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2.10.14

बंदर प्रवृत्ति

बंदर
भूल चुके हैं
सुग्रीव,बाली या हनुमान की ताकत
छोड़ चुके हैं
पहाड़
नहीं भटक पाते
कंद मूल फल के लिए
वन वन।

सभी बंदर
नहीं जा पाते
संकट मोचन
सबको नहीं मिलते
भुने चने या
देसी घी के लड्डू!
अधिकांश तो
मारे-मारे भटकते फिरते हैं
छत-छत, सड़क-सड़क, टेसन-टेसन...
घुड़की देते हैं
भीख मागते हैं
छिनैती करते हैं
फंस गए तो
नाचते भी हैं
मदारी के इशारे पर।

बापू!
जन्म दिन पर ही नहीं
कभी-कभी
एक पंक्ति में बैठे
दिख जाते हैं
तीन बंदर
तो भी तुम्हारी
बहुत याद आती है।

हा..हा..हा...
तुम वाकई महान आत्मा थे!
तीन बंदरों के सहारे बदल देना चाहते थे
सम्पूर्ण मानव समाज की
बंदर प्रवृत्ति!
........

2.6.12

बंदर



बंदर
टेढ़ी कर देते हैं
टाटा-स्काई की छतरी
तोड़ देते हैं
फोन के तार
घुस आते हैं
कीचन में
उठा ले जाते है
फल या ताजी बनी रोटियाँ
नहाते हैं
पानी की टंकी में घुस कर
डालते है
दिन दहाड़े डाका
हम
लाठी लेकर
बमुश्किल
खुद को
बचा ही पाते हैं।

अकेले हों तो
भले भाग जांय
मगर जब होते हैं झुण्ड में
नतमस्तक हो
खुद ही भागना पड़ता है
इनसे

हमारी तरह चलती है
इनकी सरकार
इनकी संसद
इनके कानून

आपकी श्रद्धा और विश्वास का
ये भी उठाते हैं
भरपूर लाभ

देखा है
संकट मोचन के बंदर
खाते हैं
चने के साथ
शुद्ध देशी घी के
लड्ढू भी !
......................... 

नोटः आपका ब्लॉग न पढ़ पाने के पीछे इन बंदरों का भी बहुत बड़ा हाथ है।:)