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31.5.19

बुद्धिजीवी

बुद्धिजीवी वह जो खाली पेट तो भगवान से भोजन की याचना करे और जब पेट भरा हो, उसी भगवान को गाली देने में रत्ती भर भी संकोच न करे। बुद्धिजीवी वह परजीवी होता है जो खुद को सबसे बड़ा श्रमजीवी समझता है। बुद्धिजीवी वह जो चौबीस घण्टे काम करे मगर अपने कुर्ते में धूल की हल्की-सी परत भी न जमने दे। बुद्धिजीवी वह जो हर पल अपने मुखारविंद से बुद्धि का दान करता रहे। बुद्धिजीवी वह जिसके दरवाजे, दूसरे के खेत की कटी फसल खुद चलकर पहुँचे और नमस्कार करते हुए कहे..श्रीमान जी! मुझे खाने की कृपा करें। बुद्धिजीवी वह जो भक्त और उसकी भक्ति को आतंकवादी कहे मगर चुनाव के मैदान में उसी से पाला पड़ जाय तो उससे भी बड़ा भक्त कहलाए जाने के लिए उससे भी अधिक भजन-कीर्तन, हवन-पूजन करे।

समय के साथ परिभाषाएं बदल जाती हैं। एक जमाना था जब जामवंत जैसा दिखने वाला हर शक्श बुद्धिजीवी कहलाता था। बढ़ी दाढ़ी, खिचड़ी बाल, बेढंगे/मैले कपड़े, नशे में टुन्न होकर, हवा में सिगरेट के छल्ले उड़ाते किसी शक्श को देख हम झट से अनुमान लगा लेते थे कि यह पक्का बुद्धिजीवी होगा। अब ऐसा समझना मूर्खता का सूचक है। अब ऐसी दसा आम मजदूरों की होती है। बुद्धिजीवी अब सड़क पर नहीं भटकता, लोकतंत्र के हर खम्बे के ऊपर शान से चढ़ कर, अपने झण्डे गाड़ता है। पहले बुद्धिजीवियों के रहने का ठिकाना भी दुर्लभ होता था। आज तो, जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे बुद्धिजीवी। 

बुद्धिजीवी बनने की एक शर्त यह भी होती है कि उसकी बुद्धि पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो और बाजार में समस्त मूर्खों/ बुद्धिजीवी बनने की प्रक्रिया में लगे सभी बुद्धिमानों के सूचनार्थ उपलब्ध हो। पुस्तक पढ़ना तो उसके लिए भी जरूरी नहीं जिसके नाम से पुस्तक छपी है। सर्वसाधारण को बस संसूचित होना चाहिए कि फलां बुद्धिजीवी इसलिए है कि उसने इतनी सारी किताबें लिखीं हैं। वैसे भी अधिक पुस्तकें लिखने वाले असली बुद्धिजीवी को भी कई साल पहले लिखी अपनी ही बात कहाँ याद रह पाती है! मन चाहे किसी की पुस्तक पढ़कर लेखक से उसी के लिखे से बहस भिड़ा कर देख लीजिए..अपने ही लिखे के विरोध में तर्क देने लगेगा। याद दिलाओ तो कह देगा.."ओह! ऐसा! वह सन्दर्भ ही दूसरा था, पूरा पढ़ो तब समझ पाओगे।" शायद इसी का नतीजा है कि चाहे जिस फील्ड में हों, प्रत्येक बुद्धिजीवी के नाम, कम से कम एक पुस्तक जरूर प्रकाशित होती है। 

बुद्धिजीवी बनने के लिए पी.एच.डी. करके डॉक्टर कहलाने से ज्यादा जरूरी है, कोई श्रमिक आपके विचारों पर पी.एच.डी. करे। बुद्धिजीवी शब्द में ही इतना आकर्षण है कि हर नेता खुद को बुद्धिजीवी कहलाया जाना पसंद करता है। प्यादे से फर्जी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय के तर्ज पर हर नेता के पास मंत्री बनते ही बुद्धिजीवी बनने का सुअवसर हाथ लगता है। वह नहीं तो उसके चेले उसके नाम से एकाध पुस्तक छपवा ही देते हैं। 

मैं भी बुद्धिजीवी बनने के मार्ग पर हूँ। पूजा करता हूँ मगर कभी नहीं भी करता। कष्ट में ईश्वर को जरूर याद करता हूँ मगर जब आनंद में होता हूँ, पूछ बैठता हूँ..ईश्वर कौन है? मैं भी बुद्धिजीवी बनने के मार्ग पर हूँ। पुस्तक नहीं छपी मगर कोई प्रकाशक मुफ्त में छापने की कृपा करे तो छपवा भी सकता हूँ।  प्रकाशन के लिए पत्रिकाओं में लेख नहीं भेजता मगर कोई मित्र छपवा दे तो पढ़कर खुश भी होता हूँ। जाड़े में बिना नहाए भी रह लेता हूँ मगर गर्मी में रोज नहाने का उपदेश देता हूँ। पँछी को कभी दाना-पानी दिया तो फेसबुक में पोस्ट करना नहीं भूलता। मैं भी बुद्धिजीवी बनने के मार्ग पर हूँ। गर्मी में गर्मी का रोना रोता हूँ, बारिश में भीगने से डरता हूँ और जाड़े में ठंड से काँपने लगता हूँ। मैं भी बुद्धिजीवी बनने के मार्ग पर हूँ।

मैं भी बुद्धिजीवी बनने के मार्ग पर हूँ।  मेरी तरह और भी बहुतेरे ब्लॉगर्स/ फेसबुकिए राइटर, बुद्धिजीवी बनने के मार्ग पर हैं। कोई-कोई तो पुस्तक-उस्तक छपवाकर, ईनाम-विनाम पाकर बाकायदा बुद्धिजीवी घोषित हो चुके हैं। कोई प्रिंट मीडिया से दोस्ती भिड़ाकर, अपने लिखे कूड़े को भी छपवाकर सर्वमान्य बुद्धिजीवी बन चुके हैं। कुछ असली बुद्धिजीवियों को लगा कि फेसबुक में तो बहुत से बुद्धिजीवी हैं तो वे भी इस प्लेटफॉर्म का उपयोग अपने प्रकाशित पुस्तकों के प्रचार प्रसार के लिए करने लगे। हमको इस आभासी संसार मे सबसे सही बुद्धिमान वे लगे जो लेखन, आलोचना छोड़, सीधे प्रकाशक ही बन बैठे। अब इस घालमेल में असली/नकली का भेद कर पाना बड़ा ही कठिन काम है। जो बुद्धिमान होगा वह तो झट से फर्क कर लेगा, जो अनाड़ी होगा वह लाइक और कमेंट को ही बुद्धिजीवी होने का पैमाना मान कर चलेगा। बुद्धिजीवियों की असली पहचान तब होती है जब देश में चुनाव होते हैं। बड़े-बड़े बुद्धिजीवी भी किसी पार्टी के गली के कार्यकर्ता की तरह आपस में झगड़ते देखे जाते हैं। चुनाव के समय बुद्धिजीवियों के चेहरे से बुद्धि का रंग उतरते देख आप भी दांतों तले उँगलियाँ दबा कर चीख पड़ते हैं.. अरे! यह तो रँगा सियार था! 

जैसे सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के वसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से, वैसे ही जो नकली बुद्धिजीवी हैं अपने समय के साथ विस्मृत हो जाएंगे और जो असली बुद्धिजीवी हैं, कबीर की तरह लोगों के जेहन में खोपड़ी-खोपड़ी कूदते हुए सदियों-सदियों तक नज़र आते रहेंगे। बुद्धिजीवी होना गाली नहीं, घनघोर तपस्या का फल है जो सदी में बिरले के भाग में नसीब हो पाता है। आप भी बुद्धिजीवी होने के मार्ग पर हैं तो कुछ गलत नहीं कर रहे बस यह मानना छोड़ दीजिए कि मैं बुद्धिजीवी हूँ। बुद्धिजीवियों की दिल्ली से, मेरी तरह आप भी, अभी कोसों दूर हैं।

23.3.19

जूता

जूते का यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान। 
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किसी ने एक नेता जी को जूते से पीट दिया! खबर आग की तरह फैली। नेता जी और उनके समर्थक आग बबूले हुए यह तो समझ में आता है लेकिन इस घटना से जूते क्यों नाराज हो गए? आइए, देखते हैं...

एक मंदिर के द्वार पर जूतों का एक झुण्ड अपने-अपने चरणों की प्रतीक्षा में भजन-कीर्तन का आनन्द ले रहा था। उन्हें देख चप्पलों ने तंज किया.. यहाँ तो ये भजन सुनते हुए आराम फरमा रहे हैं और वहाँ इनके एक साथी को एक नेता जी के द्वारा दूसरे नेता जी से लड़ाया जा रहा है! दूसरी सभी चपल चप्पलें एक स्वर में बोल उठीं, "हाँ, हाँ, इन्हें तो कोई चिंता ही नहीं!!!" 

चप्पलों की बातों ने जूतों पर जादू का असर किया। उन्होंने तत्काल एक यूनियन का गठन किया और दो पायों के चरणों का सामूहिक बहिष्कार करते हुए अपनी कई मांगें रखीं। उन्होंने चप्पलों से भी आह्वान किया, "साथियों! आज हमें यह दुर्दिन देखना पड़ा, कल तुम्हारा भी इस्तेमाल किसी नेता से लड़ाने के लिए किया जा सकता है। हम चरण दास हैं, चरण दास रहने में ही गर्व का अनुभव करते हैं। हमें न तो किसी मनुष्यों के सर चढ़ना है और न उनके गले का हार ही बनना है। जिसका जन्म जिस हेतु हुआ है, उसे वही करना चाहिए। अपने कर्मों को छोड़, मनुष्यों की तरह, दूसरे कृत्यों में उलझना या उलझाया जाना, हमारा घोर अपमान है। जो देश की सेवा के लिए बने हैं वे देश सेवा करें, जो समाज सेवा के लिए बने हैं वे समाज सेवा करें। सर पर बिठाने के लिए और आराम करने के लिए टोपियाँ बनी हैं। हमें न तो टोपियों की तरह परजीवी बनना है और न ही गुंडे बदमाशों की तरह नेताओं से उलझना है। हम श्रमजीवी हैं। अपने देश के सभी नागरिकों के चरणों की हिफाजत करना हमारा धर्म है। देश के मेहनती नागरिकों और देश सेवा में लगे वीर सैनिकों के चरणों की सुरक्षा ही देश को विकास के मार्ग पर ले जा सकता है। यदि कोई मनुष्य या मनुष्य भेषधारी गुंडा, हमारा दुरुपयोग करता है तो हमें एक बड़ा आंदोलन चलाते हुए सभी चरणों का बहिष्कार कर देना चाहिए। हम मन्दिर-मंदिर जाएंगे, हम मस्जिद-मस्जिद जाएंगे। सभी साथियों को इकठ्ठा करेंगे और दिल्ली के रामलीला मैदान में विशाल सभा का आयोजन कर के अपने अधिकारों के साथ-साथ सभी मनुष्यों के कर्तव्य निर्वहन की माँग करेंगे।"

देखते ही देखते जूतों, चप्पलों, सैंडिलों, घरेलू स्लीपरों आदि सभी प्रकार के चरण रक्षकों ने पूरे भारत में एक बड़े आंदोलन की हुँकार भर दी। वे दिल्ली के राम लीला मैदान में लाखों जोड़ों में जमा थे और जोरदार नारा लगा रहे थे...'जूतों का यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान।'

रामलीला मैदान के बाहर अपने अपने जूतों/चप्पलों को आवाज दे कर बुलाते नङ्गे पाँव खड़े मनुष्यों की भीड़ बार-बार यह आश्वासन दे रही थी कि अब भविष्य में कभी आप लोगों का गलत इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। आइए! हमारे चरणों की रक्षा कीजिए। आपके सहयोग के बिना देश के विकास का पहिया चरमरा जाएगा। हम नंगे पाँव अब एक कदम भी और नहीं चल सकते। 

इधर एक कोने में सभी जूते चप्पल पीड़ित जूते को घेरकर खड़े थे जिसे बलात चरण से निकाल कर सर से भिड़ाया गया था। सभी उससे तरह-तरह के प्रश्न कर रहे थे... जब तुम्हें नेता द्वारा, नेता को पीटने के लिए बलात काम पर लगाया गया तब कैसा अनुभव हुआ? पीड़ित ने झल्लाकर  प्रतिप्रश्न किया....तुम्हीं बताओ, कैसा लगेगा? यहाँ आए साथियों में  से कोई बता दे! क्या किसी मनुष्य का आचरण उसके चरण से पवित्र है?  हम किसी के सर पर बरसाये जाएं या माला बनाकर गले में लटकाए जाएं, अपमान किसका हुआ? अपमान हमारा हुआ और शर्मिन्दे यही मनुष्य हो रहे हैं! पिटे जाने वाले के मित्र दुखी हैं और विरोधी जश्न मना रहे हैं! क्या मनुष्य जाति पर हमारा योगदान किसी से कम है? तब तक किसी जूते ने  जोश में आकर फिर से नारा बुलंद किया..जूते का यह अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान। 
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4.2.19

महापुरुष

इसमें कोई शक नहीं कि पुरुष अपने कर्मों से महान बनता है। पुरुष से महापुरुष बनने के लिए उसे कई सत्कर्म करने पड़ते हैं। महापुरुष बनने के लिए पुरुष को सबसे बड़ा सत्कर्म तो यह करना पड़ता है कि उसे अपना पुरुष तत्व त्यागना पड़ता है। पुरुषत्व त्यागने के लिए पुरुष को स्त्री से दूर भागना पड़ता है। अपवाद को छोड़ दें तो जितने भी महापुरुष हुए हैं उन्होंने सबसे पहले अपनी स्त्री का ही त्याग किया। प्राचीन भारत में मर्यादा पुषोत्तम भगवान श्री राम से भगवान बुद्ध, तुलसी दास तक कई उदाहरण हमे मिल जाएंगे। महात्मा गाँधी ने अपनी धर्मपत्नी को नहीं छोड़ा मगर पराई पीर सुनने के चक्कर में उन्होंने भी बा के दुखों पर केवल घड़ियाली आँसू ही बहाए। वर्षों दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटियाओं के दुखों के लिए संघर्ष किया और भारत लौट कर भी देश की आजादी की चिंता में लगे रहे, अपनी स्त्री पर ध्यान नहीं दिया। बीसवीं, इक्कीसवीं सदी में भी कुँवारे रहकर या स्त्री त्याग कर महापुरुष बनने की दौड़ में लगे पुरुषों के उदाहरण मिल जाएंगे। यह अलग बात है कि स्त्री को खुश करने के लिए पुरुष आपस मे एक सूक्त वाक्य दोहराते पाए जाते हैं... हर सफल पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है! 

