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23.5.24

सुबह की बातें (15)

पार्क में, खूब ध्यान से देख रहा था पंछियो/हिरणों की मौज मस्ती। 

ठुमक-ठुमक कर मॉर्निंग वॉक कर रहा एक मोर, चलते-चलते दौड़ने लगा, दौड़ते -दौड़ते ठहर कर पँख फैला दिया और फिर बड़ी अदा से नृत्य करने लगा!

एक दूसरा मोर अनार के पौधों से लाँग जम्प करता हुआ आया और टहल रहे मोर से बतियाने लगा। 

दूर, लोहे के सलाखों से घिरे हिरण पार्क में मोरनियाँ मिट्टी से चुग रहे थीं अपना आहार।  

नीम की शाख में टांय-टांय कर रहे थे बहुत से तोते। कुछ डाल पकड़कर झूला झूल रहे थे, कुछ चोंच लड़ा रहे थे। 

एक कउआ उड़ता हुआ चोंच में एक तिनका दबाए हुए आया और बैठ गया हिरण की पीठ पर। उछलते-उछलते गरदन पर चढ़ गया और कान में तिनका घुसेड़ने लगा। हिरण घबड़ा कर दौड़ा और कउआ उड़ चला!

एक नीम के खोते में बैठा था उल्लूओं का जोड़ा, मैं जैसे-जैसे पास जाता, उनकी ऑंखें चौड़ी होती जाती! मैने सोचा, उजाले में उल्लू कहाँ देख पाते हैं और पास चलते हैं। पास जा कर फोटू खींचने लगा तो फुर्र से उड़ गए!!! 

कुछ तोते, कुछ कबूतर, कुछ हीरन कर रहे थे चहल कदमी। मुझे देख तेजी से भागने लगे मोर। तब तक कुछ और दो पाये भी आ गये थे पार्क में। देखते ही देखते मोर उड़ कर हो गए शालाखों के पार, वन विभाग की जमीन पर।

एक कोने में टप-टप टपक रही थी नल की टोंटी। चीख रही थीं, चरखी चिड़ियाँ। एक-एक कर उड़-उड़ बैठतीं टोंटी के ऊपर, लटकातीं गरदन और खोल देतीं अपनी चोंच। टप-टप टपकता पानी वरदान था उनके लिये। चौड़े मुँह वाले पात्र में, पास ही रखा था पानी। कूद-कूद भिंगोती पंख, फुर्र-फुर्र उड़तीं और फिर-फिर बैठतीं टपकते नल की टोंटी के ऊपर। 

अब मैं उनको सुनना चहता हूँ जिनकी बोली समझ में नहीं आती। अब मैं उनसे बतियाना चाहता हूँ जो मेरी बोली नहीं समझते। जिनकी बोली समझता हूँ, उनकी बोली इतनी मीठी नहीं लगती! 

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16.10.23

सुबह की बातें (14)

धूप निकल आई है। छाँव है घने नीम के नीचे। चहुँ ओर आनंद की वर्षा का आलम है। एक तोता नीम की शाख से हवा में तैरता हुआ अनार के पौधों के बीच-बीच से निकलता हुआ फिर नीम में गुम हो गया। जाते-जाते उसने खण्डहर पर बैठी कौवी को आँख मारी या टाँय से छेड़ दिया कि साथी कौआ देर तक उसी दिसा में मुँह कर काँव-काँव करता रहा। कौए के चोंच इतनी चौडा़ई में खुलते, बंद होते कि लगा खा ही जायेगा तोते को। तोते की तरफ से फिर टाँय-टाँय की आवाज आई और कौआ पंख फैलाकर उड़ता हुआ घुस गया उसी नीम के पेंड़ पर। इधर कौवी उड़ी और हिरण के गरदन के ऊपर बैठ उसके कान में कुछ कहने लगी। हिरण ने हौले-हौले मुंडी हिलाई। कौवी संतुष्ट हो कौए की तलाश में उधर ही उड़ चली।


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27.10.22

सुबह की बातें(13)

अभी सूर्योदय नहीं हुआ है। भोर का अजोर है। धमेखस्तूप पार्क में दो चक्कर लगाने, घास में टहलने, व्यायाम करने और 10 मिनट ध्यान करने के बाद इतना उजाला हो चुका है कि फोटोग्राफी की जा सके। यहाँ नीम के कई घने वृक्ष हैं। इसे पार्क को आप नीम पार्क भी कह सकते हैं। कुछ वृक्ष के नीचे चारों ओर घेर का लकड़ी के खूबसूरत बेंच बना दिए गए हैं। यहाँ बैठकर घण्टों ध्यान कर सकते हैं, चिड़ियों की बोली सुन सकते हैं और मोर/मोरनियों को घूमते देख सकते हैं। किस्मत अच्छी है तो मोर के नृत्य भी देख सकते हैं। 

जहाँ हम खड़े हैं उसके उत्तर दिशा में धमेखस्तूप है और दक्षिण में वन विभाग की बाउंड्री वाल है। बाउंड्री के उस पार पर्याप्त संख्या में मृग/चीतल हैं। उजाला होने से पहले सियार भी खूब चीखते हैं। कुल मिलाकर यहाँ का वातावरण बिलकुल प्रदूषण मुक्त और शांत है। कुछ मिनट बैठ कर, पलकें बन्द कर, सिर्फ सुनते रहने में भी आनन्द है। 

https://youtu.be/acAjvbxWPZg 

4.10.22

सुबह की बातें-12

पत्ते झरते हैं तो शोर नहीं होता। पत्ते उगते हैं तो शोर नहीं होता। हम चीख कर रोते हुए जन्म लेते हैं। गूंगे पैदा हुए तो भी दूसरे शोर करते हैं..लड़का हुआ है/लड़की हुई है! मरते हैं तो भी शोर होता है..राम नाम सत्य है। नहीं, मुर्दे को नहीं सुनाते। चुपचाप खुद स्वीकार भी नहीं करते, राह चलते दूसरों को सुनाते हैं..जगत मिथ्या है, राम नाम ही सत्य है! कितने तो ढोल, नगाड़े बजा कर निकालते हैं शव यात्रा। मसान से लौटने के बाद राम नहीं सिर्फ काम ही काम। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक एक कोलाहल है। पत्ते खामोशी से उगते, जीवन भर हँसते और एक दिन चुपचाप झर जाते हैं। हम शांतिदूत की तरह पत्ते कोई शोर नहीं करते।  



सुबह की बातें-11

सुबह के 6 बज चुके हैं। जैन मंदिर सारनाथ के पुजारी आ चुके हैं। मन्दिर का गेट खोलने के बाद इनका पहला काम परिंदों को दाना देना है। इनके पास बिस्कुट भी होता है। गेट खोलते समय कुछ कुत्ते दिख गए तो उन्हें प्यार से बिस्कुट भी खिलाते हैं। धमेख स्तूप पर बैठे कबूतरों को इन्ही की प्रतीक्षा होती है। जैसे ही पुजारी दाने बिखेरते हैं, कबूतर उड़-उड़ कर आने लगते हैं। जैसा कि होता है, जब सरकार निर्धनों को अन्न बांटती है, कुछ सबल भी दान लूटने आ जाते हैं। वैसे ही जब पुजारी पंछियों के लिए दाने बिखेरते हैं, दाना चुगने कुछ कौए भी आ जाते हैं! अधिक शोर भी यही करते हैं। कुछ गिलहरियां भी आ जाती हैं। हम ट्वीटर पर ट्वीट करते हैं, ये परिंदे यहाँ खूब चहकते हैं।



सुबह की बातें-10

सुबह-सुबह घने नीम के वृक्षों से धमेख स्तूप तक अनवरत उड़ते रहने वाले तोते सन्डे नहीं मनाते। कोई ऑफिस नहीं, कोई छुट्टी नहीं। ये जब स्तूप से उड़कर वापस नीम की शाखों पर बैठते हैं तो कुछ कौए काँव-काँव करने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे नास्तिक पितृपक्ष में ब्राह्मणों के भोजन का उपहास उड़ा रहे हों! तोते भी टांय-टांय कर प्रतिरोध करते हैं। 


धूप तेज हो चली है। घने नीम से अनवरत एक-एक कर पीले पत्ते झर रहे हैं। कोयल के साथ पेड़की ने खूब समा बांधा है।  ये क्या कहते हैं, कुछ समझ में नहीं आता।  गिलहरियों का फुदकना बदस्तूर जारी है। लॉन में कई प्रकार के पौधे हैं मगर कोई आपस में नहीं झगड़ते। कोमल लताएँ सूखे वृक्ष के सहारे ऊपर तक चढ़ जाती हैं। कोई किसी की टांग नहीं खींचता। 


झाडू लगाने वाला आ चुका है। उसने झाड़ू से पत्तों को एक स्थान पर इकट्ठा कर लिया है, जिस पर सूर्य की स्वर्णिम किरणें पड़ रही हैं। ऐसा लगता है जैसे झाड़ू वाले ने झाड़ू लगाकर कुछ सोना इकठ्ठा कर लिया है! अब चलना चाहिए। आज की सुबह रोज की तरह आनंद दायक रही।



