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19.7.24

कोरोना काल (3)

छत 

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कोरोना काल में, घनी आबादी वाले इलाकों की छतों पर, थिरकते हुए उतरती थी शाम, जाने का नाम नहीं लेती। सूरज डूब जाता था, अँधेरा द्वार खटखटाता था मगर शाम थी कि दोनो हाथों से परे ढकेल देना चाहती थी, अंधेरों को। 

छत पर चढ़ा तो जाना, छतें गुलजार उन दिनों गुलजार रहती थीं। कहीं किसी छत पर, गुटर गूँ कर रहा होता नव विवाहित जोड़ा, कहीं इक दूजे को देख, इशारे करती, लजाती, खिलखिलाती किशोरियाँ, कहीं छत को ही जिम बना कर कसरत कर रहे युवा, कहीं पतंग उड़ाता किशोर, कहीं आमने सामने मुंडेर पर खड़ी, हाथ नचाकर बातें करतीं प्रौढ़ महिलाएं, कहीं छत के किसी कोने की कुर्सी पर बैठी, आसमान ताकती बुढ़िया, कहीं यशोदा की तरह अपने ललना को दौड़/पकड़ खाना खिलाती माँ और कहीं मेरी तरह चहल कदमी कर, अकेले स्वास्थ्य लाभ कर रहे प्रौढ़। 

छत पर चढ़ा तो जाना, हम प्रौढ़ हुए थे, बचपना, किशोरावस्था या जवानी सब के सब, जस के तस हैं। कहीं नहीं गए, वैसे के वैसे हैं, जैसे थे। बल्कि कुछ और निखरे-निखरे, कुछ और नए रंगों/वस्त्रों में ढले, कुछ और खूबसूरत हो चुके हैं! 

पहले, हमारे हाथों में, कहाँ होती थीं मोबाइल? कानों में कहाँ ठुंसे रहते थे ईयर फोन? एक को तड़ते हुए, दूसरे से, कहाँ कर पाते थे वीडियो चैटिंग? 

एक थोड़ी नीची छत पर वीडियो चैट करते हुए अपने में मगन टहल रही थी एक नव यौवना। उस घर से सटे दूसरे घर की, थोड़ी ऊँची छत से, उसे अपलक निहार रहे थे, कुछ युवा। जैसे चाँद बेखबर रहता है कि उसे कितने चकोर देख रहे हैं वैसे सबसे बेखबर, मोबाइल देख, कभी हँसती,कभी एक हाथ से मोबाइल पकड़े-पकड़े, दूसरे हाथ को नचाती, कभी किसी बात पर झुँझलाती, अपनी धुन में टहल रही थी चकोरों की चाँदनी।

कोरोना काल में एक तरफ सिसक रही थी जिंदगी तो दूसरी तरफ निखर रही थीं चन्द्रकलाएँ। सोचा करता था, देखें! देखते रहें, क्या-क्या रंग दिखाती है जिंदगी! 

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11.7.24

साइकिल की सवारी (10)

आज बहुत दिनों के बाद लगभग 20 किमी साइकिल की सवारी हुई। भोर में 5 बजे घर छोड़ने से पहले मोबाइल में Chandan Tiwari  का यूटूब चैनल चला दिया। 'डिम डिम डमरू बजावेला जोगिया' सुनते हुए आगे बढ़ा। एक खतम होता, दूसरा बजने लगता, बीच-बीच में प्रचार भी आता रहा, साइकिल चलती रही। सारनाथ से पंचकोशी चौराहे से जब साइकिल सलारपुर की तरफ मुड़ी तो आशंका थी, क्रांसिंग बन्द होगी लेकिन खुली थी। सलारपुर, खालिसपुर से आगे साइकिल जब कपिल धारा से आगे बढ़ी तो खुला-खुला, खुशनुमा वातावरण था। सूर्यमन्दिर के दरवाजे खुले थे, शनि देव पीपल के नीचे एकदम खाली बैठे थे। ध्यान आया, आज मंगलवार है, हनुमान जी व्यस्त होंगे। शनिवार होता तो भक्त शनिदेव में दिए जला रहे होते, आज हनुमान मन्दिर गए होंगे।

बिना रुके चलता रहा। पुलिया को देखा, एक अजनबी वृद्ध बैठे आराम कर रहे थे। बगल में लंगोटी वाले पीर बाबा (बरगद का विशाल वृक्ष है, भक्तों की मान्यता है कि यहाँ पीर बाबा का वास है, यहाँ भक्त लंगोटी चढ़ाते हैं।) में दो नई लाल लंगोटियाँ चढ़ी हुई थीं। सर झुकाते हुए आगे बढ़े, साइकिल रोकने का प्रश्न नहीं था, गंगा किनारे नमो घाट पर भजन मित्र मंडली का भजन 6 बजे शुरू हो जाता है। घर से बिना रुके पहुँचने में लगभग एक घण्टे लग जाते हैं, लगभग 10 किमी का सफर है।

कोटवा, मोहन सराय, तथागत भूमि से होते हुए वरुणा गंगा के संगम तट पर बने पुल को पार करते हुए, बसंत महाविद्यालय की सड़कों पर चले तो बहुत से अपरिचित मॉर्निग वॉकर तेज चलते हुए या दौड़ते हुए दिखे। रास्ते में अमृत कुण्ड के जगत पर कुछ प्राणी प्रेमी, कौवों, कुत्तों, गायों को नमकीन, बिस्कुट, गुड़ खिलाते हुए दिखे। इन सबके दर्शन करते हुए जब अपनी साइकिल नमो घाट के गोवर्धन मन्दिर पर खड़ी हुई तो 6 बजने में 5 मिनट शेष थे।

