राजस्थान के लिए 4 अप्रैल को शुरू हुई पारिवारिक यात्रा कल 12 अप्रैल को खतम हो जाएगी। घर पहुँचने से पहले अभी झूल रहे हैं लोहे के घर में। 2nd ac का डिब्बा है। लेटे हैं साइड लोअर बर्थ में। बगल के सामने वाले बर्थ में श्रीमती जी दोनो बेटियों और दोनो नातियों के साथ आनंद में हैं। दोनो नाती लगातार उपद्रव कर रहे हैं। रात्रि भोजन के बाद भी कोई सोया नहीं है। मेरे सामने के चारों बर्थ के यात्री पर्दा चढ़ाकर सो चुके हैं। बगल के साइड लोअर में तीन महिलाएं खूब बतिया कर अब शांत हुई हैं। माहौल ही ऐसा है कि आदतन मेरे दाहिने हाथ का अगूंठा मोबाइल में नाचने लगता है। अंगूठा लगाने वाले को अनपढ़, अंगूठा छाप कहा जाता है लेकिन यहाँ अंगूठा सबको ठेंगा नहीं, दुनियाँ दिखाने की इच्छा रखता है।😇
4 अप्रैल को हम 4 बड़े और दो बच्चे बनारस-ओखा एक्सप्रेस से शाम 9.45 को सवाई माधोपुर के लिए चले। ट्रेन दूसरे दिन लगभग 11 बजे पहुंची। शर्माजी अपनी पत्नी के साथ भोपाल से 4 घण्टे पहले ही पहुँच कर होटल रिजेंटा वान्या महल, रणथम्बोर में डेरा जमा चुके थे। यहाँ आने का मुख्य उद्देश्य रणथम्बोर नेशनल पार्क में जंगल सफारी करना था। होटल में प्रवेश करते ही सबका दिल खुश हो गया। यह वाकई महल में रुकने जैसा एहसास था।
दिनभर आराम करने के बाद हमने रणथम्बोर का किला घूमने का मन बनाया जहाँ 2km की पैदल चढ़ाई चढ़नी थी। श्रीमती जी के घुटनों में दर्द रहता है, पैदल चलना उनके वश की बात नहीं थी इसलिए बच्चों ने भी होटल के पार्क और स्विमिंग पुल में ही आनंद लेने का मन बनाया। हम और शर्माजी का परिवार जिप्सी से शाम 3 बजे किला घूमने निकल पड़े।
किले के लिए जहाँ से चढ़ाई चढ़नी होती है, वहाँ पहुंचकर जिप्सी ने हमे उतार दिया। 2 km की चढ़ाई चढ़ना बहुत कठिन नहीं लगा, बहुत से लोग चल रहे थे और मार्ग बहुत रोमांचक था। जंगली जानवरों में मोर, चीतल के अलावा बहुत से लंगूर दिख रहे थे। 32 खम्बे की छतरी देखकर हम जैसे ही आगे बढ़े कुछ युवकों को भालू-भालू चीखते हुए भागते/दौड़ते देखा। उनके पीछे-पीछे हम भी भागे। आगे चलकर हमें एक दौड़ता हुआ जंगली भालू दिखा। चौकीदार लाठी पीटते हुए ऐसे भगा रहा था जैसे बनारस में दूध वाले भाई डंडा लेकर भैंस भगा रहे हों, भालू दौड़ते हुए भाग भी रहा था! हमने आनंद लेते हुए वीडियो बनाया और खुश हुए।
किले की चढ़ाई का परमानंद अभी आना शेष था। ऊपर त्रिनेत्र गणेश जी का भव्य मन्दिर है। हमने जब मन्दिर में प्रवेश किया एक मस्त ग्रुप गजानन का जयकारा लगा रहा था। हम भी मोबाइल छोड़ ताली बजाने लगे। त्रिनेत्र गणेश बेहद खूबसूरत हैं।
लौटते समय एक जैन मन्दिर, देवी मन्दिर भी है। ऐतिहासिक किले को देखना और रास्तों की खूबसूरती को महसूस करना आनंद दायक है। लगभग 4km की चढ़ाई और ढलान का सफर कब कट गया, पता नहीं चला।
गूगल से यहाँ के बारे में यह जानकारी मिली.....