19.7.22

साइकिल की सवारी 1

दुर्घटना के बाद मोटरसाइकिल चलाने पर प्रतिबंध ही नहीं लगा मेरी मोटरसाइकिल श्रीमती जी द्वारा बेच भी दी गई। मैं दुखी होकर मोटरसाइकिल को जाते हुए देखता रह गया। अब घर से 5 किमी के दायरे में जाने के लिए भी 'पैदल' हो गया। कुछ ही विकल्प थे..पैदल चलो, कार के लिए ड्राइवर बुलाओ या रिजर्व गाड़ी बुलाओ। 3,4 किमी के लिए यह महंगा सौदा था। तभी तय किया कि सायकिल खरीदी जाय। दूर भीड़ वाली सड़क पर न ले जाने के आश्वासन के साथ मुश्किल से साइकिल खरीदने की अनुमति मिली और मैं रोज एक महीने से भोर में सायकिल लेकर निकलने लगा। 


घर से सारनाथ पार्क लगभग 3 किमी की दूरी पर है। भोर में 5 बजे सायकिल लेकर पार्क में जाना, सायकिल खड़ी कर एक घण्टे पार्क में घूमना, साइकिल लेकर चाय पीते, फल/दही खरीदते हुए, आराम-आराम से वापस आना, नहाकर नाश्ते के बाद 7.30 तक ऑफिस जाने के लिए घर छोड़ देना, 1.30 घण्टे बस के सफर में फेसबुक चलाना, 9.30तक ऑफिस पहुँच जाना, दिनचर्या बन गई। 


सन्डे(छुट्टी के दिन) दिनचर्या बदल जाती है। जिस दिन ऑफिस नहीं जाना होता, मन बहक जाता है। आज सन्डे था, सायकिल पर बैठते ही मन उड़ने लगा। लगभग 1 घण्टे, गांव के रास्ते साइकिल चलाकर पहुँच गया खिड़किया_घाट। खिड़किया घाट अब नमो_घाट के रूप में विकसित, बनारस के बेहतरीन घाटों में से एक, भव्य घाट बन चुका है। सड़क मार्ग, जल मार्ग और रेलमार्ग से जुड़ा यह घाट बनारस का सबसे खूबसूरत घाट है। इस घाट के बगल में खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं। राजघाट के पुल के अलावा सन्त रविदास का भव्य मंदिर है, लाल खान का मकबरा है, वरुणा और गंगा का संगम तट, आदिकेशव घाट है और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध बसन्त कॉलेज है। बसंत कॉलेज से आदिकेशव घाट जाने का, हराभरा रमणीक मार्ग है और मार्ग में मिलता है एक जिंदा कुँआ जिसका पानी आज भी बहुत मीठा है।


सारनाथ से आदिकेशव घाट, बसन्त कॉलेज होते हुए राजघाट जाने के मार्ग में और भी बहुत कुछ है।  पँचकोशी परिक्रमा के भीतर स्थित कपिलधारा है, सूर्यदेव_का_मंदिर है, सुंदर तालाब, हनुमानजी, शनि देव और शंकर जी का मंदिर है जिनके चित्र मैं अपने पेज चित्रों का आनंद  में दिखाता रहता हूँ। मार्ग में एक श्मशान घाट और निषाद राज का द्वार भी मिलता है।

 

आज बसन्त कॉलेज के कुएँ (#अमृत_कुण्ड) का पानी पीकर लौटते समय एक पुलिया दिखी। पुलिया में 4 स्थानीय ग्रामीण बैठे हुए हवा खा रहे थे और गप्पें लड़ा रहे थे। उन चारों में नेपाली टोपी पहने बहादुर भी दिखे जो बायीं हथेली पर रखी सुर्ती दाएं हाथ के अंगूठे से रगड़ रहे थे। हम भी थके थे तो वहीं साइकिल खड़ी कर उनसे गप्पें लड़ाने लगे। उन्होंने तीन गांव का नाम लिया और हाथ के इशारे से बताया यह गांव इधर, वह  गाँव उधर और हम जहाँ बैठे हैं, उस गाँव का नाम यह है। गाँव के नाम में क्या रख्खा है, हम भूल गए और याद कर लिख भी दें तो आप कौन सा ज्ञान में वृद्धि कर लेंगे! 


पुलिया में बैठकर, ग्रामीणों से बात कर, बहुत आनन्द आया। मुझे पुलिया वाले श्रीमान कानपुर के अनूप शुक्ल  जी की बहुत याद आई फिर याद आया, वे तो अभी अकेले कश्मीर घूम रहे हैं! अपने दौड़ गुरु श्रीमान Satish Saxena  जी की भी याद आई जो अभी जर्मनी में श्रीमान Raj Bhatia  जी के गाँव में घूम रहे हैं। हम पुलिया पर बैठकर यही सब सोच रहे थे कि नेपाली बहादुर ने खैनी मेरी ओर बढ़ाते हुए पूछा, आप भी लेंगे? दूसरा समय होता तो खुशी-खुशी झट से ले लेता मगर इनकार करते हुए बहादुर को धन्यवाद दिया। ग्रामीणों ने सुर्ती न खाने के लिए जब मेरी बहुत प्रशंसा करी और अपनी आलोचना करी कि सुर्ती खाना गलत बात है लेकिन आदत पड़ गई, क्या करें! तो मुझे अपने न्यूरो डॉक्टर पर बहुत गुस्सा आया जिसने मुझे दवाई चलने तक नशा करने से मना किया हुआ है।


बहुत देर बैठने, गप्पें लड़ाने के बाद जब धूप तेज होने लगी तो मैं पुलिया से उतरा और सबसे विदा लेकर घर की ओर चल दिया। रास्ते भर सोचता रहा, काशी सिर्फ अस्सी घाट, संकटमोचन, BHU, गोदौलिया, बाबा विश्वनाथ जी का दरबार या गलियों की चाय-पान की अड़ी ही नहीं है, काशी में बहुत कुछ है जिसे काशीवासी भी एक जीवन मे पूरा नहीं देख पाते।

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31.12.21

सुबह की बातें-9


रजाई से 

सर बाहर निकाल कर

दोनों कानों को  

बन्द खिड़की के उस पार फेंको!


कुछ सुनाई दिया? 

बारिश!

नहीं sss 

ओस की बूंदें हैं 

थाम नहीं पा रहे पत्ते

टप टप टपक रहीं हैं 

धरती पर। 


मौन 

कभी, कहीं नहीं होता

भोर में तो और भी शोर होता है!

आंखों से 

न दिखाई देने वाले जीव

कलियां, फूल, पत्ते

सभी करते हैं संघर्ष

जहां संघर्ष है

वहीं शोर है

ओस की पहली बूंद से

सूर्य की पहली किरण तक

जो मौन है

उसमे भी शोर है

सब

दिखाई नहीं देता 

सब 

सुनाई नहीं देता।


यह जो मौन का शोर है न?

बड़ा तिलस्मी है

सुनो!

पहली दफा

मधुर संगीत सुनाई देता है

आगे

तुम्हारी किस्मत!

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सुबह की बातें-8


नाच मेरी बुलबुल! तुझे पैसा मिलेगा।


इत्ते जाड़े/कोहरे में क्यों नाचें? ये चावल के दाने बहुत हैं।


आज रात को नया साल आने वाला है। खुशी मनाओ।


हाय राम! मतलब बम फोड़ोगे? शोर मचाओगे? मेरे घोसले में अभी अंडों से निकले दो बच्चे हैं।


नव वर्ष में हम बम नहीं फोड़ते हैं पगली! चिंता मत कर। मगर ये बता तुम लोगों के जीवन में नया साल कभी नहीं आता?


आता है न! साल में दो बार आता है। जब जब फसल कटती है, नया साल आता है। खूब दाने मिलते हैं खेतों में। तुम्हारी कृपा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मगर रुको! मुझे दो पायों पर कभी भरोसा नहीं होता। बिना शोर किए ये कोई खुशी मना ही नहीं सकते। सच सच बोलो! क्या-क्या करोगे?


मुर्गा खाएंगे, शराब पीएंगे, नाचेंगे, गाएंगे, केक काटेंगे और सुबह से शाम तक सबको नए साल की शुभकामना देंगे और क्या!


बस बस बस...बिचारे मुर्गे! हमको तो नहीं खाओगे?


तुम्हारे जिस्म में मांस ही कितना है! कभी खाया तो नहीं, एक दिन चखूं क्या?


राक्षस कहीं के! तुम लोग अपनी खुशी के लिए कुछ भी कर सकते हो। तुम्हारी प्रार्थनाएं, तुम्हारी शुभकामनाएं, तुम्हारे दान/पुण्य, पूजा-पाठ, दुआ/सलाम सब एक ढोंग है। बहुरूपिए और दोहरे चरित्र वाले हो। तुम्हें जिसने अच्छा समझा, धोखा खाया। 


अरे चुप! चुप! इतना गुस्सा मत कर। हम जिसे प्यार करते हैं उसे थोड़ी न खाते हैं। नए साल का मजा ले।

बोल! हैप्पी न्यू ईयर। 


अब ज्यादा मुंह न खुलवाओ। तुम सब मतलबी और स्वार्थी हो। प्रत्येक प्राणी को सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए पालते हो। किसी को मीठी बोली के लिए, किसी को उसके मांस के लिए तो किसी को उसके दूध के लिए।  कल एक गौरैया कित्ता सच कह रही थी....


