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18.8.19

लोहे का घर-55

क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?
.................................

न जाने कौन टेसन उतरेगा, बनारस से चढ़ा, पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में घुस कर, सफर कर रहा देसी कुत्ता! सौ/दो सौ किमी की यात्रा के बाद जब वह उतरेगा ट्रेन से तो उस पर कितना भौंकेंगे अनजान शहर के कुत्ते! क्या जी पायेगा चैन से? क्या हो जाएगी वहाँ के कुत्तों से दोस्ती? क्या मान लेंगे वे इसे अपना साथी? और क्या लौट कर देख पायेगा कभी अपनी जन्म भूमि? कैसे पहचानेगा वह, कौन सी है, बनारस जाने वाली ट्रेन?

मन में, ढेर सारे प्रश्न लेकर, देर तक देखता रहा मैं उसको। उतारना चाहा तो भौंकने लगा! जैसे पूछ रहा हो..तुम क्या सही ट्रेन में बैठे हो? 

अब मैं वाकई सोच रहा हूँ..क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ? अपने हक की रोटी के लिए क्या मुझे कभी नहीं करना पड़ा संघर्ष? क्या कोई, कभी, मुझे काटने नहीं दौड़ा? क्या इस ट्रेन में चढ़ने से पहले मेरे पास कई विकल्प थे? क्या मैं खूब सोच समझ कर चढ़ा हूँ इस ट्रेन में या जो ट्रेन मिली, उसी पर चढ़ गया? क्या मुझे अपनी मंजिल का ज्ञान है? क्या बहुत बड़ा फर्क है उस कुत्ते में और मुझ में? या सिर्फ इतना कि वह कुत्ता है इसलिए पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में, बिना टिकट , सफर कर रहा है और मैं मनुष्य हूँ, इसलिए टिकट कटा कर सीट पर बैठा हूँ। वह गलत दिसा में जा रहा है तो क्या मेरा मार्ग सही है? मैने उसे सही रास्ता दिखाने का प्रयास किया तो वह मुझ पर भौंका! क्या कोई मुझे सही राह दिखाता है तो मैं चुपचाप मान लेता हूँ? क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?

24.3.19

काशी में मोक्ष

जब तक एक भी बनारसी में फक्कड़पन है तब तक यह वाक्य सत्य है कि बनारस में मोक्ष मिलता है। मोक्ष मतलब आवागमन से मुक्त हो जाना। लाभ/हानी से मुक्त हो जाना। जय/पराजय से मुक्त हो जाना। यश/अपयश से मुक्त हो जाना। अपने/पराए से मुक्त हो जाना। 

मुक्त होने के लिए मुक्त करना आना चाहिए। त्याग करना आना चाहिए। पत्नी का त्याग, बच्चों का त्याग, घर का त्याग, परिवार, संसार के साथ-साथ अपने आप का भी त्याग। ऐसा त्यागी जो भक्ति में लीन हो वही मुक्त हो सकता है। जो मुक्त हो गया उसे ही मोक्ष मिलता है। कबीर दास जी ने भले अपना शरीर मगहर में त्यागा हो, मोक्ष की शक्ति तो उन्हें काशी से ही मिली। तुलसी को भी मोक्ष यहीं मिला। 

मोक्ष के घाट लगने की पहली सीड़ी है.. फक्कड़पन। कहते हैं काशी फक्कड़ों का शहर है। काशी में जब तक एक भी फक्कड़ है, यह बात सत्य है कि काशी में मोक्ष मिलता है। 

भिखारियों को मोक्ष नहीं मिलता। भिखारी लाख काशी में रहें, यहीं जन्म लें, वर्षों जीवित रहें और काशी में ही मरें लेकिन उन्हें मोक्ष नहीं मिलता। भिखारियों के अलावा धूर्तों, लोभियों, पापियों, दुष्टों किसी को भी काशी में मरने से मोक्ष नहीं मिलता। ये भटकती आत्माएँ हैं, युगों-युगों तक भटकती रहेंगी।  मोक्ष फक्कड़ को मिलता है। त्यागी को मिलता है। जो भी यहाँ की फक्कड़ शैली में जी पाया उसे मोक्ष मिला। काशी आ कर मरने से नहीं, काशी के अनुरूप जीने से मोक्ष मिलता है। 

यह हो सकता है कि जो भिखारी दिखते हैं, उनमें कोई त्यागी भी हो! केवल अपने जीवन यापन के लिए ही भिक्षाटन करता हो। यह भी हो सकता है कि जिन्हें हम धूर्त, लोभी, दुष्ट समझ रहे हैं उनका उद्देश्य किसी का अहित करना न हो, वे भी फक्कड़ हों। ये सब अपवाद हो सकते हैं लेकिन एक बात तो तय है कि मोक्ष प्राप्ति के लिए फक्कड़पन जरूरी है।

