे पढ़कर शायद ही कोई लड़का अपने साथ पढ़ रही किसी बदसूरत लड़की का मजाक उड़ा पाएगा।

'एक मौत का विश्लेषण' एक लम्बी कहानी है। पिता के सामने युवा पुत्र की अधिक शराब पीने के कारण लीवर खराब हो जाने से मौत हो जाती है। जब तक पूरा समाज अपने-अपने ढंग से मौत का विश्लेषण करता है, कहानी सामान्य लगती है। लेखिका ने इस कहानी में आगे एक मोड़ दिया, उन्होंने मृतक की आत्मा से मौत के कारणों का विश्लेषण करवाया! इस विश्लेषण में मृतक ने खुद को ही दोषी ठहराया है लेकिन वास्तव में मौत के लिए उसके पिता का झूठा अहंकार और गलत परवरिश जिम्मेदार है।  

अगली कहानी 'नामुराद' पढ़कर नारी पीड़ा की गहरी अनुभूति होती है। अभी दशकों पहले तक गरीब मध्यम वर्ग के आम घरों में नारी का कितना शोषण होता था! हमको यह शोषण तो नहीं दिखा, अपने आस पास हल्का-हल्का महसूस जरूर किया है। पुरुष होने का दम्भ कुछ अपने भीतर भी था, जिसने कभी इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाई, नजरअंदाज किया!  पति की जूठी थाली में भोजन करना, कितने सम्मान की बात समझी जाती थी! पत्नी के मन में कितनी वितृष्णा उपजती थी!!! कहानी पढ़कर इसका एहसास होता है।

शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलती, मूल्यांकन प्रक्रिया की धज्जी उड़ाती कहानी है 'ब्लण्डर मिस्टेक'। एक ईमानदार शिक्षक, चमचों और मूल्यांकन के समय पैसा बनाने वालों, जो इस भाव से कॉपी जाँचते हैं कि  "ये तो आँधी के आम हैं' भैया! जितने बटोर सको बटोर लो" के बीच शिक्षा अधिकारियों के समर्थन से कैसे पिसाता है और शर्मिंदगी महसूस करता है, का सटीक विश्लेषण पेश करती है।

'व्यर्थ ही..' छोटी मगर दिल को छू लेने वाली इस सामाजिक कहानी में गरीब घर की बहू और धनी घर की बहू में क्या फर्क होता है, बखूबी समझाया गया है।

'पियक्कड़' गाँव से शहर कमाने आए एक गरीब की कहानी है जो शराबी बन जाता है और गली के गुंडे उसकी पत्नी और बेटी को अपने अनुसार चलाते हैं। उसकी चीख भी एक 'पियक्कड़' की चीख समझ गली वाले नजरअंदाज कर देते हैं।

कहानी संग्रह की अंतिम कहानी है 'बन्द दरवाजा'। यह छोटे कस्बे से 'बैंगलोर' जैसे बड़े शहर में आई एक माँ की कहानी है जो इंजिनियर बेटा और बहू के पास आईं हैं। बच्चे बहुत प्यार करते हैं लेकिन 5 दिन की व्यस्तताओं के बीच साथ रहने के लिए सप्ताह में 2 दिन का ही समय मिलता है। 5 दिन फ्लैट के घर /बरामदे में रहकर माँ पड़ोसियों के बन्द दरवाजों को देखती और अपने समय को याद करती रहती हैं। कहानी बदलती सामाजिक व्यस्था और बड़े शहर की संस्कृति का बखूबी विश्लेषण करती है।

यह कहानी संग्रह 'गिरिजा जी' ने अपने 2 दिनों के वाराणसी ठहराव के समय 'ऋता' जी के साथ सारनाथ घूमते समय मुझे संप्रेम भेंट दिया था और लगभग एक वर्षों से यह मेरे अलमारी में बन्द पड़ी थी। कल शाम से इसे पढ़ना शुरू किया और आज खतम किया।  गिरिजा दी, पुस्तक भेंटकर भूल भी चुकी होंगी। 

इन कहानियों को पढ़कर एक बात समझ में नहीं आई कि एक व्यक्ति कैसे समाज के इतने रिश्तों की, इतनी खूबी से पड़ताल कर सकता है जैसे वह ही इन 

कहानियों का एक पात्र हो! खुद पीड़ा का अनुभव किए बिना कोई कैसे दूसरे के दर्द को जी सकता है!!! 

इस संग्रह की एक खास बात और लगी कि प्रत्येक कहानी के एक-एक शब्द, एक-एक वाक्य एकदम नपे तुले हैं, न एक कम न एक ज्यादा। मुझे इस कहानी संग्रह को पढ़ाने के लिए गिरिजा दी का बहुत आभार।🙏


हरदौल

श्री वंदना अवस्थी दुबे  जी का उपन्यास हरदौल कल एक बैठकी में पढ़कर खतम किया! वर्षों बाद ऐसा हुआ कि मैने कोई किताब पहले की तरह एक बार में पूरा पढ़ा। यह उपन्यास की शक्ति ही थी जिसने मुझे प्रोत्साहित किया कि अभी मैं पहले की तरह किताबें पढ़ने में समर्थ हूँ। 

एक स्त्री सुजाता, बाबा के मुख से रोज कहानी सुनती है। दोनो सूत्रधार की भूमिका में हैं। ओरछा के ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि में लिखी उपन्यास की कहानी इतनी रोचक है कि सुजाता और बाबा का संवाद भी भारी लगने लगते है, अपना मन भी कहने लगता है, "बाबा! जल्दी से आगे की कहानी सुनाओ, हरदौल का क्या हुआ?" कहानी जब चरमोत्कर्ष पर पहुँचती है, षड्यंत्र, हत्या की साजिश चल रही होती है, उसी बीच हरदौल के विवाह प्रसंग का वर्णन भी भारी लगने लगता है, मन करता है पृष्ठ पलटें, जाने की हरदौल का क्या हुआ?

इस उपन्यास के लिए वंदना जी को बहुत बधाई। जब भी बुंदेलखंड के इस लोक नायक का जिक्र होगा, इस कृति के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा। मेरा विश्वास है कि यदि आपको भी यह पुस्तक मिल जाय तो आप भी इसे एक बार में ही पूरा पढ़कर खतम करेंगे।


11.7.24

साइकिल की सवारी (10)

आज बहुत दिनों के बाद लगभग 20 किमी साइकिल की सवारी हुई। भोर में 5 बजे घर छोड़ने से पहले मोबाइल में Chandan Tiwari  का यूटूब चैनल चला दिया। 'डिम डिम डमरू बजावेला जोगिया' सुनते हुए आगे बढ़ा। एक खतम होता, दूसरा बजने लगता, बीच-बीच में प्रचार भी आता रहा, साइकिल चलती रही। सारनाथ से पंचकोशी चौराहे से जब साइकिल सलारपुर की तरफ मुड़ी तो आशंका थी, क्रांसिंग बन्द होगी लेकिन खुली थी। सलारपुर, खालिसपुर से आगे साइकिल जब कपिल धारा से आगे बढ़ी तो खुला-खुला, खुशनुमा वातावरण था। सूर्यमन्दिर के दरवाजे खुले थे, शनि देव पीपल के नीचे एकदम खाली बैठे थे। ध्यान आया, आज मंगलवार है, हनुमान जी व्यस्त होंगे। शनिवार होता तो भक्त शनिदेव में दिए जला रहे होते, आज हनुमान मन्दिर गए होंगे।

बिना रुके चलता रहा। पुलिया को देखा, एक अजनबी वृद्ध बैठे आराम कर रहे थे। बगल में लंगोटी वाले पीर बाबा (बरगद का विशाल वृक्ष है, भक्तों की मान्यता है कि यहाँ पीर बाबा का वास है, यहाँ भक्त लंगोटी चढ़ाते हैं।) में दो नई लाल लंगोटियाँ चढ़ी हुई थीं। सर झुकाते हुए आगे बढ़े, साइकिल रोकने का प्रश्न नहीं था, गंगा किनारे नमो घाट पर भजन मित्र मंडली का भजन 6 बजे शुरू हो जाता है। घर से बिना रुके पहुँचने में लगभग एक घण्टे लग जाते हैं, लगभग 10 किमी का सफर है।

कोटवा, मोहन सराय, तथागत भूमि से होते हुए वरुणा गंगा के संगम तट पर बने पुल को पार करते हुए, बसंत महाविद्यालय की सड़कों पर चले तो बहुत से अपरिचित मॉर्निग वॉकर तेज चलते हुए या दौड़ते हुए दिखे। रास्ते में अमृत कुण्ड के जगत पर कुछ प्राणी प्रेमी, कौवों, कुत्तों, गायों को नमकीन, बिस्कुट, गुड़ खिलाते हुए दिखे। इन सबके दर्शन करते हुए जब अपनी साइकिल नमो घाट के गोवर्धन मन्दिर पर खड़ी हुई तो 6 बजने में 5 मिनट शेष थे।