आदमी से रहना, साथी जरा संभल के। ये जिसको प्यार करते, उसपे इनके पहरे। हमको सिखा रहे हैं, गोपी कृष्ण कहना। जानते नहीं जो प्रेम के ककहरे।


और बुलबुल फुर्र से उड़ गई।


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17.12.17

सुबह की बातें-7

सुबह उठा तो देखा-एक मच्छर मच्छरदानी के भीतर! मेरा खून पीकर मोटाया हुआ,करिया लाल। तुरत मारने के लिए हाथ उठाया तो ठहर गया। रात भर का साफ़ हाथ सुबह अपने ही खून से गन्दा हो, यह अच्छी बात नहीं। सोचा, उड़ा दूँ। मगर वो खून पीकर इतना भारी हो चूका था क़ि गिरकर बिस्तर पर बैठ गया! मैं जैसे चाहूँ वैसे मारूं। धीरे-धीरे मुझे उस पर दया आने लगी। आखिर इसके रगों में अपना ही खून था। मैंने उसे हौले से मुठ्ठी में बंद किया और बाहर उड़ा दिया। इस तरह वह लालची अतंकवादी और मैं सहिष्णु भारतीय बना रहा।

संडे की नींद मोबाइल के अलारम से नहीं, मित्र के फोन काल से खुलती है। मोबाइल में नाम पढ़ा तो चौंक गया..रावत जी! बहुत दिनों बाद किसी शतरंज के खिलाड़ी ने याद किया। शतरंज खेलना तो वर्षों से छूट ही चुका है। अब लगता है ये हमको हरा के ही मानेंगे! कोई जमाना था जब शतरंज खेलते सुबह से शाम हो जाती थीं। गुलाब पान वाले की अडी में जब हम लोगों की बाजी जमती तो लोग खड़े होकर, मोमबत्ती जला कर भी शतरंज देखते। लेकिन आज इतनी सुबह!

नमस्कार! सब ठीक तो है?

संडे को तो आप मार्निंग वॉक करने जाते हैं न? हम भी चलेंगे।

हां, सूर्योदय के बाद चलेंगे अभी तो अंधेरा है।

सूर्योदय हो चुका पण्डित जी! सुबह के सात बज रहे हैं। रजाई से मुंह बाहर निकालिएगा तब ना।
तब निकलिए! गुलाब की दुकान पर मिलते हैं।

साइकल चला कर जब पान की दुकान पर पहुंचे तो वे सड़क किनारे खड़े हो, एक टक ताकते हुए मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। न मेरा आना जान पाए न साइकिल खड़ी करना। मैंने हाथ हिलाया..

उधर क्या देख रहे हैं?

अरे! किधर से आ गए!

रावत जी को देखकर झटका लगा। जिस्म ठीक ठाक था लेकिन पूरे बाल झक सफेद हो चुके थे!

आप के बाल तो पूरे सफेद हो चके हैं? बूढ़े हो गए आप तो!

आपके काले हैं क्या? जब से रिटायर हुए हैं हेयर डाई लगाना छोड़ दिए। आप छोड़ दीजिए आपके भी सफेद हो जाएंगे।

अब यह दूसरा झटका था। मतलब डाई लगाना छोड़ दें तो अपने बाल भी ऐसे ही सफेद दिखेंगे! हम कितने भ्रम में जीते हैं!

डाई न लगाते होते तो इतनी जल्दी सफेद न होते। लेकिन अब मन नहीं करता। क्या फ़र्क पड़ता है! बेकूफी किए जो डाई लगाना शुरू किए।

शतरंज ?

शतरंज भी छूट गया।

आज कैसे याद किए?

लोहे के घर के अलावा आप की और भी दुनियां है पण्डित जी। आप सब भूल चुके हैं। आप ने नहीं याद किया तो हमने सोचा संडे को तो मिलेंगे ही, उसी समय आपको पकड़ते हैं। सुबह की सैर भी हो जाएगी, आप से भेंट भी। कैसी रही ये वाली चाल?

अरे! इसका तो कोई जवाब ही नहीं। बढ़िया आइडिया है।

Image may contain: one or more people, people standing and outdoorखंडहर वाले लॉन में धमेख स्तूप के पीछे से निकलकर सूर्यदेव थोड़ा ऊपर आ चुके थे। खंडहरों के बीच एक अकेली विदेशी महिला सेल्फी लेते हुए अपना ही वीडियो बना रही थीं। इक्का दुक्का पर्यटक आने लगे थे। स्तूप पर कबूतर कम और कौए अधिक बैठे थे। अकेले घूमने में सिर्फ देखना और महसूस करना होता है, कोई मित्र साथ हो तो महसूस की हुई हर बात जुबां पे आ जाती है। मैंने रावत जी को छेड़ा..

धमेख स्तूप में भगवान बुद्ध की अस्थियां हैं क्या इसलिए स्तूप पर कबूतरों से अधिक कौए बैठे हैं?

रावत जी हंसने लगे...कौए कहां कम हैं पण्डित जी? हर जगह कबूतरों की तुलना में कौए अधिक पाए जाते हैं।
और गिद्ध? गिद्ध क्यों गायब हो गए?

गिद्ध जब जान गए कि आदमी के रहते मांस मिलना मुश्किल है तो कहीं मर/खप गए होंगे!

हमने एक दो चक्कर और लगाए। मौसमी फ़ूल खिल चुके थे। एक ग्रुप अब धर्मराजिका स्तूप के पास बैठकर पूजा अर्चना कर रहा था। अकेली विदेशी महिला अभी भी अपनी सेल्फी/वीडियो बनाने में मगन थी। मुझे लगा...
एक हम ही नहीं पागल, बेचैन हजारों हैं।

2.12.17

सुबह की बातें-6

साइकिल ले कर भोर में सैर को निकला तो मॉर्निंग हो ही रही थी और थोड़ा गुड-गुड लगना शुरू ही हुआ था।  पूरा गुड लगता कि सजे हुए मैरिज लॉन दिखने लगे। भीगी_पलकें का समय था। बिदाई की बेला थी। घर की अजोरिया परायों की होने वाली थी। अपना भी मन शोकाकुल हो इससे पहले तेज पैडिल मार कर आगे बढ़ गया। आगे दूसरा मैरिज लॉन दिखा। दरवाजे पर कुत्ते ही दिखे, पलकें भीतर भीगी हो रही होंगी। आगे पान की दुकान पर साइकिल खड़ी कर पैदल पैदल हो गया। पान वाले ने तपाक से उंगली करी..के के बोट देहला? हमने भी उंगली दिखाई.. जेहके देहले होई, जाई त तोहरे में! पता नहीं क्या समझा, जोर से ठहाके लगाने लगा। पता नहीं अपनी हर सही बात को लोग व्यंग्य क्यों समझ लेते हैं!

अब मॉर्निंग हो चुकी थी। सड़क की मरकरी लाइट के बिना भी लोग दिखने लगे थे। पटरी पर एक ठेले के पीछे तीन बुढ़िया मूंगफली बीन रही थीं। जमादार झाड़ू से धूल उड़ा रहा था। दो लड़के सड़क के किनारे खड़े हो सूखे पत्ते जला कर धुआँ उड़ा रहे थे। मॉर्निंग बैड हो, फेफड़ों में धूल घुसे इसके पहले नकपट्टी चढ़ा लिया। धूल/धुएं के पीछे लोग मॉर्निंग वॉक/जॉगिंग कर रहे दिखे।

बुद्ध_मन्दिर का द्वार खुल चुका था। ज्ञान लेने वालों को पंक्तिबद्ध लाइन में खड़ा कर हांकता, ज्ञान देने वाला अनुशासित हो कर मन्दिर में प्रवेश कर/करा रहा था। हम दोनों से बच कर, बगल से निकल लिए। आजकल इसी में बुद्धिमानी है। ज्ञान देने और लेने वालों से बच गए तो समझो आप बड़े भाग्यशाली हैं।

भगवान बुद्ध की मूर्ति चमक रही थी। फूल हंस रहे थे। हम आगे बढ़े तो पंक्ति में वर्षों से खड़े अशोक के कटिंग किए हुए छतरी आकार के बूढ़े वृक्ष हवा के झोंके लेते मिले। हलकी सी भी हवा चलती है तो पीपल के पत्ते बच्चों की तरह खुश हो, ताली पीटते से दिखते हैं लेकिन अशोक बड़के ज्ञानी की तरह अविचलित जस के तस खड़े रहते हैं। अक्सर ऐसा ही होता है। ज्ञानी बच्चों की तरह मिलते हैं, बुद्धिजीवी अकड़े-अकड़े।

अशोक के नीचे पत्थर के बेंच पर बैठे बूढ़े घूम घाम, थक थुका कर आपस में बतियाते दिखे। एक बूढ़ा झगड़ालू  महिला की तरह हाथ नचाकर कुछ कह रहा था बाकी लाचार पुरुष की तरह सुन रहे थे।

लॉन में बने मंच का प्रयोग स्थानीय युवा सुबह योग के लिए करते हैं। उसमें दरियां बिछाई जा रही थीं। हीरन पार्क के बगल वाला नहर नुमा तालाब मरम्मत के बाद सूखा पड़ा था। कमल उखाड़े जा चुके थे। जमीन दरकने लगी तो तालाब के सड़ रहे, ठहरे पानी को बदलने की आवश्यकता महसूस हुई होगी। नई जमीन पर नए पौधे लगेंगे तो यह चमन और भी खूबसूत होगा। यह बात सभी समझते हैं।