17.12.17

एक दिन की जिन्दगी

जिंदगी
चार दिन की नहीं
फकत
एक दिन की होती है।
हर दिन
नई सुबह
नया दिन
नई शाम और..
अंधेरी रात होती है।
सुबह
बच्चे सा
पंछी-पंछी चहकता
फूल-फूल हंसता
दिन
जैसे युवा
कभी घोड़ा
कभी गदहा
कभी शेर
कभी चूहा
शाम
जैसे प्रौढ़
ढलने को तैयार
भेड़-बकरी की तरह
गड़ेरिए के पीछे-पीछे
चलने को मजबूर
रात
जैसे बुढ़ापा
जुगनू की रौशनी को
नसीब मान
समय की टिक-टिक
ध्यान से सुनता
पुनर्जन्म/नई सुबह से पहले
मर जाता।
....देवेन्द्र पाण्डेय।

12.7.17

अब तो दर्शन दे दे

धोबियाsss
धुल दे 
मोरी चदरिया 
मैं ना उतारूँ 
ना
एक जनम दूँ
खड़े-खड़े मोरी 
धुल दे चदरिया!

आया तेरे घाट बड़ी 
आस लगा के
जाना दरश को 
शिव की नगरिया
धुल दे चदरिया।

रंगरेजवाsss
रंग दे 
मोरी चदरिया 
मैं ना उतारूँ 
ना
एक जनम दूँ
खड़े-खड़े मोरी 
रंग दे चदरिया

जइसे उजली 
धुली धोबिया ने
वइसे प्रेम रंग 
रंग दे चदरिया 
आया तेरे घाट बड़ी 
आस लगा के
जाना दरश को 
शिव की नगरिया
रंग दे चदरिया।

भोलेsssss
अब तो दर्शन दे दे
धोबिया धुल कर साफ कियो है
प्रेम रंग रँगायो
साफ है मोरी चदरिया
भोलेsss
अब तो दर्शन दे दे।
.........

4.4.17

श्री दिगम्बर जैन मंदिर-सारनाथ



मंदिर के दरवाजों में लिखे दोहे भावनाएं हैं जिन्हें पढ़ना और समझना आनन्द दायक है.


अनित्य भावना 

राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असबार.
मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार.. 

अनित्य यानि अस्थिर, चंचल, छणिक, परिवर्तनशील, विनाशी, संसार की हर वस्तु, हर नाता रिश्ता, हमारा शरीर, आयु, रूप-लावण्य, वैभव, परिग्रह, सत्ता-अधिकार सबकुछ एक न एक दिन जाने वाला है. जन्म के साथ मरण, यौवन के साथ बुढ़ापा, सुख के साथ दुःख, लक्ष्मी के साथ दारिद्रय लगा हुआ है. कोई अपने को कितना ही बचाने का प्रयास करे, विनाश से, क्षीणता से, बच नहीं सकता. सबको एक दिन जाना ही है.

अशरण भावना 

दल-बल देवी देवता, मात पिता परिवार 
मरती बिरियाँ जीव को, कोई न राखनहार 

अशरण अर्थात असुरक्षा, असहायता, निरीहता. मनुष्य समझता है कि उसका ज्ञान, उसकी विद्याएँ, उसका वैभव, उसकी प्रतिष्ठा, ये सब उसके रक्षक-पोषक हैं. इसलिए वह इन चीजों के प्रति मोहित होता है, संचय करता है. किन्तु वास्तविकता यह है कि अंतिम समय आने पर कोई रक्षा नहीं कर सकता. आज तक कोई किसी को बचा नहीं सका. जो मरणधर्मा है, वह बच नहीं सकता. 

धर्म भावना  
जाचै सुरतरु देय सुख, चिंतत चिंता रैन
बिना जाचै बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख दैन  

कल्पवृक्ष तो याचना करने पर सुख की सामग्री देते हैं, लेकिन धर्म तो ऐसा कल्पवृक्ष है कि बिना याचना के ही परमसुख प्राप्त होता है.

15.1.17

सत्य


देखो! सुनो! समझो! तब बोलो।
बोलो तो..
जोर-जोर से बोलो
पूरे आत्मविश्वास से बोलो
दो चार और सुनें कि तुमने
क्या देखा? क्या सुना? और क्या समझा?
विचलित मत होना
जब वे बोलें
चिल्लाने मत लगना..
झूठ! झूठ!
तुम गलत! तुम गलत!
मैं सही! मैं सही!
ध्यान से सुनना
उन्होंने क्या बोला
और समझना
कि यह
उनका देखा, उनका सुना और उनका समझा सत्य है।
सत्य
सभी के लिये
कभी एक सा नहीं होता
सभी की
अपनी नज़र, अपनी शक्ति और अपनी समझ होती है
इसीलिये सभी के
अपने-अपने सच होते हैं।
सभी के सत्य एक होते तो
सभी
वृक्ष न बन गये होते!