नव निर्मित नमोघाट एक विशाल, खूबसूरत घाट है। यहाँ सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। अच्छी पार्किंग, सी एन जी गैस भराने की व्यवस्था, हाथ का सकल्पचर, गोवर्धन मन्दिर, क्रीड़ा क्षेत्र, विशाल हैलिपैड और 2,3 किमी में फैला सुंदर, चौड़ा मार्ग। यहाँ आसपास के लोग प्रातः भ्रमण के लिए रोज आते हैं। आगे वरुणा-गंगा संगम तट पर स्थित प्रसिद्ध आदिकेशव घाट तक जाने का मार्ग है। लगभग 50 मीटर का मार्ग निर्माणाधीन है, शेष बन चुका है। यहाँ एक तरफ भजन मंडली भजन प्रारम्भ करने की तैयारी कर रही थी और हम पसीना पोंछते हुए, समय से पहुँच गए।

सबके साथ बैठकर, ताली बजाते हुए, लगभग 30 मिनट सीताराम-सीताराम... का गायन हुआ, लौटते समय आराम-आराम से जगह-जगह रुकते हुए लौटे । कुएँ का पानी पिये, पीर बाबा की पुलिया पर कुछ समय बैठ कर आराम किया, पंचकोशी चौराहे से ताजे फल खरीदते हुए घर पहुँचे हैं तो शरीर में 12 और घड़ी में लगभग 8 बज चुके थे।

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https://youtu.be/U-MToJ1lJ64?si=YrkS3-B4vBaeKIbp





O9 जुलाई 2024

18.6.24

कोरोना काल (2)

एकाकी जीवन 

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एकाकी जीवन की शुरुआत जुलाई 2020 से हुई। जौनपुर में अलग कमरा लेकर रहने लगा। बिस्तर तो मेरे पास था ही, कमरे में चौकी, पंखा पहले से था। 2-4 दिन रिस्क लेकर होटल में खाना खाया फिर धीरे-धीरे किचन के लिए सब आवश्यक सामान खरीद लिया। गैस सिलेंडर एक सहयोगी कर्मचारी ने उपलब्ध करा दिया। खाना पकाने का थोड़ा बहुत अनुभव तो पहले से था, जब फंसता तो फेसबुक में पोस्ट डाल देता जैसे...भुजिया/सब्जी बनाते समय करेला छिलना चाहिए कि नहीं? कोरोना काल में मित्र मानो खाली ही बैठे होते, कमेंट से कई सलाह दे देते। 

एक दिन सुबह चाय बनाने के लिए एक दिन पहले शाम का रखा एक पाव दूध उबाला तो फट गया! बहुत देर तक फटे दूध को उबलते देखता रहा फिर उसमें थोड़ा गुड़ झोंक दिया। चम्मच से तब तक हिलाता रहा जब तक लाल पेड़ा नहीं बन गया। रात की दो बासी रोटियाँ के साथ गुड़ पनीर को लपेट कर खा गया। मान लेता, यह मोदी जी की सलाह पर आफत को अवसर में बदलना हुआ।

एक कमरा, एक किचन, एक बरामदा, लैट्रिन, बाथरूम और थोड़ी खाली जगह बस इतनी ही जगह थी। शाम को छत में घूम सकते थे। मेरे कमरे में बहुत शांति रहती थी। इतनी शांति साधारण मनुष्यों के लिए दुर्लभ थी। ध्वनिप्रदूषण फैलाने वाले जड़/चेतन दोनो प्रकार के यंत्र नहीं थे। मित्र सलाह देते हैं, "बीबी नहीं ला सकते लेकिन टी.वी. तो ला सकते हो? 5, 7 हजार में मिल जाएगी।"

हम सोचते, सीरियल देखना नहीं है, समाचार चैनलों के निर्धारित कार्यक्रमों को सुनने और प्रचार देखने के लिए काहे अपना पैसा खर्च करें? 

इन चैनलों के मालिक, व्यापारियों को या राजनैतिक दलों को चाहिए कि आम जनता को मुफ्त में घर-घर टीवी बांटें और अनुरोध करें कि हमने आपको टी.वी. सप्रेम भेंट किया है तो कृपया मेरा वाला समाचार चैनल जरूर देखिए! 

दूसरा कहे...अच्छा! आपके घर टी.वी. लगाने में फलाने चैनल ने बाजी मारी तो क्या, हम आपको टाटा स्काई या डिश टी.वी. का एक साल का नेटवर्क मुफ्त भेंट करते हैं। आधे समय हमारा वाला चैनल देखिएगा! 

कोई दूसरा चैनल वाला झण्डू बाम या विक्स वेपोरब इस अनुरोध के साथ दे जाय कि हमारे चैनल में शाम को "खास टाइम" या "दंगल" देखने से जो सर दर्द हो जाय तो इसका इस्तेमाल करें!

इन चैनलों को विज्ञापन देने वाले व्यापारियों को भी चाहिए कि विज्ञापन के साथ कुछ पैकेट आम जनता को भी वितरित करें।

मतलब हम पैसा खर्च कर के टी.वी. लाएं, हम नेटवर्क की फीस भरें और देखें क्या, आपका एजेंडा? क्यों भाई, कब तक मूरख बनाओगे? 