भगवान बुद्ध के उपदेश स्थल का चक्कर लगाते देखा बुद्ध और उनके पांचों शिष्य हमेशा की तरह मूक बैठे हैं। मूर्तियां बोल नहीं सकतीं पर इन्हे देख ऐसा लगता है कि कभी बुद्ध ने बोला होगा, कभी शिष्यों ने सुना होगा। आज भी गुरु बोलते हैं, शिष्य सुनते हैं मगर दुनियां पहले से अधिक दुखी है! कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने बुद्ध के उपदेशों को एक कान से सुना और दूसरे से निकाल दिया! या फिर बुद्ध ने कहा कुछ और हमने कुछ और ही समझ लिया! कुछ तो लोचा है।

बुद्ध मन्दिर से लौटते समय जैन मन्दिर के विशाल चिर युवा बरगद की याद आई। सोचा चलकर उन्हें प्रणाम करते हैं और चिर युवा रहने का मंत्र पूछते हैं। आखिर कब तक नहीं बताएंगे? हाय! मन्दिर का द्वार ही अभी बन्द था। यहां लोग कम आते हैं शायद इसीलिए जाड़े में पुजारी जी ने भी सूर्योदय के हिसाब से समय बदल दिया होगा। जब खुद भूख लगे, प्रसाद चढ़ाओ। पत्थर की मूर्तियां कुछ खाती थोड़ी न हैं, वे तो भाव की भूखी हैं।

सारनाथ के धमेख स्तूप वाले खंडहर पार्क का द्वार खुल चुका था। अंदर घुसा तो खंडहरों के उस पार धमेख स्तूप के पीछे सूर्यदेव निकलते दिखे। मैंने प्रणाम किया और मोबाइल से उनकी तस्वीर ले ली। मुझे लगा अपनी सुबह की पूजा संपन्न हुई। एक चक्कर लगा कर जब स्तूप के पास पहुंचा तो भक्त पूजा/ध्यान में लीन दिखे। एक पहले से तैयार फोटोग्राफर भक्तों की हर एंगिल से तस्वीरें खींच रहा था। भक्त श्रद्धा भाव से कुछ मंत्र भी पढ़ रहे थे। मेरे दुष्ट मन को लगा वे कह रहे हैं.. खींच मेरी फोटो! खींच मेरी फोटो!

यहां से निकलकर अडी में हर हर महादेव हुआ, चाय पान हुआ और कोई खास बात नहीं हुई। साइकिल उठाया, नकपट्टी चढ़ाया और बिटिया की लेडिज साइकिल के हैंडिल कैरियर में गोभी के दो ताजे फूल रख कर घर वापस आ गया। अपनी उम्र अब गुलाब के फूल लेकर जाने वाली नहीं रही।

19.2.17

सुबह की बातें-5

यूँ तो मॉर्निंग रोज ही गुड होती है लेकिन नौकर की मॉर्निंग तभी गुड होती है जब नौकरी से छुट्टी का दिन हो और लगे आज तो हम अपने मर्जी के मालिक हैं। कैमरा लेकर, मोबाइल छोड़ कर सुबह ही घर से निकलने के बाद हरे-भरे निछद्द्म वातावरण में अकेले घूमते हुए एहसास होता है कि हम भी इसी स्वतंत्र प्रकृति के अंग हैं। दौड़ने, हाँफने, टहलने के बाद थक कर सारनाथ के खंडहर वाले पार्क में घने नीम वृक्षों के नीचे किसी बेंच्च पर बेफिक्र हो बैठकर घण्टों प्रकृति का नजारा लेना, आनन्द दायक है।
खण्डहर के एक कोने में वेलेंटाइन जोड़े हीरो-हीरोइन की तरह फोटू हिंचा रहे थे। तैयारी से आये लगते थे। कपड़े बदलते और नए कपड़े में नई तस्वीरें खिंचाते। मैं उन्हें देखने में मशगूल था और सोच ही रहा था कि इनमें वेलेंटाइन वाली नेचुरल फीलिंग नहीं है भले ही ये फेसबुक में फोटो चिपकाएं तो बड़े रोमांटिक जोड़े नजर आएं कि तोतों के जोड़े नीम की शाख पर टाँय-टाँय करने लगे। उनके टाँय-टाँय से ध्यान भंग हुआ और उन्हें ही देखने लगा। एक लहराती, पतली शाख पकड़ कर झूलने और कलाबाजी खाते हुए टाँय-टाँय करने लगा और दूसरा उसे देख कर टाँय-टाँय करने लगा। दोनों में कौन तोता, कौन तोती ये अपने पल्ले नहीं पड़ा लेकिन असली वेलेंटाइन जोड़े लग रहे थे। बगल में खड़ा एक थाई जोड़ा चिंग-मिंग, चियाऊं-मियाऊं कर रहा था लेकिन जैसे टाँय-टाँय का मतलब नहीं समझा वैसे चियाऊं-मियाऊं भी नहीं समझा।
एक गिलहरी मेरे कदमों के पास से कुछ मुँह में दबा कर भाग गई और सरपट दौड़ती, अपने साथी के बगल में बैठ दोनों हाथों से पकड़ कर खाने लगी। इन्हें देख एक बात समझ में आती है कि खाने के मामले में ये कभी एक-दूसरे को कुछ शेयर नहीं करते। इस मामले में मनुष्य इनसे श्रेष्ठ प्राणी हैं।
एक थाई बच्चा लॉन में ही एक ओर खड़ा होकर, हिलते हुए बनारसी अंदाज में सू-सू करने लगा! उसकी मम्मी दौड़ते हुए आईं और उसे चपत लगाते हुए डाँट कर सभ्यता सिखाने लगी। अपने साथियों के बीच मम्मी शर्मसार होते हुए चीं-चां और अपने साथियों के बीच बच्चा हीरो बना ही-ही कर रहा था।
पौधों में बसन्ती बहार थी। भौरे गुनगुना रहे थे। दो सहेलियाँ बड़ी अदा से एक दूसरे की तस्वीरें खींच रहीं थीं। रह रह कर गेट की तरफ उचक/मचल कर देखतीं फिर फोटो खिंचाने में मशगूल हो जातीं। शायद उन्हें किसी की प्रतीक्षा थी।
धमेख स्तुप से नीम की शाख तक कबूतरों, कौओं और तोतों का आना-जारी था। मृगों के झुण्ड वैसे ही घास के लालच में बाउंड्री के उस पार ललचाई नजरों से टुकुर-टुकुर ताक रहे थे। मोर के इर्द-गिर्द मोरनियां न जाने क्या चुग रहीं थीं। एक कौआ एक हिरन की पीठ की सवारी कर रहा था। कौए तो कौए हैं कहीं भी बैठ जाते हैं। इनके लिये क्या हिरन, क्या भैंस! क्या संसद भवन, क्या गांधी जी की मूर्ती!!!

8.1.17

सुबह की बातें -4


शाम के शोर से 
भोर का मौन अच्छा है 
शाम महबूबा है मेरी,
भोर 
एक मासूम बच्चा है
शब्दों का खजाना था 
शाम के पास 
एक भी याद नहीं 
रात के बाद 
भोर 
बोलता कुछ नहीं 
मगर सुनता हूँ 
खुद ब खुद 
अभिव्यक्त होता है 
चहक लूँ 
मन ही मन 
पंछियों के जगने से पहले 
अभी अँधेरा है, 
जाग लूँ थोड़ा
उजाला देख लूँ 
अजोर से पहले.

वृक्षों का माथा चाट
पत्ती-पत्ती रेंगती, 
टप्प से धरती पर कूद-कूद 
गायब हो रही थीं 
शरारती ओस की बूदें! 
पँछी खामोश थे,
गेट के ताले ठंडे 
कुछ देर स्तब्ध खड़ा 
भोर को सुनता रहा 
फिर भागकर 
रजाई में दुबक गया।

जारी है 
ओस की टिप-टिप.
छाया है कोहरा
चुप हैं पँछी
गूँज रहा है
भोर का मौन

नहीं है मेरे पास
एक भी
मेऱा पढ़ाया पालतू तोता
होता भी तो
'गोपी-कृष्ण कहो' नहीं कहता
मौन हो
राधे-राधे
सुनता रहता।

उठो न! 
सुनो न! 
धरती पर जल तरंग बजा रही हैं 
ओस की बूँदें!!! 
सुन रहे हैं पँछी 
दुबक कर 
अपने-अपने घोंसलों में
मौन मुखर है 
चहुँ ओर
आओ! 
आँखें बंद कर बैठो यहाँ, 
शाल ओढ़कर 
ना ना 
कुछ ना कहो।
भोर के अजोर तक 
सुनती रहो...
कितना मधुर है मौन का संगीत! 
इन पंछियों की तरह सशंकित होकर मत देखो! 
ऑंखें बंद कर विश्वास से सुनो..
ऐसे ही होता है 
अन्धकार के बाद 
रोज सबेरा।
........

27.11.16

सुबह की बातें-3

धमेख स्तुप के ऊपर 

कौए अधिक थे
कबूतर कम
तोते
कर रहे थे टांय-टांय
कर रहे थे भगवान से प्रार्थना
कह रहे थे...
कौए बढ़ रहे हैं, कबूतर उड़ रहे हैं
कुछ करो!
यह अच्छी बात नहीं!

हंसने लगा
उगता सूरज
बुद्ध नहीं,
यह लड़ाई
कबूतरों को ही लड़नी है
तुम भगवान से प्राथना मत करो
आलोचना मत करो
उत्साहित करो
कबूतरों को
कौए भाग जायेंगे.



