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13.1.19

ये पतंगें

तेरी नीयत
तेरे मंझे
तू ही जाने
मैं साथ रहना चाहता हूँ
इन पतंगों के!
ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

आकाश में
छाई है बदली,
हो रही है
हल्की-फुल्की
बूंदाबांदी
और फिर
बह रही
कातिल हवाएं!
प्रतिकूल हैं
रंग सारे
मगर फिर भी
ये पतंगें
बादलों को चीरकर
किरण लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
बादलों में
धूप लिखना चाहती हैं।

ये पतंगें
हौसलों की बातियाँ हैं,
ये पतंगें
इस धरा की थातियाँ हैं,
ये पतंगें
आग की चिंगारियाँ हैं।
चलो साथी!
साथ दें
इन पतंगों का
ये पतंगें
इस धरा में
सुबह लिखना चाहती हैं।


2.1.14

टिंबकटूं, शेखचिल्ली और चिलगोजर


तीन मित्र थे- टिंबक टूं, शेखचिल्ली और चिलगोजर। नाम से ऐतराज हो तो आप अपने सुविधानुसार दूसरे नाम भी समझ सकते हैं। मैने ये नाम इसलिए दिये कि मुझे बहुत प्रिय थे और कहीं अपने बचपन में किसी कथा-कहानी को पढ़ते हुए दिमाग में बैठ गये थे। मेरे इन पात्रों में टिंबकटूं सबसे चालाक, शेखचिल्ली सबसे मूर्ख और चिलगोजर सबसे हिम्मती था। मैने इन पात्रों को तब गढ़ा था जब मेरी दोनो बेटियाँ बहुत छोटी थीं। उन्होने बोलना सीख लिया था और तोतली जुबान में तब मुझसे लिपट जातीं जब मैं ऑफिस से घर आकर सब्जी और दूसरे घर के सामाने का झोला पटक कर चाय पीने बैठता। श्रीमती जी लम्बी सांस लेतीं और कीचन में यह कहते हुए घुस जातीं-अब आप संभालिये! मेरी मजबूरी थी कि मैं उन्हें देर तक झूठी-मुठी कहानियों में भुलाता रहता। यदि ऐसा न करता तो समय से भोजन मिलना संभव ही नहीं था। मैं शुरू करता-तीन मित्र थे..तभी कोई बोल पड़ता- आं आं पता है तिबंकतू, थेखतिल्ली औsss...तिलगोदर। आगे बताइये... :) 

तीनो में घनिष्ट मित्रता थी। कोई टोकता ..घनित माने ? मतलब.. खूब मित्रता थी। …अत्ता। तीनो तुम लोगों से अधिक बड़े नहीं थे। आठ-दस साल के होंगे। एक दिन पता है क्या हुआ! टिंबकटूं ने नदी किनारे मछली पकड़ने की योजना बनाई। सबको सूर्योदय के समय बुला लिया और बैठ गया नदी में बंसी डाल कर। छोटी बिटिया बीच में ही टोक देती.. बंती तो आप बजाते हैं न पापा ! उतते तिबंकतू मतली कैते पकल तकता है ? तब तक बड़ी समझाती- तिंबकतूं पापा की तलह बंती बदाता होगा..मतलियाँ तुनने के लिए आतीं होंगी, तिलगोदर और थेखतिल्ली दौल कल पकल लेते होंगे, है न पापा ? 

मैं माथा पीट लेता। दोनो की टोकाटेकी के कारण जो कहानी सोच रहा होता वह सब भूल जाता लेकिन प्रश्न ऐसे होते की बिना बताये आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। मैं समझाता-वो दूसरी वाली बंसी होती है। एक लम्बी-सी डंडी होती है। जसमें एक तरफ मछली को फंसाने के लिए एक मजबूत धागा लटका होता है। जिसमें लोहे का कांटा बंधा होता है। कांटे में मछली को खाने के लिए कुछ फंसा देते हैं, जिसे चारा कहते हैं। फिर धागे को पानी में डुबो देते हैं और डंडी को पकड़ कर नदी किनारे बैठ जाते हैं। मछली चारा खाने के लिए आती है और कांटा उसके मुँह में फंस जाता है। कांटे में मछली के फंसते ही डंडी भारी लगने लगती है और किनारे बैठा शिकारी झट से धागे को ऊपर खींच लेता है। मछली फँस जाती है। समझी? दोनो बिटिया एक साथ बोल पड़तीं-तमझ गये। तिबंकतू बहुत बदमात था! मतली को खाने का लालच देकल पकल लेता था! 