बहुत शांति रहती थी कमरे में। पड़ोस में भी शांति थी। लगता था पड़ोसी भी समाचार नहीं देखते। भले चैनल हर समय समाचार दिखाता रहता हो। सुबह काम पर जाने वाले या स्कूल जाने वाले बच्चों के माता पिता, कितनी रात तक समाचार देखेंगे?  बहुत शांति थी पास पड़ोस में भी। सीलिंग फैन की आवाज भी न आती तो पता ही नहीं चलता कि हम धरती के प्राणी हैं!

एक बार एक अधिकारी और दो कर्मचारी के कोरोना पॉजिटिव होने के कारण ऑफिस लॉक हो गया।  समय मिला तो मन मचला। बैगन, टमाटर, आलू भूनकर चोखा बनाने का मन किया। गैस चूल्हे पर रखकर भूनने वाली जाली खरीदने बाजार चले गए। जाली के साथ, एक लोहे की छोटी वाली कड़ाही भी खरीद लिए। सोचा, बारिश हुई और पकौड़ी खाने का मन किया तो फिर कड़ाही के लिए दुबारा आना होगा। 

बरतन बेचने वाली एक महिला थीं। मैने पूछा बैगन, टमाटर तो जाली में रखकर भून लेंगे लेकिन आलू कैसे भूनेंगे? उसने बढ़िया आइडिया दिया, "आलू तो बिना पानी डाले कूकर में पका सकते हैं! आलू को बिना छिले धो कर दो फाँक कर लीजिए और एक चम्मच तेल कूकर में डालकर, उस पर आलू रखकर चढ़ा दीजिए। एक सीटी में आलू पक जाएगा।"

कमरे में आकर दिन में बनारसी अंदाज में बैगन, टमाटर भूनकर, हरी मिर्च, प्याज और कच्चे सरसों के तेल के साथ खूब स्वादिष्ट चोखा बनाया। अरहर की गाढ़ी दाल को देशी घी, जीरा से छौंक दिए। दाल, चावल और चोखा। वाह! उस दिन का लंच लाजवाब था ।

एक दिन शाम को बारिश तो नहीं हुई लेकिन एक मित्र तिवारी जी आ गए।  किचन में रखी, नवकी छोटकी कड़ाही बुलाने लगी। तिवारी जी आधा प्याज और एक बैगन काटकर, दो साबूत हरी मिर्च थाल में सजा दिए। इधर बेसन घुला, उधर कड़ाही चढ़ी आँच पर। वाह! मजा आ गया। खूब स्वादिष्ट पकौड़ी और चाय। हम भी मस्त, तिवारी जी भी खुश।

बेसन ज्यादा घुल गया था तो अंत मे उसे भी कड़ाही में उड़ेल कर पका दिए। रात में बेसन की सब्जी बन कर तैयार हो गई। लेकिन अब न भूख लग रही थी न रोटी बनाने का मन ही हो रहा था। किचन को शुभरात्रि बोला और सो गया। भूख लगेगी तब देखा जाएगा। 

जिस वक्त शाम को हम मोबाइल चार्जिंग में लगाकर खाना पका रहे होते, हमारे शुभचिंतक मित्र खाना पकने की प्रतीक्षा में खुद पक रहे होते। कोई काम तो रहता नहीं, फोन मिलाकर मेरा हाल चाल पूछने लगते थे! उनसे बतियाते हुए, खाना पकाने के चक्कर में सब्जी में कभी नमक ज्यादा हो जाता था, कभी मसाला जल जाता था। मोबाइल भी ठीक से चार्ज न हो पाए। फिर यह निश्चय किया कि खाना पकाते समय मोबाइल स्विच ऑफ रखना है। अब मोबाइल भी चार्ज हो जाती, खाना भी पक जाता। बुद्धि अनुभव से ही आती है। 

एक दिन सोच रहा था, दूध पी लूँ। दूध गाय का है या भैंस का मुझे नहीं पता था। इतना जानता था कि दूध प्लास्टिक के पैकेट में था और मैने दुकानदार से सिर्फ यह पूछा था.. दूध है? पैकेट किस कम्पनी का है, पैकेट के ऊपर क्या लिखा है, कुछ नहीं पढ़ा। फाड़ा, उबाला, उबल गया तो एक कप चाय बनाया और शेष ढक कर रख दिया था। रात के बारह बजा चाहते थे , सोच रहा था, दूध पी लूँ। फ्रिज नहीं था, सुबह तक फट जाएगा, पैसा बर्बाद हो जाएगा। सोच रहा था पलकें बन्द होने, नींद के आगोश में जाने से पहले दूध पी ही लूँ।  इतना आसान भी नहीं था दूध पीना। 5 घण्टे हो चुके थे, ठंडा हो चुका था, फिर उबालना नहीं पड़ेगा क्या? उबलने का इन्तजार करना फिर ठंडे होने का इन्तजार करना, बार-बार उबालने से जो बरतन जल जाता, उसे मांज कर रखना, सब आसान था क्या? जितनी आसानी से सोच लिया..दूध पी लो, उतना सरल था क्या? सरल तब लगता है जब श्रीमती जी रख देती हैं लाकर, टेबुल पर। अकेले घर में, दूध पीना आसान था क्या?

