18.8.13

शरीफ़ आदमी

मुद्दतों बाद चाय की दुकान में कवि जी को एक शरीफ आदमी मिल गया। उनको देखते ही खड़ा हो गया। बोला-"आइये! बैठिये! चाय पी लीजिए।" कवि जी खुश हुए। बैठते हुए अपना संदेह व्यक्त किये-"आपको पहचाना नहीं!" वह बोला-"मैं आपको अच्छी तरह पहचानता हूँ। आप पूरे 'घाघ' हैं!" कवि जी चौंककर खड़े हो गये- "क्या मतलब ?" उस शरीफ आदमी ने हकलाते हुए कहा-"मेरा मतलब 'महाघाघ'! कवि जी अब लगभग नाराज होते हुए चीखे-"क्या कह रहे हैं आप?" शरीफ आदमी ने अपनी बात स्पष्ट की-मेरा मतलब 'बड़े कवि'..आप एक अच्छे कवि हैं।" कवि जी फिर खुश होकर बैठ गये-"हें हें हें..तब ऐसा बोलिए न, घाघ- घाघ क्या लगा रक्खा है?

उनकी बातें सुनकर मेरा दिल खिल गया। चाय आने तक मैं भी दोनो से काफी हिल मिल गया। मैं चुपचाप दोनो की बातें सुनने लगा। शरीफ आदमी ने बात आगे बढ़ाते हुए कवि जी कहा- 

एक दिन मैं सरकारी दफ्तर गया।
क्यों गये?
काम था।
हुआ?
नहीं।
फिर जाओगे?
नहीं।
क्यों?
जान गया कि काम नहीं होगा।
होगा तो?
होगा तब भी नहीं जाऊँगा।
भगवान करे कभी काम पड़ ही जाये तो?
भगवान न करे कभी काम पड़े और सरकारी दफ्तर जाना पड़े।
ठीक है, मत जाना। मैं चलता हूँ।

वह भी लपककर खड़ा हो गया..

कहाँ?
घर।

कवि जी! आप भी अजीब आदमी हैं। मेरी बात पूरी सुने बिना ही जा रहे हैं! कवि जी बोले-चाय खतम हो गई। मैं तपाक से बोला-दूसरी पी लीजिए। मैने चाय वाले को आवाज दी-ऐ भाई जरा चाय देना। मुझे दोनो की बातों में मजा आ रहा था। कवि जी ने मेरी बातें सुनकर और भी भाव दिया-चाय के बाद मैं पान भी खाता हूँ। मैने कहा-पान में से आइये-जाइये। बनारस में पान की क्या कमी है! यहाँ यही तो एक चीज बची है जो लोग अभी भी एक दूसरे को प्रेम से खिलाते हैं। मेरी बात सुनकर कवि जी फिर बैठकर चाय पीने लगे। वह आदमी मुझे जरूरत से ज्यादा शरीफ लग रहा था। उसने अपनी बात आगे बढ़ाई...

हाँ, तो मैं कह रहा था, एक दिन मैं सरकारी दफ्तर गया था। दरवाजे पर ही लम्बी-लम्बी मूँछों वाला एक यमदूत खड़ा था। मुझे देखते ही गरज कर बोला-क्या काम है? 

मैं बीच में ही बोल पड़ा-पक्का चपरासी होगा।

उसने चौंककर पूछा-आपको कैसे पता चला?

मैं बोला-"इसमे कौन सी बड़ी बात है सरकारी दफ्तर में अनजान व्यक्ति को देखते ही रूआब से बोलने वाला चपरासी के सिवा और कौन हो सकता है?"

शरीफ आदमी मेरे उत्तर से संतुष्ट हुआ-आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। चपरासी ही था। उसने अपनी बात जारी रखी....

मैने चपरासी से पूछा- पाण्डे जी कहाँ बैठते हैं? चपरासी मुझे भीतर ले गया। एक कोने में लगे फाइलों की ढेर की ओर इशारा करते हुए कहा-वही हैं। मैने गौर से देखा तो मुझे फाइलों के ढेर के बीच एक खोपड़ी दिखाई दी। पास गया तो देखा, एक सज्जन सिर झुकाये हुए कुछ लिख रहे थे। मैने पूछा-

पाण्डे जी आप ही हैं? 