16.10.16

वक्त ने कहा- मेरे पास घड़ी नहीं है!

दुखी इन्सान ने कहा  
मेरा वक्त ख़राब चल रहा है
वक्त हँसने लगा
 
उसने कहा
वो वाला समय कितना अच्छा था!
वक्त फिर हँसने लगा

उसने ईश्वर से प्रार्थना किया
हे प्रभु!
मेरा वक्त ख़राब चल रहा है, अच्छा कर दो!
मेरा प्रसाद स्वीकार करो

पुजारी ने प्रसाद चढ़ा कर आशीर्वाद दिया
पंडित जी ने
लम्बी पूजा कराई और दक्षिणा लेने के बाद बोले
तुम्हारा कल्याण हो
तुम्हारे अच्छे दिन आने ही वाले हैं

वह खुश हो गया
उसके साथ
पंडित जी भी खुश हुए
पुजारी भी खुश हुआ
और तो और
मंदिर के बाहर खड़े
सदा रोते रहने वाले
भिखारी ने भी
अपने गंदे हाथ पसारे
उसने
भिखारी को भी
खुशी-खुशी एक रूपया दिया
और आगे बढ़ गया  

वक्त  
पागलों की तरह
ठहाके लगाने लगा!!!
मैंने पूछा
कितनी देर से ठहाके लगा रहे हो
कुछ पता भी है ?

वक्त ने कहा-
मेरे पास घड़ी नहीं है!
और...
फिर ठहाके लगाने लगा.
.............

5.6.16

चार कवितायेँ

(१)
भरम 
दौड़
घर से मन्दिर तक
परसाद पेट में
दुनियाँ
मुठ्ठी में!
..............
(२)
धूप 

धूप 
धरती पर
घूमने चली।

भीग गये कपड़े
बादल ने किये झगड़े
हो गई पागल
दिखी कोई बदली 

धूप
कलियों को
चूमने चली।
..................
(३)
चिड़िया 
आ चरी आ
खा चरी खा
पढ़ चरी पढ़
पिंजड़ा लिख
सपना लिख
कैद हो जा
उड़ गई तो बाज पकड़ ले जायेगा!
................................
(४)
सत्य 
डाल से गिरे
छत-आँगन में फैले
गंध हीन
मरे पत्ते
ढेर बने
आग मिली
धुआं-धुआं
जले पत्ते
वृक्ष ने कहा..
'यही सत्य है!'
दो-चार और..
झरे पत्ते.

11.6.15

ठहरो! इतना आग मत उगलो


मेरी पलकों से पहले
खुलती हैं
तुम्हारी पलकें
उठकर देखता हूँ
फेंक चुके हो
अंधेरे की चादर
गिरा चुके हो
लाल चोला
मेरे मुँह धोने, खाने-पीने, कपड़े पहनकर काम पर निकलने तक तो
टंच हो
झक्क सफेद धोती-कुर्ता पहन
घोड़े के रथ पर बैठ
दौड़ने लगते हो आकाश में
न जाने कहाँ जाना रहता है तुम्हें !
मियाँ की दौड़ मस्जिद तक
पूरब से निकलते हो
पश्चिम में ओझल हो जाते हो
न नमाज़ी सी  सहृदयता न ईश्वर का भय
है तो बस
रावणी अहंकार!

ठहरो!
इतना आग मत उगलो
अभी असाढ़ है
आगे....
सावन, भादों

तुम्हें
कीचड़  में डुबो कर
गेंद की तरह खेलेंगे
गली के बच्चे
मेरे देश में
किसी की तानाशाही
नहीं चलती ।
..........

14.12.14

ईश्वर!


हे ईश्वर!

कड़ाकी ठण्ड में
कैसा है रे तू?
गरम पानी
मिलता है क्या नहाने को?

मैं तो
रजाई में दुबका
फेसबुक का मजा ले रहा हूँ
चुटकुले पढ़ रहा हूँ
तू?
चैन से सोया है न!


धरती, आकाश, आग, हवा,पानी
सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र.....
इतना सब दिया तूने
कि आज तक
ठीक-ठीक जान भी नहीं पाया
कितना दिया तूने!

न मागने की आदत गई
न भूख मिटी
किसी ने सही कहा है-
भिखारियों को जितना भी दो
रहेंगे भिखारी ही।


हमारे मांगने से परेशान मत हो
कोई तकलीफ हो
तो लिख
पूरी कोशिश करूँगा
कि तेरा कष्ट
दूर हो।

आदमी हूँ
पुरखों का नाता है
बेवफाई नहीं करूँगा
निश्चिन्त रह।

जहाँ भी है
खुश रह
मस्त रह।

20.10.14

भूख बड़ी कुत्ती चीज है!