यू ट्यूब में पनीर और शिमला मिर्च की रेसिपी देखूँ या लाइव कविता सुनूँ? बड़ी समस्या थी। वहाँ कोई टोकने/रोकने वाला नहीं था। जितनी मर्जी फेसबुक चलाऊँ या फिर मिर्जापुर पार्ट 2 देखूँ या कोई पसंद की कोई किताब पढूं लेकिन जो आलू गोभी खरीद कर लाता उसे कच्चा तो खाया नहीं जा सकता था!

दिसम्बर का महीना था, कोरोना का आतंक कम हुआ था लेकिन अकेले रहने की आदत पड़ चुकी थी। एक दिन बाहर घना कोहरा था और सुबह से लोकल फाल्ट के कारण बिजली कटी हुई थी। पड़ोसी परेशान होकर सामने बरामदे में टहल रहा था। उसका परिवार बड़ा था और कई किराएदार थे। सुबह से बड़बड़ा रहा था ... भोर में पानी नहीं चलाए, पता नहीं बिजली कब आएगी! लेकिन हम मस्त थे। हमको सिर्फ एक बाल्टी पानी चाहिए थी । स्व0 नीरज याद आ रहे थे ....जितनी भारी गठरी होगी, उतना तू हैरान रहेगा!

एक दिन सोच रहा था, सभी खिड़कियाँ/दरवाजे बन्द होने पर भी कमरे में धूल कहाँ से आ जाते हैं? मेरे कमरे में जाले बुनने के लिए मकड़ियाँ कहाँ से आती है? सफाई न करूँ तो मेरे स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा? मटर के दाने चावल में और टमाटर दाल में डालकर पका दिया जाय तो सब्जी बनाने की क्या जरूरत है? सोच रहा था, आज इतना सोच लिया, शेष कल सोचेंगे। वास्तव में क्या होना चाहिए!

एकाकी जीवन के अनुभव ने एक ज्ञान दिया, "मन ठीक न हो तो खाना बेकार बनता है। दाल में नमक अधिक हो सकता है, सब्जी कच्ची रह सकती है, भात जल सकता है। इसलिए जब खाना खराब हो तो पत्नी पर नाराज होने के बजाय यह पता लगाने का प्रयास करो कि उसका मन दुखी क्यों हैं?"

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12.6.24

कोरोना काल (1)

कोरोना काल में हम रोज के यात्रियों का बनारस से जौनपुर जाना-आना असम्भव हो गया था। ट्रेने बंद हो चुकी थीं और बस भी कम ही चलती थी। कोरोना का इतना आतंक था कि मास्क और सेनिटाइजर के प्रयोग के बाद भी किसी कोरोना वाले के सम्पर्क में आ जाने का खतरा बना हुआ था। रोज के यात्रियों की संख्या 100 से अधिक ही थी। हर आदमी का जौनपुर में अलग-अलग फ्लैट लेकर रहना कठिन था लेकिन नौकरी तो करनी थी। न जौनपुर में इतने फ्लैट थे न सभी के लिए पूरे संसाधन जुटा कर अकेले रहना ही संभव था। परिणाम यह हुआ कि 5/7 की संख्या में अपने-अपने ग्रुप बनाकर लोगों ने जौनपुर में कमरा लेकर रहना शुरू किया।

हम पाँच मित्र(जिसमें सभी अधिकारी थे) को जल्दी ही एक महलनुमा घर की तीसरी मंजिल में एक बड़ा हॉल, एक बड़ा किचन, उचित दाम में किराए पर मिल गया। घर बहुत बड़ा था और जिस मंजिल में हम रहते थे, उसमें और दूसरा कोई परिवार न था। बरामदे में नहाओ, गलियारे में नाचो, छत में घूमो, कोई पूछने वाला न था। बिस्तर-चादर सब अपने-अपने घर से ले आए थे और किचन का सामान, बर्तन भी थोड़ा-थोड़ा सभी घर से ले आए थे। विकेंड में या किसी छुट्टी के एक दिन पहले हम मोटर साइकिल चला कर, कभी कार से जौनपुर-बनारस जाते-आते थे। कोरोना काल में उस समय हमे यह सबसे सुरक्षित लगा। मास्क, हेलमेट पहनने के बाद, सुनसान सड़क पर बाइक चलाना, संभावित कोरोना से बचने का सरल उपाय था। 

भोर में उठकर घूमने जाते, चाय पीने के बाद लौटकर बरामदे में मोटे पानी की धार से नहाते, मिलकर भोजन बनाते और ऑफिस जाते। ऑफिस से आने के बाद नहाना, चाय, तास और रोज एक पार्टी। शुक्र है कि कोरोना काल में बियर/शराब की दुकाने खुल गई थीं। सभी के घर वाले चिंतित रहते कि पता नहीं कैसे रहते होंगे, कैसे बनाते, खाते होंगे और हम रोज मौज उड़ा रहे थे जिसका ज्ञान घर वालों को न था। हमने एक बड़ी आपदा को अवसर में बदल दिया था। 

यह सब अधिक दिन नहीं चला। अति हर चीज की बुरी होती है। पार्टी सप्ताह/पंद्रह दिन में एक दिन ठीक होती है लेकिन यह रोज-रोज की पार्टी से मैं घबड़ाने लगा। मेरे पढ़ने, लिखने के शौक में यह बड़ी बाधा थी। रोज शाम को अकेले में मन कचोटता, यह क्या कर रहे हो? ऑफिस के पास एक कमरे का फ्लैट ढूंढने लगा। 2/3 महीने के भीतर ही मन मुताबिक एक फ्लैट मिल गया और मैं सबसे क्षमा मांगते हुए ग्रुप से अलग हो गया। धीरे-धीरे 'एकाकी जीवन' मुझे रास आने लगा।