नव निर्मित नमोघाट एक विशाल, खूबसूरत घाट है। यहाँ सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। अच्छी पार्किंग, सी एन जी गैस भराने की व्यवस्था, हाथ का सकल्पचर, गोवर्धन मन्दिर, क्रीड़ा क्षेत्र, विशाल हैलिपैड और 2,3 किमी में फैला सुंदर, चौड़ा मार्ग। यहाँ आसपास के लोग प्रातः भ्रमण के लिए रोज आते हैं। आगे वरुणा-गंगा संगम तट पर स्थित प्रसिद्ध आदिकेशव घाट तक जाने का मार्ग है। लगभग 50 मीटर का मार्ग निर्माणाधीन है, शेष बन चुका है। यहाँ एक तरफ भजन मंडली भजन प्रारम्भ करने की तैयारी कर रही थी और हम पसीना पोंछते हुए, समय से पहुँच गए।

सबके साथ बैठकर, ताली बजाते हुए, लगभग 30 मिनट सीताराम-सीताराम... का गायन हुआ, लौटते समय आराम-आराम से जगह-जगह रुकते हुए लौटे । कुएँ का पानी पिये, पीर बाबा की पुलिया पर कुछ समय बैठ कर आराम किया, पंचकोशी चौराहे से ताजे फल खरीदते हुए घर पहुँचे हैं तो शरीर में 12 और घड़ी में लगभग 8 बज चुके थे।

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https://youtu.be/U-MToJ1lJ64?si=YrkS3-B4vBaeKIbp





O9 जुलाई 2024

18.6.24

कोरोना काल (2)

एकाकी जीवन 

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एकाकी जीवन की शुरुआत जुलाई 2020 से हुई। जौनपुर में अलग कमरा लेकर रहने लगा। बिस्तर तो मेरे पास था ही, कमरे में चौकी, पंखा पहले से था। 2-4 दिन रिस्क लेकर होटल में खाना खाया फिर धीरे-धीरे किचन के लिए सब आवश्यक सामान खरीद लिया। गैस सिलेंडर एक सहयोगी कर्मचारी ने उपलब्ध करा दिया। खाना पकाने का थोड़ा बहुत अनुभव तो पहले से था, जब फंसता तो फेसबुक में पोस्ट डाल देता जैसे...भुजिया/सब्जी बनाते समय करेला छिलना चाहिए कि नहीं? कोरोना काल में मित्र मानो खाली ही बैठे होते, कमेंट से कई सलाह दे देते। 

एक दिन सुबह चाय बनाने के लिए एक दिन पहले शाम का रखा एक पाव दूध उबाला तो फट गया! बहुत देर तक फटे दूध को उबलते देखता रहा फिर उसमें थोड़ा गुड़ झोंक दिया। चम्मच से तब तक हिलाता रहा जब तक लाल पेड़ा नहीं बन गया। रात की दो बासी रोटियाँ के साथ गुड़ पनीर को लपेट कर खा गया। मान लेता, यह मोदी जी की सलाह पर आफत को अवसर में बदलना हुआ।

एक कमरा, एक किचन, एक बरामदा, लैट्रिन, बाथरूम और थोड़ी खाली जगह बस इतनी ही जगह थी। शाम को छत में घूम सकते थे। मेरे कमरे में बहुत शांति रहती थी। इतनी शांति साधारण मनुष्यों के लिए दुर्लभ थी। ध्वनिप्रदूषण फैलाने वाले जड़/चेतन दोनो प्रकार के यंत्र नहीं थे। मित्र सलाह देते हैं, "बीबी नहीं ला सकते लेकिन टी.वी. तो ला सकते हो? 5, 7 हजार में मिल जाएगी।"

हम सोचते, सीरियल देखना नहीं है, समाचार चैनलों के निर्धारित कार्यक्रमों को सुनने और प्रचार देखने के लिए काहे अपना पैसा खर्च करें? 

इन चैनलों के मालिक, व्यापारियों को या राजनैतिक दलों को चाहिए कि आम जनता को मुफ्त में घर-घर टीवी बांटें और अनुरोध करें कि हमने आपको टी.वी. सप्रेम भेंट किया है तो कृपया मेरा वाला समाचार चैनल जरूर देखिए! 

दूसरा कहे...अच्छा! आपके घर टी.वी. लगाने में फलाने चैनल ने बाजी मारी तो क्या, हम आपको टाटा स्काई या डिश टी.वी. का एक साल का नेटवर्क मुफ्त भेंट करते हैं। आधे समय हमारा वाला चैनल देखिएगा! 

कोई दूसरा चैनल वाला झण्डू बाम या विक्स वेपोरब इस अनुरोध के साथ दे जाय कि हमारे चैनल में शाम को "खास टाइम" या "दंगल" देखने से जो सर दर्द हो जाय तो इसका इस्तेमाल करें!

इन चैनलों को विज्ञापन देने वाले व्यापारियों को भी चाहिए कि विज्ञापन के साथ कुछ पैकेट आम जनता को भी वितरित करें।

मतलब हम पैसा खर्च कर के टी.वी. लाएं, हम नेटवर्क की फीस भरें और देखें क्या, आपका एजेंडा? क्यों भाई, कब तक मूरख बनाओगे? 

बहुत शांति रहती थी कमरे में। पड़ोस में भी शांति थी। लगता था पड़ोसी भी समाचार नहीं देखते। भले चैनल हर समय समाचार दिखाता रहता हो। सुबह काम पर जाने वाले या स्कूल जाने वाले बच्चों के माता पिता, कितनी रात तक समाचार देखेंगे?  बहुत शांति थी पास पड़ोस में भी। सीलिंग फैन की आवाज भी न आती तो पता ही नहीं चलता कि हम धरती के प्राणी हैं!

एक बार एक अधिकारी और दो कर्मचारी के कोरोना पॉजिटिव होने के कारण ऑफिस लॉक हो गया।  समय मिला तो मन मचला। बैगन, टमाटर, आलू भूनकर चोखा बनाने का मन किया। गैस चूल्हे पर रखकर भूनने वाली जाली खरीदने बाजार चले गए। जाली के साथ, एक लोहे की छोटी वाली कड़ाही भी खरीद लिए। सोचा, बारिश हुई और पकौड़ी खाने का मन किया तो फिर कड़ाही के लिए दुबारा आना होगा। 

बरतन बेचने वाली एक महिला थीं। मैने पूछा बैगन, टमाटर तो जाली में रखकर भून लेंगे लेकिन आलू कैसे भूनेंगे? उसने बढ़िया आइडिया दिया, "आलू तो बिना पानी डाले कूकर में पका सकते हैं! आलू को बिना छिले धो कर दो फाँक कर लीजिए और एक चम्मच तेल कूकर में डालकर, उस पर आलू रखकर चढ़ा दीजिए। एक सीटी में आलू पक जाएगा।"

कमरे में आकर दिन में बनारसी अंदाज में बैगन, टमाटर भूनकर, हरी मिर्च, प्याज और कच्चे सरसों के तेल के साथ खूब स्वादिष्ट चोखा बनाया। अरहर की गाढ़ी दाल को देशी घी, जीरा से छौंक दिए। दाल, चावल और चोखा। वाह! उस दिन का लंच लाजवाब था ।

एक दिन शाम को बारिश तो नहीं हुई लेकिन एक मित्र तिवारी जी आ गए।  किचन में रखी, नवकी छोटकी कड़ाही बुलाने लगी। तिवारी जी आधा प्याज और एक बैगन काटकर, दो साबूत हरी मिर्च थाल में सजा दिए। इधर बेसन घुला, उधर कड़ाही चढ़ी आँच पर। वाह! मजा आ गया। खूब स्वादिष्ट पकौड़ी और चाय। हम भी मस्त, तिवारी जी भी खुश।

बेसन ज्यादा घुल गया था तो अंत मे उसे भी कड़ाही में उड़ेल कर पका दिए। रात में बेसन की सब्जी बन कर तैयार हो गई। लेकिन अब न भूख लग रही थी न रोटी बनाने का मन ही हो रहा था। किचन को शुभरात्रि बोला और सो गया। भूख लगेगी तब देखा जाएगा। 

जिस वक्त शाम को हम मोबाइल चार्जिंग में लगाकर खाना पका रहे होते, हमारे शुभचिंतक मित्र खाना पकने की प्रतीक्षा में खुद पक रहे होते। कोई काम तो रहता नहीं, फोन मिलाकर मेरा हाल चाल पूछने लगते थे! उनसे बतियाते हुए, खाना पकाने के चक्कर में सब्जी में कभी नमक ज्यादा हो जाता था, कभी मसाला जल जाता था। मोबाइल भी ठीक से चार्ज न हो पाए। फिर यह निश्चय किया कि खाना पकाते समय मोबाइल स्विच ऑफ रखना है। अब मोबाइल भी चार्ज हो जाती, खाना भी पक जाता। बुद्धि अनुभव से ही आती है। 

एक दिन सोच रहा था, दूध पी लूँ। दूध गाय का है या भैंस का मुझे नहीं पता था। इतना जानता था कि दूध प्लास्टिक के पैकेट में था और मैने दुकानदार से सिर्फ यह पूछा था.. दूध है? पैकेट किस कम्पनी का है, पैकेट के ऊपर क्या लिखा है, कुछ नहीं पढ़ा। फाड़ा, उबाला, उबल गया तो एक कप चाय बनाया और शेष ढक कर रख दिया था। रात के बारह बजा चाहते थे , सोच रहा था, दूध पी लूँ। फ्रिज नहीं था, सुबह तक फट जाएगा, पैसा बर्बाद हो जाएगा। सोच रहा था पलकें बन्द होने, नींद के आगोश में जाने से पहले दूध पी ही लूँ।  इतना आसान भी नहीं था दूध पीना। 5 घण्टे हो चुके थे, ठंडा हो चुका था, फिर उबालना नहीं पड़ेगा क्या? उबलने का इन्तजार करना फिर ठंडे होने का इन्तजार करना, बार-बार उबालने से जो बरतन जल जाता, उसे मांज कर रखना, सब आसान था क्या? जितनी आसानी से सोच लिया..दूध पी लो, उतना सरल था क्या? सरल तब लगता है जब श्रीमती जी रख देती हैं लाकर, टेबुल पर। अकेले घर में, दूध पीना आसान था क्या?

