Showing posts with label सर्वहारा. Show all posts
Showing posts with label सर्वहारा. Show all posts

24.5.20

बच्चे

रोटी पर बैठकर
उड़े थे
कोरोना खा गया रोटी
पैदल हो गए
सभी बच्चे

तलाश थी
ट्रेन की, बस की
कुचले गए
पटरी पर, सड़क पर

हम
धृतराष्ट्र की तरह
अंधे नहीं थे
देखते रहे दूरदर्शन
देखते-देखते
मर गए
कई बच्चे!

शहर से
पहुँचे हैं घर
बीमार हैं, लाचार हैं
जागते/सोते
देखते हैं स्वप्न...
रोटी का सहारा हो तो
उड़ चलें
फिर एक बार
यहाँ तो
डर है! नफरत है!
कैसे रहें?
..........

17.9.14

विज्ञान क चमत्कार

विज्ञान क चमत्कार
सब आपै क सरकार।

कइसे बइर(वैर) लें
हमें का परी ?
सौ साल पहिले
आप जलाये
ट्यूब लाइट
सौ साल बाद
हम जलायें ढिबरी !

बड़ी मेहरबानी
पहिले दऊ देत रहेन
आज आप देत हौ
धूप, हवा, पानी।

हम पढ़े नाहीं मालिक
लइका बतावत रहा
चोर चोरी करत रहेन
अउर साव
मजूरा बनके पहुँचात रहेन
तांबा, पीतल, हीरा, कोयला, अभ्रक-सभ्रक..
बड़ा खजाना रखे है माई !

ओहू का करी ?
पढ़ लिख के अपाहिज हो गयल ससुरा
न खेत न शरीर में जोर
बतिया करे
बड़ी-बड़ी
शहर में
नाहीँ जुगाड़ पावत बा
नून, तेल, लकड़ी।

छिमा करें
बहक गये
बहुत बोल गये 
आप क विज्ञान
आप क चमत्कार
आप क संसार
नमस्कार।

…………………………….

26.10.13

नइखे नूंssss

कल फेसबुक में इसे पोस्ट किया था। जिन्होंने इसे समझा खूब पसंद किया जिन्होने नहीं समझा उन के सर के ऊपर से गुजर गया। जब मैने बलिया में नइखे नूं... इस शब्द को एक-दूसरे से कहते सुना तो थोड़ा और ध्यान से सुनने लगा। बलिया, बिहार के निवासी इसका प्रयोग बड़े रोचक ढंग से करते हैं। उनके कहने के अंदाज से पता चलता है कि वे प्यार से.. ‘नहीं है, नsss..’ कह रहे हैं, कठोरता से... ‘नहीं है!‘ कह रहे हैं या फिर पूछ रहे हैं...नहीं है न ? 

जितना सुनता उतना आनंद आता। इस शहर में टेसन से उतरते ही एक कतार में लिट्टी-चोखे की दुकाने  हैं। मैने खाया लेकिन बढ़िया नहीं लगा। शायद बढ़िया दुकान तक मैं अभी पहुँचा नहीं। यहाँ का पानी पीने लायक नहीं है। पीने के लिए पानी खरीदना पड़ता है। सोचने लगा.. गरीब जनता कहाँ से पानी खरीद पाती होगी! इसी पानी में ही दाल-भात बनाती होगी। लिट्टी तो आंटे-सत्तू से बनता है लेकिन चोखा! चोखे के लिए प्याज, बैगन और टमाटर तो चाहिए। क्या गरीबों के लिए प्याज, बैगन खरीदना इत्ता आसान है? गरीबों के इस सर्वसुलभ प्रिय भोजन पर किसकी नज़र लग गई! यही सब सोचते हुए इस शब्द नइखे नूं को और ध्यान से सुनने लगा। सुनते-सुनते बेचैन मन ने कुछ अधिक ही सुन लिया। देखिये मैने क्या सुना.....
  

नइखे नूंsss


बाटी तs बटले बिया 
नsssरम,
थलिया मा चोखवा 

नइखे नूंsssssss 

बजरिया मा 
भांटा-पियाज 
खूब होखे,
जेबवा मा नोटिया

नइखे नूंssssss

हाय दइया!
दलिया मा
पानी बाटे
गंगाजी कs मटियर
देखा तनि,
रंग एकर!
पीsssयर?

नइखे नूंsssss

दू बूँद
तेलवा मा
चुटकी नमकिया
चला खाईं
नून-रोटी
पेट भर सानि के
हमनी के जीये के बा
होई न अजोरिया...
मरे के बा?