कुत्ते 
दौड़ते हैं 
बीच सड़क पर
इस पार से उस पार
उस पार से इस पार
कभी कोई
बाइक के सामने आ जाता है
कभी कोई
कार के सामने आ जाता है
बाइक के सामने
आदमी की टांग टूटती है
कार के सामने
कुत्ते की टांग टूटती है
कुत्ता 
किसी से टकराना नहीं चाहता
वह चाहता है
रोटी का एक टुकड़ा

भूख बड़ी कुत्ती चीज है!

............

12.10.14

भय

अँधेरे से,
गली में भौंकते 
कुत्तों से,
छत पर कूदते 
बंदरों से,
खेत में भागते 
सर्पों से,
अब डर नहीं लगता।

दुश्मनों के वार से,
दोस्तों के प्यार से,
खेल में हार से,
दो मुहें इंसान से,
डर नहीं लगता।

जान चुका हूँ
मान/अपमान
सुख/दुःख
मिलता है
इस जीवन में ही,
भूत या भगवान से
अब डर नहीं लगता।

माँ और मसान
दोनों की गोद में
भूल जाता है प्राणी
अपना अभिमान
दोनों का होना भी तय
मगर दिल है
कि मानता नहीं
भयभीत होने के सौ बहाने 
ढूँढ ही लेता है!
न जाने मुझे
किस बात का भय रहता है!!!

12.2.14

लोहे के घर से...


रेल की दो पटरियों में ट्रेन नहीं, लोहे के कई घर लिये पूरा शहर दौड़ता है। पूरा शहर लोहे का बना होता है। लोहे के शहर में घर, कंकरीट के शहर में बने घरों की तरह कई प्रकार के होते हैं। एक ही शहर में महल, एक मंजिले, दो मंजिले, बहुमंजिले या कच्चे मकानों की तरह एक ही ट्रेन में ए.सी., स्लीपर और अनारक्षित डिब्बे होते हैं। किसी-किसी शहर में आज भी बाग-बगीचे, खेल के मैदान, सूखे तालाब, बहती नदी दिख जाती है! पटरियों पर भागता शहर अपनी इस कमी को खिड़कियों से बाहर झांककर पूरा कर लेता है। वैसे भी शहरों के बाग-बगीचे सब की नसीब में कहाँ होते हैं? अधिसंख्य देखते हैं मगर अखबार पढ़कर ही जान पाते हैं कि इन बगीचों में सुबह के समय ताजी हवा बहती है! 

जैसे शहर कई प्रकार के होते हैं वैसे ही ट्रेनें भी कई प्रकार की होती हैं। राजधानी, महानगरी, सुपर फॉस्ट, पैंसिंजर..। पैंसिजर ट्रेनें रूक-रूक कर चलती हैं... छुक छुक छुक छुक, छुक छुक छुक छुक.. सुपर फॉस्ट.. धक-धक धक-धक, धक-धक धक-धक । जब कोई मसला फंसता है, पैंसिजर ट्रेन सेंटिंग में डाल दी जाती हैं। एक्सप्रेस ट्रेन चीखती-चिल्लाती धड़ल्ले से गुज़र जाती है। पैसिंजर ट्रेन के यात्री कम दाम के टिकट पर ही इतने प्रसन्न रहते हैं कि घंटो के अनावश्यक ठहराव का गम भी खुशी-खुशी सह लेते हैं। यह सुख गरीबी रेखा से नीचे वाले राशन कार्ड पर मिलने वाले लाभ जैसा है। भले ही रेंग कर चले, सरकार की कृपा से जिंदगी चलती तो है! 

लोहे के सुंदर शहर में.. अच्छे घर में.. मेरा मतलब सुपर फास्ट ट्रेन की आरक्षित बोगी में चल रह रहे लोगों की जिंदगियाँ सिकुड़ी-सिकुड़ी, सहमी-सहमी होती है। अनजान यात्रियों से बातें करना मना होता है। अनारक्षित बोगी के यात्री आपस में खूब बातें करते हैं। ऐसा माहौल हमें अपने शहर में भी देखने को मिल जाता है। गलियों में बसे छोटे-छोटे घरों की खिड़कियाँ आपस में खूब आँख-मिचौली करती हैं। खूब बातें करती हैं। बिजली पानी के लिए आपस में झगड़ती हैं। एक-एक इंच का हिसाब-किताब होता है लेकिन बड़े घरों के दरवाजे पर चौकिदार होता है! दरवाजे पर रुके नहीं कि शेर जैसा कुत्ता झपटता है-भौं! 