यू ट्यूब में पनीर और शिमला मिर्च की रेसिपी देखूँ या लाइव कविता सुनूँ? बड़ी समस्या थी। वहाँ कोई टोकने/रोकने वाला नहीं था। जितनी मर्जी फेसबुक चलाऊँ या फिर मिर्जापुर पार्ट 2 देखूँ या कोई पसंद की कोई किताब पढूं लेकिन जो आलू गोभी खरीद कर लाता उसे कच्चा तो खाया नहीं जा सकता था!

दिसम्बर का महीना था, कोरोना का आतंक कम हुआ था लेकिन अकेले रहने की आदत पड़ चुकी थी। एक दिन बाहर घना कोहरा था और सुबह से लोकल फाल्ट के कारण बिजली कटी हुई थी। पड़ोसी परेशान होकर सामने बरामदे में टहल रहा था। उसका परिवार बड़ा था और कई किराएदार थे। सुबह से बड़बड़ा रहा था ... भोर में पानी नहीं चलाए, पता नहीं बिजली कब आएगी! लेकिन हम मस्त थे। हमको सिर्फ एक बाल्टी पानी चाहिए थी । स्व0 नीरज याद आ रहे थे ....जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा!

एक दिन सोच रहा था, सभी खिड़कियाँ/दरवाजे बन्द होने पर भी कमरे में धूल कहाँ से आ जाते हैं? मेरे कमरे में जाले बुनने के लिए मकड़ियाँ कहाँ से आती है? सफाई न करूँ तो मेरे स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा? मटर के दाने चावल में और टमाटर दाल में डालकर पका दिया जाय तो सब्जी बनाने की क्या जरूरत है? सोच रहा था, आज इतना सोच लिया, शेष कल सोचेंगे। वास्तव में क्या होना चाहिए!

एकाकी जीवन के अनुभव ने एक ज्ञान दिया, "मन ठीक न हो तो खाना बेकार बनता है। दाल में नमक अधिक हो सकता है, सब्जी कच्ची रह सकती है, भात जल सकता है। इसलिए जब खाना खराब हो तो पत्नी पर नाराज होने के बजाय यह पता लगाने का प्रयास करो कि उसका मन दुखी क्यों हैं?"

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17.6.24

काव्यगोष्ठी (Udgar)

दिनांक 16 जून 2024 को udgar साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संस्था की 100 वीं काव्य गोष्ठी, स्याही प्रकाशन के कार्यालय में मनाई गई। 























https://gaongiraw.in/joyous-conclusion-of-the-100th-poetry-seminar-of-udgaar/ 

12.6.24

कोरोना काल (1)

कोरोना काल में हम रोज के यात्रियों का बनारस से जौनपुर जाना-आना असम्भव हो गया था। ट्रेने बंद हो चुकी थीं और बस भी कम ही चलती थी। कोरोना का इतना आतंक था कि मास्क और सेनिटाइजर के प्रयोग के बाद भी किसी कोरोना वाले के सम्पर्क में आ जाने का खतरा बना हुआ था। रोज के यात्रियों की संख्या 100 से अधिक ही थी। हर आदमी का जौनपुर में अलग-अलग फ्लैट लेकर रहना कठिन था लेकिन नौकरी तो करनी थी। न जौनपुर में इतने फ्लैट थे न सभी के लिए पूरे संसाधन जुटा कर अकेले रहना ही संभव था। परिणाम यह हुआ कि 5/7 की संख्या में अपने-अपने ग्रुप बनाकर लोगों ने जौनपुर में कमरा लेकर रहना शुरू किया।

हम पाँच मित्र(जिसमें सभी अधिकारी थे) को जल्दी ही एक महलनुमा घर की तीसरी मंजिल में एक बड़ा हॉल, एक बड़ा किचन, उचित दाम में किराए पर मिल गया। घर बहुत बड़ा था और जिस मंजिल में हम रहते थे, उसमें और दूसरा कोई परिवार न था। बरामदे में नहाओ, गलियारे में नाचो, छत में घूमो, कोई पूछने वाला न था। बिस्तर-चादर सब अपने-अपने घर से ले आए थे और किचन का सामान, बर्तन भी थोड़ा-थोड़ा सभी घर से ले आए थे। विकेंड में या किसी छुट्टी के एक दिन पहले हम मोटर साइकिल चला कर, कभी कार से जौनपुर-बनारस जाते-आते थे। कोरोना काल में उस समय हमे यह सबसे सुरक्षित लगा। मास्क, हेलमेट पहनने के बाद, सुनसान सड़क पर बाइक चलाना, संभावित कोरोना से बचने का सरल उपाय था। 

भोर में उठकर घूमने जाते, चाय पीने के बाद लौटकर बरामदे में मोटे पानी की धार से नहाते, मिलकर भोजन बनाते और ऑफिस जाते। ऑफिस से आने के बाद नहाना, चाय, तास और रोज एक पार्टी। शुक्र है कि कोरोना काल में बियर/शराब की दुकाने खुल गई थीं। सभी के घर वाले चिंतित रहते कि पता नहीं कैसे रहते होंगे, कैसे बनाते, खाते होंगे और हम रोज मौज उड़ा रहे थे जिसका ज्ञान घर वालों को न था। हमने एक बड़ी आपदा को अवसर में बदल दिया था। 

यह सब अधिक दिन नहीं चला। अति हर चीज की बुरी होती है। पार्टी सप्ताह/पंद्रह दिन में एक दिन ठीक होती है लेकिन यह रोज-रोज की पार्टी से मैं घबड़ाने लगा। मेरे पढ़ने, लिखने के शौक में यह बड़ी बाधा थी। रोज शाम को अकेले में मन कचोटता, यह क्या कर रहे हो? ऑफिस के पास एक कमरे का फ्लैट ढूंढने लगा। 2/3 महीने के भीतर ही मन मुताबिक एक फ्लैट मिल गया और मैं सबसे क्षमा मांगते हुए ग्रुप से अलग हो गया। धीरे-धीरे 'एकाकी जीवन' मुझे रास आने लगा।


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23.5.24

सुबह की बातें (15)

पार्क में, खूब ध्यान से देख रहा था पंछियो/हिरणों की मौज मस्ती। 

ठुमक-ठुमक कर मॉर्निंग वॉक कर रहा एक मोर, चलते-चलते दौड़ने लगा, दौड़ते -दौड़ते ठहर कर पँख फैला दिया और फिर बड़ी अदा से नृत्य करने लगा!

एक दूसरा मोर अनार के पौधों से लाँग जम्प करता हुआ आया और टहल रहे मोर से बतियाने लगा। 

दूर, लोहे के सलाखों से घिरे हिरण पार्क में मोरनियाँ मिट्टी से चुग रहे थीं अपना आहार।  

नीम की शाख में टांय-टांय कर रहे थे बहुत से तोते। कुछ डाल पकड़कर झूला झूल रहे थे, कुछ चोंच लड़ा रहे थे। 

एक कउआ उड़ता हुआ चोंच में एक तिनका दबाए हुए आया और बैठ गया हिरण की पीठ पर। उछलते-उछलते गरदन पर चढ़ गया और कान में तिनका घुसेड़ने लगा। हिरण घबड़ा कर दौड़ा और कउआ उड़ चला!

एक नीम के खोते में बैठा था उल्लूओं का जोड़ा, मैं जैसे-जैसे पास जाता, उनकी ऑंखें चौड़ी होती जाती! मैने सोचा, उजाले में उल्लू कहाँ देख पाते हैं और पास चलते हैं। पास जा कर फोटू खींचने लगा तो फुर्र से उड़ गए!!! 

कुछ तोते, कुछ कबूतर, कुछ हीरन कर रहे थे चहल कदमी। मुझे देख तेजी से भागने लगे मोर। तब तक कुछ और दो पाये भी आ गये थे पार्क में। देखते ही देखते मोर उड़ कर हो गए शालाखों के पार, वन विभाग की जमीन पर।

एक कोने में टप-टप टपक रही थी नल की टोंटी। चीख रही थीं, चरखी चिड़ियाँ। एक-एक कर उड़-उड़ बैठतीं टोंटी के ऊपर, लटकातीं गरदन और खोल देतीं अपनी चोंच। टप-टप टपकता पानी वरदान था उनके लिये। चौड़े मुँह वाले पात्र में, पास ही रखा था पानी। कूद-कूद भिंगोती पंख, फुर्र-फुर्र उड़तीं और फिर-फिर बैठतीं टपकते नल की टोंटी के ऊपर। 

अब मैं उनको सुनना चहता हूँ जिनकी बोली समझ में नहीं आती। अब मैं उनसे बतियाना चाहता हूँ जो मेरी बोली नहीं समझते। जिनकी बोली समझता हूँ, उनकी बोली इतनी मीठी नहीं लगती! 