मेरी आवाज को सुनकर उसका सर टेबुल लैम्प की तरह ऊपर उठा और अपने दिव्य ज्ञान से मुझे प्रकाशित करते हुए बोला-यहाँ कई प्रकार के पाण्डे जी पाये जाते हैं! आपको किससे मिलना है ? 

वही जो लोन देते हैं।

यहाँ सभी पाण्डे जी लोन देते हैं। आपको किससे मिलना है?

मुझे उनका नाम नहीं मालूम।

अपना नाम मालूम है?

जी।

जी क्या?

लोन चाहिए।

लोन भी कई प्रकार के होते हैं। आपको कौन सा लोन चाहिए?

मैने घर बनाने के लिए प्रार्थना पत्र दिया है।

अच्छा तो आपको घर बनाने के लिए 'हाउसिंग लोन' चाहिए।

जी।

हाउसिंग लोन वो वाले 'पाण्डे जी' देते हैं। उसने दूसरे कोने में दूसरे फाइलों के ढेर की ओर इशारा किया। मैं धन्यवाद देकर दूसरे कोने में दूसरे पाण्डे जी के सामने खड़ा हो गया।  

आप पाण्डे जी हैं?

दूसरे भी पहले से कम न थे। छूटते ही बोले-जहाँ से आप आ रहे हैं, वे भी पाण्डे जी हैं।

जी, जान गया हूँ। उन्होने ही मुझे आपके पास भेजा है।

क्या काम है?

हाउसिंग लोन चाहिए।

आपका घर कहाँ है?

मैने खीझकर कहा-घर नहीं है तभी तो हाउसिंग लोन ले रहा हूँ।

मेरा मतलब आप कहाँ रहते हैं?

किराये के मकान में। कचहरी के पास लेकिन इससे लोन का क्या संबंध है?

गहरा संबंध है। जमीन है?

हाँ।

कितनी?

सवा बिस्वा।

आय कितनी है?

दस हजार मासिक।

कैसे खरीदी?

भीख मांगकर! इससे आपको क्या मतलब? मैने गुस्से से जवाब दिया।

मतलब है। मुझे यह देखना होगा न कि कैसे चुकायेंगे! मैं भीख नहीं लोन देता हूँ। फिर बड़बड़ाया-नंगा पहनेगा क्या और निचोड़ेगा क्या!

जी! कुछ समझा नहीं।

कुछ नहीं। नक्शा पास है?

नहीं। 

तो जाइये पहले 'विकास' से नक्शा पास कराके आइये।

ये कहाँ बैठते हैं?

कौन?

विकास बाबू।

वह झल्लाया-अरे! विकास बाबू नहीं। विकाश प्राधिकरण से नक्शा पास कराके आइये।

कवि जी बहुत देर से उस शरीफ आदमी की बातें बड़े ध्यान से सुन रहे थे। जब वह चुप हुआ तो कवि जी ने पूछा-

आप विकास प्राधिकरण गये?

गया था।

क्या हुआ?

पता चला मेरी जमीन कृषि योग्य भूमि है। वहाँ खेती की जा सकती है, नक्शा पास नहीं होगा।

मैने मन ही मन सोचा- अजीब बात है! सवा बिस्वा जमीन कोई खेती करने के लिए खरीदेगा!!! फिर उत्सुकता से पूछा-तब आजकल आप खेती कर रहे हैं?

नहीं।

तो?

उसी जमीन में घर बनाकर रह रहे हैं।

अच्छा! कैसे?

जैसे सब रह रहे हैं।

तब तो खूब ऑफिस के चक्कर लगाने पड़े होंगे।

अरे नहीं, सरकारी दफ्तर शरीफों के बस का नहीं है।

फिर?

एक दलाल मिल गया। उसने लोन दिला दिया, मैने घर बना लिया।

विकास प्राधिकरण वाले नहीं आये?