पुरुष को महापुरुष बनने के लिए अपनी रुचि और क्षमता के हिसाब से अलग-अलग क्षेत्र का चुनाव करना पड़ता है। पहले क्षेत्र सीमित थे। धर्म, दर्शन और जन सेवा ही सर्व सुलभ क्षेत्र हुआ करते थे। विकास के साथ-साथ महापुरुष बनने के अनेकों द्वार खुलते चले गए। राजनीति, खेल, संगीत, नाटक, सिनेमा और अब तो ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक और वाट्सएप जैसे सर्वसुलभ रास्ते अपना कर भी पुरुष, महापुरुष बनने की सोच सकता है। लेकिन इन सभी सत्कर्मों में उसे स्त्री का नहीं तो स्त्री की भावनाओं का त्याग जरूर करना पड़ेगा, तभी वह महापुरुष बन सकता है।

महापुरुष बनने के लिए सबसे सटीक और बढ़िया मार्ग राजनीति है। खेल, संगीत, सिनेमा या दूसरे आभासी मार्ग पर चलकर भारत रत्न तो मिल सकता है लेकिन महापुरुष बनने के लिए उसे इसमें राजनीति का तड़का भी लगाना पड़ता है।  राजनीति में सफल होने पर पुरुष को मोक्ष प्राप्ति की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।  राजनीतिज्ञ जब तक जीवित रहता है, विरोधी उसे परम पुरुष ही प्रचारित करते हैं। मरणोंपरांत परम पुरुष को महापुरुष मान कर उसकी ख्याति से लाभान्वित होते हैं। राजनीति का उद्देश्य वैसे तो समाज और राष्ट्र की सेवा है मगर इसमें व्याप्त दलगत स्वार्थ की भावनाएं पुरुष को महापुरुष क्या, मनुष्य की श्रेणी से भी पदच्युत करा सकती है।  एक दल, दूसरे दल के महापुरुष को नीचा दिखाने और अपने दल के परम पुरुष को महा पुरुष सिद्ध करने में लगा रहता है। जैसे हम बचपन में खड़िया से खींची अपनी पाई को बड़ा सिद्ध करने के लिए दूसरे की खींची पाई को मिटा देते थे, ठीक वैसे ही राजनीतिज्ञ अपने दल के पुरुष को महान सिद्ध करने के लिए दूसरे दल के महापुरुष की गलतियाँ गिनाते पाए जाते हैं। 

वह महापुरुष भाग्यशाली होता है जिसके पास उसकी जाति का वोट बैंक तगड़ा होता है। वोट बैंक की विशालता को देख कर कोई भी दल उस महापुरुष की गलतियाँ गिनाने की हिम्मत नहीं कर पाता। इससे एक बात और समझ में आती है कि किसी पुरुष को महापुरुष बनना ही पर्याप्त नहीं होता, मरणोपरांत सदियों तक महापुरुष बने रहने के लिए अपनी जाति का प्रबल समर्थन भी चाहिए होता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे भवन्तु निरामया के साथ-साथ, अपनी जाति का सबसे ज्यादा कल्याण करते हुए मोक्ष प्राप्त करना चाहिए, तभी वह मरणोपरांत भी महापुरुष बना रह सकता है। अपनी जाति को छोड़, दूसरी जातियों का कल्याण करने वाले पुरुष भी हुए, लेकिन उन्हें अब कौन याद करता है! 
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28.10.18

पटाखे

जिसे देखते ही पूरे शरीर मे उत्तेजना बढ़ जाती है उस माल का नाम पटाखा माल है। जो आँच दिखाते ही धड़ाम से फूट जाय, जिसके फूटने पर आपका मन आंनद से भर जय तो समझो वही पटाखा माल है। आँच दिखाते-दिखाते आपकी पूरी बत्ती जल जाय और धड़ाम की आवाज भी कानों में न सुनाई पड़े तो समझो वो पटाखा नहीं, फुस्सी माल है। पटाखा देखने और पाने के लिए बाजार में घूमना पड़ता है। माल ही माल को खींचता है। इसलिए पटाखा प्राप्त करने के लिए जेब में माल लेकर बाजार में घूमना पड़ता है। अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण पटाखे मॉल में नहीं बिकते, तंग गलियों में या सड़कों के किनारे पटरी पर सज्ज होकर बिकने के लिए आते हैं। पटाखे खरीदते समय अपनी जेब के साथ अपनी उम्र और क्षमता का भी ध्यान रखना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि पटाखा खरिदा आपने, घर लेकर गए और छुड़ाने के लिए मोहल्ले के लड़कों को बुलाना पड़ा!

हर चीज का एक समय होता है। उम्र के किसी पड़ाव पर जो चीज अच्छी लगती है, समय बीत जाने के बाद वही चीज बेकार लगने लगती है। पटाखों का भी यही हाल है। चुटपुटिया छुड़ाते समय काँपने वाली उँगलियाँ आड़ू बम के धमाकों से भी संतुष्ट नहीं होती। किशोर से जवान हुए तो चाहते हैं कि आड़ू बम में आग लगाने से पहले उसे किसी पुराने टीन के कनस्टर से ढक दिया जाय ताकि धमाके के साथ टीन के परखच्चे उड़ जांय! तंग गलियों के छत पर खड़े होकर, बम को हाथ से पकड़ कर, सुतली में आग लगाकर, नीचे फेंकने में जो मजा है वह बुढ्ढों की तरह पुराने अखबार के ऊपर बम रखकर, अखबार में आग लगाकर, कान में उँगलियाँ घुसेड़ कर, चार हाथ पीछे भागने में कहाँ! 

जैसे पटाखे छुड़ाने में आनन्द की एक उम्र होती है वैसे ही पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी त्योहारों में प्रदूषण की चिंता करने का शुभ मुहूरत होता है। धर्मनिरपेक्ष समय मे फैलने वाले प्रदूषणों पर पर्यावरण की चिंता का असर नक्कार खाने में तूती की आवाज की तरह सुनी, अनसुनी रह जाती है इसलिए त्योहारों के समय आवाज बुलंद करनी चाहिए। भले रोज मुर्गा उड़ाते हों लेकिन जब बकरीद का समय आये तो बकरों की कुर्बानी पर टेसुए बहाना सबसे मुफीद होता है। भले एक पौधा न रोपे हों, होली में होलिका दहन के लिए सजाए वृक्षों की डाल पर छाती फाड़ने में चैन आता है। यह और कुछ नहीं, दूसरे के फटे में उँगली करने का हम भारतीयों का पुराना स्वभाव है। स्वच्छता के नाम पर अपना कूड़ा या चूहेदानी में फंसा चूहा जब तक पड़ोसी के दरवाजे पर छोड़ नहीं आते हमारी आत्मा को सुकून नहीं मिलता।

सुंदर लाल बहुगुणा गंगा पर टिहरी बांध का विरोध करते रहे, कोई फर्क नहीं पड़ा। सरकारें गंगा पर बांध भी बनाती रही और सफाई के नाम पर गंगा में हाथ भी धोती रही। न बाँध रुका, न गंगा का पानी ही साफ हुआ। गंगा को मुक्त कर दो तो गंगा की धार स्वयं अपनी सफाई के साथ आपके पाप भी बहा ले जाने में समर्थ है। हम व्यवस्था पर व्यंग्य क्या खाक करेंगे? व्यवस्था सदैव हमारा ही मजाक उड़ाती रहती है और हम सब चुपचाप सहने के आदी हो चुके हैं। जान्ह्वी स्वयं मुक्तिदायिनी, पाप हारिणी हैं और हम उस पर बांध बांध कर उसी की सफाई करने में लगे हैं! गंगा में बांध बांधने से प्रदूषण नहीं होता, दिवाली में पटाखे छुड़ाने से प्रदूषण फैलता है।  

सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना कि दो घण्टे पटाखे छुड़ाने से इतना प्रदूषण नहीं होगा कि समाज सहन न कर सके। हम पूछते हैं कि आज के मंहगाई के जमाने में किस आम आदमी की इतनी हैसियत है कि वह दो घण्टे से ज्यादा पटाखे छुड़ा सके? हमने तो अपने जुनूनी समय मे भी एकाध घण्टे से ज्यादा पटाखे नहीं छुड़ाए! हां, पहले लोग 'मजा लेना है जीने का तो कम कम, धीरे धीरे पी' वाले अंदाज में रुक रुक कर पटाखे छुड़ाते थे, अब वही पटाखे दो घण्टे में ही सारे छुड़ा दिए जाएंगे। पहले मुकाबला चलता था। पड़ोस के भोनू की रॉकेट हवा में उड़ी तो ध्यान से देखा जाता था कि वह कितना ऊपर उड़ा और हवा में कितनी जोर से फटा! फिर उसके मुकाबले अपना दो आवाजा छोड़ा जाता। नीचे भोनू के कान के पर्दे भी फटें और दूर ऊपर जा कर इतनी जोर से फटे की नीचे भोनू की छाती फटी की फटी रह जाय।  

हिन्दुओं की बात करते हो तो हिंदुओं के पटाखे छुड़ाने का एक निर्धारित समय होता है। बदमाश लौंडों की बात छोड़ दो तो लक्ष्मी पूजा समाप्त होने से पहले हिन्दू स्वयं धमाके नहीं चाहते। डरते हैं कि कहीं शोर शराबे से उल्लू डर कर भाग न जांय। वे तभी पटाखे छुड़ाते हैं जब आरती समाप्त होने के बाद दिए भी जला कर खाली हो चुके होते हैं। धनी माने जाने वाले परिवारों के लिए भी पटाखे छुड़ाने के लिए दो घंटे बहुत हैं। अब समय में लफड़ा हो सकता है। पण्डित जी यदि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित समय शाम आठ बजे से पहले पूजा समाप्त कर दें तब तो ठीक लेकिन यदि पूजा कराते कराते रात के दस बजा दिए तो गए पटाखे पानी में! गुस्से में पटाखे यदि पण्डित जी के सर पर फूटे तो और भी लंबे समय के लिए जेल जाना पड़ सकता है। माननीय न्यायालय के इस आदेश से प्रदूषण कितना कम होगा यह तो कह नहीं सकते लेकिन इतना तय है कि पटाखे छुड़ाने वाले घर के गैंग का ध्यान हर समय लक्ष्मी जी के बजाय घड़ी पर ही टिका रहेगा।

18.10.18

जब जागो तभी सबेरा

आप मुर्गे की बांग से जागते होंगे, हमको तो पड़ोस की जूली जगाती है! जूली का मालिक भोर में चार बजे ही निकल जाता है मॉर्निंग वॉक पर। जूली की मालकिन अपने पति देव के जाने के बाद, गेट बाहर से उटका कर, देर तक कॉलोनी में टहलती रहती हैं और जूली बन्द गेट के भीतर से मालकिन को देख देख कूकियाती रहती है। जूली की कुकियाहट को सुन, दूसरे पड़ोसी का शेरू ताल से ताल मिलाने की तर्ज पर, तीसरे मंजिल की छत से भौंकना शुरू करता है। इधर जूली बोली कुई, उधर शेरू बोला.. भौं! 

पूरे कॉलोनी में भौं-भौं, कुई-कुई की आवाजें गूँजने लगती हैं। शायद इनके शोर से ही कदम्ब की शाख पर बैठे पंछियों की नींद खुल जाती है और वे भी बीच-बीच में चहकने लगते हैं। भौं-भौं, कुई-कुई के शोर से जब अपनी नींद उचटती है तो सुबह के साढ़े चार के आस पास का समय होता है। अपना एलार्म बाद में बजता है, जूली पहले बोलती है। भौंकती है, इसलिए नहीं लिख रहा कि लोग बच्चों से भी जियादा अपने  पालतू जानवरों से  मुहब्बत करते हैं। भले कुत्ते/कुतियों के भौंकने से हमारी नींद समय से पहले उचट जाय, मुहब्बत का सम्मान करना हमारा फर्ज बनता है। 

कुछ लोग घोड़े बेच कर सोते हैं। कुत्ते लाख भौंकते रहें न उनकी नींद टूटती है, न ही मुंगेरी लाल के ख्वाब टूटते हैं। उनका सबेरा सूर्योदय से नहीं, बिस्तर छोड़ने से शुरू होता है। हम जब मॉर्निंग वॉक से लौट रहे होते हैं, वे जम्हाई लेकर चाय पी रहे होते हैं। भले मुहावरे का अर्थ न मालूम हो लेकिन बेशर्मों की तरह हँसते हुए कहते हैं.. जब जागो तभी सबेरा। लोग बिस्तर से उठ कर चाय पीने को ही सबेरा मान बैठते हैं। 

जागना तो तब होता है जब मन का अंधकार दूर हो। जब अंतर्मन में प्रकाश की किरणें फूटें, अपनी गलती का एहसास हो और मन बुरे कर्म छोड़, सत्कर्मों की तरफ लग जाय। तब कहो.. जब जागे तभी सबेरा। यह क्या कि सूरज चढ़ जाने पर बिस्तर छोड़े, चाय पीते हुए फेसबुक/वाट्सएप में गुडमार्निंग स्टेटस अपडेट/फारवर्ड किए और हंसते हुए बोल पड़े.. जब जागो तभी सबेरा! चुनाव परिणाम से पहले जब सरकार नहीं जगती तो आम आदमी एक रात के बाद कैसे जाग सकता है!