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3.1.24

यात्रा संस्मरण, लोहे का घर 74

लोहेकेघर की लम्बी यात्रा है, बनारस से मुम्बई। हम साइड लोअर बर्थ में लेटे हैं, सामने की सभी बर्थ पर सारनाथ के साथी बैठे हैं। मुंबई से गोवा, गोवा से पुणे, पुणे से मुम्बई, मुंबई से वापस बनारस 10 दिन की घुमक्कड़ी की योजना है। 8 में 5 वरिष्ठ, 3 युवा हैं। यह ट्रेन नम्बर 12168 बनारस से लोकमान्य तिलक जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेन की थर्ड ए. सी. बोगी है। सभी अपने- अपने तरीके से आनंद ले रहे हैं। कोई अमरूद काट रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है और कोई आनंद दायक गप्प लड़ाने में मस्त हैं। लगता है सभी घर की कैद से मुक्त हो, दौड़ने वाले लोहे के घर मे आकर बहुत खुश हैं। सुबह-सबेरे आँगन में कलरव करने वाले परिंदों की तरह सभी चहक रहे हैं।

ट्रेन मिर्जापुर में रुकी है। बनारस से अगला स्टॉपेज प्रयागराज है, यह इसका ठहराव नहीं है। यदि अपने निर्धारित स्टेशन पर ही रुके तो फिर भारतीय रेल कैसे रहे! भारतीय रेल जुगाड़ से चलती है, टेसन से पहले और टेसन के बाद भी रूकती है। कब चलेगी, इसकी घोषणा नहीं होती, इनके पास एक ब्रह्म वाक्य है, "यात्रियों को हुई असुविधा के लिए खेद है।"

एक भले साथी ने आलू पूड़ी का नाश्ता करा दिया, सभी ने चटखारे लेकर खाए, पान जमाया और अपनी-अपनी मोबाइल खोल ली। जैसे कक्षा में नाश्ते के बाद लड़के पुस्तक पलटने लगते हैं, वैसे ही लोहे के घर में यात्री नाश्ते के बाद मोबाइल खोल लेते हैं। 😃

ट्रेन मानिकपुर से आगे चली है। जब रोज के यात्री थे, दूर से आने वाली लेट ट्रेन, अपने ऑफिस से छुट्टी के समय मिल जाती थी तो खुशी होती थी, आज हम स्वयं दूर के यात्री हैं और अपनी ट्रेन एक घण्टे लेट है तो साथी यात्री मायूस हैं। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जाने पीर पराई! वाली बात है।

इधर एक रोचक घटना घटी। सारनाथ के ही एक यात्री मिल गए। इनकी टिकट कन्फर्म नहीं है, वेटिंग में है। अपने 9 साथियों में एक नहीं आ पाए तो अपने पास एक बर्थ खाली है। इस तरह वेटिंग टिकट वाले यात्री की समस्या का समाधान हो गया, हम लोग भी अपने परिचित साथी को अकस्मात पा कर खुश हुए। मंजिल चाहे जब मिले, सफर का आनंद लेना चाहिए और आनंद मिल गया।

जबलपुर पहुँचने वाली है ट्रेन। हम लोगों ने घर से लाया हुआ भोजन मिलबाँटकर कर लिया। तीन प्रकार की सब्जी और पूड़ी हो गई। अब सभी बिस्तर की तलाश में हैं। पूरे कूपे में हमारे सिवा कोई और है ही नहीं, आठों बर्थ में अपने ही साथी हैं, नई कहानी कहाँ से ढूंढे! बगल के कूपे में लोग खाना आर्डर देकर जबलपुर आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनका खाना जबलपुर में आएगा। हमारे साथियों ने घर से भरपूर पूड़ी सब्जी लाई थी, हमे खाना मंगाने की जरूरत नहीं पड़ी। अब धीरे-धीरे लोग कंबल, चादर ओढ़/बिछा रहे हैं।

लोहे के घर में सुबह चौंकाने वाली हुई। अलॉर्म चीखने लगा, "कोच में आग है, गलियारे से निकलें!" नींद खुली तो देखा सभी साथी हड़बड़ा कर जग रहे हैं। ट्रेन रुकी थी, अफरा तफरी का माहौल था लेकिन आग कहीं नहीं दिख रही थी। अभी हम सोच ही रहे थे कि बैग लेकर उतरें या छोड़ कर एक साथी बोले, "केहू सिगरेट पीले होई, एमे सेंसर लगल हौ, वही बजत हौ।" तब तक सुरक्षाकर्मी डंडा, टार्च लेकर दौड़ने/देखने लगे। कुछ भीतर कुछ बाहर कोच के नीचे पहियों में टार्च जलाकर देखने लगे। कुछ देर बाद चार कर्मी एक आदमी को पकड़े ले जा रहे थे और पूछ रहे थे, "किसको सिगरेट पीते देखे हो, बताओ?" यहाँ सबको देखने के बाद वे आगे बढ़ गए, अलार्म बजना बंद हुआ, लगभग 30 मिनट बाद ट्रेन चल दी। सभी ने संतोष की सांस ली और सब कुछ सामान्य हो गया।

