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8.2.21

शत्रुता

मैने मांगा, 

जाड़े की धूप

उसने दिया,

घना कोहरा!


मैने पूछा,

"ठंडी कब जाएगी?"

उसने कहा,

"थोड़ी बर्फवारी होने दो।"


मैने पूछा,

"बसंत कहाँ है?"

उसने कहा,

"रुको! एक ग्लेशियर टूट जाने दो!"


मैने कहा,

"जाओ! 

तुमसे बात नहीं करते।"

उसने कहा,

"मित्र! 

तुमसे ही सीखी है यह 

शत्रुता!"

.........

2.9.17

प्रकृति (सब गम भुलाकर जीना सिखाती है)

बारिश से पहले
तेज हवा चली थी
झरे थे
कदम्ब के पात
छोटे-छोटे फल
दुबक कर छुप गये थे
फर-फर-फर-फर
उड़ रहे परिंदे
तभी
उमड़-घुमड़ आये
बदरी-बदरा
झम-झम बरसे
बादल
सुहाना हो गया
मौसम
बारिश के बाद
सहमे से खड़े थे
सभी पेड़-पौधे
कोई बात ही नहीं कर रहा था
किसी से!
सबसे पहले
बुलबुल चहकी
कोयल ने छेड़ी लम्बी तान
चीखने लगे
मोर
कौए ने करी
काँव-काँव
और...
बिछुड़े
साथियों को भुलाकर
हौले-हौले
हँसने लगीं
पत्तियाँ।