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21.5.24

गरीबी

सुबह 7 से 9 के बीच कई लोकल ट्रेनें थीं जो लगभग एक घण्टे में पुणे पहुंचाती थीं। वैसे ही शाम 6 के आसपास एक इंटरसिटी, एक लोकल,  2 ट्रेनें थीं जो पुणे से लोनावला पहुंचाती थीं। वैसे तो पुणे और लोनावला के बीच इस रुट में कई ट्रेनें थीं मगर 'देव' को ऑफिस आने, जाने के लिए सही समय पर ये ट्रेनें ही मिलतीं। 

यह समय ऐसा होता जब लोकल ट्रेनों में बहुत भीड़ होती। एक तो सस्ता किराया दूसरे निर्धारित समय पर चलने के कारण रोज के सभी यात्री इन लोकल ट्रेनों में ही जाना पसंद करते थे। यह समय ऐसा होता था कि खंडाला घूमने आने वाले यात्री नहीं के बराबर होते। घूमने वाले सुबह आना और शाम को लौट जाना पसंद करते थे। रात को वे ही रुकते थे जो अगली सुबह पहाड़ों पर सूर्योदय का नजारा लेना चाहते थे।

बारिश में पहाड़ों से गिरते झरनों और जलप्रपात में मिलकर आगे नदी के रूप में मैदान में फैलने का दृश्य अत्यंत दिलकश होता। बांध के किनारे खड़े हो जल प्रपात देखना भी खूब आनंदित करता। कुछ युवक रील बनाने में मगन रहते। वे सब घूम कर, सभी प्रसिद्ध स्थान देख कर शाम को लौट जाते।

'देव' को सुबह में पुणे जाना होता और शाम तक लौट आना होता। खंडाला की पहाड़ियों के एक कच्चे रास्ते में छोटा सा लकड़ी और मिट्टी का बना, दो मंजिला दो कमरों का कच्चा घर था उसका। नीचे के तल के एक कमरे में काम वाली निर्धन बाई और दूसरे में घर के कबाड़ रहते। लकड़ी की सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाना पड़ता जिसके एक कमरे में माँ बेटे और दूसरे में चूल्हा बर्तन रहता। कमरे के बाहर लकड़ी का ही एक बरामदा था जहाँ बैठकर खाना, पढ़ना सब होता। घर के बाहर लगभग चारों तरफ मिलाकर लगभग 5 कट्ठा जमीन ही बची थी। घर में एक अकेली माँ रहती थीं। पिता की बचपन में ही मृत्यु हो चुकी थी, मां ने ही खेतों में सब्जी उगाकर, दूसरे घरों में काम करके किसी तरह देव को पढ़ाया था और अब देव पढ़ लिख कर एक प्राइवेट कम्पनी में काम करने लगा था। माँ चाहती थी कि देव की शादी किसी अच्छे घर में हो जाय और अब आराम मिले लेकिन शादी के नाम पर देव हमेशा मुकर जाता। उसने अभी कम्प्यूटर से इंजिनियरिंग किया था और उसे एम. बी. ए.कर के अच्छी नौकरी की तलाश थी। 

देव को हर मौसम परेशान करता। जाड़े में अधिक ठण्ड तो बारिश में घर चारों ओर से टपकने लगता। मिट्टी पोत कर बनी बेंत की दीवारों में वर्षा की बूदों से डरावनी आकृतियाँ उभर आतीं। घर के बाहर लकड़ी और जंगली घाँस से घिरा कच्चा शौचालय था। शादी की बात पर माँ बेटे में अक्सर बहस हो जाती। माँ चाहती थी कोई हाथ बंटाने वाली आ जाय और वह चाहता था पक्का घर बन जाय तभी शादी करें।  ऐसे में पत्नी को कहाँ रखेंगे? वह रोज घर से 10 किमी दूर साइकिल चलाकर रेलवे स्टेशन जाता और एक मित्र के घर साइकिल खड़ी कर, गाड़ी पकड़ता। 

लोकल ट्रेन में कभी बैठने के लिए सीट मिल जाती, कभी खड़े-खड़े ही पूरी यात्रा करनी पड़ती। पीठ में झोला लिए (जिसमें पानी और टिफिन रहता) दोनों हाथों से जंजीर पकड़ कर, आते-जाते परिचित हो गए साथियों से बतियाते हुए सफर करता। 

एक दिन लोकल ट्रेन में एक लड़की के बगल में उसे बैठने भर की सीट मिल गई! एक घंटे के सफर में दोनो में कोई बात नहीं हुई लेकिन एक दूसरे की फोन कॉल सुनकर इतना अंदाजा लग गया कि लड़की का नाम दिपाली है और वह एक प्राइवेट स्कूल में बच्चों को स्पोर्ट्स सिखाती है, मतलब एक गेम टीचर है। 

उस दिन के बाद यह अक्सर होने लगा कि दोनो की जब निगाहें आपस में टकराती, एक दूसरे को देखकर दोनो के मुखड़े पर एक मुस्कान खिल जाती। धीरे-धीरे दोनो एक दूसरे के लिए सीट रोकने और पास बैठने लगे। दोनो कब तक चुप रहते! परिचय हुआ, बातें होने लगीं और एक शाम ट्रेन की प्रतीक्षा में खड़े देव को देखकर दीपा चहकी,  "ट्रेन आने में अभी 15 मिनट का समय है, आइए! एक कप चाय हो जाय?" उस दिन के बाद यह अक्सर होने लगा। यूँ कहिए दोनो 15 मिनट पहले ही स्टेशन पहुँचने लगे। जिस दिन ऑफिस में छुट्टी होती दोनो मोबाइल में बातें करने लगे! बातों ही बातों में उन्हें एहसास हुआ कि जब एक ही शहर में रहते हैं तो मिलकर भी बातें हो सकती हैं!

जाड़े के दिन थे । दोनो भोर में ही सूर्योदय देखने खंडाला हिल्स व्यू पॉइंट्स पहुँच चुके थे। पहाड़ों के बीच से स्वर्णिम आभा बिखेरता एक गोला ऊपर और ऊपर उठता जा रहा था। दोनो एक दूसरे को भूल अपलक उगते सूरज को ही निहार रहे थे। एक प्यास समाप्त होती है, दूसरी जग जाती है। ठण्ड के मारे हालत खराब थी और दोनो को जोरों की भूख लग रही थी। पास ही सड़क किनारे एक गुमटी नुमा ढाबे से दोनो ने ब्रेड आमलेट का नाश्ता किया। नाश्ते के बाद एक पहाड़ी पर बैठ, धूप की गर्मी लेते हुए दोनो ने आपस में बहुत सी इधर-उधर की बातें कीं लेकिन घर के बारे में बताते हुए बचते रहे।

दरअसल दिपाली एक अनाथ लड़की थी। बचपन में ही एक दुर्घटना में माता पिता की मृत्यु हो गई। पिता ऑटो चलाते थे और भयंकर शराबी थे। एक शाम शराब के नशे में गर्भवती पत्नी को अस्पताल ले जाते समय पहाड़ी से ऑटो फिसल कर सैकड़ों फिट नीचे खाई में गिर गई। अबोध दीपा को उसके मामा अपने साथ घर ले आए और वहीं उसकी शिक्षा हुई। मामी बात-बात पर दीपा को यह एहसास दिलाती कि वह एक मनहूस लड़की है जिसने अपने माँ बाप को बचपन में ही खा लिया और अब यहाँ छाती पर मूंग दलने आई है। काम की न काज की, खाली पढ़ती रहती है। दूसरी ओर दीपा को भी यह एहसास हो चुका था कि उसे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़ा होना है, मामा-मामी पर बोझ नहीं बनना है। इसी एहसास ने उसे तंग हालत में पढ़ना और लड़ना सिखाया। बड़ी सफलता तो उसे नहीं मिली लेकिन स्पोर्ट्स में रूचि होने के कारण ग्रेजुएशन के बाद एक स्कूल में गेम टीचर हो गई। उसकी मामी रोज ताने मारती, "कौन करेगा इससे शादी? कहाँ से लाएंगे दहेज के पैसे? कमाने लगी है तो पुणे में ही कमरा लेकर क्यों नहीं रहती? क्यों रोज आती-जाती है!" 

देव से बातें करते वक्त दीपा सोचती, 'अब अपना दुखड़ा देव को क्या बताएं! वह भी क्या सोचेगा,'कैसी लड़की से पाला पड़ा है!' इधर देव सोचता, 'मेरी ग़रीबी सुनकर भाग जाएगी, मैं इसे खोना नहीं चाहता।' इसी कश्मकश में दोनो इधर-उधर की बातें करके अपने-अपने घर चले गए।

बहुत दिनों से दीपा दिख नहीं रही थी, उसका फोन भी नहीं लग रहा था, देव परेशान था। रोज सुबह उम्मीद से उठता, रोज ट्रेन चलते ही मायूस हो जाता, 'आज भी नहीं दिखी!' काश! वह अपने घर का पता बता देती। एक दिन ऑफिस में काम अधिक होने के कारण उसे पुणे में रुकना पड़ा। वह देर शाम 'दगडू सेठ गणेश जी' के दर्शन करने चला गया। दर्शन करके लौट रहा था तो अचानक सड़क के दूसरे किनारे दीपा खड़ी दिख गई! वह सड़क पार करते हुए लपक कर उसके पास पहुंचा तो उसे देख दीपा सकपका गई। 

साथ-साथ गुमसुम 3 किमी पैदल चलते-चलते शिवाजी नगर रेलवे स्टेशन के पास पहुंच गए। वहीं रुककर दोनो एक दुकान में चाय पीने लगे। संक्षेप में दीपा ने अपना हाल बताया और यह भी कि मामी के तानों से घबड़ाकर उसने यहाँ एक कमरा किराए में ले लिया है, अपना दुखड़ा सुनाना नहीं चाहती थी, इसलिए मोबाइल का सिम भी बदल दिया। यहाँ रहकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए बहुत समय मिल जाता है। गणेश जी ने चाहा तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी, कुछ अच्छा होता तो तुमसे जरूर बात करती।

देव को उसकी बातें सुनकर झटका सा लगा, मैं व्यर्थ ही अपनी ग़रीबी से शरमा रहा था! गरीब होना तो बहुत छोटी बात है, बड़ी बात तो यह है कि हम ग़रीबी से कैसे लड़ते हैं!