'विकास बाबू' आते हैं तो 'कल्लू सिंह' संभाल लेते हैं।

ये 'कल्लू सिंह' कौन?

उसने गर्व से ज़वाब दिया-आप 'कल्लू सिंह' को नहीं जानते! बहुत बड़े नेता हैं। मेरी कॉलोनी में रहते हैं।

आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे नेता होना अभी भी शान की बात हो....!

और नहीं तो क्या ? वह कॉलोनी क्या जहाँ कोई 'कल्लू सिंह' न रहते हों! मैं तो कहता हूँ प्रत्येक कॉलोनी में एक 'कल्लू सिंह' होना चाहिए ताकि सभी प्रकार के गुँडों से जनता की रक्षा होती रहे।

कवि जी ने बीच में तार जोड़ा-

अच्छा, आपने घर तो बना लिया लेकिन आपके कॉलोनी में बिजली के खम्बे हैं?

हाँ, है न!

गड़े हैं?

हाँ भाई, गड़े भी हैं और खड़े भी हैं।

उसमें बिजली के तार भी लगे हैं?

हाँ! हाँ! बिजली के तार भी लगे हैं और उनमें बिजली भी दौड़ती है। करेंट भी आता है। बल्ब भी जलते हैं।

मुझे भी सुखद आश्चर्य हुआ। कवि जी ने पूछा-

यह चमत्कार कैसे हुआ? अब इतना बताया तो यह भी बता दीजिए।

शरीफ आदमी बोला-मेरे पड़ोस का प्लॉट 'शर्मा जी' का है। शर्मा जी बिजली विभाग में हैं। एक दिन रात के समय ट्रैक्टर पर तार-खम्बे लदवा लाये। सबने मिलकर रातों रात गड़वा दिया। पूरी कॉलोनी में 'शर्मा जी' की बड़ी प्रशंसा है। बड़े सज्जन आदमी हैं।

सड़क! सड़क बनी?

वह बोला-एक दिन वह भी बन जायेगी। विधायक जी चुनाव के समय देखकर गये हैं। वह तो तभी बन जाती मगर हमारा नाम वोटर लिस्ट में न पा बिदक गये। बोले-जब आप हमें वोट नहीं दे सकते तो हम आपके लिए सड़क क्यों बनवायें? जब आप कुछ दे नहीं सकते तो आपको मांगने का भी कोई हक नहीं है।

कवि जी बोले...चलिए, सब काम हो गया तो सड़क भी एक दिन बन ही जायेगी।

हाँ, उसने एक लम्बी सांस ली फिर दो लाइन सुनाई-

शुक्र है कि देश में.... भ्रष्टाचार है
न्याय की डगर तो बड़ी पेंचदार है।

कवि जी चौंके-अरे! यह तो आप मेरी ही लाइन सुना रहे हैं!!!

उसने कहा-हाँ, सब आपका ही दिया मंत्र है। जब कोई सरकारी दुःख आता है, मैं इसी का जाप करता हूँ। तभी तो कहता हूँ-आप पूरे 'घाघ' हैं।

कवि जी फिर गरजे-'घाघ' नहीं कवि कहिेए। 

शरीफ आदमी बोला-क्या फर्क पड़ता है? 'घाघ' कितने महान कवि थे। यदि हम आज के कवियों को 'घाघ' कहें तो उन्हें खुश होना चाहिए।

कवि जी घबड़ा कर उठ गये-अच्छा, अब चलता हूँ। आपसे मिलकर बहुत खुशी हुई। लगता है मैने आपके पहले भी कहीं देखा है!

वह बोला-मैं तो आपको देखते ही पहचान गया था। आप वही सरकारी लोन वाले पाण्डे जी हैं न...?

कवि जी ने झट से उत्तर दिया-नहीं... दुनियाँ में कई प्रकार के पाण्डे जी पाये जाते हैं। वे दूसरे...