पता नहीं आपको अनुभव हुआ है या नहीं, हमको तो हुआ है। भागती कारें गढ्ढे उगलती हैँ! जब हम चार पहिए के पीछे अपनी बाइक दौड़ाते हुए ट्रेन पकड़ने के लिए फुल स्पीड में भाग रहे होते हैं, अचानक कार के नीचे से गढ्ढा निकलता है और अपनी बाइक एक हाथ ऊपर उछल पड़ती है! चार पहिए वाला अपने चारों पहियों को सड़क के बीच मे नरक पालिका द्वारा सजाकर रखे हुए गढ्ढे से बचाकर आगे निकलता है और पीछे चलने वाले बाइक सवार को गढ्ढा तब दिखता है जब बाइक से उछलकर गिरने से बच जाता है। सुबह भले घर से हनुमान चालीसा पढ़कर निकला हो, भगवान को याद करते हुए अंग्रेजी में कहता है.. थैंक्स गॉड! 

अब आम आदमी सड़क पर मिलने वाले ऐसे गढ्ढों के लिए सरकार को नहीं कोसता। सम्भावित दुर्घटना के लिए अपनी गलती मानता है कि उसे अपनी बाइक चार पहिए से इतनी दूरी बनाकर चलानी चाहिए कि जब कारें गढ्ढे छोड़ें तो समय रहते दिख जाए। जब जागो तभी सबेरा की तर्ज पर, कुछ देर तक मैं भी नींद से जाग कर चलता हूँ। फिर भूल जाता हूँ कि नुझे कार से दूरी बनाकर चलना चाहिए। सरकारें हों या कारें, आम आदमी को कभी भी गढ्ढे में धकेल सकती हैं। 

ऐसा ही होता है। एक दिन नहीं, हर दिन होता है। हम रोज जागते और हर रोज सो जाते हैं। कई बार तो दिन के चौबीस घण्टों में बार-बार जागते और बार-बार सो जाते हैं। जब जब गढ्ढे में गिरते हैं, थैंक्स गॉड बोलते हैं लेकिन न सोना छोड़ते हैं न गढ्ढे में गिरना। जीतने के बाद सरकारें सो जाती हैं, गढ्ढे से बचने के बाद आम आदमी सो जाते हैं। सरकार जागती हैं जब सत्ता चली जाती है। बाइक सवार जागता है जब दुर्घटना हो जाती है। कोमा से निकलने के बाद दोनों के मुख से एक मासूम प्रश्न प्रस्फुटित होता है.. मेरी क्या गलती थी? सरकारें आत्म मंथन के बाद निष्कर्ष निकालती है..विपक्ष का दुष्प्रचार हमारे काम पर भारी पड़ा। आम आदमी निष्कर्ष निकालता है..यदि सड़क में गढ्ढा न होता तो वह कभी नहीं गिरता। दोनो दर्द तक जागने के बाद, फिर गहरी नींद में सो जाते हैं। सरकार हो या आम आदमी, दोनो जागें भी तो कैसे? नींद से जगाने वालों को सभी भूनकर खा जाना पसंद करते हैं।  

आपकी नींद का मुझे नहीं पता लेकिन अपनी नींद तो पड़ोस की जूली के कुकियाने  से खुलती है।
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16.6.18

डांस इंडिया डांस


प्रोफेसर साहब का डांस बढ़िया था लेकिन उनकी डांस पार्टनर कोलंबिया वाली शकीरा होती तो और भी मजा आता! क्यों? मेरा इतना कहना था कि शादी में रुमाल को बीन बनाकर नागिन डांस करने वाला मोटुआ भी सुबह सबेरे मार्निंग वॉक के बाद पार्क के चबूतरे पर बैठ पेट फुलाने/पचकाने की क्रिया को बीच में ही रोक, दोनों हाथ नचाकर कहने लगा..'डांस तो हमने भी किए शादी में बहुत, सबकी किस्मत कहां वायरल होना! स्टेज मिला न किसी ने डांस का वीडियो बनाया और न ही हम वायरल हुए। यदि तुमने ध्यान दिया होता तो आज प्रोफेसर साहब नहीं, गोविंदा के साथ फोटू हम खिंचा रहे होते!' उसकी बातों को सुनकर लगा कि अब जल्दी ही बहुत से डांस वीडियो यूट्यूब में आने ही वाले हैं।

सुसुप्तावस्था को प्राप्त बुद्धिजीवियों को छोड़ वह कौन है जो बारात में झन्नाटेदार संगीत सुन कर भी नहीं थिरकता? थिरकते सभी हैं। किसी का मन थिरकता है, किसी के कदम थिरकते हैं। कोई संकोच में गोल भीड़ के पीछे खड़ा थिरकते कदम के साथ ताली बजा बजा कर मुंडी हिलाता है, कोई आगे बढ़ हौसला अफजाई करते हुए यह सोच कर रुका रहता है कि कोई शिफारिश करे तो हम भी डांस में कूद पड़ें। किसी किसी बारात में तो बाकायदा मित्रों को डांस शक्ति वर्धक पेय पिलाया जाता है कि डांस करने वालों का संकोच जाता रहे और वे शील तोड़ कर थिरकने लगें। डांस वृद्धि पेय पान के बाद तो मुर्दे में भी जान आ जाती है। बुजुर्ग भी लौंडों की तरह कमर हिला हिला कर उछलने लगते हैं।

यदि आपकी सांस जल्दी न उखड़ती हो तो जितना आसान दण्ड पेलना है उतना ही आसान डांस करना है। आधुनिक डांस तो और भी आसान। क्या जरूरत है वही स्टेप किये जांय जो गोविंदा ने किए थे! एक संतुलन बनाकर हाथ, पैर, कमर, मुंडी मतलब शरीर के सभी अंगों को जितना बाएं हिलाइए उतना दाएं हिलाइए। ब्रेक कर के हिलाइए तो ब्रेक डांस, लगातार हिलाइए तो फास्ट डांस। शकीरा की तरह कमर को लट्टू बनाकर नचाने के लिए तो ईश्वर की कृपा चाहिए लेकिन स्टेमना बनाइए तो गोविंदा और प्रभु देवा की क्रेक/ब्रेक डांस तो कर ही सकते हैं। रोज घर/दफ्तर में किसी न किसी के इशारे पर नाचते ही हैं, थोड़ा अपने मन से भी नाच लीजिए।

डांस से ध्यान का मार्ग ओशो ने सिखाया है। इससे अच्छा सदा हीट और फिट रहने का कोई दूसरा तरीका संसार में है ही नहीं। इस तरीके को अपना कर आप भी प्रोफेसर साहब की तरह सुपर हिट हो सकते हैं। रोज शाम टी.वी. खोलकर मीडिया के इशारे पर नाचना बन्द कीजिए और ओशो के बताए तरीके अपनाकर नृत्य कीजिए। ओशो ने ज्ञान प्राप्ति के बहुत से तरीके बताए लेकिन हम संभोग से समाधी को पकड़ कर लटक गए! डांस बहुतों ने किए वायरल हुए प्रोफेसर साहब! हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री जी ने भी फिट इंडिया का नारा दिया है। इस नारे के साथ उन्होंने देश की नाचने का एक और अवसर प्रदान किया है। नहीं ओशो के तो अपने प्रिय नेता के इस नए दांव पर नाचिए। जीना है तो इनके/उनके इशारे पर नाचना तो पड़ेगा ही। थोड़ा समय निकाल कर अपनी इच्छा से भी नाच लें। हो सकता है आपका डांस नृत्य में बदल जाय और आप पर कृष्ण की कृपा हो जाय। कृष्ण ने आपका नृत्य देख लिया तो भव सागर से पार लगने में किंचित मात्र की देर नहीं लगेगी।

27.3.18

माफ़ी

हम जब छोटे थे तो कक्षा में गुरुजी और घर में बाउजी दंडाधिकारी थे। दोनों को सम्पूर्ण दंडाधिकार प्राप्त था। स्कूल में गलती किया तो मुर्गा बने, घर में गलती किया तो थप्पड़ खाए। एक बार जो कक्षा में मुर्गा बन गया, दुबारा गलती करने का विचार भी मन में आता तो उसकी रूह कांप जाती। अच्छे अच्छे शरारती और मिजाज के टेढ़े लड़के बाबूजी के घर में आने की आहट भांप कर सीधे हो जाते थे! तब गलती करने पर माँ के आँचल के अलावा दोनो जहां में कहीं माफी नहीं मिलती थी।

अब नदी में बहुत पानी बह गया। इधर गुरुजी ने लड़के को चपत भी लगाई उधर उसका पूरा खानदान स्कूल के दरवाजे पर खड़ा मिलेगा...मेरे गधे को डंडा क्यों मारा? गुरुजी देर तक गधे के पूरे खानदान से माफी मांगते नजर आएंगे….वो क्या है कि मैंने तो इसलिए लड़के को चपत लगाई कि लड़का गलत संगति में न पड़े, पढ़ लिख ले..। तब तक गधे का बाप शेर की तरह दहाड़ेगा.. चौप! जानते नहीं हो! मैनेजर से कह कर नौकरी से निकलवा दुंगा!!! अब तदर्थ या संविदा पर नियुक्त वित्तविहीन अध्यापक के पास इतनी हिम्मत कहां!  वह तो नौकरी जाने के भय से गधे को भी बाप कहेगा। 

इधर बाबूजी ने लड़के को थप्पड़ लगाया तो लड़का जोर से चीखा... मम्मी ssss और बाबूजी की सिट्टी पिट्टी गुम!  देर तक मम्मी से सॉरी सॉरी बोलते नजर आएंगे। लड़का पापा को तिरछी निगाहों से ताकेगा..हो गया?  फिर बुलाऊं मम्मी को?  

न तो पहले घरेलू हिंसा का कानून था, न मध्यम वर्गीय घरों के लड़के अंग्रेजी कान्वेंट स्कूल में पढ़ पाते थे। वह समय अभी ज्यादा दूर नहीं गया जब माफी वही मांगता था जो गलती करता था। उसे माफी नहीं मांगनी पड़ती थी जो गलत काम करने से रोकता है। 

अब ऐसे हालात में सज्जन पुरुष माफी नहीं मांगेगा तो और क्या करेगा? अपनी यह जो पीढ़ी है न? बहुत सताई हुई पीढ़ी है। जब तक बच्चे थे स्कूल में गुरुजी और घर में बाउजी तोड़ते रहे। जब बड़े हुए तो बैल मरकहे हो गए और गधों के सींग जम गए!

नेता जी के माफी मांगने से आप अधिक उत्साहित हैं तो यह आपकी भूल है। कुछ लोग गलती इसीलिए करते हैं कि फंस गए तो माफी मांग लेंगे। हमारे देश में सज्जनों और उदार हृदय वालों की कोई कमी भी नहीं। जहां देखो, वहीं दयालू गुरु मिल जाते हैं। यदि कानून का रटा रटाया निश्चित नियम कानून न होता तो क्या पता वर्षों बाद किसी घोटाले में फंसे नेता जी को जज साहेब दया कर के छोड़ ही दें! बुड्ढा बेचारा! अब कहां जाएगा जेल!  जनता का वश चले तो शायद माफी मिल ही जाय! बड़ी दयालु और सहिष्णु है भारत की जनता। नेता जी भी जनता की इस कमजोरी को ताड़ चुके हैं। जब उन्हें टीवी में हाई लाइट होने का मन करता है तड़ से ऐसा बयान जारी करते हैं कि विरोधी गुट शोर मचाने लगता है... तुमने गलती करी, बहुत बड़ी गलती करी। हमारी मान हानी हुई। तुम्हारे खिलाफ मानहानी का मुकदमा करेंगे! पानी जहां सर के ऊपर गया, नेताजी झुककर माफी मांग लेते हैं..मेरे कहने का मतलब यह नहीं था, मेरे बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया फिर भी किसी को दुःख पहुंचा हो तो हमको माफी दई दो! 

एक झटके में सबका भला हो गया। जिसकी मान हानी हुई थी व वह अब मान लाभ की स्थिति में पहुंच गया! जो नेता जी भीड़ में गुम हो चुके थे फिर से अखबार और टी वी चैनलों पर चमकने लगे। समाचार चैनलों को अच्छी खासी टी आर पी मिल गई। देश की चिंता करने वालों को फेसबुक और वाट्स एप पर बहस का नया मुद्दा मिल गया। जुगलबंदी बना कर व्यंग्य ठेलने वालों को एक नया विषय मिल गया। एक नेता जी ने गलती क्या करी मानों देश की सोई चेतना ही जाग गई!  