एक बड़ा ही रोचक पहलू है। कंकरीट के शहर में तो जिस घर में रहते हैं बस वैसा ही अनुभव होता है लेकिन लोहे के घर में हमें हर प्रकार का अनुभव मिल जाता है। ईंट-पत्थर के घरों में रहने वाले लोग ही, लोहे के घर में रहने के लिए बारी-बारी से आते-जाते रहते हैं। कभी सुपर फॉस्ट ट्रेन में ए.सी. का मजा लेते हैं, कभी अनाऱक्षित बोगी का तो कभी-कभी पैसिंजर ट्रेन की जिंदगी का भी अनुभव लेते हैं। घंटों ठहरे हुए पैसिंजर ट्रेन में बैठकर, धकधका कर गुजरते ‘सुपर फॉस्ट’ को कोसते हैं मगर सुपर फॉस्ट में चढ़ते ही, ए.सी. में बैठते ही, ‘पैंसिजर’ का दर्द भूल जाते हैं। 

ए.सी. में खिड़कियाँ नहीं खुलतीं। ताजी हवा भीतर नहीं आती। न अधिक गर्मी लगती है न अधिक ठंड। धीरे से पर्दा हटाकर आप शीशे के बाहर झांक सकते हैं मगर बाहर वाले नहीं झांक सकते आपके भीतर। हम ऐसा ही जीवन पसंद करते हैं। सबके भीतर झांकने की क्षमता और अपने लिए तगड़ा सुरक्षा कवच! पैसिंजर ट्रेन में जितना आप बाहर देखते हैं, लोग उससे कहीं अधिक आपके भीतर झांक लेते हैं। ए.सी. में नहीं आता लठ्ठा-नमकीन बेचने वाला, मुंगफली या चाय बेचने वाला। यहाँ ऑर्डर लिये जाते हैं, समय पर मिल जाता है स्वादिष्ट भोजन। भोजनालय यहाँ साथ चलता है। पैसिंजर ट्रेन के यात्री कम्बल, गठरी, झोला, लकड़ी, खाने-बनाने का सामान, सब साथ लिये चलते हैं। कभी-कभी तो मोटर साइकिल भी लाद लेते हैं बोगी में! खिड़की के रॉड में सिर्फ एक पैडिल पर टंग जाती है पूरी साइकिल!

कंकरीट के शहर में आप किस घर में रहते हैं यह आपकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर करता है। लोहे के शहर में आप किस घर में रहते हैं यह हमेशा आपकी आर्थिक क्षमता पर निर्भर नहीं करता। आप अच्छे, सुरक्षित घर में रहना चाहते हैं, पैसा भी जेब में है मगर आरक्षण नहीं मिलता। मजबूरी में वहाँ रहना पड़ता है जहाँ रहने की आपको आदत नहीं है। किस ट्रेन में सफर करते हैं? यह मंजिल की दूरी पर निर्भर करता है। महलों में रहने वाले जैसे हर किसी से बात नहीं करते वैसे ही रजधानी या सुपर फॉस्ट ट्रेनें हर प्लेटफॉर्म पर नहीं रूकतीं। मंजिल का स्टेशन आपकी आवश्यकता तय करती है। यात्रा तय करता है। सुपर फॉस्ट ट्रेन के यात्रियों को बदकिस्मती से कभी-कभी अपने गाँव भी जाना पड़ता है। पैसिंजर ट्रेनों का सहारा भी लेना पड़ता है। पैंसिजर ट्रेन ही गाँव के स्टेशन पर रूकती है। ऐसे यात्री पूरे सफ़र में नाक-भौं सिकोड़ते रहते हैं। मंजिल से इतर किसी दूसरे स्टेशन पर देर तक रूकना उन्हें गहरा आघात पहुँचाता है। यह वैसा ही है जैसे किसी राजकुमार को अपनी कार दो पल रोककर किसी रिक्शे वाले से मार्ग पूछना पड़े। वे रिक्शेवाले को ‘थैंक्यू’ कहते हैं रिक्शेवाल खुश हो जाता है। राजकुमार दुखी कि आज यह दिन भी देखना पड़ा कि एक मामूली रिक्शेवाले से मंजिल का पता पूछना पड़ा..! 

आनंद आप पर निर्भर करता है। आप मंजिल पर पहुँचकर आनंद लेते हैं या सफर को ही आनंद दायक बनाते हैं। ए.सी. में बैठकर ही आनंद ले पाते हैं या पैसिंजर ट्रेन में भी आनंद ढूँढ लेते हैं ? यदि आपको सफ़र में कष्ट और मंजिल पहुँचकर ही आनंद आता है तो यकीन मानिए कि आपको पता ही नहीं, आनंद किस चिड़िया का नाम है! क्योंकि सफ़र तो अभी भी अधूरा है..! कभी हम लोहे के घर को अपना समझ बैठते हैं, कभी पत्थर के घर को मगर ज्ञानी कहते हैं हमारा जिस्म ही मिट्टी का बना है! हम मिट्टी के घर में रहते हैं!!! 