उसने दीपा का फोन नंबर लिया और अपने दिल की बात उससे कह दी, "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुमसे भी गरीब हूँ। आर्थिक रूप से भी, मानसिक रूप से भी। तुमने मेरी मानसिक गरीबी एक झटके में दूर कर दी, तुम्हारा यह एहसान मैं भूल नहीं पाउँगा। गणेश जी ने चाहा तो हम जल्दी ही मिलेंगे।"

दूसरे दिन घर लौटकर उसने माँ से कहा, "माँ! मैने शादी करने का फैसला कर लिया है, लड़की भी ढूंढ ली है। अब हम पूना में किराए का घर लेकर वहीं रहेंगे। नौकरी के साथ मन लगाकर पढ़ाई करेंगे। गणेश जी ने चाहा तो हमको अच्छी नौकरी मिल जाएगी और तुमको प्यार करने वाली बहू, क्यों! तैयार हो?"

माँ खुशी से उछल पड़ी, "जै गजानन! तुमने मेरी सुन ली। मुझे बहू मिलेगी और मेरा देव पैसा कमाकर यहाँ आएगा और पक्का घर बनाएगा।".

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13.5.24

पुत्र रत्न

मित्र ने बताया, "ईश्वर की कृपा से पुत्र को 'पुत्र रत्न' की प्राप्ति हुई है, मैं दादा बन गया, कोई अच्छा सा नाम बताइए। "

मैने कहा, "आपको रत्नो की इतनी अच्छी पहचान है! माणिक, हीरा, नीलम, पन्ना, लाल मूंगा, मोती, पुखराज, लेहसुनिया मुख्य रत्न माने गए हैं, आप यह भी पता लगा लीजिए, कौन सा रत्न हुआ है।" पता चल जाय तो आगे 'लाल' लगा दीजिएगा। जैसे मानिक लाल, पन्ना लाल...

अबे! नीलम तो नीला होता है, लाल कैसे लगाएंगे?

पक्का हो गया कि नीलम ही है? पहले पक्का तो कर लो, पुखराज भी अच्छा नाम है। ऐसा न हो कि रत्न पुखराज मिला और तुमने नीलम नाम रख दिया।

तुम भी हमेशा मजाक करते हो। हमने कहा, पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है तो तुम रत्नो के नाम गिनाने लगे! अरे पुत्र को सभी रत्न और पुत्री को लक्ष्मी कहते हैं तो हमने भी कह दिया!!! क्या गलत किया?

बहुत गलत किया भाई, बहुत गलत किया। आखिर हम पुत्र को रत्न और पुत्री को लक्ष्मी कब तक समझते रहेंगे? ये रत्न और लक्ष्मी हमारे बच्चों से मूल्यवान क्यों हैं? 100 रत्नो के बदले भी क्या एक पुत्र ला सकते हैं? लाखों रुपयों के बदले क्या पुत्री को बेच सकते हैं? नहीं न? फिर क्यों हम अपने बच्चों की तुलना रत्न और लक्ष्मी से करें? हम क्यों नहीं पुत्र का नाम आज की तारीख पर ही रख दें...लड़का-9 मई, 2024, लड़की- 9मई 2024 अब बड़ा होकर लड़का/लड़की अपने कर्मों से खुद को जैसा सिद्ध करें, वैसा नाम हो जाएगा। लड़के ने मिसाइल बनाया तो आदरणीय राष्ट्रपति जी की तरह उसके नाम के आगे 'मिसाइल मैन' जुट जाएगा, चोर निकला तो चोर। लड़की धावक निकली तो उड़न परी, घर में काम करने वाली हुई तो गृहणी। जिसका जैसा कर्म, वैसा नाम जुड़ जाएगा। न जाति न धर्म, न अगड़ा न पिछड़ा सब भेदभाव समाप्त। हाँ, विकलांग हुआ तो दे देंगे आरक्षण। जन्म से ही क्यों मान लें कि यह रत्न है, यह दीन। इसे आरक्षण मिलना चाहिए, इसे नहीं! ईश्वर ने तो सभी मानवों को एक जैसा बनाया है, हम भेदभाव क्यों करते हैं? इतना भेदभाव करते हैं और अपने को बुद्धिमान भी समझते हैं!

हा.. हा.. हा... मतलब तुम आरक्षण विरोधी हो!

मेरे इतने लम्बे भाषण का तुमने यही अर्थ निकाला! इसीलिए यह भेदभाव नहीं खतम हो रहा है। आरक्षण दो न भाई, मैने कब मना किया है? गरीब को आरक्षण दो, विकलांग को आरक्षण दो, दीन हीन को आरक्षण दो....। धार्मिक और जातिगत भेदभाव मिटाने का कोई तो तरीका बताओ? एक तरफ कहते हो भेदभाव बुरा है, दूसरी तरफ भेदभाव की बुनियाद मजबूत करते हो! दोनो संभव नहीं है। अब तुमको पोते का नाम ही रखना है तो उसी पंडित जी के पास जाओ, जिनका तुम विरोध करते हो। यही न करते आए हो? कर्मकांड का मजाक उड़ाना और फिर उसी के शरण में जाना! जय राम जी की।.

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25.1.24

लोहे का घर 75 (संस्मरण)

लोहे का घर का घर मेरा पीछा नहीं छोड़ता या मैने लोहे के घर को अपना आवास बना लिया है, नहीं पता। अभी मुंबई, गोवा, पुणे घूमकर 10 दिनों में घर आया ही था कि आज फिर दिल्ली जाने के लिए 'शिव गंगा एक्सप्रेस' पकड़ना पड़ा।

हुआ यूँ कि बिटिया छुट्टी लेकर आई थी लेकिन अचानक से 8 तारीख को ऑफिस पहुंचने का बुलावा आ गया। उसने 7 तारीख के लिए फ्लाइट का टिकट लिया था लेकिन खराब मौसम के कारण फ्लाइट निरस्त हो गई और मजबूरी में ट्रेन पकड़नी पड़ी। एक वर्ष के बच्चे के साथ उसे इतनी देर के सफर में अकेले भेजना ठीक नहीं लगा, मैं भी चल दिया। कल सुबह पहुंचेंगे, दिन में 3 बजे वन्दे भारत से वापस आना है, सिर्फ पहुंचाने जा रहे। थर्ड ac में दरवाजे के बगल वाली साइड लोअर/ अपर मिली है। रात्रि के 11 बजने वाले हैं, लगातार कोई न कोई आ/जा रहा है, सो नहीं पा रहे।


जिसका डर था, वही हुआ। बिटिया की तबीयत खराब हो गई। ठंड लग गई या बदहजमी हो गई 4-5 बार लगातार बाथरूम जाने से उसकी हालत पतली होने लगी। मुझे लगा, यही हाल रहा तो बेहोश हो जाएगी। टी टी से मदद मांगी। उसने फोन करके कानपुर में डॉ बुलवा लिया और मुझसे बोला, "अभी 40 मिनट में कानपुर आ जाता है, डॉ, दवाई सब मिल जाएगा।"


कानपुर स्टेशन अपने निर्धारित समय 2.45 पर पहुंची। ट्रेन रुकते ही डॉ, दवा के साथ उपस्थिति हो गए। एक घण्टे में उनकी दवा से आराम मिल गया। उसका बार -बार बाथरूम जाना रुका, मैं नाती को संभालता रहा। मेरे कूपे के सहयात्री भी सहयोगी मिल गए। मेरे पास एक अपर, एक साइड लोअर की 2 बर्थ थी, एक अपनी लोअर बर्थ देकर मेरी अपर बर्थ में सोने चला गया, इससे बहुत राहत मिली। नाती ने भी खूब सहयोग किया, अपनी अम्मा के तबियत खराब होने तक, गहरी नींद में सोया रहा। इस समय दोपहर के 12 बजने वाले हैं, ट्रेन 5घण्टे लेट चल रही है। इसे सुबह 8.30 पर दिल्ली पहुँचना था लेकिन अभी यह दिल्ली से 150 किमी दूर है। बिटिया का ऑफिस तो गया, अब चिंता यह है कि दोपहर 3 बजे से पहले दिल्ली पहुँच जाय और मैं दामाद जी को बिटिया, नाती हवाले कर वन्दे भारत पकड़ लूँ। वन्देभारत दिल्ली से 3 बजे छूटेगी। 😃

