राजकीय पुस्तकालय, वाराणसी में वरिष्ठ साहित्यकारों के कर कमलों द्वारा बसंत पंचमी के दिन हुआ पुस्तक 'चिड़-पिड़ चूँ-चूँ' का भव्य विमोचन।
हिंदी व्यंग्य का तीखा, सजीव और सशक्त दस्तावेज़ — चिड़ पिड़ चूँ चूँ
समकालीन हिंदी व्यंग्य साहित्य में एक सशक्त और विशिष्ट हस्तक्षेप के रूप में वरिष्ठ कवि, व्यंग्यकार एवं यात्रा-वृत्त निबंधकार देवेंद्र पांडेय ‘बेचैन आत्मा’ की नवीनतम कृति “चिड़ पिड़ चूँ चूँ” पाठकों के सम्मुख उपस्थित है। यह पुस्तक केवल व्यंग्यों का संग्रह नहीं, बल्कि आधुनिक समाज, व्यवस्था और व्यक्ति की मानसिकता का ऐसा एक्स-रे है, जो मुस्कान के साथ-साथ गहरी बेचैनी भी पैदा करता है।
इस संग्रह में छोटे-छोटे सैकड़ों व्यंग्य सम्मिलित हैं—जो आकार में भले ही लघु हों, किंतु प्रभाव में अत्यंत व्यापक, तीक्ष्ण और दूर तक असर करने वाले हैं। लेखक ने इनमें सामाजिक विसंगतियों, नैतिक पतन, अवसरवादिता, दिखावटी सभ्यता, राजनीतिक छल, प्रशासनिक जड़ता और आम आदमी की विवशताओं को अत्यंत सहज, मारक और व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है। हर व्यंग्य एक ऐसा दर्पण है, जिसमें पाठक हँसते-हँसते स्वयं को और अपने आसपास की व्यवस्था को पहचानने लगता है।
देवेंद्र पांडेय ‘बेचैन आत्मा’ की व्यंग्य दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि पाठक को सोचने, सवाल करने और आत्ममंथन के लिए विवश करती है। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और आम बोलचाल के बेहद निकट है, जिससे व्यंग्य सीधे पाठक के मन तक पहुँचता है। कटाक्ष, प्रतीक, संकेत, विडंबना और सहज हास्य का संतुलित प्रयोग इस पुस्तक को न केवल पठनीय, बल्कि स्मरणीय भी बनाता है।
यह महत्वपूर्ण कृति स्याही प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है—जो समकालीन हिंदी साहित्य में गुणवत्तापूर्ण, विचारोत्तेजक और मूल्यवान पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्रतिष्ठित नाम है। पुस्तक का संपादन देश के वरिष्ठ संपादक एवं साहित्यकार पंडित छतिश द्विवेदी ‘कुण्ठित’ द्वारा किया गया है। उनकी सूक्ष्म दृष्टि, भाषा-संवेदना और साहित्यिक अनुशासन ने इस संग्रह को एक सुसंगठित, प्रभावशाली और संग्रहणीय स्वरूप प्रदान किया है।
📦 सार्वभौमिक उपलब्धता
अब हिंदी व्यंग्य प्रेमियों के लिए यह महत्वपूर्ण पुस्तक “चिड़ पिड़ चूँ चूँ” देश-विदेश में सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध है। पाठक इसे प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म्स के माध्यम से आसानी से मँगवा सकते हैं—
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क्यों पढ़ें “चिड़ पिड़ चूँ चूँ”?
✔ यदि आप केवल हँसना नहीं, बल्कि सच्चाई से रूबरू होना चाहते हैं।
✔ यदि आप समाज और व्यवस्था को व्यंग्य की पैनी दृष्टि से समझना चाहते हैं।
✔ यदि आप हल्के शब्दों में कही गई गहरी बातों का आस्वाद लेना चाहते हैं।
👉 “चिड़ पिड़ चूँ चूँ” एक ऐसी व्यंग्य पुस्तक है, जो आपको मुस्कुराने के साथ-साथ सोचने के लिए भी विवश करेगी।
आज ही अपने पुस्तकालय में शामिल करें—क्योंकि हर दौर को उसका व्यंग्य चाहिए।