अब नींद पूरी तरह खुल चुकी है। 'लोहे का घर' खुद भी जगा, सबको जगा भी दिया। कुछ अभी अलसाए पड़े हैं, कुछ फ्रेश होकर चाय पी रहे हैं। चाय,पानी बेचने वाले वेंडर लगातार आ/जा रहे हैं। सुबह के सात बजने वाले हैं, कोच के भीतर बल्ब अभी जल रहा है, बाहर भी रौशनी फैल रही है। बाहर/भीतर का अंधकार यूं चुटकियों में दूर हो जाय तो बस आनंद ही आनंद है। ट्रेन भुसावल से आगे चल रही है, अगला स्टेशन 'नासिक रोड' है।

सही समय पर लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुंची अपनी ट्रेन। वहाँ से तिलक नगर स्टेशन से लोकल ट्रेन पकड़कर छत्रपति शिवाजी स्टेशन पहुँचे। अपना सामान 'अमानती घर' में जमा किया और खा/पी कर 'गेटवे ऑफ़ इंडिया' घूमने निकल पड़े। छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से यह बहुत पास था। गेटवे ऑफ़ इण्डिया के ठीक सामने है 'होटल ताज'। होटल ताज को देखकर आतंकवादी घटना याद आ गई, जिसने पूरे देश को हिला दिया था। जिसके सामने भूतपूर्व प्रधानमंत्री बी पी सिंह की मृत्यु की खबर दब कर रह गई थी।

गेटवे ऑफ़ इण्डिया से घुमते हुए पैदल-पैदल मरीन ड्राइव तक गए। वहाँ लगभग एक घण्टे समुन्द्र के किनारे बैठकर सूर्यास्त का दर्शन किए फिर घूमते हुए वापस स्टेशन। मडगांव के लिए अगली ट्रेन रात 11 बजे थी। अभी ट्रेन में बैठे हैं। यह लगभग 11 बजे मडगांव पहुंचाएगी, वहाँ से गोवा घूमने जाना है।






गोवा घूम लिए। यहाँ का मौसम गर्म है। धूप इतनी तेज है कि काला चश्मा खरीदना पड़ा। बनारस में कड़ाके की ठण्ड और कोहरे का समाचार सुनकर यहाँ हर वर्ष आने की इच्छा हो रही है। शायद इसीलिए लोग हर वर्ष गोवा आते हैं।

वास्को रेलवे स्टेशन के पास रुके थे, यहाँ से कार लेकर एक दिन नार्थ गोवा, दूसरे दिन साऊथ गोवा चले गए। मांडवी रिवर,कोको बीच,कांडोली बीच, कलंगुट बीच,थँडर वर्ड,बाघा बीच, पंजी, शांता दुर्गा मन्दिर, मंगेश शिव मन्दिर, नेवी म्यूजियम, जापानी गार्डेन, कैसीनो पंजी सब घूम लिए। यहाँ Beach बहुत हैं, सबका नाम याद रखना भी कठिन काम है। बाघा बीच में समुन्द्र स्नान भी हुआ। समुन्द्र में नहाने के बाद बाहर निकल कर साफ पानी से भी स्नान किया।

यह 8 मित्रों का जीवंत ग्रुप है। कुछ अधिक जीवंत हैं जिन्हें बियर के बाद स्कॉच भी चाहिए। कुछ शाम तक इंतजार करते हैं, कुछ को सुबह जागने से ही चाहिए होता है। कुछ धार्मिक, शाकाहारी हैं, कुछ मांसाहारी लेकिन किसी को किसी के खान पान से कोई परेशानी नहीं है। सभी आनंद लेने में जुटे हैं। आज दिन में 3 बजे वास्को से पूना के लिए ट्रेन पकड़नी है, ट्रेन कल भोर में पुणे पहुंचेगी, वहाँ 4 दिन रुककर आस पास के इलाकों में घूमने की योजना है।


























गोवा एक्सप्रेस में बैठ गए। यह 3 बजे 'वास्को डी गामा' स्टेशन से चलकर 'निजामुद्दीन' तक जाएगी, हमको पूना जाना है। यह पुणे कल सुबह 4.15 पर पहुंचाएगी। ग्रुप में 5 वरिष्ठ नागरिक हैं लेकिन सभी अपर या मिडिल अपर बर्थ मिली है। पता नहीं इस बार रेलवे ने वरिष्ठ नागरिकों का कोई ध्यान क्यों नहीं रखा! बनारस से मुम्बई होते हुए गोवा चले आए लेकिन कहीं कोई जाँच नहीं हुई। मुम्बई में जब 'गेटवे ऑफ़ इण्डिया' में घूम रहे थे और ताज होटल को देख रहे थे तो यह खयाल आया कि यहाँ अपनी कोई जाँच नहीं हुई! पुलिस आतंकवादी घटना के बाद कितनी सक्रीय हो गई थी!!! मतलब घटना के बाद जाँच होती है, पहले नहीं।

हमारी बोगी जहाँ है, एक स्पीकर तेज आवाज में लगातार अपनी ट्रेन की घोषणा कर रहा है। अब इसकी घोषणा से खीझ हो रही है। सुन-सुन कर कान दर्द करने लगा। ट्रेन यहीं से बनकर चलती है, हम लोग होटल से 12 बजे चेक आउट कर गए, कहाँ जाते!ट्रेन आ गई तो बैठ गए। आधे घण्टे पहले बैठने का परिणाम यह हुआ कि ट्रेन चलने तक मराठी, हिंदी और अंग्रेजी में लगातार की जाने वाली घोषणा सुननी पड़ेगी। घोषणा खत्म हुई, इंजन का हारन बजा, ट्रेन चल दी। बाय-बाय गोवा, फिर मिलेंगे।

