8.2.21

शत्रुता

मैने मांगा, 

जाड़े की धूप

उसने दिया,

घना कोहरा!


मैने पूछा,

"ठंडी कब जाएगी?"

उसने कहा,

"थोड़ी बर्फवारी होने दो।"


मैने पूछा,

"बसंत कहाँ है?"

उसने कहा,

"रुको! एक ग्लेशियर टूट जाने दो!"


मैने कहा,

"जाओ! 

तुमसे बात नहीं करते।"

उसने कहा,

"मित्र! 

तुमसे ही सीखी है यह 

शत्रुता!"

.........

15 comments:

  1. मैने पूछा,
    "बसंत कहाँ है?"
    उसने कहा,
    "रुको! एक ग्लेशियर टूट जाने दो!"


    यथार्थ पर गहरा कटाक्ष करती कविता...

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  2. सटीक प्रस्तुति

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  3. संवाद के रूप में कटु सत्य को उजागर किया है । बहुत गहन विचार इस रचना में

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  4. ...सचमुच तबाहियाँ हमने ही सिरजी हैं . सरल सी गहरी कविता

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  5. प्रकृति के साथ ताल-मेल रखना इन्सान ने सीखा ही कहाँ - प्रतिक्रिया होगी ही.

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