शिवगँगा 3 बजे के बाद पहुंची दिल्ली। अच्छा यह हुआ कि लौटने की ट्रेन 'वन्दे भारत' भी 2 घण्टे विलम्ब से चलने का मैसेज आ गया। मैने बता दिया था कि मैं स्टेशन से ही लौट जाऊंगा, घर में जरूरी काम है, लौटना जरूरी है। समधी, समधन और दामाद जी सभी भरपूर भोजन के साथ दिल्ली प्लेटफार्म पर मौजूद थे। मेरे पास 2घण्टे का समय था, मैं भी स्टेशन से बाहर निकल आया और कार में ही भोजन करके, बिटिया के साथ सबको विदा कर दिया और हाथ हिलाते हुए लौट चला प्लेटफार्म पर जहाँ से वन्दे भारत मिलनी थी। ट्रेन बहुत विलम्ब से आई, 7 बजे छूटी और चाल ठीक रही तो पहुंचाएगी भी 8 घण्टे बाद, भोर में 3 बजे। मतलब आते समय ट्रेन सुबह 8.30 के बजाय दोपहर में 3 के बाद आई थी और जाते समय यह रात्रि 11 के बजाय भोर में पहुंचाने वाली है। इस तरह आते/जाते का 16 घंटा ट्रेन ने खा लिया।

लोहे के इस घर का मेरा पहला अनुभव है। हवाई जहाज की तरह सुफेद कूपे की सीटों पर यात्री लाइन से आगे /पीछे बैठे हैं। अपनी विंडो सीट है। हर रो में 3 चेयर कार हैं। मेरी बगल की दोनो सीट खाली है, शायद अगले स्टॉपेज कानपुर में भरे। दिल्ली और बनारस के बीच कानपुर और प्रयागराज यही 2 स्टॉपेज हैं। पानी, नाश्ता, चाय मिल गया। भले पैसा टिकट में लिया हो लेकिन कोई प्रेम से खिलाए तो अच्छा लगता है। थके शरीर को आनंद आया। सभी यात्री अपनी-अपनी सीट पर मगन हैं, दिखलाई नहीं दे रहे। मेरे बगल के 2 खाली बर्थ में से 1 में एक 2 जुड़वा पाँच वर्ष की बेटियों का पिता, जम कर लैपटॉप चलाने में लीन है। उसकी 2 बर्थ है, उसमें पत्नी और दोनो बच्चे बैठे हैं। मुझे देखता देख, हँसते हुए बोल रहे थे, 'अगली बार बच्चों के लिए भी बर्थ लेना पड़ेगा।' इन्हें कानपुर जाना है, आज तो इनका काम बन गया। कानपुर तक तो दोनो सीट खाली रहने वाली है। सामने बोगी की स्क्रीन पर, अगला स्टॉपेज कानपुर लिखकर आ रहा है और लगातार एक लाइन चल रही है, जिसमें चेतावनी प्रदर्शित हो रही हैं, "शिकायत इस नम्बर पर करें, लावारिस समानों से सावधान रहें, कमोड में कुछ न फेंके, मध्यपान, धूम्रपान न करें आदि।" कहीं किसी की मोबाइल की रिंगटोन, कहीं वीडियो की आवाज को छोड़ दिया जाय तो कूपे में शांति है, लिखने का माहौल है लेकिन अपना शरीर ही 24 घण्टे की बिना आराम वाली यात्रा के कारण थका हुआ है।

सुबह के 6 बजने वाले हैं, कानपुर के आउटर में ट्रेन रुकी है। कल शाम 7 बजे जब यह ट्रेन चली थी, इसे कानपुर पहुँच जाना था। कोहरे के कारण लेट है ट्रेन। लगता है बनारस पहुँचने में 10 बजाएगी। कानपुर उतरने वाले यात्री अपने सामान पैक कर तैयार हैं, पहुँचे तो उतरें। जिन्हें यहाँ नहीं उतरना है उनके खर्राटों की आवाजें आ रही हैं। यह मेरे घूमने का समय है, इस समय मुझे नींद नहीं आती। जितना सोना था, सो लिए। मेरे बगल में बैठे यात्री की 5 वर्ष की दोनो जुडवां बेटियाँ 'अंकल बाय' कहके माता पिता के साथ कानपुर उतरने के लिए दरवाजे पर चली गई हैं। कल शाम मैने अपनी आइसक्रीम इन्हें खिला दिया था, तभी से ये मुझसे बहुत खुश हैं। दोनो चुलबुली बेटियों से पूछता था, "तुम दोनो में कौन बड़ी है?" एक बोलती, "ये मुझसे 5 मिनट बड़ी है, लेकिन हाईट में मैं बड़ी हूँ!" कितनी बड़ी?, पूछने पर नहीं बता पाती, शरमा जाती, केवल हाथ से इशारा करती, "इत्ती बड़ी।" अब घर पहुँच कर पक्का पता लगाएगी कि हाईट में वो कित्ती बड़ी है? कानपुर आ गया, दोनो चली गईं। कानपुर से कोई नहीं चढ़ा, मेरे बगल की दोनो सीट खाली है और जहाँ बच्चे बैठे थे, वो कोना भी सूना हो गया है।

प्रयागराज से आगे बढ़ी है वन्देभारत। अब कोहरा घना नहीं है। एनाउंस हो रहा है, "भारतीय रेलवे आपके सुखद और मंगलमय यात्रा की शुभकामनाएँ देती है।" जिस ट्रेन को कल रात 11 बजे वाराणसी स्टेशन पर होना था, आज 9 बजे दिन में प्रयागराज से चली है, यात्रा कितनी सुखद है, यह आप समझ ही सकते हैं। वैसे इसमें भारतीय रेलवे का कोई दोष नहीं, सब दोष कोहरे का है। आकाश में कोहरा घना होना, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना ही नहीं, लोहे के घर के विलम्ब से चलने के लिए हो रही आलोचना से बचाव का एक रास्ता भी है! इतनी शानदार गाड़ी में कुछ ही यात्री शेष हैं। लगता है विलम्ब के कारण टिकट निरस्त करा कर लोगों ने दूसरा रास्ता अपना लिया है।

अपन तो दुःख में सुख ढूंढते हैं। इतनी बड़ी गाड़ी में कुछ यात्रियों के साथ शांतिपूर्वक अपनी यात्रा चल रही है। बीच-बीच में चाय/नाश्ता भी मिल रहा है। अधिक देर ठहराने का कोई अतिरिक्त मूल्य भी नहीं चुकाना, अतिरिक्त नाश्ता भी शायद मुफ्त में मिले! लग रहा है बारात में चल रहे हैं और बरातियों की तरह रेलवे अपना स्वागत कर रहा है! और क्या चाहिए? सूर्यदेव के दर्शन हो रहे हैं, अब रफ्तार तेज हुई है, लगता है, 12 बजे तक घर पहुँच जाएंगे।

3.1.24

यात्रा संस्मरण, लोहे का घर 74

लोहेकेघर की लम्बी यात्रा है, बनारस से मुम्बई। हम साइड लोअर बर्थ में लेटे हैं, सामने की सभी बर्थ पर सारनाथ के साथी बैठे हैं। मुंबई से गोवा, गोवा से पुणे, पुणे से मुम्बई, मुंबई से वापस बनारस 10 दिन की घुमक्कड़ी की योजना है। 8 में 5 वरिष्ठ, 3 युवा हैं। यह ट्रेन नम्बर 12168 बनारस से लोकमान्य तिलक जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन की थर्ड ए. सी. बोगी है। सभी अपने- अपने तरीके से आनंद ले रहे हैं। कोई अमरूद काट रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है और कोई आनंद दायक गप्प लड़ाने में मस्त हैं। लगता है सभी घर की कैद से मुक्त हो, दौड़ने वाले लोहे के घर मे आकर बहुत खुश हैं। सुबह-सबेरे आँगन में कलरव करने वाले परिंदों की तरह सभी चहक रहे हैं।

ट्रेन मिर्जापुर में रुकी है। बनारस से अगला स्टॉपेज प्रयागराज है, यह इसका ठहराव नहीं है। यदि अपने निर्धारित स्टेशन पर ही रुके तो फिर भारतीय रेल कैसे रहे! भारतीय रेल जुगाड़ से चलती है, टेसन से पहले और टेसन के बाद भी रूकती है। कब चलेगी, इसकी घोषणा नहीं होती, इनके पास एक ब्रह्म वाक्य है, "यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद है।"

एक भले साथी ने आलू पूड़ी का नाश्ता करा दिया, सभी ने चटखारे लेकर खाए, पान जमाया और अपनी-अपनी मोबाइल खोल ली। जैसे कक्षा में नाश्ते के बाद लड़के पुस्तक पलटने लगते हैं, वैसे ही लोहे के घर में यात्री नाश्ते के बाद मोबाइल खोल लेते हैं। 😃

ट्रेन मानिकपुर से आगे चली है। जब रोज के यात्री थे, दूर से आने वाली लेट ट्रेन, अपने ऑफिस से छुट्टी के समय मिल जाती थी तो खुशी होती थी, आज हम स्वयं दूर के यात्री हैं और अपनी ट्रेन एक घण्टे लेट है तो साथी यात्री मायूस हैं। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जाने पीर पराई! वाली बात है।