भयंकर भीड़ है गोवा एक्सप्रेस में। जो भीड़ चढ़ चुकी है वे मराठी के अलावा दूसरी भाषा भी बोल रहे हैं। भोलपन से कहते हैं, "जनरल समझ कर चढ़ गए!" टी टी भी परेशान है, एक डिब्बे से भगाता हैं, दूसरे में चले जाते हैं। दरवाजे के पास चपे हुए हैं। हड़काता है, "अगले स्टेशन में उतर जाओ, नहीं तो पेनाल्टी लगाएंगे।" ये सर्वहारा दिखते हैं, फाइन देने लायक भी नहीं दिखते। लोअर बर्थ वाले परेशान हैं, सभी चढ़े जा रहे। अब लगता है रेलवे ने बड़ी कृपा करी कि हमको अपर बर्थ दे दिया। बीच से भगाए गए तो ये अब दरवाजे के पास जमा हैं। इस डिब्बे में लगभग 200 से ज्यादा बिना बर्थ वालों की संख्या है। कुछ देर में ये जमीन पर सो भी जाएंगे। यह स्लीपर बोगी है।

हमारे साथी इधर-उधर बिखरे हैं। सभी की यहाँ-वहाँ अपर बर्थ है। इधर ठंड नहीं होगी, एक रात की यात्रा है, मानकर इन्होने स्लीपर में रिजर्वेशन करा लिया। ठंड तो नहीं है, भीड़ ज्यादा है। घाटप्रभा स्टेशन में ट्रेन रुकी है, टी टी सबको उतार रहा है। उतारते-उतारते ट्रेन चल दी! अब कैसे उतारेगा!!! बाहर तो फेंक नहीं सकता। अब फाइन मांग रहा है। पुलिस को बुलाने की धमकी दे रहा है। आसान नहीं है टी टी की नौकरी। हमको इस भीड़ का खूब अनुभव है लेकिन जो परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं, परेशान हैं।

एक वेंडर वाला बड़ा पाव लेकर आया। मैने पूछा, "कितने का है?" बोला, "30/-का 2 बड़ा, 2 पाव।" मैने पूछा, "बड़ा कितने का, पाव कितने का?" वो बोला, "बड़ा 25/-का 2। मैने कहा, "5/- का 2 पाव देना!" वह मुकर गया! हड़बड़ा कर बोला, "ऐसा थोड़ी न होता है।" मैं हँसने लगा, "मैं दाम तो तुम्हारे ही हिसाब से दे रहा हूँ, बड़ा 25/- का तो पाव 5/-का ही न हुआ? वह बड़बड़ाते हुए चला गया, "लेना हो तो पूरा लो!" नीचे बैठे सभी यात्री हँसने लगे। दूसरा वेंडर बड़ा पाव लेकर आया, उसने दाम बताया, 2बड़ा 20/-का, 2पाव 10/-का। मैने 20/-में 2 बड़ा खरीद लिया। नीचे बैठे यात्री हँसने लगे, एक बोला, "अभी तो आपको 2पाव चाहिए था!" मैं भी हँसने लगा, "नहीं, हमको 2 बड़ा चाहिए था, यह ईमानदार वेंडर है, इसलिए ले लिया।" लोग फिर हँसने लगे! पता नहीं मेरी बातों से लोग क्यों हँसने लगते हैं!🤔

बोगी की भीड़ कुछ कम करने में टी टी को सफलता मिल गई। रात के 10 बज रहे हैं, लोगों ने अपना बर्थ सजा लिया है। ट्रेन 46मिनट विलम्ब से रायाबाग पहुंची है। अब हम भी लिखना बंद कर सोते हैं, सुबह 4 बजे उठना है।

गोवा एक्सप्रेस अपने सही समय भोर में पूना पहुँच गई। ट्रेन में ही पुणे के एक यात्री की सलाह पर पूना रेलवे स्टेशन से 2km दूर 'पंद्रह अगस्त चौक' पर होटल 'टूरिष्ट' मिल गया, वहाँ 4दिन रुके। पहले दिन तो खूब आराम किया गया और पूना शहर में दगड़ू सेठ गणेश जी' का दिव्य दर्शन किया गया और आस पास शहर में ही घूमा गया।

दूसरे दिन एक कार लेकर वहाँ से 123 किमी दूर छठें ज्योतिर्लिंग 'भीमा शंकर' का दर्शन किया गया। वहाँ एक अलग प्रकार की अव्यवस्था देखने को मिली। मन्दिर से 2 किमी पहले ही दूर से आने वाली गाड़ियों को रोक दिया जा रहा था और वहाँ से दूसरे लोकल वाहन से प्रति व्यक्ति 20/- लेकर मन्दिर तक पहुंचाया जा रहा था। इस व्यवस्था का लाभ स्थानीय वाहनों को खूब मिल रहा था। मन्दिर से बहुत पहले से ही लम्बी लाइन शुरू हो गई थी। पंक्तिबद्ध घंटों खड़े होकर शिवलिंग का दिव्य दर्शन हुआ। काशी विश्वनाथ में तो अब हम काशी वासी शिवलिंग को छू नहीं पाते लेकिन यहाँ 'स्पर्श दर्शन' का सुख मिला। एक साथी तो वहीं शिवलिंग पकड़कर दण्डवत लेट गए। लौटने के रास्ते में सीढ़ियों के किनारे कई प्रकार की दुकाने सजी थीं। मुख्य रूप से खोए से बने खाद्य पदार्थों, निम्बूरस पिलाने वालों की अधिकता थी।