कवि जी चले गये, शरीफ आदमी चला गया और मैं बैठकर सोच रहा हूँ कि हर इंसान किसी न किसी मोड़ पर एक दूसरे से दुबारा टकरा ही जाता है लेकिन याद हमेशा चोट खाने वाला रखता है।


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नोटः यह कथा पूरी तरह काल्पनिक है। इसे किसी प्रकार के पाण्डेजी, कल्लू सिंह या कवि जी से जोड़कर न देखा जाय। कहीं कोई साम्य मिलता है तो इसे महज संजोग ही समझा जाय। उद्देश्य व्यंग्य लिखना और आनंद पहुँचाना है।.. धन्यवाद।

32 comments:

  1. अच्छी व्यंग्य-कथा ।

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    1. वरिष्ठ व्यंगकार का उत्साहवर्धन आपकी पूंजी हो गया देवेन्द्र जी :)

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  2. बहुत अछ्छा ब्यंग. काल्पनिक होते हुये भी पुर्णरूप से सत्य-कथा.पांडेयजी की जगह और किसी सरनेम वाले हर कार्यालय में मिलते ही हैं.

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  3. काल्पनिक होते हुए भी बहुत सुंदर सटीक व्यंग,,,

    RECENT POST: आज़ादी की वर्षगांठ.

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  4. मनोरंजक व्यंग कथा ....बधाई स्वीकार करें
    बेचैन आत्मा को शांति मिलेगी :-))))

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  5. हमारे घर के बगल मे भी 'कल्लू सिंह' जी रहते हैं। :)

    बहुत ही शानदार-जानदार व्यंग्य।

    सादर

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  6. लाजवाब व्यंग.

    रामराम.

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  7. जाली नोट - सब वास्तविक पात्र हैं जबकि आपने नोट में लिखा है कि पूरी तरह काल्पनिक है:)

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  8. लेकिन ये ‘लोन वाले पांडे’ जी ने ये क्यों कहा कि कई प्रकार के पांडे होते हैं?
    ऐसे कितने प्रकार हैं थोड़ा तफ़्सील से बताइए।

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    1. मंगल पाण्डे से लेकर चंकी पाण्डे तक किसका-किसका नाम गिनाऊँ! छोड़िये पाण्डे जी को तिवारी जी मान कर पढ़ लीजिए या फिर यादव जी! :)

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  9. डिस्क्लेमर की जरुरत कहाँ है , इस देश में शर्मा , पाण्डेय , आदि का नाम लेकर कुछ भी कहा जा सकता है , इस पर कानून की कोई धारा लागू नहीं है बल्कि आप उतना अधिक माने जायेंगे !
    अच्छी लगी व्यंग्य कथा !

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    1. खुद पर व्यंग्य करना ज्यादा सुरक्षित होता है। :)

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    2. @ खुद पर व्यंग करना ज्या... , हमारा भी यही अनुमान था :)

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  10. प्रगतिशील माने जायेंगे :)

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    1. ठीक है , मैं प्रगतिशील कहलाने की इच्छा होते ही आपके इस फार्मूले को ध्यान में रखूंगा :)

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  11. महज संज्योग हो ही जाते हैं...:)

    सामयिक और वेहतरीन व्यंग.

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  12. आज के युग का प्रगतिशील व्यंग ....


    जय बाबा बनारस....

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  13. क्या व्यंग्य लिखा है और क्या आनंद मिला है मान गए जी...... पाण्डेय तो बहुत है पर अपने बनारस वाले पाण्डेय जी की बात तो निराली है……सटीक व्यंग्य |

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    1. शुक्रिया इमरान भाई। जोरदार तारीफ़ के लिए।

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  14. आफिस आफिस याद आया

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  15. आज की बुलेटिन विश्व फ़ोटोग्राफ़ी दिवस .... 601 वीं ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट (रचना) को भी शामिल किया गया। सादर .... आभार।।

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  16. य़े पाण्डेजी तो आॉफिस आॉफिस से ही लगते हैं ।

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  17. फर्जी बात है! कुछ काल्पनिक नहीं है इसमें।

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  18. सरस संवाद, आनन्द आ गया विकास यात्रा में

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