नइखे नूं ssssss
.....................


जो इसे नहीं समझ रहे उनके लिए शब्द अनुवाद करने का प्रयास करता हूँ। भाव तो आप समझ ही जायेंगे----

नहीं है नssss

बाटी तो ही ही 
नरम 
थाली में चोखा

नहीं है नsssss :(

बाजार में
बैगन-प्याज 
खूब है
जेब में नोट

नहीं है नssss :(

हे भगवान!
दाल में 
गंगी जी का 
मटमैला पानी है
देखो जरा
इसका रंग
पीला?

नहीं है न ?

(मतलब दाल में गंदे पानी की मात्रा इतनी अधिक है कि इसका रंग अब पीला भी नहीं रह गया है। यहां 'नइखे नूं' कहते हुए बता नहीं रहा है, पूछ रहा है। जब जान गया कि दाल, प्याज, बैगन, टमाटर सभी उसकी पहुँच से दूर हैं तो दुखी होकर आगे कहता है...)

दो बूँद
तेल में
चुटकी भर नमक
चलो
नून-रोटी
मिलाकर
पेटभर खायें
हम लोगों को जीवित रहना है
एक दिन उजाला होगा न!
मरना है?

नइखे नूं sssss

नहीं नssssss !

.......................

15.10.13

त्योहार और आम आदमी

दशहरा, बकरीद या दिवाली खास आदमी धन से, आम आदमी मन से मनाते हैं। अर्थशास्त्र कहता है-पूँजी के द्वारा अर्जित किये हुए उस पैसे को धन कहते हैं जिसमें निरंतर वृद्धि होती रहती है। समाज शास्त्र कहता है-परिवार के सदस्यों की उस इच्छा को मन कहते हैं जिसकी पूर्ति लिए आम आदमी को कर्ज़ लेना पड़ता है। यही कारण है कि ये त्योहार खास के लिए खुशी, आम के लिए दुःख के कारण बनते हैं। गणित की भाषा में दोनो में एक शब्द कॉमन है-आदमी। हारता यही है, जीतता यही है। मरता यही है, मारता यही है। कलयुग में यही भक्त है, यही भगवान है।

मांसाहारी परेशान हैं। दशहरे और बकरीद ने मछलियों, मुर्गों, बकरों और भी दूसरे खाये जाने वाले जानवरों का भाव बढ़ा दिया है। शाकाहारी भी कम परेशान नहीं। टमाटर चालीस से नीचे नहीं उतर रहा, प्याज साठ पर डटा हुआ है और अब तो गोभी, नयां आलू और मटर भी बाज़ार में आ गया है। सभी त्योहार आम आदमी कर्ज़ लेकर रोते हुए मनायेगा। खास के पास धन है। सभी त्योहार हँसते हुए मनायेगा। रोते हुए मने, चाहे हँसते हुए, त्योहार आयेंगे और मनाये जाते रहेंगे। गरीब यह नहीं समझ पाते कि ये त्योहार खास के द्वारा, खास के लिए, खास के हित में बनाये गये हैं। ये व्यापारियों के लिए आते हैं। मुल्लों, पंडितों के लिए आते हैं। पूँजीपतियों के लिए आते हैं। ये त्योहार सर्वहारा वर्ग की खून-पसीने की गाढ़ी कमाई को बाज़ार तक ले जाने के लिए आते हैं। इन त्योहारों में गरीब के घर ढिबरी भी कर्ज़ के तेल से जलती है, बाजार लाभ से जगमगाते हैं।  

आम आदमी की परेशानी खास को समझ में नहीं आती। हँसते हुए कहता है-अब भारत में गरीब कहाँ रह गया? रिक्शा चलाने वाले के पास भी मोबाइल है! गरीब आदमी के बच्चों के पास भी लैपटॉप है। नेट पर बैठकर बड़े-बड़ों से चैट करता है! भाड़ में जाये तुम्हारा मोबाइल! भाड़ में जाय तुम्हारा यह जंजाल। तुमने मोबाइल देकर मजदूरों को और 24 घंटे का गुलाम बना दिया। रात में भी चैन से सो नहीं पाता। थका-मांदा रात मे 12 बजे घर आया है। दो रोटी खाकर गहरी नींद सोया है। तुम्हें कोई जरूरी काम याद आ जाता है और तुम उसे भोर में ही घर आने का आदेश सुना देते हो। जब मोबाइल नहीं था, रात तो उसकी अपनी थी। लोटा लेकर निपटने जाता था तो देख पाता था सूरज़ की लाली कैसी होती है! अब तो दोनो जहान से गया। मगर मजे की बात यह कि यह भी नहीं कह पाता- यह लो अपनी लकुटी कमरिया, बहुत ही नाच नचायो।