 .....……

4.12.13

रोज़ के यात्री



सुबह-शाम
टेशन-टेशन दौड़ते हैं
ट्रेन के
आने-जाने का समय पूछते हैं
कभी पैसिंजर
कभी सुपरफॉस्ट पकड़ते हैं
पैसिंजर पकड़कर दुखी
सुपरफॉस्ट में चढ़कर प्रसन्न होते हैं

रोज़ के यात्री
धीरे-धीरे
जान पाते हैं
कि वे
जिस ट्रेन में सवार हैं
वह पैंसिजर नहीं है
सुपरफॉस्ट भी नहीं
इसकी गति निर्धारित है
इसमें
बस एक बार चढ़ना
इससे                            
बस एक बार
उतरना होता है
यह किसी स्टेशन पर नहीं रूकती
बस..
खिड़की से देखकर होता है आभास
कि वह बचपन था
यह जवानी
अब आगे बुढ़ौती है
कब चढ़े
यह तो
सहयात्रियों से जान जाते हैं
उतरना कहाँ है ?
कुछ नहीं पता।

......................

18.1.13

घोंघा

कुछ घालमेल हो रहा है। चित्रों का आनंद लेते-लेते कविता बन जा रही है। अपने ब्लॉग "चित्रों का आनंद" में गंगा जी की कुछ तस्वीरें लगाने लगा तो एक कविता अनायास बन गई। अब उसे यथा स्थान यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ।


घोंघा

कभी
तुममे था
जीवन !
रेत कुरेदने पर 
निकल आये हो 
बाहर।

अब खाली हो
असहाय
खालीपन के
एहसास से परे

बन चुके हो
खिलौना
खेलते हैं तुम्हें
रेत से बीन-बीन
बच्चे

ढूँढता हूँ तुममें
जीवन
काँपता हूँ
भरापूरा
अपने  खालीपने के
एहसास से!

मैं
घोंघा बसंत।
...............

25.7.12

मन आनंद से भर गया।




घर पहुँचने से पहले ही बारिश की फुहार शुरू हो गई। बारिश तेज हो जाने, भीग जाने और भीग कर बीमार पड़ जाने की चिंता ने बाइक की स्पीड तेज कर दी। तभी खयाल आया, रूक सकता नहीं, घर जल्दी पहुँचना ही है, बारिश तेज हो जायेगी तो भीगना तय है। क्यों न सावन की इस फुहार का आनंद लिया जाय!” बाइक की स्पीड धीमी हो गई। गरदन ऊपर किया तो चेहरे पर वर्षा की फुहारें पड़ने लगीं। अगले ही पल मेरा मन आनंद से भर गया।


यह कई वर्ष पहले की बात है। बारह घंटे की बस की यात्रा के बाद भी मेरा सफ़र अभी खत्म नहीं हुआ था। मंजिल अभी दो घंटे दूर थी। जिस्म थककर चूर हो चुका था और मस्तिष्क बोरियत का पहाड़ ढो रहा था। तभी  निगाह तेज धुन पर उछलते-कूदते खलासी पर पड़ी। हर स्टेशन पर जैसे ही बस धीमी हो कर रूकने लगती, बस का खलासी दरवाजे पर खड़ा हो, एक हाथ से लोहे के रॉड को पकड़े अपना पूरा जिस्म बाहर की ओर झोंकते हुए, आगे की मंजिल का नाम ले-लेकर चीखता। कुछ यात्रि रूकते, कुछ चढ़ जाते। बस आगे बढ़ती और वह फिर वैसे ही तेज धुन पर उछलने कूदने लगता। रूक-रूक कर ड्राइवर या कंडेक्टर से कुछ मजाक करता, जोर का ठहाका लगाता, फिर गरदन जोर जोर से हिलाते हुए उछलने कूदने लगता। उसे देखकर यह खयाल आया, एक यह है जो सफ़र की शुरूआत से ही खड़े-खड़े मस्ती से झूमते हुए चला आ रहा है, एक मैं हूँ जो बैठे-बैठे भी उकता चुका हूँ। चलना तो तय है फिर क्यों न सफ़र का आनंद लिया जाय !” अगले ही पल मन आनंद से भर गया। सफ़र की थकान मिट चुकी थी।   