अब किसी को मेरी किसी बात पर कोई ठेस पहुंची हो तो .. सॉरी! माफी मांगने का यह अंग्रेजी तरीका मुझे अतिशय प्रिय है। माफी भी मांग लो और गिल्टी फील भी न हो! और इसके बाद कोई फिर कुछ कहे तो जोर से भिड़ लो..बोला न सॉरी! अब जान लोगे क्या?

3.3.18

वेलेंटाइन

खत में गुलाब क्या आया! बिचारे कवि जी की खाट खड़ी, बिस्तरा गोल हो गया। उसने लाख अपने श्री मुख से अपनी श्रीमती को समझाने का प्रयास किया कि आज वेलेंटाइन डे है। फेसबुक में एक प्रेम कविता पोस्ट करी थी। बहुत सी लड़कियों को पसंद आया था। किसी बुढढे कवि मित्र को हृदयाघात लगा है और उसने मारे जलन के जानबूझ कर शरारतन गुलाब भेजा है कि मेरा घर में ही जीना हराम हो जाय लेकिन श्रीमती जी को नहीं यकीन करना था, नहीं किया।

सच सच बताओ ये सोनम कौन है? मैंने तुम्हारी जेब में एक बार सोनम बेवफा है वाला एक दस रुपए का नोट देखा था। कितनी मुश्किल हुई थी उसे चलाकर नंदू बनिया की दुकान से आजवाइन खरीदने में। सब नोट देख कर हंसने लगे थे और मैंने घर आ कर मारे गुस्से के दाल में जीरा के बदले आजवाइन का तड़का दे दिया था। आज कलमुंही ने लिफाफे में गुलाब भेजा है। देखो! लाल स्याही से लिखा है..सोनम।

तुमने खत पढ़ा? क्या लिखा था?

मैंने लाल मिर्चे के साथ उसे आग में झोंक कर आज सुबह ही मुन्ने की नज़र उतारी है। और तो याद नहीं लेकिन बेशर्म ने कविता की दो लाइन लिखी थी..

आन क लागे सोन चिरैया, आपन लागे डाइन! 
बिसरल बसंत अब त राजा आयल वेलेंटाइन।


तुम लोगों को अपनी पत्नी डाइन लगती है? दूसरे की सोन चिरैया? आज इस घर में या तुम रहोगे या मैं।
अरे! यह तो बेचैन आत्मा की कविता है। नेट में पूरी कविता मौजूद है। तुम्हें यकीन न हो तो खुद देख सकती हो। यह जरूर उसी का काम है।

कवि जी को खुद को निर्दोष साबित करने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े। मुश्किल से उनकी भोली भाली श्रीमती जी का गुस्सा शांत हुआ होगा और उनकी खड़ी खाट फिर बिछ पाई।

वेलेंटाइन ने नई पीढ़ी को जितना मौज, बेरोजगारों को जितने रोजगार दिए और घर बसाने में जितना योगदान दिया उतना ही घर उजाड़ने में सहयोगी भूमिका भी अदा करी है। उत्सव धर्मी भारतीयों को भले संत वेलेंटाइन के मानवीय प्रेम की कथा का ज्ञान न हुआ हो प्रेम के इजहार के इस नवीन थ्योरी को अपनाने में वर्ष भर की देरी नहीं करी। यह परंपरा त्योहार की तरह भारत में ऐसे मनाया जाने लगा जैसे पहले से तपे तपाए बुरादे में थोड़ी चिंगारी की जरूरत हो और पूरा ढेर धू धू कर जलने लगे। आग पहले से लगी हो बस थोड़ा नकली घी डाल कर स्वाहा! बोलने की देर हो।

दिल तो हमारा भी धड़कता था और भीगा बदन पहले भी जलता था। हमें नहीं पता था तो बस इतना नहीं पता था कि साल में एक दिन आता है जब हम 'इलू इलू' बोल सकते हैं। यही एक संकोच ने न जाने कितने लड़कों को अपनी वेलेंटाइन के घर जा कर उनके शादी में बरातियों के जूठे पत्तल भी उठाने और लड़की के बाप के सुर में सुर मिला कर 'बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले' गाने पर मजबूर किया। कितने लड़कों ने दुखी मन से राखी बंधवा ली और जीवन भर भाई धर्म का पालन किया। हमारी पीढ़ी के न जाने कितने दंत हीन मसूड़े वाले आज भी यह मानते हैं कि काश! यह त्योहार पहले आया होता।

दरअसल वेलेंटाइन और कुछ नहीं उच्छृंखल होने की सामाजिक मान्यता है। शराब पीने की सामाजिक मान्यता मिल जाय, प्रेम प्रदर्शन करने की सामाजिक मान्यता मिल जाय। लीव इन रिलेशनशिप के नाम पर साथ रहने और सेक्स करने की मान्यता मिल जाय तो फिर और क्या चाहिए? न सामाजिक जिम्मेदारी न और कोई झंझट फिर तो सभी यही कहना चाहेंगे.. जय हो वेलेंटाइन बाबा की।

28.1.18

बजट

सभी अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से बजट बनाते हैं। सरकार और व्यापारी साल भर का, आम आदमी महीने भर का और गरीब आदमी का बजट रोज बनता/बिगड़ता है। सरकारें घाटे का बजट बना कर भी विकास का घोड़ा दौड़ा सकती है लेकिन आम आदमी घाटे का बजट बनाकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है। आम आदमी को सीख दी जाती है कि जितनी चादर हो, उतना ही पैर फैलाओ लेकिन सरकारों को अधिकार होता है कि मनमर्जी पैर फैलाओ। चादर छोटी पड़े तो देश/विदेश जहां देखो वहीं चादर फैलाओ। आम आदमी दूसरों के आगे चादर फैलाते-फैलाते शर्म के मारे धरती पर गड़ने लगता है और जिस दिन चादर फट जाती है, आत्महत्या कर लेता है। गरीब के पास न आय न बजट। रोज कुआं खोदो, पानी पियो। न खोद पाओ, भूखे ही सो जाओ। गरीब माल्या बनकर, बैंक से कर्ज लेकर चादर ओढ़ते हुए विदेश नहीं भाग सकता।

बजट का आधार आय है। आय नहीं तो व्यय नहीं और बिना आय व्यय के बजट कैसा? बजट बनाने के लिए आपको मालूम होना होता है कि रुपया कहां से और कितना आएगा? तभी आप व्यय की भी सोच सकते हैं। जिसके पास आय नहीं वह क्या बजट बनाएगा? नंगा नहाएगा क्या, निचोड़ेगा क्या? पकौड़ी बेचना भी रोजगार है। पकौड़ी बेचने वाला भी बजट बनाता है लेकिन उसका बजट रोज बनता/बिगड़ता है। सरकार का बजट बिगड़ने से सरकार भूखी नहीं सोती, घाटे के बजट से काम चला लेती है लेकिन जिस दिन पकौड़ी वाले का बजट बिगड़ जाता है उसे भूखे ही सोना पड़ता है। हम अपने बच्चों के लिए उस रोजगार का ख्वाब देखते हैं जिसमें उन्हें कभी भूखा न सोना पड़े। सरकार कहती है रोजगार दे दिया न? बस! अब जियादे चूं चपड़ मत करो। जब सरकार की दलील को मीडिया समझ गई तो आम आदमी की क्या औकात है! हां जी, हां जी कहना है।

जाड़े के समय एक दिन मैंने लोहे के घर में एक आदमी को चादर ओढ़ने का प्रयास करते हुए देखा था। पैर ढकता तो मुंह खुला रह जाता, मुंह ढंकता तो पैर खुला रह जाता। जाड़ा इतना कि पैर और मुंह दोनो ढकना जरूरी। अब वह क्या करे? कब तक पैर सिकोड़ता रहे? उसने एक उपाय निकाला। जूता मोजा पहन कर, मुंह ढक कर सो गया। चादर का एक सिरा मुंह को ढके था, दूसरा मोजे तक फैला हुआ था। आम आदमी ऐसे ही बजट बनाता है।

सरकार की आय का मुख्य श्रोत तमाम प्रकार के कर होते हैं जो भिखारी से लेकर अरबपति तक को देने होते हैं। किसी से सीधे टैक्स लिया जाता है किसी से घुमाकर। जो सीधे दे ही नहीं सकता उससे घुमाकर लिया जाता है। जो सीधे दे सकता है उससे सीधे भी लिया जाता है, घुमाकर भी। हर प्रकार से वसूली के बाद सरकार के पास जनता के विकास के लिए खर्च करने की ताकत आ जाती है। अखबार में पूरा हिसाब ग्राफ देकर समझा दिया जाता है। रुपया आए कहां से? रुपया जाए तक? सब लिख्खा होता है। जो समझ में न आए वह घाटा होता है और यह घाटे की भरपाई कैसे होगी आम जनता यही नहीं समझ पाती। काश कि हम भी अपने घर में घाटे का बजट पेश कर खुश हो पाते!

सरकारें पांच साल के लिए चुनी जाती हैं इसलिए पांच बार बजट बनाती है। पहले साल उसे चुनाव की चिंता नहीं होती है इसलिए कठोर बजट बनाती है। जनता नाराज हो तो हो.. ठेंगे से! टैक्स के रूप में इत्ता वसूल लो कि पिछली सरकार ने ठीक चुनाव से पहले जो जाते जाते मुफ्त गिफ्ट वितरण और कर्ज माफी वाला मनमोहक बजट किया था और जिसके कारण गाड़ी पटरी से उतर गई थी वह संभल जाय। फिर हर साल धीरे धीरे अपनी महाजनी सूरत को मनमोहक बनाती जाती है। चुनाव के साल तो धन ऐसे लुटाती है जैसे कहीं से कोई गड़ा खजाना हाथ लग गया हो। अर्थशास्त्रियों ने चेताया तो टका सा जवाब.. सरकार में फिर चुन कर आने दो सब घाटा पहली बजट में ही पूरा कर लेंगे। मतलब वही काम करती है जो पिछली सरकार ने किया था मगर इसका अंदाज अलग होता है। नई सरकार नए अंदाज में आम आदमी की पूंछ उठाती है। जनता नई सरकार के जमाने में नए अंदाज में, पहले धीरे धीरे फिर फुग्गा फाड़कर रोती है।

देश का कोई आदमी ऐसा नहीं है जो टैक्स न देता हो। भिखारी भीख मांग कर एक किलो आंटा खरीदता है तो उस आंटे पर भी टैक्स चुका रहा होता है। मजदूर अपनी मजदूरी से आयकर दे रहा होता है। शेष बचे धन की हर खरीददारी में अप्रत्यक्ष कर दे ही रहा होता है। किसान लाभ कमाता ही नहीं तो सीधे कर कैसे देता! वह तो अन्नदाता शब्द सुनकर ही अपने सभी गम भूल जाता है। आम आदमी का काम सरकार को तमाम प्रकार के कर देकर बजट बनाने में सहयोग करना है। आम आदमी क्या बजट बनाएगा! बजट बनाना तो बड़े लोगों का काम है। 

20.1.18

लोकतंत्र का बसंत

काशी में मराठी भाषा का एक कथन मुहावरे की तरह प्रयोग होता रहा है.. "काशी मधे दोन पण्डित, मी अन माझा भाऊ! अनखिन सगड़े शूंठया मांसह।" जजमान को लुभाने के लिए कोई पण्डित कहता है.. काशी में दो ही पण्डित हैं, एक हम और दूसरा हमारा भाई। बाकी सभी मूर्ख मानव हैं। ऐसे ही हमारे देश के लोकतंत्र में भी दो संत पाए जाते हैं। एक अ संत दूसरा ब संत। बाकी रही विद्वान जनता जिनकी गलतियों के कारण ही दोनों संत निरंतर मोटाते रहते हैं। इसे यूं समझा जाय कि लोकतंत्र एक बड़ा सा घर है जिसमें अ संत और ब संत दो भाई रहते हैं। जहां असंत है, वहीं बसंत है। जनता जजमान की तरह कभी इनसे छली जाती है कभी उनसे।

जनता अपना काम लेकर कभी अ संत के पास जाती है कभी ब संत के पास। अ संत के पास जाने वाली जनता समझती है कि अ संत ही उसके घर में बसंत ला सकता है। ब संत के पास जाने वाली जनता समझती है कि अ संत तो इसका भाई ही है, वह मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा ब संत ने चाहा तो मेरे घर भी बसंत आ ही जाएगा।

भारत का लोकतंत्र एक बहुत बड़ा घर है। इसके चार बड़े बड़े खंबे हैं। ये खंबे इतने मजबूत हैं कि अ संत और ब संत के हरदम बसंत मनाने के बावजूद भी ज्यों का त्यों मजबूत बना हुए हैं। कभी कोई खंबा अ संत की कारगुज़ारियों से कराहता है, कभी कोई खंबा ब संत की कारगुज़ारियों से लेकिन मुश्किल वक़्त में बाकियों के सहारे चारों खंबे मजबूती से लोकतंत्र को टिकाए रखते हैं।

पहले हमारे देश में बहुत से संत रहते थे। कोई अ संत और ब संत नहीं था। भारत का लोकतंत्र उन्हीं संतों की तपस्या का परिणाम है। अब इसमें संत के बेटों अ संत और ब संत का राज चलता है। बारी बारी से दोनों बसंत मनाते हैं और जनता कभी इनकी जय जयकार करती है, कभी उनकी।

प्रकृति का बसंत हर साल आता है। वीरों का बसंत तब आता है जब उन्हें युद्ध के मैदान में जौहर दिखाने का अवसर मिलता है। विद्यार्थी तब बसंत मनाते हैं जब परीक्षा में पास होते हैं। लेखकों का बसंत उनकी नई पुस्तक के लोकार्पण के दिन होता है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का बसंत पॉच साल में एक बार आता है जब देश में चुनाव होते हैं। प्रकृति का बसंत तो पतझड़ के बाद आता है मगर लोकतंत्र में पतझड़ और बसंत दोनो साथ साथ आते हैं। जो पार्टी हारती है उसके पतझड़ के दिन शुरू हो जाते हैं, जो जीत जाती है उनके पत्ते लहलहाने लगते हैं। इस प्रक्रिया को संत और असंत दोनों लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत मानते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिस देश में चुनाव ही नहीं होते उस देश का राजा तानाशाह हो सकता है लेकिन लोकतंत्र में भी हारने वाला, शासक दल को तानाशाह घोषित करवाने में लगा रहता है। लोकतंत्र के चारों खंबों पर बारी बारी से पोस्टर चस्पा किए जाते हैं.. लोकतंत्र खतरे में है!

