21.4.12

तेरे आगे सब नंगे



तेरे आगे सब नंगे
हर गंगे, हर हर गंगे।

कोई पूरब से आता है
कोई आता पश्चिम से
कोई उत्तर से आता है
कोई आता दक्षिण से

धुलते हैं सब पाप उसी के
जो होते मन के चंगे।

एक नदी के नहीं ये झगड़े
तुमने माँ को बाँध दिया!
देख सको तो देखो पगले
ईश्वर ने दो आँख दिया!

कहीं धर्म के, कहीं चर्म के
चलते हैं गोरख धंधे।

जमके धोये हाथ उसी ने
जिसने गंगा साफ किया!
जिसके जिम्मे पहरेदारी
उसने गोता मार लिया!

माँ की गरदन टीप रहे हैं
कलजुग के अच्छे बंदे।

तनकर देखो तो मैली है
झुककर देखो तो दर्पण
तुम न करोगे तेरे अपने
कर देंगे तेरा तर्पण।

आ जायेगा चैन कि जिस दिन
मिल जायेंगी माँ गंगे।

हर गंगे, हर हर गंगे 
तेरे आगे सब नंगे।

..................................................

40 comments:

  1. @ कहीं धर्म के, कहीं चर्म के, चलते हैं गोरख धन्धे ...

    सत्य वचन! बहुत सुन्दर! हर गंगे, हर हर गंगे!

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  2. गंगा मैया को समर्पित प्यारी और पर्यावरणीय रचना !गंगा की विरासत को बचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है पर अर्थ की दौड़ में सब उसे अनदेखा किये बस भागे जा रहे हैं !

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  3. मां की दुर्दशा पर आखिर एक कवि की व्यथा होठों तक आ ही गयी

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  4. kai baras ho gaye ganga snan kiye, is saal jaayenge.
    har har gange

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  5. कैसे हैं ये हथकंडे,
    लूट रहे हैं भिखमंगे ,
    घोल-घोल कर विष जल मैं
    मुख से कहते 'हरगंगे '

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  6. तनकर देखो तो मैली है.
    झुककर देखो तो दर्पण
    तुम ना करोगे तेरे अपने
    कर देंगे तेरा अर्पण.

    माँ की दुर्दशा से विचलित होना स्वाभाविक है.

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  7. बहुत अच्छी गुहार है । किन्तु कवियों की सरकार सुनती ही कहाँ है ।

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  8. हर हर गंगे ।

    माँ को प्रणाम ।

    प्रभावी रचना ।।

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  9. पंडित जी ने लेख लिखा था,
    पाण्डे जी ने गीत रचा,
    किन्तु अभागिन गंगा मैया का
    न कोई सम्मान बचा.
    गंगा की संपदा को खोकर हम सब हैं बस भिखमंगे,
    माफ करो हे माता, कैसे बोलें हम हर हर गंगे!!

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    1. पंडित जी, ऊ का कहते हैं..म्यूज बन गये।:)

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  10. सच कहा है ... माँ गंगे तो सब कुछ आत्मसात कर रही है फिर भी कोशिश कर रही है पवित्र रहने और करने की ... पर उसके पुत्रों कों न जाने क्या होता जा रहा है ... सार्थक चिंतन ...

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  11. कितने युग, कितने जन देखे..

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  12. हर भाल दिखा उजला चाहे
    अन्दर नागों से फन देखे !!



    पंडित जी माहौल बड़ा खराब है मेरी खुद की हालत मां गंग सी हो गई है बुखार के बाद वैचारिक नंग धडंग से स्थिति है कविता लिखने की कोशिश भोथरी पड़ गई है ! अब मजबूरी में यह कह कर खिसक रहा हूं कि बुरा जो ढूंढन मैं चल्या ? ... ये ससुरा इंसान भी बहुत कुत्ती चीज है पैदा होते ही जन्म देने वाली मां पे ही गंद करना चालू कर देता है ज़रा भी पछतावा नहीं करता तो फिर तारने वाली कि चिंता कौन करे :(

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    1. चलिये प्रवीण जी की और आपकी पंक्तियों को मिलाकर एक मुक्तक की शक्ल दें...