रणथंभौर दुर्ग का वास्तविक नाम ( रंत:पूर ) है इसका अर्थ रन की घाटी में स्थित नगर रन उस पहाड़ी का नाम है जो दुर्ग की पहाड़ी के नीचे स्थित है एवं थम उस पहाड़ी का नाम है जिस पर किला बना है इसी कारण इसका नाम रणस्तंभपुर हो गया।
हीराचंद ओझा के अनुसार रणथंभौर का किला अंडाकृति वाले एक ऊंचे पहाड़ पर स्थित है यह सात पहाड़ियों के मध्य स्थित है इस कारण यह दुर्ग गिरी दुर्ग वन दुर्ग की श्रेणी में आता है इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में चौहान शासक राजा जयंत द्वारा कराया गया।
1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविंद राज ने चौहान वंश की नीव रणथंभौर दुर्ग में रखी
अब्दुल फजल ने इस दुर्ग को देखकर कहा कि और दुर्ग नंगे हैं परंतु यह दुर्ग बख्तरबंद है।
रणथंभौर दुर्ग दिल्ली मालवा एवं मेवाड़ से निकट होने के कारण इस दुर्ग पर बार-बार आक्रमण होते रहे हैं रणथंभौर दुर्ग पर सर्वप्रथम कुतुबुद्दीन ऐबक ने आक्रमण किया 1291 1292 में सुल्तान जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने रणथंबोर दुर्ग पर दो बार आक्रमण किया परंतु उसने दुर्ग कड़ी सुरक्षा व्यवस्था देखकर यह कहते हुए कि ऐसे 10 कीलों को तो मैं मुसलमानो के मूंछ के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता वापस चला गया।
रणथंभौर दुर्ग में स्थित प्रवेश द्वार
1 नौलखा दरवाजा - इसका जीर्णोद्वार जयपुर के महाराजा जगत सिंह ने कराया
2 तोरण दरवाजा/अंधेरी दरवाजा - मुस्लिम शासक द्वारा /त्रिपोलिया दरवाजा- जयपुर शासन द्वारा
3 हाथीपोल
4 सूरजपोल
5 गणेशपोल
दुर्ग में स्थित दर्शनीय स्थल
1 जोगी महल
2 जेत्र सिंह की छतरी हमीर ने अपने पिता की मृत्यु के बाद उसकी समाधि पर लाल पत्थरों से 32 विशाल खंभो वाली 50 फीट ऊंची छतरी बनवाई जिस पर बैठकर न्याय करता था इसलिए इसे न्याय की छतरी भी कहते हैं
3 त्रिनेत्र गणेश मंदिर
4 पदमला तालाब सुपारी महल हमीर महल बादल महल शिव मंदिर लक्ष्मी नारायण मंदिर।
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दूसरा दिन जंगल सफारी का था। शर्माजी ने सभी की बुकिंग पहले से करा रखी थी। होटल में ही कैंटर आ गया। प्रातः 6 बजे ही हम सभी सवार हो, चल दिए बाघ के दर्शन करने। बाघ दर्शन से पहले गाइड ने कई जंगली जानवर दिखाए और यहाँ के टाइगर का वर्णन किया। हमने 2 नम्बर गेट से जंगल के भीतर प्रवेश किया था। उसने बताया कि यहाँ के टाइगर का नाम 'बादल' है। एक घण्टे से ज्यादा जंगल में बिताकर हम लौटने लगे मगर टाइगर का दर्शन नहीं हुआ। जब उसने एक बड़ा सा हरा भरा उल्लू दिखाया तो हमने उसका मजाक भी उड़ाया, "उल्लू दिखा रहे हो या बना रहे हो! तुम्हारा टाइगर कहाँ है?" उसने कहा, "वो तो साहब किस्मत की बात है, बादल आज नहीं दिखा, दिखता तो है।" हमने कहा, "तुम दूसरे सभी टाइगरों के नाम पेड़, पत्ती रख दो। जैसे बादल दिख रहा है वैसे वे भी दिखेंगे। "
हम निराश होकर लौट रहे थे कि जलाशय के पास कुछ मृग दिखे। हमारी गाड़ी रुक गई, हम मृग देखने लगे। गाइड बोला, "ये सशंकित हैं, टाइगर दिख सकता है।" तभी एक मृग ने आवाज लगाई। गाइड बोला, "कॉल आ गया, टाइगर भी आएगा।" तभी शोर हुआ, कई गाड़ियाँ आसपास जमा होने लगीं, कोई बोला, "वो देखो! टाइगर आ रहा है।" सचमुच एक खूबसूरत टाइगर चहल कदमी करता हुआ आता दिखा। सभी सांस रोककर देखने लगे। हमने वीडियो भी बनाए। हमारी गाड़ियों के बीच से उसने कच्ची मिट्टी की सड़क पार करी और इधर से उधर जाकर एक झाड़ियों के पीछे बैठ गया। बहुत देर तक हम उसे देखते रहे। हमारे आसपास कई टैंकर, जिप्सी जमा हो चुके थे। अच्छी खासी भीड़ जमा हो चुकी थी। हम हैरान थे, इन गाड़ी वालों को कहाँ-कहाँ से भनक लग जाती है और टाइगर देखने के लिए सभी जमा हो जाते हैं!
