लगभग सही समय से ही चल रही है अपनी
#ट्रेन। धूप नहीं निकली है लेकिन कोहरा भी नहीं है। लोहे के घर की खिड़की से दिख रहे हैं हरे अरहर और पीले सरसों के खेत। आसमान के श्वेत रंग को मिलाकर देखो तो याद आता है अपना
#तिरंगा । बीच-बीच में बरगद की लम्बी झूलती जड़ें, पगडंडियों पर चलते स्कूल जाते बच्चे, अलाव जला कर आग तापते लोग और खेतों में अपनी मिट्टी से प्यार करते ग्रामीण। कर्मशील मनुष्यों का दर्शन बड़ा शुभ होता है। अकर्मण्य नहीं दिखते, लोहे के घर से।
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इस ईमानदार धोखाधड़ी करने वालों में हमारे प्रधान मंत्री जी नोटबंदी करके सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए। समूचा विपक्ष नाराज है-ये तो बहुत बड़ा धोखा है! चुनाव सर पर है और इतना बड़ा धोखा!!! अब सबने मिलकर प्रचारित करना शुरू किया, यह तो गरीबों के साथ धोखा है। गरीबों को परेशानी हो भी रही है। बड़े लोगों की चोर-बाजारी पकड़ में भी आ रही है। चोर नये-नये पैतरे खोज रहे है, सरकार नये-नये नीयम बना रही है।
इस नूरा कुश्ती में जो सबसे ज्यादा परेशान है वो है आम आदमी। पहले उसे लगा कि डकैती डालकर जो धनवान बने थे उनके नोट बेकार हो गए। बहुत खुश हुए कि घंटों लाइन में लगे हैं तो क्या, चोरवे तो बरबाद हुए! अब नाराज है -हमारे लिए नोट नहीं लेकिन चोरों को लाखों के नए नोट! जइसे नोट बंद कर मोदी जी अपनी पीठ थपथपा कर, तालियाँ बजवाकर राजनीति करने लगे वइसे पूरा विपक्ष नोटबंदी की परेशानियां गिना कर उन्हें झूठा साबित करने में जुट गए। जइसे किसी दफ्तर में आ टपके किसी ईमानदार अधिकारी को उनके मातहत ही कोसने लगते हैं, वइसे जिनके बल पर नोटबंदी का फैसला किया, वे ही उनको गलत साबित करने में जुट गये!
अब तो माहौल यह हो गया है कि जिसके साथ जो भी बुरा होता है इल्जाम झट से मोदी जी के सर फोड़ देता है। आर बी आई नीयम बदले, इल्जाम मोदी पर। कहीं कोई किसी अव्यवस्था का शिकार हो, इल्जाम मोदी पर। हद तो तब हो गई जब सही समय पर जाने से यात्रियों की ट्रेन छूटी, इल्जाम मोदी पर! कोई कह रहा था-मोदिया ट्रेन छुड़ा देहलस!!! सरकार, पार्टी सब हल्के, अच्छे-बुरे सभी के लिये जिम्मेदार-मोदी जी।
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इधर दून के आने का एनाउंसमेंट शुरू हुआ , उधर भण्डारी स्टेशन पर नशे में झूमते, सबका मालिक एक....नशेमन तेरे लिये...! गाते, नाचते अर्धविक्षिप्त शराबी के कदम ठिठके। यात्रियों का रेला एक प्लेटफॉर्म से दूसरे की ओर भागने लगा। शराबी के इर्द-गिर्द गोल गोलइया में बड़ी देर से मजमा लगाये हंस रहे रोज के यात्रियों ने नशेड़ी को छोड़ अपनी-अपनी पोजीशन ले ली।
बहुत भीड़ है आज
ट्रेन में। इस बोगी से उस बोगी टहलते-टहलते आखिर ऊपर चढ़ कर बैठने भर की जगह मिल गई है। दून से आ रहे कोलकोता जाने वाले यात्रियो