भारत का लोकतंत्र जितना ताकतवर माना जाता है उतना ही कमजोर भी होता है। जरा सी कुछ बात हुई कि खतरे में पड़ जाता है। लोकतंत्र न हुआ भारतीयों का कमजोर अंग हो गया जो हर बात पर फटने लगता है! लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का ज्ञान विपक्ष को ही होता है। सत्ता पक्ष तो हमेशा सुदृढ़ लोकतंत्र का ढिंढोरा ही पीटता पाया जाता है। सत्ता पक्ष लोकतंत्र का बसंतोत्सव मनाता है तो विपक्ष लोकतंत्र के पतझड़ की तरह झड़ता रहता है। लोकतंत्र के चारों खंबे जब जब अपना दुखड़ा रोते हैं, विपक्ष तपाक से उनके सुर में सुर मिलाते हुए जनता को भड़काता फिरता है.. लोकतंत्र खतरे में है! विपक्ष की आदत दूसरे के फटे में टांग अड़ाने की है और सत्ता पक्ष सूई धागा लेकर आम जनता के फटे को सीने के लिए दौड़ता भागता दिखने की कोशिश करता है।

विपक्ष का मजबूत होना अच्छे लोकतंत्र की निशानी माना जाता है। अभी भारत में विपक्ष कमजोर है शायद इसीलिए लोकतंत्र बार बार खतरे में पड़ रहा है। विपक्ष तगड़ा हुआ तो सत्ता कमजोर पड़ने लगती है। चुनाव के समय अपने दम पर सरकार बना लेने का दावा करने वाली पार्टियां गणित कमजोर पड़ने पर विपक्षी पार्टियों को तोड़ती मेल जोल करती दिखने लगती है। सरकार बनने के बाद शेष बची हुई पार्टियां विपक्ष में आ जाती हैं और आपस में मिलकर तगड़ा विपक्ष बनने का प्रयास करती हैं। बड़े दंभ से कहती हैं.. आपस में मेल जोल न होई त चली का?

आम आदमी जिसकी पहुंच रोटी, कपड़ा और मकान के आगे सुबह के अखबार/शाम के टीवी तक है वे तो 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन ही लोकतंत्र का बसंतोत्सव मना कर खुश हो लेते हैं। हम भी न अ संत हैं न ब संत। थोड़ा लिखना पढ़ना जान गए हैं। लोकतंत्र के बसंतोत्सव से दो चार फ़ूल मिल गए इसी में खुश हैं। हम भी बस यही मंगल कामना कर सकते हैं कि हमारे महान संतों की घनघोर तपस्या से जो यह लोकतंत्र की बगिया खिली है इसमें से एकाध फूल उन अभागों को भी मिले जिन्हे आजतक पतझड़ और कांटों के सिवा कुछ भी नसीब नहीं हुआ।

14.1.18

पुस्तक मेला और साहित्यकार

एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक आए थे। दर्शकों के अलावा दोनों जगह मालिकों की भीड़ थी। कहीं पशु मालिक कहीं पुस्तक मालिक। जैसे पुस्तकों के मालिक केवल लेखक नहीं, प्रकाशक भी होते हैं वैसे ही पशुओं के मालिक भी अपने अपने पशुओं को एक स्थान पर सुपुर्द किए दे रहे जो उन्हें सजा कर बेच रहा था। जैसे पशु मेले में अपना कोई पशु नहीं था वैसे ही पुस्तक मेले में भी अपनी लिखी कोई पुस्तक नहीं थी। दोनो मेले में एक ही प्रश्न देर तक मेरा पीछा करते रहे..आपकी कहां है?

आदमी अपने अनुभवों से ही कुछ सीखता है। यदि आपका थोपड़ा पशु मालिक या लेखक की तरह हो तो आप को दोनो ही मेले में नहीं जाना चाहिए। पशु मेले में जाएं तो आपके हाथ में लंबा पगहा हो और पीछे कोई दुधारू गाय लचक लचक कर चल रही हो। बिना पशु वाले किसान की पशु मेले में और बिना पुस्तक वाले लेखक की पुस्तक मेले में कोई इज्जत नहीं होती। पुस्तक मेले में तब तक न जाएं जब तक आपकी कोई पुस्तक प्रकाशित न हो चुकी हो। बिना अपनी पुस्तक लिए गए तो फिर आप दुकान-दुकान घूम कर पुस्तक खरीदते ही रह जाओगे, बेचने का सुख नहीं मिलेगा।

ईश्वर जानता है कि जो सुख ज्ञान देने में है वह लेने में कत्तई नहीं है। जेब खाली कर ज्ञान वही खरीद सकता है जिसका पेट भरा हुआ हो और घर में खजाना गड़ा हुआ हो। ज्ञान तो धीरे से चुरा लेने की चीज है। लाइब्रेरी में गए और नोट बना लिए। एक पुस्तक इशू कराए दूसरी दबा कर निकल लिए। पढ़ने लिखने वाले चेहरे से शरीफ दिखते हैं इसलिए इनकी चोरी कम पकड़ में आ पाती है। धरा भी गए तो पकड़ने वाले भी पढ़ने लिखने वाले होते हैं, जल्दी से माफी मिल जाती है। अब एक मल्लाह, दूसरे मल्लाह से क्या पार उतरवाई लेगा? लेखक बिरादरी राजनेताओं की तरह कृतघ्न थोड़ी न होती है कि मौका पाते ही विरोधियों के पीछे सी.बी.आई छोड़ दे! लेखक की चोरी पकड़ी भी गई तो भले उपेक्षा का शिकार हो जाय, सजा नहीं पाता।

पुस्तक मेले में घूमने आए लोग सभी स्टाल में जाकर सभी प्रकार की पुस्तकें ऐसे पलटते हैं जैसे सत्य की खोज में निकला फकीर ज्ञान तलाशने के लिए जंगल जंगल भटक रहा हो ! अंत में खरीदते वही दो चार पुस्तकें हैं जिनके लेखकों के नाम अपने पाठ्य पुस्तक से उन्होंने सुन रखे हैं। सब पलटने के बाद मासूमियत से पूछते हैं.. मुंशी प्रेम चंद की गबन है? दुकानदार भी आदतन उस कोने की तरफ इशारा करता है जिधर उसकी टाइप के लोग अधिक आये हैं और जहाँ अधिक भीड़ है। इस प्रश्न पर दुकानदार अधिक झल्लाते पाए जाते हैं.. दो बैलों की जोड़ी है? गनीमत है यह नहीं कहते..दो बैलों की जोड़ी लेनी हो तो पशु मेले में जाओ, यहां क्यों घूम रहे हो?

पहले लेखक बनने और एक पुस्तक छपवाने के लिए भूखे पेट रहकर किसी बड़े साहित्यकार के दरबार में वर्षों खुद को तपाना और लेखक सिद्ध करना पड़ता था। प्रतिष्ठित साहित्यकार का आशीर्वाद मिलने के बाद ही कोई प्रकाशक किसी नए लेखक की कोई पुस्तक छापने की हिम्मत जुटा पाता था। अंतर्जाल के प्रचलन और आभासी दुनियां ने इस पूरे पटल को ही बदल कर रख दिया है। सभी की डायरियां अब ब्लॉग/फेसबुक में लिखी जाने लगी हैं। जेब में पैसा हो, प्रशंसक हों तो आप सीधे प्रकाशक से बात कर सकते हैं.. कित्ता लोगे? और कित्ती दोगे? पुस्तक न बिकनी है न रायल्टी मिलनी है. यह बात आप भी जानते हैं, प्रकाशक भी। एकमुश्त सौदा तय हो जाता है। इत्ती लेंगे और प्रकाशन के बाद इत्ती पुस्तकें देंगे। आपको लेखक बन ख्याति अर्जित करनी है, अगले को प्रकाशक बन पैसा कमाना है। ख्याति और पैसे के इसी सुखद संजोग ने पाठक शून्यता के हाहाकारी जुग में भी चमत्कारिक ढ़ंग से नए लेखकों और प्रकाशकों की नई पौध का सृजन किया है। पुस्तक मेला और कुछ नहीं छुट्टे शब्दों की भीड़ है जो पशुओं की तरह अपने अपने मालिकों के साथ पुस्तक रूपी पगहे में बंधी कुछ पाने की लालसा लिए एक स्थान पर जमा होती है। इस भीड़ में कोई निराला, कोई धूमिल कोई गालिब अपने झोले में अपनी पांडुलिपी दबाए भूखे पेट, प्रकाशक-प्रकाशक घूम रहा हो तो भला उसे कौन पहचानेगा? यह दौर लेखक बन कर नाम कमाने का है तो यह दौर अच्छे लेखकों के बिना प्रकाशित हुए गुम हो जाने का भी है।

17.12.17

छेड़छाड़

छेड़छाड़ करने वाले गंदे लड़कों ने प्यार करने वालों का जीना हराम कर दिया है. इतने सख्त क़ानून बनवा दिए कि लड़कों का लड़कियों को लाइन मारना भी मुश्किल हो गया है. पता नहीं कौन किस बात का बुरा मान जाय और शिकायत कर दे! फिलिम में नायक द्वारा नायिका को छेड़ने, छेड़ते-छेड़ते पटा लेने और अंत में विलेन से दो-दो हाथ करने के बाद दोनों के मिलन के सुखांत देख-देख हम बड़े हुए हैं. लड़की का भाई, पिताजी बाद में रिश्तेदार पहले तो हमें विलेन ही लगते थे. अब दृश्य बदल चुके हैं. पति को पत्नी से भी शराफत से बात करनी पड़ती है. छेड़छाड़ करने का मूल अधिकार इधर से उधर सरक गया प्रतीत होता है. कोई गोपी सहेलियों के साथ गर्व से गाना गाये..मोहें पनघट पे नन्द लाल छेड़ गयो रे..तब तो ठीक. लेकिन यदि उसने दुखी होकर यही गाना गाया तो कान्हा गए तीन साल के लिए जेल में.!

जब  युवती या महिला के प्रति अश्लील इशारों, टिप्पणियों, गाने या कविता पाठ करना भी अपराध की श्रेणी में आ गया है तो छेड़छाड़ करने वालों के साथ व्यंग्यकारों को इस विषय में लिखने से पहले क़ानून की धाराओं का अध्ययन कर लेना चाहिए. यह कहने से बचा नहीं जा सकेगा कि हमको तो फलाने ने लिखने के लिए चने के झाड़ पर चढ़ाया और हम चढ़ गए. गिरने पर हड्डी तो अपनी ही टूटनी है. चढ़ाने वाला तो यह कह कर निकल जाएगा कि हमने तो ऐसा नहीं कहा था.

पहले की बात अलग थी. स्कूल, कॉलेज से होकर विश्व विद्यायल पहुँचने के बाद ही हम देश भक्ति के फिलिम देखने के बाद बॉबी जैसी एकाध फिलिम देख पाते थे. शोले की बसन्ती जब तक ड्रीम गर्ल बनी विश्व विद्यालय से निकल कर घर/बाहर के आचार संहिता के घेरे में कैद हो गए. विश्व विद्यालय में लड़कों की तुलना में लड़कियां भी इतनी कम होती थीं कि अपने जैसे फटेहाल साइकिल सवार को कौन घास डाले? कहने का मतलब छिड़ने या छेड़ने के अवसर बेहद कम होते थे. आज के दौर के बुजुर्गों पर जो कामुक होने के आरोप लगते हैं कहीं यह इन्ही कुंठा ग्रस्त जीवन शैली अभिशाप तो नहीं? यह शोध का विषय है. इस पर समाज शास्त्री चिंतन मनन करें. 

अब तो पैदा होते ही हाथों में स्मार्ट फोन लेकर बड़े हो रहे हैं बच्चे. स्कूल, कॉलेज से विश्विद्यालय पहुंचते-पहुंचते कितने बॉय फ्रेंड/गर्लफ्रेड और कितने गठबंधन/ब्रेक अप! जितने प्यार करने वाले उतने विलेन. जितने विलेन उतने शोषण. इधर नहीं मिला तो उधर हाथ मारो. लड़कियों के स्कूल के बाहर लड़कों की भीड़. जब लड़कियां पढ़ेंगी तो जाहिर है नौकरी भी करेंगी. कामकाजी महिलाओं की सख्या भी पढेगी. शोषण करने की पुरुषवादी मानसिकता बदलते-बदलते बदलेगी. पीढी दर पीढी सुधार होगा मगर यह जो दौर है वह खतरनाक है. 