आम आदमी को तो श्रम के बदले पेट भर भोजन चाहिए। पहनने के लिए कपड़ा चाहिए। बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए। रहने के घर चाहिए, घर में बिजली-पानी चाहिए। चलने के लिए सड़क चाहिए। बीमार पड़े तो अस्पताल चाहिए। इतना सब मिल जाय तब जाकर धन्यवाद देने के लिए भगवान चाहिए। उत्सव मनाने के लिए त्योहार चाहिए। मगर यहाँ सब उल्टा-पुल्टा हो रहा है। घर में खाने के लिए रोटी नहीं मगर त्योहार मनाना जरूरी है। पैसा नहीं है तो कर्ज़ लेकर ही सही, मनाना जरूरी है। दौड़ लगा रहे हैं मंदिरों में..हे ईश्वर! चमत्कार कर दो। भाग रहे हैं भीड़ में। भगदड़ मची तो खास एक भी नहीं, सबके सब आम ही मरे। चालाक नहीं जाते भीड़ में। कर्ज़ दे सकते हैं ब्याज़ पर। जाओ! मनाओ भगवान, मनाओ त्योहार, काटो बकरे, चढ़ाओ परसाद। तरह-तरह के ऑफर, तरह-तरह के प्रलोभन।

कहाँ जायेगा भागकर आम आदमी? कर्ज़ ले लो कर्ज़। सस्ते दर पर ले लो। सिम भराओ..बतियाओ सढ़ुआइन से। ऐ बहिनी, फोन लगाय द जरा मौसी के! दशहरा ऑफर है, दीवाली ऑफर है..ले लो, ले लो, कर्ज़ ले लो। कर्ज लेकर नई टीवी ले आओ, फ़्रिज ले आओ, जिसकी जितनी हैसियत उससे बढ़कर चीजें ले आओ। पेट्रोल भराने की ताकत नहीं, साइकिल छोड़कर मोटर साइकिल ले आओ। रखने लायक घर नहीं, कार ले आओ। शामिल हो जाओ दौड़ में। रोटी से दूर, दवा से दूर, अच्छी शिक्षा से दूर जिये जा रहे हैं झूठे भ्रम जाल में। भले छत चू रहा हो, मोबाइल भरा होना चाहिए, केबिल चालू रहना चाहिए। देखना है सीरियल...आनंदी, बिग बॉस, महाभारत। ललचते जाना है देख-देखकर तरह-तरह के विज्ञापन। सब देखकर भी सुख नहीं हैं। भरनी है आह! करना है क्रंदन। नौ दिन व्रत रखो, माई खुश होंगी तो मिल जायेगा सब कुछ। लक्ष्मी की पूजा करो, घर धन से भर जायेगा। 

उच्च शिक्षा पर खास का कब्जा है। अच्छे इलाज खास के ही वश में हैं। आम आदमी को रहना ही है भगवान भरोसे। इस जाल से निकल पाना अब तो असंभव लगता है। यह और कुछ नहीं अपराधियों, पूँजीपतियों, धर्मगुरूओं का एक सम्मिलित चमत्कार है। इस चमत्कार को नमस्कार है।
...................................

                                          

24.10.12

सर्वहारा


सूर्योदय हो या सूर्यास्त
चौकन्ने रहते हैं
चिड़ियों की तरह
नाटे, लम्बू, कल्लू, छोटू
या फिर
बिगड़ैल पूँजीपतियों के शब्दों में-
हरामख़ोर।

भागते हैं
साइकिल-साइकिल
दौड़ते हैं
सूरज-सूरज
तलाशते हैं
दाना-पानी

दिन ढले
इन्हें देखकर
खोँते में
किलकने लगते हैं
चँदा, सूरज, राधा, मोहन
या फिर
राजकुमारी।

चोंच की तरह
खुल जाता है
झोले का मुँह
चू पड़ते हैं धरती पर
टप्प से
कुछ स्वेद कण
तृप्त हो जाती है
जिन्दगी।

अजगर की तरह
गहरी नींद
नहीं सो पाते,
बुद्धिजीवियों की तरह
नहीं कर पाते
शब्दों की जुगाली,
बांटते हैं दर्द
आपस में।

कमेरिन कहती है..
लाख काम करो
दू रोटी कम्मे पड़ जात है!
इहाँ चन्ना देर से निकसत हs का ?
गाँव मा तs 
हम जल्दिये सूत जात रहे
इहाँ तs
सोवे कs भी मउका नाहीं मिलत 
पूरा।

कल बहनिया ताना मारत रही 
हमार शहर बहुत बड़ा हs
तोहार तs, जैसे गाँव!