16.10.16

सुबह की बातें-2


यह धमेख स्तूप है. आज सुबह उसी के सामने लगभग २०० मीटर की दूरी पर बैठा था बेंच्च पर. सोचा एक तस्वीर खींच लूँ. खुद ही खुद की. मैंने इस खुदी को नाम दिया 'खुद्दम' अंग्रेजी वाले इसे कहते हैं ..selfie . मैं और मेरा साया, कोई दूसरा आदमी नहीं था बेंच पर. और दूसरे बहुत से साथी थे. नीम के कई घने पेंड़, इसमें दौड़ते गिल्लू, शाख पर बैठे तोते, घांस पर फुदकती मैना, पीछे डीयर पार्क में हिरण, कौए, कबूतर, मोर और भी दूसरे पंछी. साया भी तब नजर आने लगा जब सूर्यदेव निकले. उजाला न हो तो साया भी साथ नहीं होता. दौड़ने और टहलने के बाद यहाँ बैठकर आदमी और आदमी की बातों से दूर पंछियों की बातें सुनना, मृगों के साथ कौओं की शरारत देखना अच्छा लगता है.

आज जब मैं आया तो सबसे पहले मोर अपने पंख फैलाकर उड़ भागा फिर गिलहरियाँ नीम की शाख पर छिपकली की तरह सर-सर दौड़तीं पत्तों में छुप कर मुझे देखने लगीं, काले कौए ने कांव-कांव करी और तोते फुर्र से उड़ गए! आदमी कितना हेय प्राणी होता है!!! जिसे देखते ही सब भाग खड़े होते हैं. मुझे लगता है कि सब मुझे पहचानने लगे हैं. कभी निडर हो कुछ पास भी आ जाते हैं लेकिन फिर भी उनका विश्वास अर्जित नहीं कर पाया. मानव तन में तो यह आजीवन संभव नहीं लगता. बड़े भाग मानुष तन पायो! उंह! क्या भाग्य जब ये अराजनीतिक प्राणी मुझ पर विश्वास ही नहीं करते?
...........
धूप निकल आई है। छाँव है घने नीम के नीचे। चहुँ ओर आनंद की वर्षा का आलम है। एक तोता नीम की शाख से हवा में तैरता हुआ अनार के पौधों के बीच-बीच से निकलता हुआ फिर नीम में गुम हो गया। जाते-जाते उसने खण्डहर पर बैठी कौवी को आँख मारी या टाँय से छेड़ दिया कि साथी कौआ देर तक उसी दिसा में मुँह कर काँव-काँव करता रहा। कौए के चोंच इतनी चौडा़ई में खुलते, बंद होते कि लगा खा ही जायेगा तोते को। तोते की तरफ से फिर टाँय-टाँय की आवाज आई और कौआ पंख फैलाकर उड़ता हुआ घुस गया उसी नीम के पेंड़ पर। इधर कौवीउड़ी और हिरण के गरदन के ऊपर बैठ उसके कान में कुछ कहने लगी। हिरण ने हौले-हौले मुंडी हिलाई। कौवी संतुष्ट हो कौए की तलाश में उधर ही उड़ चली।

मार्निंग वाक करने वाले जा चुके। लाउड स्पीकर से समझ में न आने वाली भाषा में बुद्ध की स्तुती सुनाई पड़ रही है। मैं मौन रह कर बुद्ध के संदेश याद करने का प्रयास कर रहा हूँ। यहाँ, धमेख स्तूप और बुद्ध मंदिर के आस-पास सुख ही सुख है, कहीं कोई दुखी नहीं। संसार में फैला दुख मनुष्य के कर्मों का फल है। जैसे बुद्ध को सत्य का ग्यान हुआ और उन्होने संसार में आनंद की वर्षा की वैसे ही मूढ़, अभिमानी मनुष्यों के कर्मो से दुसरे निर्दोष प्राणी भी दुखी होते हैं।
कुछ पर्यटकों का झुण्ड है पार्क में। कुछ जोड़े फोटू-सोटू खिंचा रहे हैं प्रेम से। कुछ लड़के बढ़िया कैमरा ले कर फोटोग्राफी कर रहे हैं। एक लड़का दौड़ता हुआ आया और बोला-अंकल-अंकल आपकी बहुत सुंदर तस्वीर खींची है हमने। हमने उनको धन्यवाद के साथ अपना फोन नम्बर दिया। फोटो आया तो बताऊँगा उन्हें कि मैं बेचैन आत्मा हूँ। अभी नहीं बताया नहीं तो समझते अंकल बेवकूफ बना रहे हैं।

6.12.15

सुबह की बातें (गठरी वाले घुमक्कड़)


धमेख स्तूप सारनाथ वाले पार्क में प्रातः भ्रमण के समय हम हाथ फेंककर घूम रहे थे और कुछ लोग सर पर भारी बोझ लादे घूम रहे थे! मुझे आश्चर्य हुआ। एक को रोककर पूछा-भाई! आपलोग ये भारी बोझ सर पर लादे क्यों घूम रहे हैं? एक महिला ने जवाब दिया...'क्या करें? गेट पर हर एक का 10 रूपिया मांग रहा था!' मुझे लगा ये लोग तो आम आदमी से भी गरीब हैं! गरीब हो कर भी घूमने का शौक रखते हैं!!! फिर बोला-'अरे! तो सब सामान एक स्थान पर रख दीजिये। आपके साथ इतने आदमी हैं, किसी को सामान देखने के लिए लगा कर बाकी लोग आराम से घूम सकते हैं!!!' उन्होने मेरे बात सुनी अनसुनी कर दी और कन्नी काट कर आगे बढ़ गये। हमारे साथ मिर्जा भाई भी घूम रहे थे। हँसते हुए बोले- जाय दा मरदवा! ई तोहें बनारसी ठग समझत हउवन! इनके लग्गे जइबा त भागे-दौड़े लगीहें। तू इनहन का भलाई नाहीं करत हउआ, डरवावत हौआ! इनहने के अइसे मौज आवत हौ।' 

मिर्जा की बात सुनकर मैं सकपका गया-'का मिर्जा! हम तोहके बनारसी ठग लगत हई?' मिर्जा बोले-'त का तोहरे कपारे पे लिखल हौ कि तू बड़का ईमानदार हउआ?' फिर हिन्दी में समझाने लगे-'ये लोग नागपुर से आए सीधे-सादे तीर्थयात्री हैं। इन्होने सुन रख्खा होगा कि बनारसी ठग होते हैं। इसलिए ये अपना सामान कहीं रखना नहीं चाहते होंगे। सभी साथ होंगे तो कोई समान ले नहीं पाएगा। इसलिए ये घूमते हुए भी सामान सर पर ढो रहे हैं।' 

मिर्जा की बात मेरे समझ में आ गई लेकिन नजर इनके सामानों पर ठहर गई! हँसते हुये बोला-गठरी में बहुत माल हौ का मिर्जा?  मिर्जा ने ठहाका लगाया-'नीयत खराब हो गयल बाबा! गेट पर समान रख्खे बदे 10 रूपिया जेकरे पल्ले ना हौ, ऊ का माल धरी हो?  चला! चाय पियावा बहुत मगजमारी क लेहला।'

 और हम हंसते हुए माटी के कुल्हड़ में जाड़े की धूप पीने लगे।


   

11.10.15

सुबह की बातें-1


20 सितम्बर, 2015 

धमेख स्तूप सारनाथ के सामने बेंच पर लेटा बिन चश्मे के लिख रहा हूँ। 3-4 किमी सड़क पर और कुछ देर घास पर चलने के बाद यहाँ लेटने में खूब आनंद आता है। स्तूप पर बैठे तोतों के झुण्ड बेंच के ऊपर घने नीम के भीतर बैठ खूब टांय-टांय कर रहे हैं। बुलबुल,कोयल और भी दुनियां भर के पंछियों के कलरव के आलावा कुछ देसी आवारा कुत्तों की झाँव-झाँव भी सुनाई पड़ रही है। टहलने वालों की संख्या बहुत कम है। यहां आने के लिए 5 रुपिया टिकट का लगता है इसलिए सभी नहीं आते। तोतों का झुण्ड अभी उड़कर फिर स्तूप पर जा कर चिपक गया। हर तरफ आनंद ही आनंद बिखरा पड़ा है। कुछ मन में उतार रहा हूँ, कुछ आपसे बांट रहा हूँ। शुभ प्रभात।

धूप निकल आई है। घने नीम के वृक्षों से छन छन कर हरे घास में चिपके ओस कणों को चुपके-चुपके पी रही है। एक तिब्बत्ती लड़की अपनी छोटी बहन के साथ मेरी बेंच और स्तूप के बीच में लॉन पर बैठी योगा कर रही है। हर आसन के बाद देर तक अपनी छोटी चोटी को खींचती/  संवारती जा रही है। छोटी बहन लगातार टिपिर-टिपिर आँख हाथ नचा नचा कर तिबती भाषा में जाने क्या बतिया रही है। बड़ी भी खुश है। धूप तेज हो रही है। अब चलता हूँ। कुल्हड़ वाली मस्त चाय की तलाश में। सन्डे सारनाथ की सुबह आनंद दायक रही।

