2.2.26

शतरंज

कड़ाकी ठण्ड में 
पने राजा, अपनी रानी और अपने सिपाहियों के साथ 
श्वेत, श्याम रंग के
कुछ जानवर 
एक डिब्बे में कठुआए 
एक दूसरे से चिपके पड़े थे
न कोई झगड़ा, न कोई रगड़ा
ॐ शान्ति।

तभी

काला, सफेद चौसँठ खाने वाला बोर्ड लेकर

दो आदमी आए 

सभी में प्राण फूँक जगाए

आमने-सामने बैठ कर रंग बाँट लिए

तुम काला, हम सफेद,

दोनो राजा

आपस में लड़ने लगे!


एक-एक कर

कभी पैदल, कभी घोड़ा....

सभी शहीद होने लगे

तभी

एक आदमी बोला-मात!

दूसरे ने मायूस होकर स्वीकार किया अपनी हार।


अगले ही पल

दोनो आदमी

मोहरों को डिब्बे में भरने लगे

राजा-रानी के साथ

सभी जानवर, पहले की तरह

कठुआए, एक दूसरे से चिपककर गहरी नींद सो गए।


यह सब देख 

आकाश में विचरण करते देवता 

ठहाके लगाने लगे-

हमने मनुष्य बनाए 

लेकिन उनको

लड़ना/लड़ाना तो नहीं सिखाया था

यह खेल इन्होने 

अपने से सीखा है।

......

1 comment:

  1. मनुष्य ने जो सीखा या सीखता ही जा रहा , ऐसी उसकी बुद्धि पर विधाता को भी आश्चर्य होता होगा।
    सादर।
    ----++---
    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ३ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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