      कितने युग,कितने जन देखे
      युग-युग ने काले घन देखे
      हर भाल दिखा उजला चाहे
      अन्दर नागों के फन देखे।

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    2. अली साब ,आपकी सलामती हमारे लिए बहुत ज़रूरी है,पर अब ख्वाब वैसे न देखना...नंग-धड़ंग वाले !
      आज ही 'निरमल बाबा' से दुआ की थी, 'किरपा' चालू हो गई,आपके आने से !

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    3. हद हो गई संतोष जी अब आपका बस चले तो ख़्वाबों पे भी ड्रेस कोड लागू कर दीजियेगा :)

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  13. देर सवेर तो हम चेतेंगे, नहीं तो हर-हर गंगे!

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  14. गंगा फिर भी गंगा ही रहेगी।

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    1. धन्य महाराज :)

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    2. गंगा फिर भी गंगा कैसे रहेगी? क्या इसका अर्थ यह लगाया जाय कि हमे चुपचाप बैठे रहना चाहिए, गंगा फिर भी गंगा ही रहेगी?

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  15. कल्पना कीजिये कि राजा भगीरथ आ गये हैं और गंगा की दुर्दशा से व्यथित हो आमरण अनशन पर बैठ गये है अब सरकार की प्रतिक्रिया क्या होगी?

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    1. कौशलेन्द्र जी कल्पना करी ,

      अरे भाई राजा भागीरथ 'मरे' हुओं को तारने के लिए गंगा धरती पर लाये थे ! उन्हें अच्छे से पता था कि इस काम में दुर्दशा होती ही है सो अनशन में काहे बैठेंगे :)

      तो क्या हमें मरे हुओं से प्रतिक्रिया की उम्मीद भी करनी पड़ेगी :)

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  16. बढ़िया...........
    सुंदर सामायिक रचना..

    बधाई...

    अनु

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  17. कृपया चित्र देखने के लिए पन्ना पलटें !!

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  18. हम नर्मदा किनारे वाले भी यही महसूस करते हैं।

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  19. अर्थ पूर्ण कटाक्ष करती रचना -हर गंगे हर हर गंगे ,एक हमाम और सब नंगे ,हाथ लिए सब तिरंगे ...

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  20. आजाये चैन की जिस दिन मिल जाएगी माँ गंगे....मेरे लिए तो यही पंक्ति अवशयक है क्यूंकि शाद आपको यह जानकर आश्चर्य हो मगर सच यही है की मैंने आज तक, या यौम कहिए की अभी तक माँ गंगा को देखा ही नहीं हाँ गंगा जल का सेवन ज़रूर किया है मगर गंगा नदी को नहीं देखा...खूबसूरत भाव संयोजन से सजी सार्थक रचना.... समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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  21. झट पहुंचा दूँगी तल में,
    गर लेगा मुझसे पंगे....
    मगर इंसान है कि पंगे लेना छोडता ही नहीं, लिहाज़ा कभी ऋण तो कभी धन जल से मरता है।

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  22. ... फणीश्वर रेणु के जुमले में बोले तो!!

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  23. क्या बात हैं पाण्डेय जी आज तो आपने गंगा जी के दर्शन करा दिए :)

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  24. इंसान मैया गंगे से पंगे लेने से बाज नहीं आता, लिहाज़ा कभी ऋण तो कभी धन जल से मरने को अभिशप्त है।

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  25. अद्भुत गंगा दर्शन
    और फिर दिग्दर्शन भी

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  26. दोनों ही चित्र गंगा के रूप हैं ... सबका सोचती है गंगा ...

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  27. आप का जलवा है भाई ...आपके पास गंगा है!!!

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    1. गंगा तो सबकी है। मेरा सौभाग्य है कि मैं गंगा किनारे बसा हूँ । मेरा कर्तव्य है कि जो देखा सबसे साझा करूँ...

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  28. दुखद है सर!
    जब जब घर जाता हूँ, मन हहर उठता है।

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