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18.4.12

सब्जी महंगी है न ?


सब्जी बाजार में भटकते-भटकते थक हार कर देर शाम अपनी वाली सब्जी की दुकान से सब्जी खरीदने गया तो देखा सभी हरी सब्जियाँ बिक चुकी थीं। आलू, टमाटर, प्याज के अलावा एक छोटी कटहरी अकेले उदास बैठी थी। मैने लपक कर उसे उठा लिया। दुकानदार से पूछा...इहै बचल हौ ! कित्ते कs हौ?” दुकानदार ने एहसान लादते हुए कहा..सबेरे से तीस मे बेचत रहली, आप बीसे दे दिहा। दाम सुनकर मैं चीखा..नान भरे कs मिर्ची अस कटहरी, बीस रूपैय्या में ! काहे लूटत हउआ मालिक ?” दुकानदार झल्लाकर उसे मेरे हाथ से छीनने ही वाला था कि मैने उसे लपक के अपने झोले मे छुपा लिया। खिसियानी हंसी हंसते हुए संत वचन बोलने लगा, ”ठीके हौ, तोहू का करबss ! जौन भाव मिली तौने भाव न बेचबss !! J वह हंसते हुए बोला.. एक घंटा से बाजार मे घूमत हउआ। जब कुल दुकाने कs सब सब्जी ओरा गयल तs ऐसे पूछत हउआ जैसे हजार दू हजार कs खरीद्दारी करे वाला रहला! चार दाईं त हमहीं बतउले रहली कि नेनुआँ, भिंडी, बोड़ा सब चालिस रूपैय्या कीलो हौ। काहे नाहीं तबे कीन लेहला? लगन शुरू हो गयल, काली से यहू भाव न मिली!”

मैं लौटता तभी वहाँ दूसरा व्यक्ति सब्जी खरीदने पहुँचा। सब्जी न देख बड़का झोला लहराते, आश्चर्य व्यक्त करते हुए बोला...अरे ! इत्ती जल्दी दुकान से कुल सब्जी गायब हो गयल ! सबके पास बहुत पैसा हौ मालिक !! अब हम का खरीदी ? मैने उससे कहा, “आप बहुत भाग्यशाली हैं। कम से कम घर जाकर आत्मविश्वास के साथ यह तो कह सकेंगे नसब्जी नहीं मिली तो क्या करें ? आज आलू प्याज ही बना दो। आज तो मैं बड़ा झोला और पूरे सौ रूपये का नोट लेकर गया ही था सब्जी खरीदने।” J

वह मेरी ओर देख कर मुस्कराने लगा।

मैं खुश हुआ कि उसे मेरी बात अच्छी लगी।

दुकानदार बड़बड़ाया....दुकान बढ़ाव रे रमुआँ ! ई दुन्नो मिला एक्कै कटेगरी कs हउअन। इन्हने के सस्ती सब्जी चाही। सरकार से लड़े कs औकात तs हौ नाहीं, बस हमरे कपारे पे सवार हो जइहें। कोई अपने घरे से तs न न देई। समस्या ई हौ कि अब अइसने गाहक ढेर आवे लगलन ! जिनगी झंड हो गयल।   
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2.1.12

घर



बड़े शहर में
सहमा सहमा
एक बड़ा  
खंडहर रहता है
एक कमरा है
उस कमरे में
प्यारा सा इक
घर रहता है।

पति देव
बड़े कर्मठी
खुशमिजाज
पत्नी रहती है
बड़ी हो चुकी
दो पुत्रियाँ
सीधा सा
बेटा रहता है।

बड़ा है कमरा
उस कमरे में
पूरब दिशा
दो चौकी रहती
पश्चिम में
बाबूजी की
हिलने वाली
खटिया रहती
उत्तर में
टीवी रहती है
दख्खिन में
चौका बर्तन है
एक कोने 
अलमारी रहती
एक कोने में
फ्रिज रहता है
कमरे में
घुसते ही दायें
लोहे का बक्सा रहता है
एक ताखे में
उस्तक पुस्तक
एक ताखे
ईश्वर रहता है।

गर्मी में
पूरा कमरा
एसी का मजा देता है
जाड़े में
एक ही हीटर
सबको गर्मी दे देता है
वर्षा में
जब छत चूता है
बिस्तर में
बल्टी आ जाती
सुनते हैं
सब सहमे सिकुड़े
टप टप टप टप
क्या गाती है !  
बाबूजी की
खटिया पर भी
एक बगोना
हंसने लगता
टीवी प्लॉस्टिक
ओढ़ चुपाता
गद्दा करवट
बदल के सोता
जाहे जिस मौसम में जाओ
घर हरदम
हंसता रहता है
उस घर का
हर इक कोना
खुश होकर
मिलता रहता है।

टीवी कहती
कथा कहानी
मोबाइल
बातें करती है
बरतन
चटपट करते रहते
बेलन भी
हंसता रहता है।

डिबिया
लढ्ढू लेकर आती
स्वच्छ गिलास
आता पानी ले
प्लेट
पकौड़ी लेकर आता
कप चमकीली
चाय गरम ले
और जब मैं
चलने लगता
पनडब्बा भी
मुस्काता है।

बड़े शहर में
सहमा सहमा
एक बड़ा  
खंडहर रहता है
एक कमरा है
उस कमरे में
प्यारा सा इक
घर रहता है।
  
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