इधर एक रोचक घटना घटी। सारनाथ के ही एक यात्री मिल गए। इनकी टिकट कन्फर्म नहीं है, वेटिंग में है। अपने 9 साथियों में एक नहीं आ पाए तो अपने पास एक बर्थ खाली है। इस तरह वेटिंग टिकट वाले यात्री की समस्या का समाधान हो गया, हम लोग भी अपने परिचित साथी को अकस्मात पा कर खुश हुए। मंजिल चाहे जब मिले, सफर का आनंद लेना चाहिए और आनंद मिल गया।

जबलपुर पहुँचने वाली है ट्रेन। हम लोगों ने घर से लाया हुआ भोजन मिलबाँटकर कर लिया। तीन प्रकार की सब्जी और पूड़ी हो गई। अब सभी बिस्तर की तलाश में हैं। पूरे कूपे में हमारे सिवा कोई और है ही नहीं, आठों बर्थ में अपने ही साथी हैं, नई कहानी कहाँ से ढूंढे! बगल के कूपे में लोग खाना आर्डर देकर जबलपुर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका खाना जबलपुर में आएगा। हमारे साथियों ने घर से भरपूर पूड़ी सब्जी लाई थी, हमे खाना मंगाने की जरूरत नहीं पड़ी। अब धीरे-धीरे लोग कंबल, चादर ओढ़/बिछा रहे हैं।

लोहे के घर में सुबह चौंकाने वाली हुई। अलॉर्म चीखने लगा, "कोच में आग है, गलियारे से निकलें!" नींद खुली तो देखा सभी साथी हड़बड़ा कर जग रहे हैं। ट्रेन रुकी थी, अफरा तफरी का माहौल था लेकिन आग कहीं नहीं दिख रही थी। अभी हम सोच ही रहे थे कि बैग लेकर उतरें या छोड़ कर एक साथी बोले, "केहू सिगरेट पीले होई, एमे सेंसर लगल हौ, वही बजत हौ।" तब तक सुरक्षाकर्मी डंडा, टार्च लेकर दौड़ने/देखने लगे। कुछ भीतर कुछ बाहर कोच के नीचे पहियों में टार्च जलाकर देखने लगे। कुछ देर बाद चार कर्मी एक आदमी को पकड़े ले जा रहे थे और पूछ रहे थे, "किसको सिगरेट पीते देखे हो, बताओ?" यहाँ सबको देखने के बाद वे आगे बढ़ गए, अलार्म बजना बंद हुआ, लगभग 30 मिनट बाद ट्रेन चल दी। सभी ने संतोष की सांस ली और सब कुछ सामान्य हो गया।

अब नींद पूरी तरह खुल चुकी है। 'लोहे का घर' खुद भी जगा, सबको जगा भी दिया। कुछ अभी अलसाए पड़े हैं, कुछ फ्रेश होकर चाय पी रहे हैं। चाय,पानी बेचने वाले वेंडर लगातार आ/जा रहे हैं। सुबह के सात बजने वाले हैं, कोच के भीतर बल्ब अभी जल रहा है, बाहर भी रौशनी फैल रही है। बाहर/भीतर का अंधकार यूं चुटकियों में दूर हो जाय तो बस आनंद ही आनंद है। ट्रेन भुसावल से आगे चल रही है, अगला स्टेशन 'नासिक रोड' है।

सही समय पर लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुंची अपनी ट्रेन। वहाँ से तिलक नगर स्टेशन से लोकल ट्रेन पकड़कर छत्रपति शिवाजी स्टेशन पहुँचे। अपना सामान 'अमानती घर' में जमा किया और खा/पी कर 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' घूमने निकल पड़े। छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से यह बहुत पास था। गेटवे ऑफ़ इण्डिया के ठीक सामने है 'होटल ताज'। होटल ताज को देखकर आतंकवादी घटना याद आ गई, जिसने पूरे देश को हिला दिया था। जिसके सामने भूतपूर्व प्रधानमंत्री बी पी सिंह की मृत्यु की खबर दब कर रह गई थी।

गेटवे ऑफ़ इण्डिया से घुमते हुए पैदल-पैदल मरीन ड्राइव तक गए। वहाँ लगभग एक घण्टे समुन्द्र के किनारे बैठकर सूर्यास्त का दर्शन किए फिर घूमते हुए वापस स्टेशन। मडगांव के लिए अगली ट्रेन रात 11 बजे थी। अभी ट्रेन में बैठे हैं। यह लगभग 11 बजे मडगांव पहुंचाएगी, वहाँ से गोवा घूमने जाना है।






गोवा घूम लिए। यहाँ का मौसम गर्म है। धूप इतनी तेज है कि काला चश्मा खरीदना पड़ा। बनारस में कड़ाके की ठण्ड और कोहरे का समाचार सुनकर यहाँ हर वर्ष आने की इच्छा हो रही है। शायद इसीलिए लोग हर वर्ष गोवा आते हैं।

वास्को रेलवे स्टेशन के पास रुके थे, यहाँ से कार लेकर एक दिन नार्थ गोवा, दूसरे दिन साऊथ गोवा चले गए। मांडवी रिवर,कोको बीच,कांडोली बीच, कलंगुट बीच,थँडर वर्ड,बाघा बीच, पंजी, शांता दुर्गा मन्दिर, मंगेश शिव मन्दिर, नेवी म्यूजियम, जापानी गार्डेन, कैसीनो पंजी सब घूम लिए। यहाँ Beach बहुत हैं, सबका नाम याद रखना भी कठिन काम है। बाघा बीच में समुन्द्र स्नान भी हुआ। समुन्द्र में नहाने के बाद बाहर निकल कर साफ पानी से भी स्नान किया।

यह 8 मित्रों का जीवंत ग्रुप है। कुछ अधिक जीवंत हैं जिन्हें बियर के बाद स्कॉच भी चाहिए। कुछ शाम तक इंतजार करते हैं, कुछ को सुबह जागने से ही चाहिए होता है। कुछ धार्मिक, शाकाहारी हैं, कुछ मांसाहारी लेकिन किसी को किसी के खान पान से कोई परेशानी नहीं है। सभी आनंद लेने में जुटे हैं। आज दिन में 3 बजे वास्को से पूना के लिए ट्रेन पकड़नी है, ट्रेन कल भोर में पुणे पहुंचेगी, वहाँ 4 दिन रुककर आस पास के इलाकों में घूमने की योजना है।


























गोवा एक्सप्रेस में बैठ गए। यह 3 बजे 'वास्को डी गामा' स्टेशन से चलकर 'निजामुद्दीन' तक जाएगी, हमको पूना जाना है। यह पुणे कल सुबह 4.15 पर पहुंचाएगी। ग्रुप में 5 वरिष्ठ नागरिक हैं लेकिन सभी अपर या मिडिल अपर बर्थ मिली है। पता नहीं इस बार रेलवे ने वरिष्ठ नागरिकों का कोई ध्यान क्यों नहीं रखा! बनारस से मुम्बई होते हुए गोवा चले आए लेकिन कहीं कोई जाँच नहीं हुई। मुम्बई में जब 'गेटवे ऑफ़ इण्डिया' में घूम रहे थे और ताज होटल को देख रहे थे तो यह खयाल आया कि यहाँ अपनी कोई जाँच नहीं हुई! पुलिस आतंकवादी घटना के बाद कितनी सक्रीय हो गई थी!!! मतलब घटना के बाद जाँच होती है, पहले नहीं।

हमारी बोगी जहाँ है, एक स्पीकर तेज आवाज में लगातार अपनी ट्रेन की घोषणा कर रहा है। अब इसकी घोषणा से खीझ हो रही है। सुन-सुन कर कान दर्द करने लगा। ट्रेन यहीं से बनकर चलती है, हम लोग होटल से 12 बजे चेक आउट कर गए, कहाँ जाते!ट्रेन आ गई तो बैठ गए। आधे घण्टे पहले बैठने का परिणाम यह हुआ कि ट्रेन चलने तक मराठी, हिंदी और अंग्रेजी में लगातार की जाने वाली घोषणा सुननी पड़ेगी। घोषणा खत्म हुई, इंजन का हारन बजा, ट्रेन चल दी। बाय-बाय गोवा, फिर मिलेंगे।

भयंकर भीड़ है गोवा एक्सप्रेस में। जो भीड़ चढ़ चुकी है वे मराठी के अलावा दूसरी भाषा भी बोल रहे हैं। भोलपन से कहते हैं, "जनरल समझ कर चढ़ गए!" टी टी भी परेशान है, एक डिब्बे से भगाता हैं, दूसरे में चले जाते हैं। दरवाजे के पास चपे हुए हैं। हड़काता है, "अगले स्टेशन में उतर जाओ, नहीं तो पेनाल्टी लगाएंगे।" ये सर्वहारा दिखते हैं, फाइन देने लायक भी नहीं दिखते। लोअर बर्थ वाले परेशान हैं, सभी चढ़े जा रहे। अब लगता है रेलवे ने बड़ी कृपा करी कि हमको अपर बर्थ दे दिया। बीच से भगाए गए तो ये अब दरवाजे के पास जमा हैं। इस डिब्बे में लगभग 200 से ज्यादा बिना बर्थ वालों की संख्या है। कुछ देर में ये जमीन पर सो भी जाएंगे। यह स्लीपर बोगी है।