25 सितम्बर, 2015 

घने नीम के नीचे लेटना ही सुखद है, यहाँ तो नीम के कई वृक्ष हैं। दायें बाएं, दूर और दूर। नीम की शाख में तोतों के झुण्ड के झुण्ड तंय-टांय कर रहे हैं। और भी कई पंछियों के कलरव गूँज रहे हैं।  मैं घूमने, ओस में डूबे घांस में नंगे पाँव टहलने के बाद यहां धमेख स्तूप सारनाथ के लॉन में बने लम्बे चबूतरे पर लेटा हूँ। काफी देर हो चुकी है लेकिन यहां से उठने का मन नहीं कर रहा। 

एक पंछी ने जल तरंग छेड़ा है। मैं इनका नाम नहीं जानता। तोता, मैना, कौआ,कोयल,बुलबुल बस यही सब गिने चुने नाम ही जानता हूँ। जल तरंग के बीच कोयल की कूक और कौओं की काँव-काँव भी सुनाई पड़ रही है।सतियानास!  धमेख स्तूप के पीछे बने जैन मंदिर से लाऊड स्पीकर से भजन बजने लगा! उनका ईश्वर प्रसन्न हो रहा होगा लेकिन मेरे आनंद में अब खलल पहुँच रहा है। सवा सतियानास! पीछे बुध्द मंदिर से भी लाउडस्पीकर बजने लगा! बुद्धम शरणम् गच्छामी! जय हो... बुद्ध कितने प्रसन्न हो रहे होंगे! 
अब चलता हूँ। सुप्रभात।

27 सितम्बर, 2015

पंडी जी पिंजड़ेे के तोते को रटा दिए हैं-गोपी कृष्ण कहो। लाउडस्पीकर में रोज बजता रहता है लेकिन धमेख स्तूप सारनाथ के तोते नहीं कहते -"बुद्धम शरणम् गच्छामी"। गुलामी और आजादी के बीच कितना फर्क है! लॉन में दिखा भक्तों का झुण्ड। ये कह रहे थे-बुद्धम शरणम् गच्छामी।

4 अक्टूबर, 2015 

सुबह-सुबह घने नीम के वृक्षों से धमेख स्तूप तक अनवरत उड़ते रहने वाले तोते सन्डे नहीं मनाते। कोई ऑफिस नहीं, कोई छुट्टी नहीं। ये जब स्तूप से उड़कर वापस नीम की शाखों पर बैठते हैं तो कुछ कौए काँव-काँव करने लगते हैं। ऐसा लगता है जैसे नास्तिक पितृपक्ष में ब्राह्मणों के भोजन का उपहास उड़ा रहे हों! तोते भी टांय-टांय कर प्रतिरोध करते हैं। 

धूप तेज हो चली है। घने नीम से अनवरत एक-एक कर पीले पत्ते झर रहे हैं। कोयल के साथ पेड़की ने खूब समा बांधा है।  ये क्या कहते हैं, कुछ समझ में नहीं आता पर यह तो तय है कि बिहार के चुनावी दंगल में लालूजी और मोदी जी की तरह कोई राग नहीं छेड़ रहे।  गिलहरियों का फुदकना बदस्तूर जारी है। लॉन में कई प्रकार के पौधे हैं मगर कोई आपस में नहीं झगड़ते। कोमल लताएँ सूखे वृक्ष के सहारे ऊपर तक चढ़ जाती हैं। कोई किसी की टांग नहीं खींचता। 

झाडू लगाने वाला आ चुका है। अब चलना चाहिए। आज की सुबह रोज की तरह आनंद दायक रही।

5 अक्टूबर, 2015 
आज एक लड़का सारनाथ में हिरणों को ब्रेड खिला रहा था। एक बड़ा पैकेट ब्रेड लिए था और तोड़-तोड़ कर खिलाये जा रहा था। हिरण ब्रेड के लिए धीरे-धीरे जमा हो रहे थे। सुप्रभात।


6 अक्टूबर, 2015
आज सुरुज नारायण रोज की तरह लालम लाल, गोलमटोल निकले। मैंने देखा उन्हें खण्डहरों के उस पार धमेख स्तूप के पीछे। फूलों ने मेरी तेज चाल को देखकर छेड़खानी करी-हैलो! आज फ़ोटू नहीं खींचोगे? बांस के की पत्तियाँ थोड़ी सजग हुईं। मैं सबको मुस्कुराकर देखते हुए आगे बढ़ चला। देसी कुत्ते झुण्ड बनाकर सरसराते हुए बगल से गुजरे। अनार के पौधों के पीछे कुत्तों के जोड़े प्यार करने लगे। तोते टांय-टांय करते नीम से उड़ चले फिर स्तूप की ओर। हिरणों के झुण्ड उदास थे। आज नहीं दिखा उनको ब्रेड खिलाने वाला लड़का। मैं जल्दी में था। सबको देख मुस्कुराते हुए चलता बना। सुप्रभात।

7 अक्टूबर, 2015 

आज न फूलों से कोई बात हुई न चिड़ियों से। कुत्ते भी नहीं दिखे। पहली बार सुना सारनाथ मृगदाव के चीतलों को बोलते हुए। बाउंड्री की जालियों के पास जा कर देखा सभी एक लाइन में सावधान की मुद्रा में खड़े हो कर जोर-जोर से बोल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये अपने राज्य का राष्ट्र गान गा रहे हैं! ध्यान से देखने पर समझ में आया कि ये अपने किसी भटके हुए साथी को आवाज लगा कर बुला रहे हैं। मैंने उनके आवाज की नकल की तो सब झटके से मेरी ओर देखने लगे। जब तक मैं फ़ोटू खींचता, मुँह फेर लिया।सूरुज नारायण लाल-लाल आँखे तरेरते हुए मुझ पर धूप की वर्षा करने लगे।



धमेख स्तूप पर तोते.कबूतर रोज की तरह उड़ रहे थे। मॉर्निंग वॉक वाले तेज-तेज चल रहे थे। तेज-तेज सीटी बजने की आवाज सुनाई दी तो देखा दो लड़के घास पर चलने वालों को मना कर रहे थे। पता चला इनकी ड्यूटी लगाई गई है कि लोग घास पर न चलें। सही भी है, लोगों के घास में चलने से उसकी ख़ूबसूरती बिगड़ जाती है। ख़ूबसूरती देखभाल मांगती है। यह दूर से देखने और आनंद लेने की चीज है। छेड़खानी किया तो ख़राब हो जायेगी। लोग फूलों को तो क्या, मिलने पर कलियों को भी अपने क्षणिक स्वार्थ में तोड़ कर मसल देते हैं।

इन्ही सब में खोया रहा। अभी घर आया तो याद आया कि आज तो न फूलों से कोई बात हुई न चिड़ियों से! न जाने क्या सोच रही होंगी मेरे बारे में!


12 अक्टूबर, 2015 घर से मात्र 20 मिनट कदम चाल की दूरी पर है सारनाथ बुद्ध मंदिर। प्रातः भ्रमण के साथ लोग मंदिर मे,  मैं मंदिर के बाहर चारों ओर बिखरी प्राकृतिक सुंदरता में भगवान् बुद्ध के दर्शन करता रहता हूँ। मंदिर के सामने लान में एक बड़ा सा चबूतरा है जिसमें चढ़ने के लिए बनी सीढ़ियों की रेलिंग पर बच्चे झूल रहे थे। उनकी फ़ोटू खींची तो वे खुश हो गए। चबूतरे पर प्लास्टिक बिछा कर लोग योगा कर रहे थे। बहुत से लोग थे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी भंडारे की भीड़ हो! यहाँ लोग सामूहिक योगा कर के तन की चर्बी घटा रहे थे और मन की भूख मिटा रहे थे।


वहां से चलकर धमेख स्तूप के खण्डहरों वाले पार्क में आये तो मुझे देख फूलों के चेहरे प्रसन्न हो गए या सूर्यदेव की सुनहरी किरणों के प्रभाव से खूबसूरत हो गए, ठीक-ठीक कह नहीं सकता। मैंने जब एक फूल से कहा तुम बहुत खूबसूरत हो लेकिन मुझे तुम्हारा नाम नहीं मालूम! तो वह खिलखिलाकर हंसने लगा। तुम लोग हमारा नाम भी रखते हो!!! मैं उन्हें हँसता छोड़ आगे बढ़ गया। इन्हें क्या मालूम कि मनुष्य जिसे देखता है पहले उसका नाम ही रखता है और जिससे डरता है उसे भगवान मान लेता है।

घूम कर थक गया तो अब मैं लान के पत्थर पर लेटा अपना योगा कर रहा हूँ। सुन रहा हूँ चिड़ियों की बोली,  लिख रहा हूँ मोबाइल से फेसबुक पर। सामने नीम के शाख पर एक गिलहरी काले कौए से फल के लिए झगड़ रही है। सामने दूसरे पेड़ पर एक तोता और एक तोती आपस में चोंच लड़ा रहे हैं। तोता मैना की प्रेम कथाएँ तो खूब पढ़ीं पर उनको चोंच लड़ाते मैंने तो नहीं देखा। अभी एक तोतों का दूसरा झुण्ड टें टें टें टें करते हुए घने नीम में घुस गया। उसमें कितने तोते कितनी तोती होंगे,  मैं नहीं जान पाया।

घर लौटते हुए खंडहरों पर नजरें टिकीं तो ऐसा लगा जैसे इन खण्डहरों में घूमती होंगी और भी  बेचैन आत्माएँ!  लेकिन मुझे कोई दूसरा या दूसरी नहीं मिली या यह भी हो सकता है कि मिली हों, साथ-साथ घूमी हों और हमने इक दूजे को पहचाना ही न हो!