दो बार ही नहीं, कई बार ऐसा महसूस किया है मैने। हालात को कोसा है, दुखी हुआ हूँ फिर अनायास खुशी से झूमने लगा हूँ। अकेले में, कभी सोचता हूँ इन बातों को तो लगता है मैं ही महामूर्ख हूँ ! जानता हूँ कि आनंद कहाँ है फिर भी रोता रहता हूँ ! कभी जल्दी ही संभल जाता हूँ, कभी कई दिन लगते हैं संभलने में। प्रश्न उठता है कि इतने सबक सीखने के बावजूद दुखी होता ही क्यों हूँ? क्यों नहीं बना लेता हमेशा-हमेशा के लिए आनंद को अपना दास ? काश ! मैं ऐसा कर पाता।

आप कह सकते हैं, आनंद को अपना दास बनाने के चक्कर में पड़ना ही क्यों ? खुद को ही आनंद का दास बना लो!” आनंद प्राप्ति के लिए यह सरल मार्ग है। जहाँ आनंद दिखे वहीं रम जाओ। जायज, नाजायज चाहे जैसे हो खूब मजे उड़ाओ। जेब में पैसे हों तो हाट-मॉल, सुरा-सुंदरी सभी तो आपकी सेवा में हाजिर हैं। जहाँ जैसे भी मिले लूट लो ! लेकिन मैं इस आनंद की बात नहीं कर रहा। यह तो क्षणिक है। इस मार्ग पर चलकर तो दुखों के महासागर में खो जाने की प्रबल संभावना है। मैं उस आनंद की बात कर रहा हूँ जो हमारे भीतर है। मैं उस दुःख की बात कर रहा हूँ जो हमारी सोच से बढ़ती-घटती है। इसके लिए किसी अतिरिक्त धन की आवश्यकता नहीं। इसके लिए किसी खास मेहनत की आवश्यकता नहीं। बस थोड़ा सा नज़रिया ही तो बदलना है! भीगने के भय से चिंतातुर होकर भी हमें भीगते हुए घर जाना है। हमने अपनी सोच थोड़ी सी बदली, बारिश की फुहारों का एहसास किया और अगले ही पल मन आनंद से भर गया। खलासी वही कर रहा है जो उसका काम है। वह चाहे तो कम पगार के लिए बस के मालिक को कोसते हुए भी सफ़र कर सकता है। वह चाहे तो अपनी छुट्टी और परिवार की चिंता करते हुए दुखी मन से भी सफ़र कर सकता है। लेकिन नहीं, वह खुशी-खुशी अपना काम करते हुए आनंद ले रहा है।  

प्रायः देखा जाता है, बॉस ने कोई अतिरिक्त काम सौंपा नहीं कि हमारा मूड-मिजाज़ गड़बड़ा जाता है। काम तो करना ही पड़ता है लेकिन हम काम करते वक्त पूरा समय अपने बॉस को कोसते हुए दुखी रहते हैं। वहीं अगर यह भाव आ जाये, हमारा परम सौभाग्य है कि हमारे बॉस ने हमें इस विशेष काम के लुए चुना। हमे इस अतिरक्त काम को बेहतर ढंग से करके दफ्तर में अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी है। नज़रिया बदलते ही काम करते वक्त बिताया गया वही समय आनंद से कट जाता है।

दिखता सरल है लेकिन यह आनंद सहज़ नहीं है। आनंद के इस मार्ग में विचार रूपी तिलस्मी दुनियाँ है। हमें विचारों के इस तिलस्म को यत्नपूर्वक तोड़ना है। दृढ़ प्रतिज्ञ रहना है। यह तभी संभव है जब हमारे हृदय में संतोष का भाव हो। ईश्वर के प्रति धन्यवाद का भाव हो। दूसरों के प्रति क्षमा का भाव हो। सहज स्वीकार्य की सकारात्मकता हो। सहज स्वीकार्य का यह अर्थ भी नहीं कि अन्याय को भी स्वीकार करते चले जाना है। अन्याय का विरोध करना भी हमारा धर्म है। हमे अपने धर्म से च्युत भी नहीं होना है लेकिन ऐसा करते वक्त अपने भीतर अहंकार को भी आश्रय नहीं देना है। अहंकार अकेले नहीं आता। जब आता है अपने साथ दुखों का पूरा कुनबा साथ लिये चलता है। अंहकार और सहृदयता के बीच का सतुंलन ही आनंद की प्राप्ति का मार्ग है। कभी-कभी यह सतुंलन सहज ही स्थापित हो जाता है, कभी अहंकार में डूबे नकारात्मक सोच को ही हम अपने ऊपर हावी होने देते हैं। यह कठिन है, मगर एक बार सध जाय तो मन आनंद से भर जाता है।