तीसरे दिन लोनावला और खंडाला घूमने गए। पुणे से लोकल ट्रेन मात्र 15/- रुपए के टिकट पर लोनावला पहुंचाती है। साथियों की राय बनी कि आने/जाने में कार में हजारों रुपिया क्यों खर्च किया जाय! वहाँ पहुँच कर गाड़ी ले लेंगे। हम लोगों ने यही किया। लोकल ट्रेन में खूब भीड़ थी लेकिन बैठने की जगह मिल गई, लोकल ट्रेन में घूमने का यह नया आनंद दायक अनुभव था। बैठने की सीट मिल जाय तो लोकल ट्रेन में यात्रा करना कोई बुरा नहीं है लेकिन दोनो बांहों से सिक्कड़ पकड़ कर, धक्के खाते हुए, खड़े होना पड़े तो भारी पड़ता है। रोज लोकल ट्रेन में यात्रा करने वालों को शायद ही सीट मिल पाती होगी।

लोनावला पहुँच कर एक ऑटो से हम 4 लोग 4 घण्टे घूमते रहे। हम 8 लोगों के ग्रुप में 4 साथी पूना न आकर, 'दमन दीप' चले गए। 4 लोगों के साथ घूमना थोड़ा आसान पड़ता है, जहां जाओ, गाड़ी आसानी से मिल जाती है। सोचे थे, खंडाला में मौसम ठंडा होगा लेकिन यहाँ भी धूप/गर्मी थी। जैकेट बांहों में लेकर घूमना पड़ा। एक बात और समझ में आई कि पूना से लोनावला जाने के बजाय, लोनावला में ही होटल लेकर सुबह/ शाम घूमते तो पहाड़ों में घूमने का और आनंद आता, लेकिन 31 दिसम्बर/1जनवरी का दिन होने के कारण यह लगा कि वहाँ होटल बहुत मंहगा मिलेगा, पूना से जाया /आया जाय, पूना का होटल बढ़िया है, इसे न छोड़ा जाय। खंडाला से पुणे लौटने में शाम हो गई।

थका देने वाली यात्रा के बाद चौथे दिन कहीं दूर घूमने की इच्छा नहीं हुई। पूना में ही शाम के समय 'सारस बाग' घूमने गए। 'सारस बाग' में सारस नहीं मिला, गणेश जी का मन्दिर और मूर्तियों का संग्रह मिला। पार्क खूबसूरत है, एक तालाब भी है। तालाब में कमल थे, कछुए थे। पार्क के पीछे की तरफ एक मेला लगा था। खाने /पीने की दुकाने सजी हुई थीं। साल का पहला दिन होने के कारण खूब भीड़ थी। 'सारस बाग' से निकल कर मन हुआ एक बार फिर दगडू सेठ भव्य गणेश जी का दर्शन किया जाय। यहाँ भी खूब भीड़ थी। मंदिरों में भीड़ देखकर लगा कि सनातनियों ने पहली जनवरी को एक बड़े त्योहार के रूप में अंगिकृत कर लिया है! अब होटल जा कर आराम करना था, रात में हमलोगों की मुंबई जाने वाली ट्रेन थी।
































रात की ट्रेन पकड़कर 2 जनवरी को, भोर में लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुँचे। यहाँ अमानती में अपना सामान जमा कर 60-70 किमी दूर जीवदायिनी देवी के दर्शन का प्रोग्राम बना। साथियों को लोकल ट्रेन में चलने का आनंद मिल चुका था। मात्र 20/- प्रतिव्यक्ति की टिकट कटा कर हम लोग तिलक नगर टर्मिनल से कुर्ला, दादर में लोकल ट्रेन बदलते हुए 'वीरार' पहुँचे। वीरार से 2 किमी की दूरी पर ऑटो रिक्शे से 'जीवदायिनी मन्दिर' पहुँचे। माता जी का मन्दिर बहुत ऊँचाई पर है। मन्दिर तक पहुँचने के लिए रोप वे, लिफ्ट की सुविधा है। माताजी का दिव्य दर्शन करने के बाद हम लोग फिर लोकल ट्रेन पकड़ कर दादर आ गए। तबतक आधा दिन बीत चुका था, लोकमान्य तिलक टार्मिनल से अपनी ट्रेन देर शाम 10.45 पर थी।

दादर में भोजनपरान्त एक कार ले लिया और मुम्बा देवी, महालक्ष्मी मन्दिर दर्शन करते हुए, समुन्द्र के किनारे- किनारे वापस लोकमान्य तिलक टर्मिनल पहुँच गए। जहाँ से रात में ट्रेन पकड़नी थी।

इस समय ट्रेन इटारसी पहुँचने वाली है। आरक्षण बढ़िया मिला है। पूरे कूपे की आठों बर्थ पर हम आठ साथियों का कब्जा है। सभी आनंद से अपनी यात्रा का संस्मरण करते हुए फोन से अपने-अपने घर बतिया रहे हैं। हम संस्मरण लिख रहे हैं। खबर लगी है, बनारस में कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है, कल बारिश भी हुई थी। रात 2 बजे अपनी ट्रेन बनारस पहुँचेगी। लग रहा है बनारस पहुँचते ही सबकी गर्मी निकल जाएगी।