धूप तेज हो गई, अब चलना चाहिए। आनंद दायक रही संडे की सुबह। सुप्रभात खतम हो गया। अब तो शुभ दिन बोलना पड़ेगा।





नोट: फेसबुक में लिखे कुछ स्टेटस को मिलाकर यह पोस्ट बना दिया। 

9.12.12

सुबहे बनारस-2

ये आज सुबह की तस्वीरें हैं। गंगा जी में आजकल साइबेरियन पंछियों का जमावड़ा है। नाव में सूर्योदय के दर्शन के लिए घूमने वाले यात्रि इनके लिए कुछ दाना लिये रहते हैं। आओ-आओ की पुकार लगाते हैं। ये पंछी आवाज को पहचानने लगे हैं या दाने को ये तो वे ही जाने लेकिन सूर्योदय के समय इनको नावों के पीछे-पीछे भागते देखना बड़ा अच्छा लगता है। 



यहाँ घाट पर वृक्ष नहीं हैं। दशाश्वमेध घाट के पास गमलों में पौधे लगे हैं।




यह फोटोग्राफी का चातुर्य प्रदर्शन है। ऐसा कोई किला नहीं है घाट में।
 

बनारस में गंगा भक्ति, शिव भक्ति कोई अचरज की बात नहीं है लेकिन इस बनारसी भक्त को देखिये। ये स्नान-ध्यान के पश्चात गंगा घाट की मिट्टी से ताजे शिवलिंग की स्थापना करने के बाद सूर्योदय के समय शिव को गंगाजल चढ़ा रहे हैं! बनारस और सुबहे बनारस को आत्मसात करने के लिए समय देना होता है। तुलसी, कबीर ने यूँ ही नहीं इसे अपने हृदय में बसाया होगा!

11.12.10

पहली मार्निंग वॉकिंग.....(व्यंग्यात्मक संस्मरण)

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थोड़ी लम्बी हो गई है। चाहता तो दो किश्तों में भी प्रकाशित कर सकता था। आप चाहें तो दो बार में पढ़ सकते हैं। पढ़ना शुरू तो कीजिए......

                    चार वर्षों के लिए मेरा भी बस्ती गमन (1994-1998) हुआ था। बस्ती अयोध्या से लगभग 70 किमी दूर स्थित शहर का नाम है। यहाँ पर रहने से ज्ञान हुआ कि बस्ती के संबंध में मुझसे पहले किसी बड़े लेखक ने लिख दिया है...बस्ती को बस्ती कहूँ तो का को कहूँ उजाड़ ! बड़े लेखकों में यही खराबी होती है कि वे हम जैसों के लिखने के लिए कुछ नहीं छोड़ते। मेरे में भी इस शहर के बारे में अधिक कुछ लिखने की क्षमता नहीं है सिवा इसके कि यह एक दिन के मुख्य मंत्री का शहर है। सबसे अच्छी बात तो बड़े लेखक ने लिख ही दी। छोटे शहरों की एक विशेषता होती है कि आपको कुछ ही दिनो में सभी पहचानने लगते हैं। मानना आपके आचरण पर निर्भर करता है। आचरण की सामाजिक परिभाषा आप जानते ही हैं। कवि समाजिक होना चाहता है मगर हो नहीं पाता। इस शहर में नौकरी पेशा लोगों के लिए जीवन जीना बड़ा सरल है। 4-5 किमी लम्बी एक ही सड़क में दफ्तर, बच्चों का स्कूल, अस्पताल, सब्जी, मार्केट, बैंक, डाकखाना, खेल का मैदान सभी है। एक पत्नी. दो बच्चे हों और घर में टी0वी0 न हो तो कम कमाई में भी जीवन आसानी से कट जाता है।

                   एक दिन कद्दू जैसे पेट वाले वरिष्ठ शर्मा जी मेरे घर पधारे और मार्निंग वॉक के असंख्य लाभ एक ही सांस में गिनाकर बोले, “पाण्डे जी, आप भी मार्निंग वॉक किया कीजिए। आपका पेट भी सीने के ऊपर फैल रहा है !” घबड़ाकर पूछा, “सीने के ऊपर फैल रहा है ! क्या मतलब ? शर्मा जी ने समझाया, “सीने के ऊपर पेट निकल जाय तो समझ जाना चाहिए कि आप के शरीर में कई रोगों का स्थाई वास हो चुका है ! हार्ट अटैक, शूगर, किडनी फेल आदि होने की प्रबल संभावना हो चुकी है।“ शर्मा जी ने इतना भयावह वर्णन किया कि मैं आतंकी विस्फोट की आशंका से ग्रस्त सिपाही की तरह भयाक्रांत हो, मोर्चे पर जाने के लिए तैयार हो गया। डरते-डरते पूछा, “कब चलना है ? शर्मा जी ने मिलेट्री कप्तान की तरह हुक्म सुना दिया, “कल सुबह ठीक चार बजे हम आपके घर आ जाएंगे, तैयार रहिएगा।

                    मार्निंग वॉक के नाम पर की जाने वाली निशाचरी से मैं हमेशा से चिढ़ता रहा हूँ। ये क्या कि सड़क पर घूमते आवारा कुत्तों के साथ ताल पर ताल मिलाते हुए, मुँह अंधेरे, धड़कते दिल घर से निकल पड़े। चार बजे का नाम सुनते ही मेरी रूह भीतर तक कांप गई। जैसे मेरी भर्ती कारगिल युद्ध लड़ने के लिए सेना में की जा रही हो। मैने पुरजोर विरोध किया, “अरे सुनिए, आप तो मार्निंग वॉक की बात करते-करते निशाचरी का प्रोग्राम बनाने लगे ! रात में भी कोई घूमता है ? मैं क्या रोगी-योगी हूँ ? भोगी इतनी सुबह नहीं उठ सकता ! कुत्ते ने काट लिया तो ? शर्मा जी मेरी तरफ ऐसे देखने लगे जैसे कोई नकल मार कर परीक्षा उत्तीर्ण करने वाला विद्यार्थी, फेल विद्यार्थी को हिकारत की निगाहों से देखता है। जैसे कोई रो-धो कर मिलेट्री की ट्रेनिंग ले चुका जवान नए रंगरूट को पहली बार आते देखता है। फिर समझाते हुए बोले, “पाण्डेय जी, आप तो समझते नहीं हैं। चार बजे घर से नहीं निकले तो देर हो जाएगी। पाँच बजे के बाद तो सब लौटते हुए मिलेंगे।“ मैने फिर विरोध किया, “अरे छोड़िए, सब लौटते हुए मिलें या लोटते हुए ! नाचते हुए मिलें या रोते हुए ! हमें इससे क्या ? हम तो तब चलेंगे जब प्रभात होगा।“ मगर शर्मा जी को नहीं मानना था, नहीं माने। जिद्दी बच्चों की तरह यूँ छैला गए मानो उन्हें जिस डाक्टर ने मार्निंग वॉक की सलाह दिया था, उसी ने 4 बजे का समय भी निर्धारित किया था। बोले, “देखिए आपने वादा किया है ! चलना ही पड़ेगा। चल कर तो देखिए फिर आप खुद कहेंगे कि चार बजे ही ठीक समय है।“ मरता क्या न करता ! हारकर चलने के लिए राजी हो गया । मुझे शर्मा जी ऐसे प्रतीत हुए मानो सजा सुनाने वाला जज भी यही, फाँसी पर चढ़ाने वाला जल्लाद भी यही । जाते-जाते मुझे सलाह देते गए, “एक छड़ी रख लीजिएगा !”

                   छड़ी क्या मैं उस घड़ी को कोसने लगा जब मैने शर्मा जी से मार्निंग वॉक पर चलने का वादा किया था। मेरे ऊपर तो मुसीबतों का पहाड़ ही टूट गया। शुक्र है कि उन दिनों ब्लॉगिंग का शौक नहीं था लेकिन देर रात तक जगना, टी0वी0 देखना या कोई किताब पढ़ना मेरी आदत रही है। अब ब्लॉगिंग ने टी0वी0 का स्थान ले लिया है। मैं कभी घड़ी देखता, कभी उस दरवाजे को देखता जिससे शर्मा जी अभी-अभी बाहर गये थे। मन ही मन खुद को कोस रहा था कि साफ मना क्यों नहीं कर दिया ! संकोची स्वभाव होने के कारण मेरे मुख से जल्दी नहीं, नहीं निकलता और अब किया भी क्या जा सकता था ! सोने से पहले जब मैने अपना फैसला श्रीमती जी को सुनाया तब उन्हें घोर आश्चर्य हुआ। वह बोलीं, “आज ज्यादा भांग छानकर तो नहीं आ गए ! तबीयत तो ठीक है !! उठेंगे कैसे ?” एक साथ इतने सारे प्रश्नों को सुनकर ऐसा लगा जैसे मिलेट्री में भरती होने से पहले साक्षात्कार शुरू हो गया हो ! बंदूक से निकली गोली और मुख से निकली बोली कभी वापस नहीं आती। अब अपनी बात से पीछे हटना मेरी शान के खिलाफ था। मैं बोला, “आप समझती क्या हैं ? मैं उठ नहीं सकता ! आप उठा के तो देखिए मैं उठ जाउंगा !!” श्रीमती जी मुझे ऐसे देख रही थीं जैसे उस पागल को जो मेरे घर कल सुबह-सुबह मुझसे पैसे मांग रहा था। फिर उन्होंने हंसते हुए कहा, “मैं क्यों उठाने लगी ? क्या मुझे भी घुमाने ले चलोगे !” मैं कभी शर्मा जी को याद करता कभी श्रीमती जी को साथ लिए अंधेरे में घूमने की कल्पना करता। झल्लाकर बोला, “आप रहने दीजिए, मैं अलार्म लगा कर सो जाउंगा।“ मैने सुबह 4 बजे का अलार्म लगाया और बिस्तर में घुस गया। मार्निंग वॉक और कुत्तों की कल्पना करते-करते गहरी नींद में सो गया।