कुछ देर रुकने के बाद टाइगर भी चला गया हम भी लौट चले। धन्य भाग जो दर्शन पायो का भाव सभी के चेहरे पर दिख रहा था। अब सभी मुझे उलाहना दे रहे थे, "आप कितना मजाक उड़ा रहे थे, जंगल में टाइगर ही नहीं है, बादल क्यों, सबके नाम पेड़, पत्ते रख लो, अब क्या कहेंगे? टाइगर दिखा की नहीं? हमने भी मान लिया, "हाँ भाई, अब मान लिया, टाइगर होता है और दिखता भी है।"
दो घण्टे आराम करने के बाद उसी दिन 3 बजे से हमारी शाम की जंगल सफारी शुरू हुई। इस बार हमने महंगी जिप्सी बुक कर रखी थी। जिसमें दो बच्चों के साथ केवल हम 6 यात्री ही थे। गेट नम्बर 3 से प्रवेश किया जहाँ के बारे में माना जाता है कि इस क्षेत्र में टाइगर दिखने की संभावना बहुत ज्यादा है। यहाँ का बतावरण भी काफी रमणीक था। जगह-जगह जल भरे झील जैसे तालाब दिख रहे थे। मृग, मोर, लंगूर तो बहुत दिखे, एक स्थान पर मगरमच्छ भी दिखा। हम इन सबों में खोए हुए थे कि कोई आहट लगी, ड्राइवर ने गाड़ी घुमाई और एक किनारे रोककर बोला, यहीं से टाइगर निकलेगा। हमारे अचरज की सीमा नहीं थी जब बिलकुल हमारे पास से टाइगर निकल कर आगे झाड़ियों में गुम हो गया। ड्राइवर ने जिप्सि घुमाई और कुछ दूर तेजी से भगाकर फिर एक जगह रोक दिया, टाइगर यहीं से गुजरेगा! हम फिर दिल थाम देखने लगे। कुछ ही देर में हमारे ड्राइवर का पीछा करते हुए कई गाड़ियाँ जमा हो गईं और टाइगर वहीं से निकला जहाँ उसने कहा था। हमने टाइगर के दिव्य दर्शन किए, मोबाइल से वीडियो बनाए और ड्राइवर को खूब शाबाशी दी, ईनाम भी दिया जब उसने हमें होटल के द्वार पर छोड़ा। कुल मिलाकर हमारी जंगल सफारी आनंद दायक रही। अगले दिन 7 अप्रैल को हमें कार से जयपुर जाना था।
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जयपुर की यात्रा प्रारम्भ करने से पहले हमने वान्या महल के लॉन में प्रातः भ्रमण और अकेले स्विमिंग का आनंद लिया। ब्रेकफास्ट के बाद हमको ले जाने के लिए पहले से बुक हमारी गाड़ी आ गई और हमें जयपुर के होटल जिंजर में छोड़ दिया। सफर आनंद दायक रहा, बारिश भी हुई, चाय भी मिला। होटल में जिस मंजिल में जो कमरा उन्होंने दिया उसमें अजीब सी स्मेल आ रही थी। हम भड़क कर वापस जाने लगे और पैसा रिफंड मांगने लगे तभी उन्होने दूसरी मंजिल में अच्छा कमरा दिखाया और मौके की नजाकत, हो रहे विलम्ब को देखकर हम मान गए। वैसे कुल मिलाकर होटल ठीक है। ब्रेकफास्ट, डिनर बढ़िया है और कर्मचारियों का व्यवहार भी विनम्र है। सवाई माधोपुर की जंगल सफारी शर्माजी के दिमाग से बढ़िया हो गई, आगे जयपुर घुमाने का जिम्मा बेटियों पर डालकर हम निश्चिन्त थे, योजना बनाओ, घूमो और घुमाओ।
पहले दिन 7 अप्रैल की शाम बेटियों ने चोखी ढाणी जाने का प्रोग्राम बनाया। एक गाँव का रूप देकर एक ही जगह राजस्थानी संस्कृति की झलक दिखाने का बढ़िया प्रयास है।बहुत तारीफ सुनी थी लेकिन हमको अच्छा नहीं लगा। राजस्थानी संस्कृति के प्रदर्शन के नाम पर 1100/- प्रतिव्यक्ति की वसूली नहीं जमी। खाना भी लोगों की इच्छा पर होना चाहिए। प्रवेश तभी मिलेगा जब आप 1100/- का टिकट कटा लेंगे, यह अच्छा नहीं लगा। 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चे का 650/- की दर से टिकट काटना भी अच्छा नहीं लगा। पंचपकवान के नाम पर थाली भी बेस्वाद लगी।