सरकार को सख्त क़ानून तो बनाना ही पड़ेगा. अब क़ानून को लागू करने वालों के लिए समस्या यह जान पाना है  कि कौन लड़की पार्क में अपनी मर्जी से राजी खुशी छिड़ी जाने के लिए आई है और कौन बहला फुसला कर लायी गयी है? शादीशुदा लड़कियां भी अब गाढ़ा सिन्दूर या घूंघट डाल कर तो आती नहीं कि पुलिस देखे और झट से पहचान ले कि यह तो विवाहित जोड़े हैं. इनके मौज मस्ती में छेड़छाड़ करी तो नौकरी गई. कौन जोड़ा कितना ताकतवर है?  कहीं ऐसा न हो कि इधर पकड़े, उधर फोन आ जाय! कोई सीधा सादा कमजोर हैसियत का जोड़ा मिले तो उसे पकड़ कर बंद किया जा सकता है. अब पुलिस भी उन्हीं मामलों में हाथ डाल सकती है जब कोई महिला शिकायत करे. आम आदमी के घरों की लड़कियां तो तभी शिकायत करेंगी जब पानी सर से ऊपर बहने लगे. बुरी नीयत से केवल टच करने, छू जाने या मात्र अश्लील बातों पर शिकायत करने वाली महिलाऐं आम नहीं कोई खास ही होगी. अब सरकार क्या करे? कानून बना दिया. अब? लागू कैसे करे? 

छेड़छाड़ रोकना मात्र सरकार का काम नहीं है. इसके लिए समाज को भी मानसिक रूप से तैयार होना होगा. यह संभव है कि सरकारें बलात्कारी को यथाशीघ्र कड़ी से कड़ी सजा दे जिससे कोई बलात्कार करने की सोच भी न सके लेकिन मात्र सरकार के भरोसे छेड़छाड़ रुकने से रहा. जितने प्यार करने वाले बढ़ेंगे, उतने विलेन भी पैदा होंगे और उतनी छेड़छाड़  की घटनाएँ भी बढ़ेगी. समाज में बदतमीजी रुक जाए तो समझो गंगा नहा लिए. प्यार करना तो प्राणी मात्र का प्राकृतिक स्वभाव है, यह कैसे रुकेगा? और यह रुकना भी नहीं चाहिए. वैसे तो यह मां-बाप के लिए भी कठिन हो चला है लेकिन फिर भी अब लड़कियों के साथ घर के लड़कों को भी नसीहत देने की जरूरत है. जब तक आपने उनके हाथों में स्मार्ट फोन नहीं पकड़ाया है शायद आपके दबाव में आ ही जांय! और बात मान लें कि हमें किसी लडकी से बदतमीजी नहीं करनी है. मतलब वो काम नहीं करना है जो करने से लडकी मना कर दे. 

जमाना बदल रहा है. यह बदलाव का दंश है. इस दंश से बचने के लिए सभी को मिल बैठ कर सोचना पड़ेगा. समाज को सही दिसा में ले चलने की जिम्मेदारी जितनी घर के अभिभावकों की है उतना ही आज के युवाओं की भी है. आज नहीं तो कल वे भी बड़े होंगे और उनके बोए बबूल के कांटे उन्हें ही अधिक चुभेंगे. अपने राम का क्या है! जैसे वो दौर देखे वैसे ये दौर भी झेल लेंगे. अब आज के दौर में यह तय कर पाना मुश्किल है कि सुपर्नखा छेड़ी गई थी कि राम/लक्ष्मण को छेड़ने पर उसे उसके कर्मों का फल मिला था! जय राम जी की.

10.12.17

मेहमान नवाजी

मेहमान नवाजी शब्द में वो मजा नहीं है जो अतिथि सत्कार में है.  मेहमान का स्वागत तो मोदी जी भी कर सकते  है,अतिथि का कर के दिखाएँ तो जाने! मेहमान वो जो बाकायदा प्रोटोकाल दे कर आये. फलां तारीख को, फलां गाडी से, फलां समय आयेंगे. ये घूमना है, यह काम है और इतने बजे लौट जायेंगे. सब कुछ पूर्व निर्धारित. इसके उलट बिना तिथि बताये, छुट्टी और आपकी लोकेशन ताड़ कर जो सीधे आपके घर की काल बेल बजा दे वह  अतिथि कहलाता है. सब काम छोड़कर इस अकस्मात टपक पड़े अतिथि का  स्वागत करने में जो बहादुरी है वह प्रोटोकाल बता कर आने वाले अतिथि में कहाँ! सरल शब्दों में कहें तो भारत आने वाली ट्रम्प की बिटिया को आप मेहमान और नवाज शरीफ को बधाई देने अचानक लाहौर पहुंचे हमारेआदरणीय प्रधान मंत्री जी को आप अतिथि कह सकते हैं.

अतिथि तो हमारे पिताजी के समय आते थे. जब मोबाइल, नेट वर्क नहीं था. अब बिना तिथि बताये अतिथि बन कर आना या जाना बैड मैनर कहलाता है. अब मेहमान ही आते हैं. पहले आपसे फेसबुक में चैट करेंगे, आपकी सुविधा का ख्याल करेंगे, अपना पूरा प्रोटोकाल देंगे और फिर यदि आपकी इच्छा हो तभी ना नुकुर करते हुए मेहमान बनना स्वीकार करेंगे. इस पूर्व निर्धारित प्रोग्राम में सबसे पहले जो चीज है वह है रोमांच! यही सिरे से गायब हो जाता है. लेखक के मन में अब 'तू कब जाएगा अतिथि?' जैसे भाव आते ही नहीं तो वह इस विषय पर क्या खा कर व्यंग्य लिखेगा? लिखेगा तो कोरी गप्प मानी जायेगी. अब कोई शरद जोशी जैसा कैलेंडर की तारीखें दिखाकर प्राण फाडू ढंग से नहीं पूछ सकता..तुम कब जाओगे अतिथि? 

अव्वल तो मेहमान आने ही नहीं पाते. उनको न आने देने के लिए आपके पास पहले से सौ बहाने मौजूद रहते हैं. अब आप गैरतमंद हुए, वह बहुत अजीज हुआ और मुसीबत आ ही गई तो जाने की तारिख और समय पहले से  निर्धारित रहती है. मेहमान का स्वागत पान पराग से करना है या खैनी रगड़ कर चूना लगाना है सब पहले से ही तय रहता है. 

यह तो मानी जानी बात है कि जब मुसीबत आती है तो सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ जाते हैं. इधर आप ने हिम्मत करके मेहमान को आने का न्योता दिया उधर श्रीमती ने मायके जाने का निर्णय सुना दिया!...'आप स्वागत करिए मित्र का, हम तो चले अम्मा से मिलने! कई दिनों से बीमार चल रही हैं!!! चार दिन हम तो नहीं झेल सकते. अब आप चाहें तो आने वाले मेहमान को सास की बीमारी के कारण अचानक ससुराली जाने की आवश्यकता बता कर आने से रोक सकते हैं या आप में दम हो तो अकेले के दम पर मेहमान का स्वागत कर सकते हैं. 

आप नेता है या अफसर हैं तो आपके लिए प्रोटोकाल निभाना कोई कठिन काम नहीं है. सारी मेहनत और खर्च आपके कार्यकर्ता या अधीनस्थ कर्मचारी करेंगे आपको तो सिर्फ अपना कीमती समय निकल कर मेहमान से गप्प लड़ाना है. नैय्या पर बैठकर गंगा आरती देखनी है या मुग़ल गार्डन में झूला झूलना है. मेहमान नवाजी में कोई कमी रही तो सारा दोष कर्मचारियों पर और सब अच्छा रहा तो क्रेडिट आपकी! आपके कुशल संचालन में क्या बेहतरीन ट्रिप रही!!!  

मेहमान नवाजी बड़े लोगों के लिए मौज मस्ती, आम लोगों के लिए मुसीबत का सबब और गरीबों के लिए किस्मत की बात होती है. आम आदमी के पूरे माह का बजट बिगड़ जाता है लेकिन अतिथि के आने से गरीब के भाग जाग जाते हैं ! गरीब अतिथि को एक भेली गुड़, ठंडा पानी और पूड़ी-सब्जी, दाल-भात खिलाकर इतना प्रसन्न होता है कि आज उसके घर भगवान पधारे! मेहमान के जाने पर उसके साथ पत्नी और बच्चे भी दुखी होते हैं और जाते समय हाथ जोड़ कर दिल से पूछते हैं..अब कब आयेंगे? हमने मोबाइल खरीद लिया है, बता कर आते तो रजाई भी मंगा लेते. आपको ठंडी भी नहीं लगती. खैर कोई बात नहीं..जल्दी आइयेगा. मुनौवां को छोड़ दीजिये एक दो महीने के लिए यहाँ. बच्चों के साथ खूब हिल मिल गया है. हमारी पत्नी को अम्मा कहता है. 

मेहमान नवाजी का लुत्फ लेना है तो किसी गरीब के घर प्रेम की गठरी कंधे पर लादे, खूब समय निकल कर इत्मीनान से, बिना किसी प्रोटोकाल के अतिथि बन कर जाइये. वैसे अब कोई किसी के घर प्रेम से सिर्फ मिलने के उद्देश्य से नहीं जाता. किसी शहर में घूमने या काम से गया तो रहने का ठिकाना ढूँढता है और मित्र भी मेहमान का हिडेन एजेंडा भांप कर कन्नी काटता है. दोनों साथ-साथ नहीं चलता. प्रेम और स्वार्थ एक साथ कहाँ रह पाते हैं!  स्वार्थी की भेंट प्रेमी से कैसे हो सकती है? मेहमान नवाजी के महल तो प्रेम के बुनियाद पर टिके हैं.    


8.7.17

बरसात

उमड़-घुमड़ जब बादल गरजते हैं तो मनोवृत्ति के अनुरूप सभी के मन में अलग-अलग भाव जगते हैं। नर्तक के पैर थिरकने लगते हैं, गायक गुनगुनाने लगते हैं, शराबी शराब के लिए मचलने लगता है, शाबाबी शबाब के लिए तो कबाबी कबाब ढूँढने लगता है। सभी अपनी शक्ति के अनुरूप अपनी प्यास बुझाकर तृप्त और मगन रहते हैं लेकिन कवि? कवि एक बेचैन प्राणी होता है। किसी एक से उसकी प्यास नहीं बुझती। जिधर देखो उधर टाँग घुसाता नजर आता है। यत्र तत्र सर्वत्र बादलों के साथ मंडराना चाहता है। कवि बरसात पर कविता नहीं लिखता, खुद बरसात हुआ जाता है!

बरसात के मौसम में जब कवियों की याद आती है तो सबसे पहले उन कवियों की कविता याद आती है जिन्हें खुद कवि के मुखारविंद से सुनने का सौभाग्य मिला हो या फिर वो जिसे हम पाठ्य पुस्तक में पढ़ते, गुनते, गुनगुनाते हुए जवान हुए हों। जब बादल उमड़ते घुमड़ते हैं मुझे तो सबसे पहले स्व० कवि चकाचक बनारसी की कविता याद आती है...

बदरी के बदरा  पिछवउलस, सावन आयल का!
खटिया चौथी टांग उठउलस, सावन आयल का!!

बादल केवल घिर कर रह जाते हैं, ताकते रहो बरसते ही नहीं तो सुरेंद्र वाजपेयी के गीत की दर्द भरी एक लाइन याद आती है...

तुमने बादल को आते देखा होगा
हमने तो बादल को जाते देखा है!

बादल बरसते ही नहीं, सूखा पड़ जाता है। तो आधुनिक तुलसी दास कवि बावला किसान का दर्द सुनाते थे...
तोड़ि के पताल के आकाश में उछाल देबे
ढाल देबे पानी-पानी पूरा एक दान में।
रूठ जाये अदरा अ बदरा भी रूठ जाये
भदरा न लागे देब, खेत-खलिहान में!

कवि कहाँ नहीं पहुँचता! किसके खुशी से खुश, किसके दर्द से बेचैन नहीं होता! शायद इसीलिए कहा गया है..जहाँ न पहुँचे रवि, वहॉं पहुँचे कवि! धान रोपती महिलाओं को देखा तो गीत गाया, शराबी के पाँव फिसले तो गीत गाया। किसी ने टोका तो झल्लाया....

हम पथरे पे दूब उगाइब, तोरे बाप क का?
जामुन सालीग्राम बनाइब, तोरे बाप क का?
पूरे सावन बम बम बोलब, तोरे बाप क का?
तोता से मैना लड़वाइब, तोरे बाप क का?

रात भर उमड़ घुमड़ कर बादल बरसे। खेत मे सुबह पानी की एक बूंद नहीं दिखी! पीले मेंढक ने सर उठा कर बूढ़े झिंगुर से पूछा..

बादल गरजे
रात भर बारिश हुई
हमने देखा
तुमने देखा
सबने देखा
यार!
सब दिखता है
मगर जो दिखना चाहिये
वही नहीं दिखता
हमें कहीं वर्षा का जल नहीं दिखता?

बूढ़ा झिंगुर
हौले-हौले झिनझिनाते हुए बोला..

कुछ तो
बरगदी वृक्ष पी गये होंगे
कुछ
सापों के बिलों में घुस गया होगा
हमने
दो पायों को कहते सुना है
सरकारी अनुदान
चकाचक बरसता है
फटाफट सूख जाता है
वर्षा का जल भी
सरकारी अनुदान
हो गया होगा!

