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1.9.13

भीड़ चलती भेड़ जैसी...

यार तू वैसा नहीं है
पास जब पैसा नहीं है।

रात लिखता है सबेरा
झूठ है! ऐसा नहीं है।

भीड़ चलती भेड़ जैसी
गड़रिया भैंसा नहीं है।

कर रहा है संतई पर
संत के जैसा नहीं है।

एक रावण सर कई हैं
क्या कहें! कैसा नहीं है।

मन बड़ा बेचैन मेरा
फूल के जैसा नहीं है।

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16.8.13

चलो यार आँखें लड़ाते रहें।


चलो रात भर गुनगुनाते रहें

सुनें कुछ कभी कुछ सुनाते रहें।


कहीं ज़ख्म होने लगें जो हरे

वहीं मीत मरहम लगाते रहें।


नहीं सीप बनकर जुड़ीं उँगलियाँ

न पलकों से मोती गिराते रहें।


बहुत दर्द सहते रहे, थे जुदा

चलो प्रेम दीपक जलाते रहें।


अमावस कभी तो कभी पूर्णिमा

सितारे सदा मुस्कुराते रहें।


जले लाख दुनियाँ, कुढ़े प्यार से

जमाने को ठेंगा दिखाते रहें।


हमारी यही चाँदनी रात है

अमावस भले वे बताते रहें।


नहीं हम अकेले ही 'बेचैन' हैं

चलो यार आँखें लड़ाते रहें।

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21.10.12

गद्य सी अपठित हुई हैं छन्द जैसी लड़कियाँ

गद्य सी अपठित हुई हैं छन्द जैसी लड़कियाँ।
ये महकते फूल के मकरंद जैसी लड़कियाँ।

पर्व के पावन-मधुरतम गीत के स्थान पर,
दर्द में डूबी ग़ज़ल के बन्द जैसी लड़कियाँ।

जो अनुष्ठानों के मंगल कामना के श्लोक सी,
घर के सिर पर हैं धरीं, सौगन्ध जैसी लड़कियाँ।

माँ के आँचल की खुशी ये बाप के पलकों पलीं,
काटती हैं ज़िंदगी अनुबंध जैसी लड़कियाँ।

ये तेरे गमले की कलियाँ हैं, ये मुरझायें नहीं,
गेह भर के नेह के सम्बन्ध जैसी लड़कियाँ।

यातना मत इन्हें दो दोस्तों धन के लिए,
क्यों रहेंगी ये सदा प्रतिबंध जैसी लड़कियाँ।
                                                                                                                   
कर्मधारय, तत्पुरूष, द्विगु, श्लेष, उत्प्रेक्षानुप्रास,                                    
हम सभी, केवल बेचारी द्वन्द्व जैसी लड़कियाँ।

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लेखक- चित्र इस ग़ज़ल के लेखक श्री आनंद परमानंद जी का है।