हाँ, भोजन के अलावा राजस्थानी संस्कृति की जो झलक देखने को मिलती है, वह सुन्दर है। कठपुतली डांस, नृत्य सुन्दर हैं। अच्छा होता कि टिकट दो काटते, एक भोजन दूसरा शेष कार्यक्रम। इससे यह होगा कि भोजन परोसने वाले गुणवत्ता का ध्यान रखेंगे, नहीं तो शेष कार्यक्रम के लिए आने वाले दर्शकों को मनमर्जी खिलाते रहेंगे। इसके लिए प्रवेश द्वार अलग-अलग बनवाना पड़ेगा।
अगले दिन 8 अप्रैल को हम पन्ना मीणा कुंड का दर्शन करते हुए आमेर का किला देखने पहुँचे। नाम के अनुरूप किला भव्य है। एक कृतिम झील के किनारे नीचे से पूरे किले का बाहरी दर्शन खूबसूरत है। मुख्य गेट तक कार पहुँचा देती है। इसके बाद थोड़ा ही चढ़ना, चलना पड़ता है।
qप्रवेश करते ही शाही बाग का दृश्य मन मोह लेता है। तारीफ करनी होगी कि कर्मचारियों ने इसे जीवंत बना रखा है। हमने एक गाइड ले रखा था उसने हमेशा 'दीवाने आम', 'दीवाने खास' से लेकर महाराज के स्नानगृह, रसोई, शीशे जड़े महल सबके दीदार कराए और खूब वर्णन किया। उस वक्त तो उसे सुनकर हम खूब मुंडी हिला रहे थे, अब लिखने चले तो सब भूल गए। हाँ, किले के ऊपर से भी कृतिम झील का दर्शन कराया जो बेहद खूबसूरत था। झील के बीच में एक छोटा टापू जैसा क्षेत्र है जिसे बगीचा बना रख्खा है। गाइड ने बताया, यहाँ केसर की खेती करना चाहते थे लेकिन राजस्थान का मौसम अनुकूल नहीं था। यहाँ शाम को आजकल लाइट एन्ड साउंड का कार्यक्रम होता है। गाइड एक घण्टे तक लगातार बोलता, बतलाता रहा, कुछ याद है, बहुत भूल गए। सब याद होता भी तो सब लिख नहीं पाते।कुल मिलाकर आमेर का किला घूमना आनंद दायक रहा।
दूसरे दिन भोर में ही सबको नींद में छोड़कर हम और शर्मा जी जल महल के किनारे मॉर्निंग वॉक करने पहुँच गए। आपके खाते में पैसा और हाथ में मोबाइल होना चाहिए, आजकल घूमना बहुत आसान है। गूगल में प्रसिद्ध स्थान ढूंढकर, ओला/ऊबर बुक किया, पहुँच गए। हमको एक दिन पहले ऑटो वाले ने बताया था, वहाँ लोग मॉर्निंग वॉक करने जाते हैं। यहाँ हम उसी की सलाह पर पहुँचे थे।
जयपुर का जल महल मानसागर झील के बीच स्थित एक पांच मंजिला (चार मंजिलें पानी में डूबी) इमारत है, जिसे 18वीं शताब्दी में आमेर के महाराजा जय सिंह द्वितीय या माधो सिंह द्वारा अपने परिवार के लिए एक समर रिट्रीट (गर्मियों के विश्राम स्थल) और बतख शिकारगाह (Duck hunting lodge) के रूप में बनवाया गया था। यह राजपूताना और मुगल वास्तुकला का मिश्रण है।
जल महल में आम जनता का प्रवेश वर्जित है । यहाँ का पूरा अनुभव समुद्र तट पर बने सैरगाह से ही मिलता है। इसे किसी गैलरी में रखी खूबसूरत मूर्ति को निहारने जैसा समझें—आप उसके पास जा सकते हैं, लेकिन उसे छू नहीं सकते।