25.6.17

होश और सन्तुलन बना कर खाली पेट जो करो वही योग है।


आसन और प्राणायाम की शिक्षा तो बचपन में उपनयन संस्कार के साथ ही मिल गई थी लेकिन महत्व तब समझ मे आया जब बाबा को टी.वी. में सिखाते हुए देखा! उस समय बाबा को देख कर लगा था...हांय! ये तो हमारे गुरुजी पहले ही बता चुके हैं!!! इसमें नया क्या है?
अंहकार को चोट लगी। गलती का एहसास हुआ, बचपन मे मिले गुरु मंत्र का महत्व समझ में आया और यह भी लगा कि हाय! हम कितने बड़े ज्ञान को भुला बैठे थे!!! हमारी थाती याद दिलाने के लिए लिए हम बाबा की इज्जत करने लगे। कुछ नए आसन सामने आए और कुछ के नए नाम सामने आए। आसन करते-करते इज्जत करने लगे, इज्जत करते-करते कभी दन्त मंजन, कभी आंटा, कभी ये, कभी वो..खरीदने लगे। खरीदते-खरीदते सुनने लगे...और यहीं गड़बड़ हो गई! योग और प्रकृति में जहाँ व्यापार और राजनीति घुस जाती है, सब नीरस लगने लगने लगता है। आनन्द जाता रहा। योग से रोग दूर होता है मगर योग ही रोग लगने लगे तब क्या हो? गुरू को शिष्य के प्रति इतनी दया तो दिखानी पड़ेगी। शिष्य आपके चरण बड़ी श्रद्धा से छूता है, उससे लाभ कमाने की कोशिश करोगे तो वह आपको व्यापारी और आपकी शिक्षा को राजनीति समझ लेगा! कहना न होगा योग से मन फिर उचट गया।
इधर फिर योग का बाजार गरम है। विश्व ने इसके महत्व को समझा है. बनारस के गंगा घाट पर अवतरित हुए योग गुरुओं से विदेशी नागरिकों को योग सिखते हुए देखा जा सकता है। इतने आसन , इतने नाम और इतने योग गुरु हैं कि सब आसन याद रखना बड़ा कठिन है। इस परेशानी से बचने के लिए अब एक शार्ट कट फार्मूला अपना लिया है..होश और संतुलन बना कर खाली पेट जो करो वही योग है। होश मतलब चैतन्य। आती-जाती सांस का एहसास, हवा के स्पर्श का एहसास, हर आहट का एहसास..जितना हो सके चिंता और चिंतन से दूर रहकर होश में रहने का प्रयास। सन्तुलन मतलब शरीर के अंग-अंग का सन्तुलन. खड़े होकर हिलाओ, बैठ कर हिलाओ, लेट कर हिलाओ..आहिस्ता-आहिस्ता.. आराम-आराम से। पेट फुलाओ/पचकाओ, हाथ उठाओ/गिराओ, सांस लो/छोड़ दो। गरदन घुमाने का मन कर रहा है, गरदन घुमाओ. जितना दायें घुमाओ, उतना बाएं घुमाओ. गोल-गोल घुमाने का मन है? गोल-गोल घुमाओ. आँखों की पुतली को घुमाना है? घुमाओ. जीभ बाहर निकालना है? निकालो. ठहाके लगाना है? लगाओ. कमर हिलाना है? हिलाओ. थक गए तो लेट जाओ. लेटे-लेटे साइकिल चलाओ. जो मन करे, वो करो. बस संतुलन बनाए रखना. जबरदस्ती मत करना. जब तक आनद आता है अपने सभी अंग को हिलाते-डुलाते रहो. आहिस्ता-आहिस्ता, धीरे-धीरे... जितना इधर करो, उतना उधर करो। जो मर्जी आये वो करो..होश और सन्तुलन बना कर खाली पेट जो करो वही योग है।

19.2.17

हमारा बसन्त

न आम में बौर आया, न गेहूँ की बालियों ने बसन्ती हवा में चुम्मा-चुम्मी शुरू करी, न धूल उड़े शोखी से और न पत्ते ही झरे शाख से! अभी तो कोहरा टपकता है पात से। सुबह जब उठ कर ताला खोलने जाता हूँ गेट का तो टप-टप टपकते ओस को सुन लगता है कहीं बारिश तो नहीं हो रही! कहाँ है बसन्त? कवियों के बौराने से बसन्त नहीं आता। बसन्त आता है तो हवा गाने लगती है, कोयल कूकने लगती है और पत्थर भी बौराने लगते हैं। अभी तो चुनाव आया है। जो जीतेगा बसन्त तो सबसे पहले उसी के घर आयेगा। आम को तो बस बदलते दाम देखने हैं। अभी जो परिवर्तन के लिए उत्साहित हैं वे बाद में समझेंगे कि रहनुमा बदलने से दुश्वारियाँ नहीं जातीं। मालिक भेड़-बकरी का सदियों से कसाई है। कहॉ है बसन्त?

द़फ्तर जाते हुए रेल की पटरियों पर भागते लोहे के घर की खिड़की से बाहर देखता हूँ अरहर और सरसों के खेत पीले-पीले फूल! क्या यही बसंत है? भीतर सामने बैठी दो चोटियों वाली सांवली लड़की दरवाजे पर खड़े लड़कों की बातें सुनकर लज़ाते हुए हौले से मुस्कुरा देती है। लड़के कूदने की हद तक उछलते हुए शोर मचाते हैं! क्या यही बसंत है?

अपने वज़न से चौगुना बोझ उठाये भागती, लोहे के घर में चढ़कर देर तक हाँफती, प्रौढ़ महिला को अपनी सीट पर बिठाकर दरवाजे पर खड़े-खड़े सुर्ती रगड़ते मजदूर के चेहरे को चूमने लगती हैं सूरज की किरणें! क्या यही बसंत है?

अंधे भिखारी की डफ़ली पर जल्दी-जल्दी थिरकने लगती हैं उँगलियाँ। होठों से कुछ और तेज़ फूटने लगते हैं फागुन के गीत। झोली में जाता है, हथेली का सिक्का। क्या यही बसंत है?

द़फ्तर से लौटते हुए लोहे के घर से मुक्ति की प्रतीक्षा में टेसन-टेसन अंधेरे में झाँकते नेट पर दूसरे शहर की चाल जांचते मोबाइल में बच्चों का हालचाल लेते पत्नी को जल्दी आने का आश्वासन देते मंजिल पर पहुँचते ही अज़नबी की तरह साथियों से बिछड़ते, हर्ष से उछलते, थके-मादे कामगार। क्या यही बसंत है?

पहले बसन्त आता था और बसन्त के बाद फागुन आता था। बसन्त और फागुन के मिलन का सुखद परिणाम यह हुआ कि हमारे नौजवानों को प्यार सिखाने वेलेंटाइन आ गया! प्यार तो हम पहले भी करते थे मगर गुलाब पेश करते बहुत झिझकते थे। कितने फूल किताबों में मुर्झा गए। कितने शादी के बाद किताबों में दुश्मन के हाथ लगे। जब से वेलेन्टाइन की शुरुआत हुई गुलाब क्या खुल्लम खुल्ला गुलदस्ता पकड़ाये जाने लगे! बसन्त पंचमी के दिन माँ सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त कर पढ़ाई में जुटने के बजाय लड़के वेलेंटाइन के इन्तजार में दंड पेलने लगे। लड़के तो लड़के उनके पिताजी भी बेचैन आत्मा का गीत गुनगुनाने लगे-"बिसरल बसन्त अब त राजा आयल वेलेंटाइन! आन क लागे सोन चिरैया, आपन लागे डाइन!!"

अभी तो कड़ाकी ठंड है। सुबह गेट खोलो तो बसन्त के बदले देसी कुत्तों के पिल्ले भीतर झांकते हुए पूछते हैं-मैं आऊँ? मैं आऊँ? अभी तो खूब हैं लेकिन कड़ाकी ठंड में पैदा हुए कुत्ते के दर्जन भर पिल्ले बसन्त आने तक दो या तीन ही दिखते हैं। जैसे आम आदमी को बसन्त नसीब नहीं होता वइसे ही सभी पिल्लों को बसन्त नसीब नहीं होता। जिन्दा रहते तो गली में निकलना और भी कठिन हो जाता। प्रकृति को इससे कोई मतलब नहीं। कोशिश करो तो छप्पर फाड़ कर देती है। कहती है-पाल सको तो पालो वरना हम तो उसी मिट्टी से नये खिलौने गढ़ देंगे! शायद इसी को महसूस कर नारा बना होगा-दो या तीन बच्चे, होते हैं घर में अच्छे। बाद में सरकार को इससे भी कठिनाई महसूस हुई तो नारा दिया-हम दो, हमारे दो। नहीं माने तो परमाणु बम हइये है। कोई #ट्रम्प चाल चलेंगे और साफ़ हो जाएंगे दोनों तरफ के आम आदमी। फिर आराम से मजे लेंगें ख़ास, बसन्त का। हमारा बसन्त तो बाबाजी का घण्टा!
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29.1.17

बजट देश का बनाम घर का

बच्चों बताओ! बजट कौन बनाता है? कक्षा के सभी बच्चों ने उत्तर दिया-वित्त मंत्री । मगर एक ने हाथ उठा कर कहा-गृह मंत्री! उत्तर सुनते ही गुरूजी म्यान से बाहर! गृह मंत्री वाला जवाब उनकी कुंजी में नहीं था जिससे वो पढ़ाते थे और न उस तंत्र के पास था जिसने उन्हें गुरूजी बनाया था। सजा सुना दिया-दोनों हाथ उठाकर बेंच्च पर खड़े हो जाओ! लड़का विरोध में उस रिक्शे वाले की तरह हकलाने लगा जिसकी हवा बीच सड़क सिपाही निकाल दे-म..म..गर गुरूजी.. मैं..मैं..स..ही..। बच्चों के ठहाकों के बीच गुरूजी दारोगा की तरह गर्जे-चोप्प! कक्षा में ठहाके लगा रहे बच्चे गुरूजी का असली रूप देख, सहम कर चुप हो गये। कुछ देर बाद फिर खुसुर-पुसुर शुरू हुई। मॉनीटर ने खड़े होकर अनुरोध किया-'उसका जवाब तो सुन लीजिये गुरु जी!' दूसरे बच्चों में उम्मीद की किरण जागी। गुरूजी ने दोनों हाथ हवा में लहराया। बायें से मानीटर को बिठाया और दायें से लड़के को बोलने के लिये ललकारा-बक्को!
लड़के ने उत्तर दिया -देश का बजट कौन बनाता है यह तो सभी जानते हैं मगर घर का बजट गृह मंत्री बनाती हैं। यह बात मुझे पिताजी ने बताई थी। गलत है क्या सर? लड़के की मासूमियत ने गुरूजी के हृदय को छीलकर मुलायम कर दिया। हँसते हुए कहा-बैठो-बैठो। कक्षा में गुरूजी का और घर में बाउजी का हँसना माहौल को खुशनुमा बनाता है। गुरूजी की एक हंसी पर सभी मुर्झाये फूल झूम कर खिल उठे।
बच्चों की ये बातें तो मजाक में कही गयीं मगर इन बातों से एक बात यह समझ में आती है कि देश का बजट देश के वित्त मंत्री और घर का बजट घर की मालकिन बनाती हैं. साधारण शब्दों में कहें तो बजट का अर्थ होने वाली आय और किये जाने वाले खर्चों का पूर्वानुमान है. देश का बजट साल में एक बार और घर का बजट हर माह बनता है. यह पति के आय और गृहणी की कुशलता पर निर्भर करता है. जैसे भ्रष्टाचारी काला धन विदेशों में या पाताल खातों में जमा करते हैं वैसे ही महिलायें हर माह होने वाले आय का पहला हिस्सा गुप्त पोटली में जमा करती हैं और घर में आने वाले किसी बड़े आफत के समय साक्षात लक्ष्मी बन मुस्कुराते हुए प्रकट होती हैं! यह गुण भ्रष्ट नेताओं में नहीं पाया जाता. देश पर आने वाले आफत के समय ये बगलें झाँकने लगते हैं. छापे के समय ही इनकी कलई खुल पाती है. घर के बजट में महिलाओं का ध्यान सबसे पहले घर में राशन-पानी भरने में लगा रहता है. बच्चों की आवश्यकताओं के बाद उन पर ध्यान जाता है जिसके कठिन श्रम से प्रति माह घर में पैसा आता है. अक्सर वहां तक आते-आते धन ख़तम हो जाता है. बजट बनाने वाले के हिस्से में तो कुछ भी नहीं बचता. वे अपनी जरूरतों के लिए अतिरिक्त धन की मांग करती हैं और इन्हें नेताओं की तरह आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता. देश का बजट बनाने वाले भी इसी त्याग की भावना से देश का बजट बनायें तो कितना अच्छा हो!
देश का बजट बनाते समय सिर्फ पूर्वानुमान ही नहीं बल्कि लक्ष्य और उद्देश्य को भी ध्यान में रखना होता है. जिसे परफार्मेंस बजट या निष्पादन बजट कहते हैं. जनता का पैसा जनता के विकास में इस प्रकार लगाना कि देश के हित के साथ-साथ चुनाव के पूर्व किये गए वादे पूरे होते दिखाई दें यह वित्त मंत्री की आर्थिक नहीं राजनैतिक कुशलता पर भी निर्भर करता है. जनता से घुमा फिर कर कई प्रकार से टैक्स के रूप में लिए गए धन को देश हित में खर्च करना होता है. 'तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे है मेरा!' वाले भाव में वित्तीय और राजनैतिक कुशलता झलके तो विपक्ष भले कोसे मगर पार्टी के लोग खुश हो जाते हैं. बजट के प्राविधान के साथ इसको क्रियान्वयन की व्यस्था भी पारदर्शी होनी चाहिये.अक्सर देखा गया है कि आम आदमी तक आते-आते उनके लिए आवंटित धन चुक जाता है. दुष्यंत कुमार ने इस दर्द को कुछ यूं बयां किया है.."यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!"
जैसे ही बजट की घोषणा होती है लम्बे बजट की मोटी-मोटी बातें जानकर सरकार के पक्षकार वाह! वाह! तो विरोधी हाय! हाय! करने लगते हैं. सरकार कितना ही अच्छा बजट पेश करे विरोधी को हाय-हाय करना है. विरोधी जब सरकार में आ जाते हैं तो लोगों के रोल बदल जाते हैं. हाय-हाय करने वाले वाह-वाह और वाह-वाह करने वाले हाय-हाय करने लगते हैं. सरकारी कर्मचारियों की नजर आयकर में मिलने वाले छूट पर होती है. सरकारी कर्मचारी हर साल चाहते हैं कि उनकी आय अधिक से अधिक बढ़े और आयकर कम से कम लिया जाय. हर साल आय में वृद्धि होती है और हर साल छूट की दर बढ़ती जाती है. सरकारें भी जीत कर आने के शुरू के वर्षों में अंगूठा दिखाने और मुँह चिढ़ाने वाला और चुनाव वर्ष से ठीक पहले आय में अधिक छूट देते हुए लोक लुभावन बजट पेश करती है.
आजकल आभासी दुनियाँ का बाजार प्रिंट मीडिया से तेज खबर देता है. इन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं. अभी कुछ दिन पहले वाट्स एप में, आयकर में भारी छूट का मैसेज आया। पढ़ते ही लगा कि कोई #मामा बना रहा है। सरकार और इतनी उदार! कभी हो ही नहीं सकता। फिर याद आया कि 5 राज्यों में चुनाव होने वाला है, कौन जाने खबर सच ही हो! मन लड्डू बनाता, दिमाग फोड़ देता। हकीकत तो बजट आने के बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है मग़र जिसने भी यह हवा उड़ाई है वो बड़ा शातिर है। सरकार के विरुद्ध राजनीति कर रहा है। इससे कम छूट मिला तो सरकार छूट देने के बाद भी आलोचना का शिकार होगी कि क्या देने वाले थे, क्या दिये! छूट मिला ही नहीं तो और बुरा होगा! आरोप लगते देर नहीं- सरकार तो बड़ी जालसाज निकली! ये भी कोई बजट है! 