मैं समझाना चाहता-हाँ बेटा। जबसे यह दुनियाँ बनी है तभी से चालाक और ताकतवर, कमजोर और सीधे लोगों को फँसाने का खेल खेलते आये हैं। यह दुनियाँ भी एक नदी की तरह है। जहाँ घाट-घाट पर बहुत से ‘टिंबकटूं’ बंसी लटाकाये बैठे हुए हैं। अपने आनंद के लिए मछली के गले में कांटा फँसाकर पकड़ना और खा जाना इनकी आदत है। सावधानी तो मछलियों को रखनी पड़ती है। लेकिन इतना ही कह पाता- जीव ही जीव का भोजन होता है। जंगल में बड़े जानवर, कमजोर को मारकर अपनी भूख मिटाते हैं। मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है। वह शिकार भी करता है और अन्न भी उगा सकता है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो मछली पकड़कर, इनको बेचकर ही अपना और अपने परिवार का पेट भर पाते हैं। भूख मिटाने के लिए शिकार करना उनकी मजबूरी है। सिर्फ आनंद लेने के लिए दूसरे जीवों को कष्ट देना गलत बात है। टिंबकटूं सिर्फ आनंद लेने के लिए मछली पकड़ रहा था। इसलिए तुम लोगों का कहना सही है। टिंबकटूं बदमाशी कर रहा था। 

आगे जानती हो क्या हुआ? (अब मैं जल्दी-जल्दी कहानी पूरी करना चाहता था। कीचन में पक रहे भोजन की खुशबू आने लगी थी।) एक बड़ी-सी मछली जाल में फँस गई। टिंबकटूं चीखा- भारी मछली फँसी है। पकड़ो-पकड़ो। वह चीखकर कहना चाहता था कि मछली भारी है जल्दी से डंडी पकड़ो नहीं तो मैं ही पानी में गिर जाउँगा लेकिन शेखचिल्ली तो मूर्ख था ही। उसने समझा टिंबकटूं मछली पकड़ने के लिए कह रहा है। वह खुद ही दौड़कर नदी में कूद गया मछली पकड़ने के लिए। 

दोने बेटियाँ जोर-जोर से हँसने लगतीं। छोटकी कहती-उतको तो तैलना आता है। बड़की कहती-लेकिन कपला तो भीग ही गया न! मैं कहता-फिर जानती हो क्या हुआ ? शेखचिल्ली मछली को नहीं, मछली शेखचिल्ली को पकड़कर नदी में ले जाने लगी! 

दोनो चीखतीं- धूत! धूत! 

मैं समझाता-मेरा मतलब है कि मछली इत्ती बड़ी और ताकतवर थी कि शेखचिल्ली उसे पकड़कर ला ही नहीं पा रहा था और लालच में छोड़ भी नहीं रहा था। दोनो अचरज से पूछतीं- तब का हुआ ? मैं समझाता-चिलगोजर को भूल गई? चिलगोजर ने देखा तो दौड़कर नदी में कूदा और मछली को पकड़ लिया। इतने में टिंबकटूं भी आ गया। फिर तीनो मिलकर मछली को पकड़ कर किनारे ले आये। पानी से बाहर निकलते ही मछली छटपटाने लगी। शेखचिल्ली मछली को छटपटाते देखकर बोला-लगता है मछली को ठंडी लग रही है! तभी इत्ता कांप रही है!!!  टिंबकटूं को उसकी बात सुनकर गुस्सा आ गया। वह शेखचिल्ली को मारने के लिए दौड़ा-मूर्ख! यह पानी से निकलने के कारण छटपटा रही है और तुम कह रहे हो कि इसे ठंडी लग रही है!!! चिलगोजर ताली पीट-पीट कर हँसने लगा। इत्ते में जानती हो क्या हुआ? 

दोनो आँखे फाड़कर - का हुआ? 

मछली छटपटाते-छटपटाते फिसलकर पानीं में गिर गई। मछली को पानी में गिरते तीनो ने देखा तो फिर से दौड़ पड़े पकड़ने के लिए। लेकिन जानती हो क्या हुआ? 

… का हुआ? 

मछली पानी में भाग गई! इतना सुनते ही दोनो खुशी के मारे चीखने-उछलने लगीं। हो हल्ला सुनकर बच्चों की अम्माँ कमरे में आ गईं- क्या हुआ? 

दोनो हाथ नचाकर बोलीं-मतली पानी में भाग गई! 

बहुत देर तक दोनो का नाटक चलता रहता। एक पूछती-का हुआ? दूसरी कहती-मतली पानी में भाग गई!  

मैं मनाता-हे ईश्वर! इनकी हँसी यूँ ही सलामत रहे। मछलियाँ कभी किसी लालच में न फँसें और अगर फँस भी जायें तो शिकारियों को चकमा देकर भागने में कामयाब हो जायें।

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