डांटता है कमेरा’....
अच्छा! ऊ का कही गोबर गणेश!!
जस हो, तस भली अहो
दूर क बंसी
सुरीली जान पड़त है
तोहें खबर है?
महानगरी में तs
सूरज डूबबे नाहीं करत

रोवे क भी मउका नाहीं मिलत  
पूरा!
......................

22.2.11

पचइंचिया

का रे पचइंचिया !
नहइले ?
ना..
खाना खइले ?
ना..
सुतले रहबे ?
ना…
खेलबे ?
हाँ…
के उतारी तोहें इहाँ से ?
देख ! तोहार बाहू तs ओह दे ऊपर बोझा ढोवता
तू कबले सुतले रहबे ई पाँच इंची के देवार पे !

कूद !
न कुदबे ?
ले उतार देतानी तोहका
शाबास!

ना चिन्हले हमका ?
हम ठिकेदार हई...
तोहार असली बाप रे सारे !

ले ई दोना
जा बालू लिआव कपारे पर जैसे तोहार माई लियावता !
हँ...अइसे....शाबास !

ले रोटी खो।
फेंक देहले..?
हरामी...!
रूक..!
बूझ लेहले का पंडित का भाषा ?

का रे लम्बुआ...!
का कहत रहलेन पंडित जी काल ?

हँ मालिक !
कहत रहेन...

नव इंची के ईंट कs सीढ़ी बनाई के
निकसी पचइंचिया
अंधियार कुईंयाँ से
एक दिन
बजाई गिटार
खिल उठी फूल
तितलियन कs आई बाढ़
नाची मनवाँ
हुई जाई
सगरो अजोर।

हा हा हा हा...
चुप रे लम्बू !
देख !
अंखिया भर आई हमार।

पगलऊ पंडित !
ना बूझेलन केतना गहीर बा
ई कुआँ...!
....................................................................................

हिंदी अनुवाद । उन पाठकों के लिए जो भोजपुरी बिलकुल ही नहीं समझ पा रहे। मुझे नहीं मालूम कि मेरा प्रयास कहाँ तक सफल है लेकिन मुझे लगा कि अनुवाद आवश्यक है उन पाठकों के लिए जिन्होने भाषा के कारण इसे बिलकुल ही समझने से इंकार कर दिया। मेरा मानना है कि भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम है। दर्द जैसे भी हो महसूस किया जाना चाहिए।


पचइंचिया

क्यों रे पचइंचिया !
नहाये ?
ना..
खाना खाये ?
ना..
सोते ही रहोगे ?
ना...
खेलोगे ?
हाँ…
कौन उतारेगा तुम्हें यहाँ से ?
देखो !
तुम्हारा पिता तो वो... ऊपर बोझा ढो रहा है !
तुम कब तक सोते रहोगे इस पाँच इंच के दिवार पर ?

कूदो !
नहीं कूदोगे ?
लो उतार देते हैं तुमको
शाबास !

हमको नहीं पहचानते ?
हम ठेकेदार हैं.....
तुम्हारे असली बाप रे साले !

लो, यह दोना लो
जाओ अपने सर पर रख कर बालू ले आओ
जैसे तुम्हारी माँ ले कर आ रही है !
हाँ...ऐसे ही....शाबास !

लो रोटी खा लो
फेंक दिये..?
हरामी !
रूको..!
पंडित की भाषा इतनी जल्दी समझ गये ?


क्यों लम्बू..!
क्या कह रहे थे पंडित जी कल ?

हाँ मालिक !
कह रहे थे.....

नौ इंच के ईटों की सीढ़ी बनाकर
निकलेगा पचइंचिया
अंधेरे कुएँ से
एक दिन
बजायेगा गिटार
खिल उठेंगे फूल
आएंगी ढेर सारी तितलियाँ
नाचेगा मन
हो जायेगा
चारों तरफ उजाला।

हा हा हा हा....
चुप रहो लम्बू !
देखो !
मेरी आँखें भर आईं।

पगला पंडित!
नहीं समझता
कितना गहरा है
यह कुआँ…!
...............................................