22.1.17

दल बदल या दिलबदल

बीहड़ में किसी डाकू का दिल बड़े गिरोह पर आ जाय और वह लूट में अधिक हिस्से के लोभ में अपना दल बदल कर बड़े गिरोह में शामिल हो जाय तो किसी को कोई अचरज नहीं होता। जंगल का अपना क़ानून होता है। ताकत की सत्ता होती है। अस्तित्व का संघर्ष होता है। सत्ता की छाया में अधिक माल लूटने या जान बचाने के लिये डकैत दल बदलते रहते हैं। आश्चर्य तब होता है जब किसी लोकतांत्रिक देश में जन सेवा के लिये काम करने वाले नेता जी का दिल एन चुनाव के समय बड़े गिरोह पर आ जाता है और वे झट से अपना दल बदल कर दूसरे दल में शामिल ही नहीं हो जाते बल्कि चुनाव लड़ने का टिकट भी पा जाते हैं!

दल बदलू के दल बदलने से दोनों दलों के वे कार्यकर्ता खुद को दल दल में फँसा समझते हैं जिन्होंने उनसे उम्मीदें पाल रखी थीं। सामान्य को पूछता ही कौन है? दलबदलू कोई साधारण तो होता नहीं। वही हो सकता है जिसके पास जन बल और धन बल दोनों हो। इन बादशाली दलबदलुओं के अपना दिल बदलने से ये नरक में नहीं जाते बल्कि इनके इस आचरण से कितने स्वर्ग में जाने की तैयारी करने लग जाते हैं!

दिल दोनों तरफ टूटते हैं। जिस दल में थे उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि अब अपनी ताकत और कम हो गई। जिस दल में गये उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि जीवन भर मेहनत हमने किया और जब हाथ सफाई का मौका मिला तो टिकट कोई बाहरी ले उड़ा! ये उस मजनू की तरह मायूस होते हैं जो लड़की पटाये और उसका टिकट छीन कर फिलिम दिखाने कोई और ले कर चला जाया! कुछ दिन तक तो 'दिल के टुकड़े हजार हुए। कोई यहां गिरा, कोई वहाँ गिरा।' वाला हाल होता है, इरोध-विरोध होता है फिर 'हरि इच्छा' बलवान की तरह 'हाई कमान बलवान' मान कर सभी अपने पार्टी में ही अपने विलेन की जय जयकार करने लगते हैं!

प्रश्न उठता है कि आदमी दिल बदलता ही क्यों है?

कंजूस की पत्नी डाक्टर से मन्नत कर अपने पति का दिल धोखे से बदल दे और राजा का दिल लगवा दे। बाद में जब राजा उसे बेगम समझ कर रोज शाही कबाब बनाने का हुक्म देने लगे तब जा कर पत्नी को एहसास हो कि इससे अच्छा तो अपना कंजूस पति ही था!

किसी लड़की का दिल अपने रामू को छोड़ सलमान खान पर आ जाय और बाद में पता चले कि सलमान तो पहले से बहुतों का दिल तोड़ चुका है!

अच्छी भली पत्नी छोड़ कोई अधेड़ पड़ोस के लड़के से पूछे-भाभी जी घर पर हैं? और घर से पहलवान भैया निकलकर उसका सर तोड़ दें!

कोई चमचा, चम्मच की तरह एक अधिकारी के जाते ही नये वाले अधिकारी से तुरंत घुल मिल जाय और उनके प्याली में भी पुराने की तरह फिट बैठे!

ये सब बातें तो आम आदमी के लिए पुरानी सामान्य घटनाएं हैं। सब चलता है। यही दुनियाँ है, यहाँ यही होता है, मान कर हँसते हुए स्वीकार कर लेता है। मगर किसी सिद्धांत की दुहाई देने वाले का दिल, किसी दूसरे उस सिद्धान्त की दुहाई देने वाले दल पर आ जाय जिसकी जीवन भर बुराई करके नेता बना है तो दोनों दलों के अलावा जन सामान्य का भी दिल टूटना स्वाभाविक है।

एक प्रश्न के बाद कई प्रश्न उठते हैं। आखिर नेता जी ने अपना दिल क्यों बदला ? क्या सत्ता की चौकीदारी में ही होशियारी है? सत्ता सुख के सामने सब सुख ओछे हैं? क्या सिद्धांत, सत्ता प्राप्त करने की अलग-अलग सीढ़ियाँ हैं जिसमे पीढी दर पीढ़ी चढ़ती-उतराती रहती है? क्या सेवा भाव इतना प्रबल होता है कि आदमी मुँह मांगे भाव में उसे खरीद लेना चाहता है। अंत में यह कि यदि देश में इतने सारे सेवक हैं तो आम आदमी इतना दुखी क्यों है?

सिद्धार्थ ने आम आदमी के दुःख दूर करने के लिए सत्ता सुख का त्याग किया और नेता जी आम आदमी का दुःख दूर करने के लिये सत्ता पाना चाहते हैं! दोनों में सही कौन? वो जो बुद्ध बन गये या वो जो राजा बनना चाहते हैं?

19.1.17

किताबें और मेले

क्या पाण्डे जी! विश्व पुस्तक मेला लगा था दिल्ली में, गये नहीं?
हाँ मिर्जा, नहीं गये। टिकट नहीं था।
आप कहते तो टिकट कटा देता आपका। दिल्ली कौन दूर है?
ट्रेन के टिकट की बात नहीं कर रहा मिर्जा, मैं पुस्तक मेला के टिकट की बात कर रहा हूँ! पुस्तक मेले में वही लेखक जाता है जिसकी एकाध पुस्तक छप चुकी हो। बिना पुस्तक छपे मेले में जाना वइसे ही है जैसे बिना टिकट ट्रेन पर चढ़ना। तुम्हें क्या पता? बिना पुस्तक वाला कवि मेले में बिना पूँछ वाले बन्दर की तरह कितना शरमाता रहता है!
एक साल हम भी गये थे मिर्जा, मेले में। बहुत से बिछुड़े भाई एक साथ मिल गये। किसी के हाथ में पुस्तक, किसी के बैग में पुस्तक, किसी का झोला भरा हुआ तो किसी का बोरा बंधा हुआ और हम खाली हाथ! मारे शरम के जमीन पर गड़े जा रहे थे, कोई देख कर पहचान न ले।
तब! फिर का हुआ?
का होना था मिर्जा! वही हुआ जिसका डर था। हम सोच ही रहे थे कि फूट लें यहाँ से तभी एक मित्र ने पीछे से आ कर टी.टी. की तरह पीठ में धौल जमा ही दिया-कैसे हैं पाण्डे जी? आपकी कौन सी पुस्तक आई इस बार? फिर बिना उत्तर सुने पकड़ कर एक कोने में ले गया जहां कम भीड़ थी। वहाँ मेले में बिछुड़े सभी भाई मौजूद थे। सभी से मेऱा परिचय कराते हुए बोलने लगा-इनसे मिलिये! यही बेचैन आत्मा हैं। इत्तफाक की बात थी मिर्जा! सभी मुझसे तपाक से हँसते हुये मिले! किसी ने मुझे शर्मिंदा नहीं किया!! मुझे उसी पल विश्वास हो गया कि इंसानियत कहानियों में ही नहीं, लेखकों में भी पाई जाती है! सभी मुझे प्रोत्साहित करते रहे-अगली बार मेले में आपकी पुस्तक भी आ ही जानी चाहिये।
तब! इतने अच्छे मित्र हैं तब क्यों नहीं गये मेले में?
कहाँ कोई पुस्तक छपी मिर्जा! हर बार कोई प्रोत्साहित थोड़ी न करता है। इस बार जाता तो तंज कसता-पूरी जिंदगी फेसबुक में ही गुजार दोगे क्या!
तो क्या खाली लेखक ही जाते हैं पुस्तक मेले में! पाठक कोई नहीं जाता?
वही पाठक, वही लेखक मिर्जा! यूँ समझो सभी पाठक, सभी लेखक।
इनके अलावा?
लेखक को हरदम झाँसा देते रहने वाला प्रकाशक, देखा-देखी पढ़ाकू दिखने वाले नये लड़के, बड़े लेखकों के बीच घुसकर एल्फी-सेल्फी खिंचा कर फेसबुक में चस्पा करने वाले और इस तरह हमेशा आत्ममुग्ध रहने वाले नये लेखक और लेखकों को विद्वान समझ कर चाय-पानी कराते रहने वाले उनके मित्र। इन्ही सब की चौकड़ी दिन भर हुँकार-फुँकार करती रहती है मिर्जा।
मतलब गाँव के मेले की तरह कोई मजा नहीं होता मेले में?
देश-शहर-गाँव सब पुस्तक में घुस जाता है मिर्जा! तुमने देखा है न गाँव का मेला? जिस बच्चे की उमर गुब्बारा फुलाने की होती है, वही गुब्बारा बेच रहा होता है! कितनी सूनी रहती हैं हरी चूड़ी बेचने वाली गुलाबो की आँखें! यही हाल विद्वत समाज का है। जिसके पास पैसा है वह हर साल पुस्तक छपवा सकता है। प्रकाशक किसी गरीब की पुस्तक नहीं छापता। बड़े-बड़े लेखकों की तमाम उम्र फकीरी में कट गई। जब स्वर्गवासी हुए, लोगों ने तारीफ करी तभी प्रकाशक उनके घर गया। बुद्धिजीवियों की दुनियाँ और जालिम है मिर्जा, कत्ल करते हैं और खून का एक धब्बा नहीं दिखता।
सही बात है गुरु! एक बार हमने भी एक कवि समेलन कराया था। बड़े लिफ़ाफ़े के लिये सब कवि झगड़ने लगे थे आपस में! किसी तरह बीच-बचाव किया और अपनी जेब से पइसा लगा कर मामला रफा-दफा किया।
तब मेला एकदम बेकार चीज है?
नहीं मिर्जा! यह नहीं कह रहा। मेला तो मेला है, मजा ही मजा है। जइसे गरीब को मेले से ही रोटी मिलती है वइसे बुद्धिजीवी को मेले से ही खुराक मिलती है। जेब में पैसा हो, फालतू समय हो और लिखने-पढ़ने का शौक हो तो मेले से बढ़कर और दूसरी अच्छी जगह कौन है साहित्य के मनोरोगियों के लिये! सोने में सुहागा-अपनी तरह दूसरे और रोगी भी मिल जाते हैं ओने-कोने, शब्दों के चाट-पकौड़े चखते हुए! कवि को कवयित्री मिल जाती हैं, कवयित्री को कवि मिल जाते हैं। आलोचकों को कवि-कवयित्री के रूप में जुगाली करने के लिए आलू-चना दोनों मिल जाते हैं। प्रकाशकों के पुराने अंडे बिक जाते हैं, नये मुर्गे मिल जाते हैं। इससे अच्छा और क्या हो सकता है भला!
एक ताजा शेर सुनो मिर्जा-
मृत्यु लोक के लेखकों की उल्टी-पल्टी गई बहुत 
अधिक बिकी इस बार भी स्वर्गीय की पुस्तक।
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