ं की भीड़ है। लगता है जैसे बंगाल के किसी घर में बैठे हैं। आज बंगाली हो गई है लोहे के घर की यह बोगी। गोरूम, एक्टो, चहार घण्टा लेट, एक टका जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं। नीचे बैठे परिवार ने झाल-मुड़ी बनाई। नाक की नोक पर चश्मा अटकाये सुफेद मूँछ वाले टकले प्रौढ़ ने बड़े सलीके से प्याज और टमाटर काटकर पॉलीथीन में रखे लाई- चने में मिलाया। सामने बैठी महिला ने मुझे छोड़ सबको अखबार के टुकड़ों पर निकाल-निकाल कर दिया। मैं भी उधर से मुँह मोड़ जेब से निकाल कर चीनिया बादाम फोड़ने और छिलकों को छोटी पॉलीथीन में रखने लगा।
कोहरे की वजह से धीमे चल रही हैं सभी ट्रेनें। 'सौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाली हालत है। दोपहर में आने वाली ट्रेन शाम को मिल रही है, शाम वाली सुबह। नीचे बैठे मूंछों वाले टकले ने एक मोटी किताब खोल ली है। चश्मा नाक के नोक से पीछे आ गया है। पता नहीं कौन सी पुस्तक पढ़ रहे हैं! मेरे बैग में भी वेतन निर्धारण के शासनादेश वाली एक किताब है लेकिन मैं उसे पढ़ना नहीं चाहता। सिन्दबाद की साहसिक यात्राओं वाली पुस्तक के अलावा दूसरी पुस्तक पढ़ने का मन नहीं है। क्या जमाना था जब यात्रा में निकलने वाला युवा, बूढ़ा होने के बाद घर लौटता था! ऐसी पुस्तकें पढ़ी जांय तो ट्रेन का लेट होना कभी न खले। मैं तो कहता हूँ प्रभु जी को सभी यात्रियों में यह पुस्तक मुफ्त बंटवानी चाहिये और कान में तेल डाल कर सो जाना चाहिये।
पीछे बैठे यात्री बतियाने के मूड में हैं। राम मंदिर, आरक्षण, नोट बंदी सभी मुद्दों पर बहसियाने के बाद अब किसी फिल्म की चर्चा कर रहे हैं। फालतू मुद्दों में आम आदमी कितना उलझे! थक हार कर साहित्य, संगीत, भजन या प्रकृति की शरण में जाना ही पड़ता है। बच्चे अपने में मस्त हैं। उनका पेट भरा लगता है। कभी ऊपर चढ़ रहे हैं, कभी नीचे उतर रहे हैं। बंद हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ। बाहर चल रही है शिमला से आयी बर्फिली हवा। नीचे बैठे सुफेद मूँछ वाले की मोबाइल घनघना रही है। टोपी हटाकर, अपने चाँद को पूरा हिलाते हुए उसने फोन उठाया और जोर से बोला..हैलो...!
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आज पाटलीपुत्र में भीड़ नहीं है मगर एक बेंगाली परिवार आज भी है। दादी और पोती में खूब बातें हो रही हैं। इतने जल्दी-जल्दी बोल रहीं हैं दोनों कि बात समझ में नहीं आ रही।
मेरे न चाहने के बाद भी यादव जी ऊपर चले गये! मैंने कहा -इतनी जल्दी! तो चिढ़कर बोले-'तोहें साथे लेकर जाइब हो, अभहिन सूते जात हई।' यादव जी की पलकें बंद हैं। ऊपर के बर्थ पर लेटकर पटरियों की खटर-पटर सुनने में अधिक मजा आता होगा।
खाना-खाना चिल्लाते हुए चार आदमी खाने की ट्रंक पकड़े गुजर गये। वे खाना-खाना चीख रहे थे, मुझे 'राम नाम सत्य है' सुनाई दे रहा था। हरा मटर बेचने वाले पीछे-पीछे मसाले की दुर्गन्ध फैलाते हुए गुजर गये। जैसे 'राम नाम सत्य है' के पीछे अगरबत्ती सुलगाये लोग! अब माहौल में मरघटी सन्नाटा पसर गया है। यादव जी की पलकें पहले की तरह बंद हैं लेकिन अब उन्होंने दाहिने हाथ से पकड़ लिया है बर्थ की रेलिंग। ऊपर गये जरूर हैं मगर और ऊपर नहीं जाना चाहते। मुझे साथ लेकर जाने का संकल्प दृढ है शायद!
