गद्य सी अपठित हुई हैं छन्द जैसी लड़कियाँ।
ये महकते फूल के मकरंद जैसी लड़कियाँ।
पर्व के पावन-मधुरतम गीत के स्थान पर,
दर्द में डूबी ग़ज़ल के बन्द जैसी लड़कियाँ।
जो अनुष्ठानों के मंगल कामना के श्लोक सी,
घर के सिर पर हैं धरीं, सौगन्ध जैसी लड़कियाँ।
माँ के आँचल की खुशी ये बाप के पलकों पलीं,
काटती हैं ज़िंदगी अनुबंध जैसी लड़कियाँ।
ये तेरे गमले की कलियाँ हैं, ये मुरझायें नहीं,
गेह भर के नेह के सम्बन्ध जैसी लड़कियाँ।
यातना मत इन्हें दो दोस्तों धन के लिए,
क्यों रहेंगी ये सदा प्रतिबंध जैसी लड़कियाँ।
कर्मधारय, तत्पुरूष, द्विगु, श्लेष, उत्प्रेक्षानुप्रास,
हम सभी, केवल बेचारी द्वन्द्व जैसी लड़कियाँ।
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लेखक- चित्र इस ग़ज़ल के लेखक श्री आनंद परमानंद जी का है।