हमारे साथी इधर-उधर बिखरे हैं। सभी की यहाँ-वहाँ अपर बर्थ है। इधर ठंड नहीं होगी, एक रात की यात्रा है, मानकर इन्होने स्लीपर में रिजर्वेशन करा लिया। ठंड तो नहीं है, भीड़ ज्यादा है। घाटप्रभा स्टेशन में ट्रेन रुकी है, टी टी सबको उतार रहा है। उतारते-उतारते ट्रेन चल दी! अब कैसे उतारेगा!!! बाहर तो फेंक नहीं सकता। अब फाइन मांग रहा है। पुलिस को बुलाने की धमकी दे रहा है। आसान नहीं है टी टी की नौकरी। हमको इस भीड़ का खूब अनुभव है लेकिन जो परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं, परेशान हैं।

एक वेंडर वाला बड़ा पाव लेकर आया। मैने पूछा, "कितने का है?" बोला, "30/-का 2 बड़ा, 2 पाव।" मैने पूछा, "बड़ा कितने का, पाव कितने का?" वो बोला, "बड़ा 25/-का 2। मैने कहा, "5/- का 2 पाव देना!" वह मुकर गया! हड़बड़ा कर बोला, "ऐसा थोड़ी न होता है।" मैं हँसने लगा, "मैं दाम तो तुम्हारे ही हिसाब से दे रहा हूँ, बड़ा 25/- का तो पाव 5/-का ही न हुआ? वह बड़बड़ाते हुए चला गया, "लेना हो तो पूरा लो!" नीचे बैठे सभी यात्री हँसने लगे। दूसरा वेंडर बड़ा पाव लेकर आया, उसने दाम बताया, 2बड़ा 20/-का, 2पाव 10/-का। मैने 20/-में 2 बड़ा खरीद लिया। नीचे बैठे यात्री हँसने लगे, एक बोला, "अभी तो आपको 2पाव चाहिए था!" मैं भी हँसने लगा, "नहीं, हमको 2 बड़ा चाहिए था, यह ईमानदार वेंडर है, इसलिए ले लिया।" लोग फिर हँसने लगे! पता नहीं मेरी बातों से लोग क्यों हँसने लगते हैं!🤔

बोगी की भीड़ कुछ कम करने में टी टी को सफलता मिल गई। रात के 10 बज रहे हैं, लोगों ने अपना बर्थ सजा लिया है। ट्रेन 46मिनट विलम्ब से रायाबाग पहुंची है। अब हम भी लिखना बंद कर सोते हैं, सुबह 4 बजे उठना है।

गोवा एक्सप्रेस अपने सही समय भोर में पूना पहुँच गई। ट्रेन में ही पुणे के एक यात्री की सलाह पर पूना रेलवे स्टेशन से 2km दूर 'पंद्रह अगस्त चौक' पर होटल 'टूरिष्ट' मिल गया, वहाँ 4दिन रुके। पहले दिन तो खूब आराम किया गया और पूना शहर में दगड़ू सेठ गणेश जी' का दिव्य दर्शन किया गया और आस पास शहर में ही घूमा गया।

दूसरे दिन एक कार लेकर वहाँ से 123 किमी दूर छठें ज्योतिर्लिंग 'भीमा शंकर' का दर्शन किया गया। वहाँ एक अलग प्रकार की अव्यवस्था देखने को मिली। मन्दिर से 2 किमी पहले ही दूर से आने वाली गाड़ियों को रोक दिया जा रहा था और वहाँ से दूसरे लोकल वाहन से प्रति व्यक्ति 20/- लेकर मन्दिर तक पहुंचाया जा रहा था। इस व्यवस्था का लाभ स्थानीय वाहनों को खूब मिल रहा था। मन्दिर से बहुत पहले से ही लम्बी लाइन शुरू हो गई थी। पंक्तिबद्ध घंटों खड़े होकर शिवलिंग का दिव्य दर्शन हुआ। काशी विश्वनाथ में तो अब हम काशी वासी शिवलिंग को छू नहीं पाते लेकिन यहाँ 'स्पर्श दर्शन' का सुख मिला। एक साथी तो वहीं शिवलिंग पकड़कर दण्डवत लेट गए। लौटने के रास्ते में सीढ़ियों के किनारे कई प्रकार की दुकाने सजी थीं। मुख्य रूप से खोए से बने खाद्य पदार्थों, निम्बूरस पिलाने वालों की अधिकता थी।

तीसरे दिन लोनावला और खंडाला घूमने गए। पुणे से लोकल ट्रेन मात्र 15/- रुपए के टिकट पर लोनावला पहुंचाती है। साथियों की राय बनी कि आने/जाने में कार में हजारों रुपिया क्यों खर्च किया जाय! वहाँ पहुँच कर गाड़ी ले लेंगे। हम लोगों ने यही किया। लोकल ट्रेन में खूब भीड़ थी लेकिन बैठने की जगह मिल गई, लोकल ट्रेन में घूमने का यह नया आनंद दायक अनुभव था। बैठने की सीट मिल जाय तो लोकल ट्रेन में यात्रा करना कोई बुरा नहीं है लेकिन दोनो बांहों से सिक्कड़ पकड़ कर, धक्के खाते हुए, खड़े होना पड़े तो भारी पड़ता है। रोज लोकल ट्रेन में यात्रा करने वालों को शायद ही सीट मिल पाती होगी।

लोनावला पहुँच कर एक ऑटो से हम 4 लोग 4 घण्टे घूमते रहे। हम 8 लोगों के ग्रुप में 4 साथी पूना न आकर, 'दमन दीप' चले गए। 4 लोगों के साथ घूमना थोड़ा आसान पड़ता है, जहां जाओ, गाड़ी आसानी से मिल जाती है। सोचे थे, खंडाला में मौसम ठंडा होगा लेकिन यहाँ भी धूप/गर्मी थी। जैकेट बांहों में लेकर घूमना पड़ा। एक बात और समझ में आई कि पूना से लोनावला जाने के बजाय, लोनावला में ही होटल लेकर सुबह/ शाम घूमते तो पहाड़ों में घूमने का और आनंद आता, लेकिन 31 दिसम्बर/1जनवरी का दिन होने के कारण यह लगा कि वहाँ होटल बहुत मंहगा मिलेगा, पूना से जाया /आया जाय, पूना का होटल बढ़िया है, इसे न छोड़ा जाय। खंडाला से पुणे लौटने में शाम हो गई।

थका देने वाली यात्रा के बाद चौथे दिन कहीं दूर घूमने की इच्छा नहीं हुई। पूना में ही शाम के समय 'सारस बाग' घूमने गए। 'सारस बाग' में सारस नहीं मिला, गणेश जी का मन्दिर और मूर्तियों का संग्रह मिला। पार्क खूबसूरत है, एक तालाब भी है। तालाब में कमल थे, कछुए थे। पार्क के पीछे की तरफ एक मेला लगा था। खाने /पीने की दुकाने सजी हुई थीं। साल का पहला दिन होने के कारण खूब भीड़ थी। 'सारस बाग' से निकल कर मन हुआ एक बार फिर दगडू सेठ भव्य गणेश जी का दर्शन किया जाय। यहाँ भी खूब भीड़ थी। मंदिरों में भीड़ देखकर लगा कि सनातनियों ने पहली जनवरी को एक बड़े त्योहार के रूप में अंगिकृत कर लिया है! अब होटल जा कर आराम करना था, रात में हमलोगों की मुंबई जाने वाली ट्रेन थी।
































रात की ट्रेन पकड़कर 2 जनवरी को, भोर में लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुँचे। यहाँ अमानती में अपना सामान जमा कर 60-70 किमी दूर जीवदायिनी देवी के दर्शन का प्रोग्राम बना। साथियों को लोकल ट्रेन में चलने का आनंद मिल चुका था। मात्र 20/- प्रतिव्यक्ति की टिकट कटा कर हम लोग तिलक नगर टर्मिनल से कुर्ला, दादर में लोकल ट्रेन बदलते हुए 'वीरार' पहुँचे। वीरार से 2 किमी की दूरी पर ऑटो रिक्शे से 'जीवदायिनी मन्दिर' पहुँचे। माता जी का मन्दिर बहुत ऊँचाई पर है। मन्दिर तक पहुँचने के लिए रोप वे, लिफ्ट की सुविधा है। माताजी का दिव्य दर्शन करने के बाद हम लोग फिर लोकल ट्रेन पकड़ कर दादर आ गए। तबतक आधा दिन बीत चुका था, लोकमान्य तिलक टार्मिनल से अपनी ट्रेन देर शाम 10.45 पर थी।

दादर में भोजनपरान्त एक कार ले लिया और मुम्बा देवी, महालक्ष्मी मन्दिर दर्शन करते हुए, समुन्द्र के किनारे- किनारे वापस लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुँच गए। जहाँ से रात में ट्रेन पकड़नी थी।

इस समय ट्रेन इटारसी पहुँचने वाली है। आरक्षण बढ़िया मिला है। पूरे कूपे की आठों बर्थ पर हम आठ साथियों का कब्जा है। सभी आनंद से अपनी यात्रा का संस्मरण करते हुए फोन से अपने-अपने घर बतिया रहे हैं। हम संस्मरण लिख रहे हैं। खबर लगी है, बनारस में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है, कल बारिश भी हुई थी। रात 2 बजे अपनी ट्रेन बनारस पहुँचेगी। लग रहा है बनारस पहुँचते ही सबकी गर्मी निकल जाएगी।