मरघटी माहौल के बीच अपने आप थोड़ी उठ गई है लोहे के घर की खिड़की। सुरसुर-सुरसुर मेरे जिस्म से छू छू जाती है बर्फिली हवा। मैं सिहर-सिहर मजा ले रहा हूँ ठंडी हवा का।
कहीं रुक गई है अपनी ट्रेन। यादव जी भूत की तरह मेरे सामने टपक कर पूछ रहे हैं-कहाँ पँहुचल पाँड़े? कुछ और जग कर बड़बड़ाने लगे-अभहिंन ले त बढ़िया लियायल, अब का हो गयल! अब बेचैनी से सुर्ती रगड़ रहे हैं। पता नहीं कहाँ जाने की जल्दी है! इस घर में इतने लोग, उस घर में एक अदद पत्नी और 1-2 बच्चे! वहाँ पहुँच कर वहीं रह पायें ऐसा भी नहीं। फिर सुबह उठकर आना है इसी घर में! क्या जाहिलाना प्रश्न है-कहाँ पहुँचल पाँड़े? हमको कहना पड़ा-चुप मारे रहा, हमें लिखे द। पहुँच जाई त तोहें साथे लेके चलब। तू भले उप्पर अकेले चला जा, हम तोहें बिना लेहले न उतरब।
एक ट्रेन सरसरा के गुजरी है अभी। एक ताजा हवा चली है अभी। चलकर शिवपुर के आउटर में खड़ी है अपनी भी
#ट्रेन। मंजिल पास जान उठकर बड़बड़ाने लगे हैं सभी यात्री। उनके शोर से जाना, बहुत से बेंगाली हैं इस बोगी में! जब तक लोग बोलते नहीं तब तक समझ में नहीं आती उनकी भाषा। एक और ट्रेन गुजर गई। कुछ ज्यादा इतमिनान से खड़ी है अपनी ट्रेन। लिखना बंद कर बंगाली समझने का प्रयास करता हूँ। सुनने में बड़ी मीठी लगती है बंगाली।
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मोबाइल में गाना बजा रहा है-चार दिनों का खेल हो रब्बा लंबी..जुदाई..। बांसुरी में इसकी धुन खूब बजती है। जाड़े में लोहे के घर की शाम रंग-बिरंगी होती है। कहीं मनहूसियत से भरी तो कहीं आनंद दायक। एक ही बोगी में अलग-अलग ग्रुप। कोई अपने में सिकुड़े-सिकुड़े, गुमसुम तो कोई हँसी-मजाक, हल्ला-गुल्ला करते हुए। मेरे अगल-बगल गाल में हाथ रख कर कहाँ पहुँचे?, रुक गई, चल दी, पीछे वाली क्रास न कर जाए! ऐसी ही मनहूसियत की बातें करने वाले लोग हैं। बगल में शोर गुल है। लगातार गाना बज रहा है-चला जाता हूँ, किसी की धुन में, धड़कते दिल के तराने लिये...।
आज कितनो की फूटी किस्मत का लाभ हमें मिला। डाइवर्टेड ट्रेन समय से मिल गई और अब लगता है 9 बजे तक घर पहुँच जायेंगे। लोग बता रहे हैं-अभी शिवपुर में खड़ी है। यहॉं से चले तो बात बने। चल दी! पता नहीं जल्दी घर पहुँच कर ही क्या खजाना लूट लेंगे!