कड़ाकी ठण्ड में
अपने राजा, अपनी रानी और अपने सिपाहियों के साथ
श्वेत, श्याम रंग के
कुछ जानवर
एक डिब्बे में कठुआए
एक दूसरे से चिपके पड़े थे
न कोई झगड़ा, न कोई रगड़ा
ॐ शान्ति।
तभी
काला, सफेद चौसँठ खाने वाला बोर्ड लेकर
दो आदमी आए
सभी में प्राण फूँक जगाए
आमने-सामने बैठ कर रंग बाँट लिए
तुम काला, हम सफेद,
दोनो राजा
आपस में लड़ने लगे!
एक-एक कर
कभी पैदल, कभी घोड़ा....
सभी शहीद होने लगे
तभी
एक आदमी बोला-मात!
दूसरे ने मायूस होकर स्वीकार किया अपनी हार।
अगले ही पल
दोनो आदमी
मोहरों को डिब्बे में भरने लगे
राजा-रानी के साथ
सभी जानवर, पहले की तरह
कठुआए, एक दूसरे से चिपककर गहरी नींद सो गए।
यह सब देख
आकाश में विचरण करते देवता
ठहाके लगाने लगे-
हमने मनुष्य बनाए
लेकिन उनको
लड़ना/लड़ाना तो नहीं सिखाया था
यह खेल इन्होने
अपने से सीखा है।
......
मनुष्य ने जो सीखा या सीखता ही जा रहा , ऐसी उसकी बुद्धि पर विधाता को भी आश्चर्य होता होगा।
ReplyDeleteसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ३ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
यहां के देवताओं के खेल आकाश से देखते देवता
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