                     जब मेरी नींद खुली तो पाया कि मेरी श्रीमती जी मुझे ऐसे हिला रही थीं जैसे कोई रूई धुनता हो और शर्मा जी दरवाजा ऐसे पीट रहे थे जैसे रात में उनकी बीबी कहीं भाग गई हो ! मैं हड़बड़ा कर जागृत अवस्था में आ गया। सर्वप्रथम तीव्र विद्युत प्रवाहिनी स्त्री तत्पश्चात टिकटिकाती घड़ी का दर्शन किया। घड़ी में चार बजकर पंद्रह मिनट हो रहे थे ! दरवाजे पर शर्मा जी अनवरत चीख रहे थे ! मैने उठकर ज्यों ही दरवाजा खोला शर्मा जी किसी अंतरिक्ष यात्री की तरह घर के अंदर घुसते ही गरजने लगे, “अभी तक सो रहे थे ? 15 मिनट से दरवाजा पीट रहा हूँ !” जैसे मिलेट्री का कप्तान डांटता है। उनकी दहाड़ सुनकर सुनकर सबसे पहले तो मेरा मन किया, दो झापड़ लगाकर पहले इसे घर के बाहर खदेड़ूं और पूछूं, “क्या रिश्ते में तू मेरा बाप लगता है ?” मगर क्या करता, अपनी बुलाई आफत को कातर निगाहों से देखता रहा। माफी मांगी, कुर्सी पर बिठाया और बेड रूम में जाकर घड़ी देखने लगा। तब तक मृदुभाषिणी दामिनी की तरह चमकीं, “घड़ी को क्यूँ घूर रहे हैं ? मैने ही अलार्म 6 बजे का कर दिया था ! सोचा था न बजेगा न आप उठेंगे !! चार बजे उठना हो तो कल से बाहर वाले कमरे में तकिए के नीचे अलार्म लगा कर सोइएगा और बाहर से ताला लगाकर चले जाइएगा ! मैं 6 बजे से पहले नहीं उठने वाली। अपने शर्मा जी को समझा दीजिए कि रात में ऐसे दरवाजा न पीटा करें।“ मैं सकपकाया। यह समय पत्नी से उलझने का नहीं था। एक जल्लाद पहले से ही ड्राईंगरूम में बैठा था ! दूसरे को जगाना बेवकूफी होती । जल्दी से जो मिला पहनकर बाहर निकल पड़ा। मेरे बाहर निकलते ही फटाक से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनकर शर्मा जी मेंढक की तरह हंसते हुए बोले, “हें..हें..हें..लगता है भाभी जी नाराज हो गईं !” मैं उनके अजूबेपन को अपलक निहारता, विचारों की तंद्रा से जागता, खिसियानी हंसी हंसकर बोला, “नहीं, नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।“

                    शर्मा जी काफी तेज चाल से चलते हुए एक बदबूदार गली में घुसे तो मुझसे न रहा गया। मैने पूछा, “ये कहाँ घुसे जा रहे हैं ? इसी को कहते हैं शुद्ध हवा ? शर्मा जी बोले, “बस जरा सिंह साहब को भी ले लूँ ! मेरे इंतजार में बैठे होंगे। एक मिनट की देर नहीं होगी। वो तो हमेशा तैयार रहते हैं।“ शर्मा जी बिना रूके, बिना घुमे, बोलते-बोलते गली में घुसते चले गए। अंधेरी तंग गलियों को पारकर वे जिस मकान के पास रूके उसके बरामदे पर एक आदमी टहल रहा था। दूर से देखने में भूत की तरह लग रहा था। हम लोगों को देखते ही दूर से हाथ हिलाया और लपककर नीचे उतर आया। आते ही उलाहना दिया, “बड़ी देर लगा दी !” मैने मन ही मन कहा, “साला.. मिलेट्री का दूसरा कप्तान ! कहीं ‘बड़ी देर हो गई’ सभी मार्निंग वॉकर्स का तकिया कलाम तो नहीं !” मैं अपराधी की तरह पीछे-पीछे चल रहा था और शर्मा जी, सिंह साहब से मेरा परिचय करा रहे थे, “आप पाण्डेय जी हैं। आज से ये भी हम लोगों के साथ चलेंगे।“ सिंह साहब ने मुझे टार्च जलाकर ऐसे देखा मानो सेना में भर्ती होने से पहले डा0 स्वास्थ्य परीक्षण कर रहा हो ! संभवतः इसी विचार से प्रेरित हो मेरी जीभ अनायास बाहर निकल गई ! सिंह साहब टार्च बंदकर हंसते हुए बोले, बड़े मजाकिया लगते हैं ! उनके हाव भाव से मुझे यकीन हो गया कि वे मन ही मन कह रहे हैं, “इस जोकर को कहाँ से पकड़ लाए !”

                       रास्ते भर सिंह साहब मार्निंग वॉक के लाभ एक-एक कर गिनाते चले गए और मैं अच्छे बच्चे की तरह हूँ, हाँ करता, मार्ग में दिखने वाले अजीब-अजीब नमूनों को कौतूहल भरी निगाहों से यूँ देखता रहा जैसे कोई बच्चा अपने पापा के साथ पहली बार मेला घूमने निकला हो। एक स्मार्ट बुढ्ढा, चिक्कन गंजा, हाफ पैंट और हाफ शर्ट पहन कर तेज-तेज चल रहा था। कुछ युवा दौड़ रहे थे तो कोई शर्मा जी की तरह अंतरिक्ष यात्री जैसा भेषा बनाए फुटबाल की तरह लुढ़क रहा था। शर्मा जी सबको दिखा कर मुझसे बोले, “देख रहे हैं पाण्डे जी ! (मैने सोचा कह दूं क्या मैं अंधा हूँ ? मगर चुप रहा) क्या सब लोग मूर्ख हैं ? देखिए, वो आदमी कितनी तेज चाल से चल रहा है ! चलिए उसके आगे निकलते हैं !! शर्मा जी लगभग दौड़ते हुए और हम सबको दौड़ाते हुए उसके बगल से उसे घूरकर विजयी भाव से आगे निकलने लगे तो वह आदमी जो दरअसल ट्रेन पकड़ने के लिए दौड़ रहा था, मार्निंग वॉकर नहीं था, हमें रोककर पूछ बैठा, “ आप लोगों को कौन सी ट्रेन पकड़नी है ?” उसके प्रश्न को सुनकर शर्मा जी हत्थे से उखड़ गए, “मैं आपको ट्रेन पकड़ने वाला दिखता हूँ ?” लगता है वो आदमी भी शर्मा जी का जोड़ीदार था। पलटकर बोला, “तो क्या चंदा की सैर पर निकले हो ? चले आते हैं सुबह-सुबह माथा खराब करने !” किसी तरह हम लोगों ने बीच बचाव किया तो मामला शांत हुआ।

                          हम लोग जब मैदान में पहुँचे तो वहाँ कई लोग पहले से ही गोल-गोल मैदान का चक्कर लगा रहे थे। शर्मा जी, सिंह साहब के साथ यंत्रवत तेज-तेज, गोल-गोल घूमने लगे और मैं एक जगह बैठकर वहाँ के दृष्य का मूर्खावलोकन करने लगा। पूर्व दिशा में ऊषा की किरणें आभा बिखेर रही थीं। सूर्योदय का मनोहारी दृष्य था। मैने बहुत दिनो के बाद उगते हुए सूर्य को देखा था। मेरा मन जगने के बाद पहली बार प्रसन्नता से आल्हादित हो उठा। चिड़ियों की चहचहाहट, अरूणोदय की लालिमा, हवा की सरसराहट ने न जाने मुझ पर कैसा जादू किया कि मैं भी उन्हीं लोगों की तरह गोल-गोल दौड़ने लगा ! दौड़ते-दौड़ते मेरी सांस फूलने लगी। मैं हाँफने लगा मगर देखा, शर्मा जी और सिंह साहब दौड़ते ही चले जा रहे हैं ! मारे शरम के मैं भी बिना रूके दौड़ता रहा। अनायास क्या हुआ कि मेरा सर मुझसे भी जोर-जोर घूमने लगा। मुझे लगा कि मुझे चक्कर आ रहा है ! घबड़ाहट में पसीना-पसीना हो गया और भागकर बीच मैदान में पसर गया ! यह तो नहीं पता कि मुझे नींद आ गई थी या मैं बेहोश हो गया था लेकिन जब मेरी आँखें खुलीं तो मार्निंग वॉकर्स की भीड़ मुझे घेर कर खड़ी थी ! शर्मा जी मेरे चेहरे पर पानी के छींटे डाल रहे थे। एक दिन की मार्निंग वॉकिंग ने मुझे शहर में ऐसी प्रसिद्धि दिला दी थी जो शायद शर्मा जी आज तक हासिल नहीं कर पाए होंगे।