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नोटः इस पोस्ट की मजेदार बात यह है कि इसका आधा हिस्सा ब्लॉगिंग की देन है। पहले शुरू के तीन पैराग्राफ ही लिखे थे जिन पर मेरे कमेंट सहित कुल 27 कमेंट दर्ज थे। इसके बाद संतोष जी का मेल आया कि आपका यह आलेख बहुत अच्छा है। आप इसे मेल करके भेज दें तो इसे मैं 'जनसत्ता' तक पहुँचा दूँ। मैने भेज दिया। उन्होने कुछ समय बाद फोन किया कि थोड़ा छोटा है। थोड़ा और लिखिये। मैने उन्ही के कमेंट से शुरू करते हुए बात आगे बढ़ायी। लिखते वक्त कमेंट में आये विचार भी प्रभावित करते रहे और वे भाव भी आ गये जो कमेंट में दर्ज थे। इसीलिए लिख रहा हूँ कि इस पोस्ट का आधा हिस्सा ब्लॉगिंग की देन है। अब फाइनली बताइये कि कैसा है ?


ऊपर के तीन पैराग्राफ की चर्चा संतोष जी के माध्यम से आज दिनांकः 28-7-2012 को डेली न्यूज  में भी देखने को मिली।


यह लेख जनसत्ता में प्रकाशित है। 

30.4.11

डांटता है मकान मालिक...!


मैने जिस घर में आश्रय पाया उसे अपना समझ लिया 
किराया कोई और देता, मजा मैं लेता
मैला मैं करता
रंग-रोगन कोई और कराता
चोट मैं पहुँचाता
मरहम कोई और लगाता
मुझे तो यह भी नहीं पता था कि मैं जिस मकान में रहता हूँ वह किराये का है !

अपने अहंकार में मस्त
मकड़जाल में व्यस्त
और अहंकारी और मूर्ख होता चला गया

धीरे-धीरे वे सभी इस दुनियाँ से चले गये जो अपने साथ मेरे भी मकान का किराया भरते थे
जो अपने साथ मेरे भी चोटों पर मरहम लगाते थे
अब मकान मालिक सीधे मुझसे किराया मांगने लगा
मैं ताकतवर हो चुका था
उसको किराया भी ऐसे देता जैसे मुझे अपने मकान पर रखना उसकी मजबूरी हो !

वह मेरी मूर्खता पर हंसता और मैं समझता कि मेरे कृत्य पर वह बड़ा प्रसन्न है !
उसका किराया तो बस
पेट भर भोजन
तन ढकने भर वस्त्र
इच्छा भर श्रम
और चैन की नींद थी
मैने अपनी मूढ़ता में उसके साथ खूब खिलवाड़ किया !

उसे खुश करने के लिए अच्छा से अच्छा भोजन कराया
अधिक से अधिक वस्त्र पहनाये
आवश्यकता से अधिक श्रम कराया

वह कहता- अब सोने दो
मैं कहता..
अरे यार !
अभी समय है, कुछ कमा लो !

मुझे पता ही नहीं चला
कब वह
धीर-धीरे
मुझसे ऊबता, खीझता चला जा रहा है।

पहला झटका तब लगा जब मुझे चश्मे की जरूरत महसूस हुई !
दूसरा झटका तब लगा जब मेरे बालों के लिए हेयर डाई की आवश्यकता महसूस हुई !
तीसरा झटका तब लगा जब अधिक पान चबाने से मेरे दो दांत उखड़ गये !

मैं चीखता...
ठीक से रहो ! 
क्या गड़बड़ से करते हो ?
किराया तो आवश्यकता से अधिक देता हूँ !

वह ठहाके लगाता...
मूर्ख !
मैने कब आवश्यकता से अधिक मांगा था ?
मैने कब कहा था कि दिन भर पान चबाओ ?
मैने कब कहा कि मुझे घुमाना छोड़, ईंट-गारे के एक कमरे में बंद कर दो ?
मैने कब कहा था कि मुझे झील, पहाड़, नदी और झरनों से वंचित कर दो ?
मैने कब कहा था कि मुझे ऊषा की लाली और संध्या की सुनहरी किरणों से दूर कर दो ?
मैने कब कहा था मूर्ख ! 
इतनी चिंता करो कि मुझे सुलाने के लिए तुम्हें नींद की गोली खानी पड़े ?

अब तो तुम किसी लायक नहीं रहे !
साइकिल में घुमाना तो दूर अधिक देर पैदल भी नहीं चल सकते !
तुमने मेरे घर को बर्बाद कर के रख दिया है !
मैं तुम्हें घर से नहीं निकालता मगर जानता हूँ कि अधिक दिन तक नहीं रह पाओगे यहाँ।

तुमने अपनी लालच में
मेरी आदतें
मेरी आवश्यकताएँ
सब बदल दी हैं

शुक्र है
तुमने मुझे
मकान मालिक तो समझा !
मगर अब बहुत देर हो चुकी है
मैं चाहकर भी
अधिक दिनों तक तुम्हारा साथ नहीं दे सकता।

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