यहाँ प्रातः भ्रमण करने और फोटोग्राफी करने में बहुत आनंद आया।
दिन में परिवार के शेष सदस्यों का मन मार्केटिंग करने का था, हमको मार्केटिंग में कोई रूचि नहीं थी। हमको अकेले घूमने का समय मिला तो हम ओला ऑटो से फोन कर पहुँच गए ब्लॉगर वाणी गीत जी से मिलने। घर में वे और उनकी बिटिया थीं। वाणी जी ने खूब जोरदार नाश्ता कराया, बिटिया ने चाय पिलाई और बनारस भ्रमण के किस्से सुनाए। हम लोग ब्लागरों को याद करते रहे। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो अमित श्रीवास्तव जी के बीमारी से हुआ। रश्मि दी, सलिल भैया और दूसरे बहुत से ब्लागरों को याद किया गया। मैने उन्हें अपनी पुस्तक भेंट की, लौटते समय उन्होने घर में बने कुछ कलात्मक दिए भेंट किए। इतने दिनों की ब्लॉगिंग में, एक दूसरे का लिखा पढ़ते-पढ़ते हम एक दूसरे से खूब परिचित हो चुके होते हैं। मिलते हैं तो लगता ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं।
उसी दिन वाणी जी की सलाह पर हम गोविन्द जी देव मन्दिर पहुँच गए। मन्दिर में प्रेम की वर्षा हो रही थी। राधा कृष्ण की प्रतिमा में पर्दा चढ़ा था, बाहर भक्त मस्ती से नाच, गा रहे थे। भजन के बोल थे... मोहें गोपी बना दे इकबार, कान्हा तेरा क्या लागे...एक भजन खतम होने के बाद हम दर्शन की लाइन में खड़े हो गए। पाँच मिनट बाद ही पर्दा उठ गया, मनोहर छवि का दिव्य दर्शन हुआ। वीडियो भी बनाए।
मन्दिर के पास ही हवा महल है। बाहर से बहुत खूबसूरत दिखता है, भीतर से इसकी बनावट मुग्ध करती है। दीवारें इतनी जालीदार हैं की खूब हवा चलती रहती है। 5 मंजिल ऊपर चढ़कर हवा खाने के बाद समझ में आता है कि क्यों इसका नाम हवा महल है। यहाँ घूमते-घूमते शाम हो गई, पास ही जंतर-मंतर, सिटी पैलेस है लेकिन देर होने कारण उस दिन लौट आए।
दूसरे दिन प्रातः गूगल में खोजकर सेन्ट्रल पार्क चले गए। पार्क की खूबसूरती ने मन मोह लिया। विशाल पार्क है। यहाँ सभी प्रकार की कालाएं बिखरी पड़ी हैं। पोलिंग के लिए विशाल मैदान है, घोड़ों के अस्तबल हैं, गोल्फ ग्राउंड है, मेडिटेशन करने वालों का, योगा-व्यायाम करने वालों का अलग-अलग ग्रुप है। कई प्रकार के पंछी हैं और इन पंछियों के दाना-पानी की उत्तम व्यवस्था है। कुल मिलाकर एक बड़ा और शानदार पार्क है। हमारे बनारस में क्या, उत्तर प्रदेश मे भी ऐसा पार्क हमने तो नहीं देखा।
10 तारीख को सिटी पैलेस में हमने म्यूजियम देखा। भव्य महल और शानदार नक्कासी, पुराने जमाने के नाव, गंगाजल रखने का बड़ा सा चांदी का घड़ा जिसमें 200 लीटर गंगाजल अट सकता है और भी बहुत से नायाब कलकृतियाँ दिखी। ऊपर छत में एक बहुत महंगा रेस्टुरेंट भी है। जहाँ रु 200/- कप चाय, पानी की एक बोतल है। कुछ हल्का फुल्का नास्ता भी करके जो राजसी सुखनुभूति हुई, उसके सामने महंगाई भूल गए।
11 तारीख को लोहे के घर में चढ़ गए थे, लिखते हुए सुबह हो गई। अब बनारस आने ही वाला है।
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