नागपंचमी के दिन इसी नारे के शोर से हमारी नींद टूटती थी। ऊँघते-ऊँघते, आँखें मलते हुए हम घर के बरामदे में खड़े होकर नीचे झाँकते। गली के चबूतरे पर कुछ किशोर नाना प्रकार के नागों की तस्वीरें सजाकर बैठे होते। मन ललचाता ही था कि तभी दूसरे बच्चों का एक झुंड घर का किवाड़ खटखटाता। दरवाज़ा खुलते ही धड़धड़ाते हुए सीढ़ियाँ चढ़कर बैठक के बाहर आ खड़ा होता।
पिताजी पहले से तैयार रहते। कुछ सिक्के निकालकर बच्चों को देते। वे पैर छूकर, पैसों को मुट्ठी में भींचे, शोर मचाते हुए नीचे उतर जाते। गली में पहुँचकर फिर वही नारा लगाते... "छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।"
माँ नाग की तस्वीरों को घर के दरवाज़ों पर गाय के गोबर से चिपकातीं, नाग देवता की पूजा करतीं, खीर-पूड़ी बनातीं। और हम बच्चे नहा-धोकर बड़े प्रेम से खाते।
हमारा भी मन करता था, पर हम ब्राह्मण के बच्चे थे। हमें नाग बेचने और घर-घर घूमकर पैसे इकट्ठा करने का अधिकार नहीं था। हाँ, यह अलग बात है कि पिताजी से नज़र बचाकर हम भी कभी-कभी यादवों-मल्लाहों के बच्चों के झुंड में शामिल हो जाते और ज़ोर से नारा लगा देते... "छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।"
सुबह से शाम तक बीन बजाते सपेरे आते। उनकी पेटियों में कई तरह के सर्प होते — फन वाले, बिना फन के, काले, भूरे, गेहुएँ, एक मुँह वाले और दो मुँह वाले भी। गली की माताएँ घरों से निकलकर साँपों को दूध पिलातीं, धान का लावा चढ़ातीं, पैसे चढ़ातीं। सपेरे भी खुश, माँएँ भी खुश और हम बच्चे भी खुश। इसी खुशनुमा माहौल से शुरू होता था नागपंचमी का त्योहार।
बनारस की तंग गलियों के बीच तिराहों पर, जहाँ थोड़ी चौड़ी जगह मिलती, वहाँ-वहाँ 'महुवर' खेले जाते। महुवर देखने के लिए भारी भीड़ जुटती। लोग घरों की छतों, बरामदों की खिड़कियों और यहाँ तक कि छज्जों पर खड़े होकर भी महुवर देखते।
एक मदारी हाथ में थोड़ी धूल लेकर मंत्र बुदबुदाता हुआ दूसरे मदारी के चारों ओर गोल-गोल घूमता। दूसरा मदारी पूरे जोश और दर्प के साथ गाल फुलाकर बीन बजाता। घनी जटाओं को कभी दाएँ, कभी बाएँ झटकता। मंत्र पढ़ने वाला मदारी भयानक मुँह बनाकर, लाल-लाल आँखों से उसे घूरता और अचानक पूरी ताकत से हाथ की धूल उस पर झोंक देता।
अरे! यह क्या! बीन बजाने वाले की बीन बजना रुक गई। उसके मुँह से खून भी निकल रहा है! बीन मुँह में अटक गई है! निकालने की कोशिश करता है, पर निकलती ही नहीं। चारों ओर खड़ी भीड़ शोर मचाती — "मर गइल रे! अब मर जाई! खून फेंकत हौ!!"
यही क्रम दिनभर चलता। कभी एक मदारी गिरकर तड़पता, कभी दूसरा। खेल इतना जीवंत होता कि अमिताभ बच्चन या दिलीप कुमार भी फेल लगते। मदारियों के घात-प्रतिघात बिल्कुल सच लगते। हम बच्चे कभी इधर, कभी उधर मीलों दौड़ते-भागते। कोई कहता "वहाँ का महुवर बढ़िया है", तो कोई कहता "नहीं, वहाँ वाला और भी बढ़िया है!"
दिन ढलने के बाद भी बनारस में नागपंचमी का उत्सव खत्म नहीं होता था। शाम होते-होते अखाड़ों में पहलवान जमा होने लगते। बच्चों, किशोरों और युवाओं के डंबल, क्लब, जिम्नास्टिक और मलखंभ के करतब होते। बड़े पहलवान कुश्ती, जोड़ी और गदा घुमाने की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते।
कब सुबह होती और कब शाम ढल जाती, पता ही नहीं चलता था। घर से खाना खाकर निकलते या दोस्तों के साथ होते। समझदार माताएँ जबरदस्ती बिठाकर खिला भी देतीं, वरना भूखे-प्यासे पागलों की तरह दौड़ते-भागते कब दिन बीत जाता, पता ही नहीं चलता था।
आज नागपंचमी है। आज कॉलोनी के अपने घर के बाहर और घर के भीतर घोर सन्नाटा है, मगर सुबह से कानों में बस एक ही नारा गूँज रहा है...
"छोटे गुरु का, बड़े गुरु का, नाग लो! भाई, नाग लो।"
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