31.12.21

सुबह की बातें-9


रजाई से 

सर बाहर निकाल कर

दोनों कानों को  

बन्द खिड़की के उस पार फेंको!


कुछ सुनाई दिया? 

बारिश!

नहीं sss 

ओस की बूंदें हैं 

थाम नहीं पा रहे पत्ते

टप टप टपक रहीं हैं 

धरती पर। 


मौन 

कभी, कहीं नहीं होता

भोर में तो और भी शोर होता है!

आंखों से 

न दिखाई देने वाले जीव

कलियां, फूल, पत्ते

सभी करते हैं संघर्ष

जहां संघर्ष है

वहीं शोर है

ओस की पहली बूंद से

सूर्य की पहली किरण तक

जो मौन है

उसमे भी शोर है

सब

दिखाई नहीं देता 

सब 

सुनाई नहीं देता।


यह जो मौन का शोर है न?

बड़ा तिलस्मी है

सुनो!

पहली दफा

मधुर संगीत सुनाई देता है

आगे

तुम्हारी किस्मत!

...............

4 comments:

  1. मौन का शोर बहुत तिलस्मी है । बहुत शानदार अभिव्यक्ति ।।

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  2. मौन के शोर के तिलस्म का जादू बिखेरती सुंदर रचना

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  3. बहुत सुंदर

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