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21.5.24

गरीबी

सुबह 7 से 9 के बीच कई लोकल ट्रेनें थीं जो लगभग एक घण्टे में पुणे पहुंचाती थीं। वैसे ही शाम 6 के आसपास एक इंटरसिटी, एक लोकल,  2 ट्रेनें थीं जो पुणे से लोनावला पहुंचाती थीं। वैसे तो पुणे और लोनावला के बीच इस रुट में कई ट्रेनें थीं मगर 'देव' को ऑफिस आने, जाने के लिए सही समय पर ये ट्रेनें ही मिलतीं। 

यह समय ऐसा होता जब लोकल ट्रेनों में बहुत भीड़ होती। एक तो सस्ता किराया दूसरे निर्धारित समय पर चलने के कारण रोज के सभी यात्री इन लोकल ट्रेनों में ही जाना पसंद करते थे। यह समय ऐसा होता था कि खंडाला घूमने आने वाले यात्री नहीं के बराबर होते। घूमने वाले सुबह आना और शाम को लौट जाना पसंद करते थे। रात को वे ही रुकते थे जो अगली सुबह पहाड़ों पर सूर्योदय का नजारा लेना चाहते थे।

बारिश में पहाड़ों से गिरते झरनों और जलप्रपात में मिलकर आगे नदी के रूप में मैदान में फैलने का दृश्य अत्यंत दिलकश होता। बांध के किनारे खड़े हो जल प्रपात देखना भी खूब आनंदित करता। कुछ युवक रील बनाने में मगन रहते। वे सब घूम कर, सभी प्रसिद्ध स्थान देख कर शाम को लौट जाते।

'देव' को सुबह में पुणे जाना होता और शाम तक लौट आना होता। खंडाला की पहाड़ियों के एक कच्चे रास्ते में छोटा सा लकड़ी और मिट्टी का बना, दो मंजिला दो कमरों का कच्चा घर था उसका। नीचे के तल के एक कमरे में काम वाली निर्धन बाई और दूसरे में घर के कबाड़ रहते। लकड़ी की सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाना पड़ता जिसके एक कमरे में माँ बेटे और दूसरे में चूल्हा बर्तन रहता। कमरे के बाहर लकड़ी का ही एक बरामदा था जहाँ बैठकर खाना, पढ़ना सब होता। घर के बाहर लगभग चारों तरफ मिलाकर लगभग 5 कट्ठा जमीन ही बची थी। घर में एक अकेली माँ रहती थीं। पिता की बचपन में ही मृत्यु हो चुकी थी, मां ने ही खेतों में सब्जी उगाकर, दूसरे घरों में काम करके किसी तरह देव को पढ़ाया था और अब देव पढ़ लिख कर एक प्राइवेट कम्पनी में काम करने लगा था। माँ चाहती थी कि देव की शादी किसी अच्छे घर में हो जाय और अब आराम मिले लेकिन शादी के नाम पर देव हमेशा मुकर जाता। उसने अभी कम्प्यूटर से इंजिनियरिंग किया था और उसे एम. बी. ए.कर के अच्छी नौकरी की तलाश थी। 

देव को हर मौसम परेशान करता। जाड़े में अधिक ठण्ड तो बारिश में घर चारों ओर से टपकने लगता। मिट्टी पोत कर बनी बेंत की दीवारों में वर्षा की बूदों से डरावनी आकृतियाँ उभर आतीं। घर के बाहर लकड़ी और जंगली घाँस से घिरा कच्चा शौचालय था। शादी की बात पर माँ बेटे में अक्सर बहस हो जाती। माँ चाहती थी कोई हाथ बंटाने वाली आ जाय और वह चाहता था पक्का घर बन जाय तभी शादी करें।  ऐसे में पत्नी को कहाँ रखेंगे? वह रोज घर से 10 किमी दूर साइकिल चलाकर रेलवे स्टेशन जाता और एक मित्र के घर साइकिल खड़ी कर, गाड़ी पकड़ता। 

लोकल ट्रेन में कभी बैठने के लिए सीट मिल जाती, कभी खड़े-खड़े ही पूरी यात्रा करनी पड़ती। पीठ में झोला लिए (जिसमें पानी और टिफिन रहता) दोनों हाथों से जंजीर पकड़ कर, आते-जाते परिचित हो गए साथियों से बतियाते हुए सफर करता। 

एक दिन लोकल ट्रेन में एक लड़की के बगल में उसे बैठने भर की सीट मिल गई! एक घंटे के सफर में दोनो में कोई बात नहीं हुई लेकिन एक दूसरे की फोन कॉल सुनकर इतना अंदाजा लग गया कि लड़की का नाम दिपाली है और वह एक प्राइवेट स्कूल में बच्चों को स्पोर्ट्स सिखाती है, मतलब एक गेम टीचर है। 

उस दिन के बाद यह अक्सर होने लगा कि दोनो की जब निगाहें आपस में टकराती, एक दूसरे को देखकर दोनो के मुखड़े पर एक मुस्कान खिल जाती। धीरे-धीरे दोनो एक दूसरे के लिए सीट रोकने और पास बैठने लगे। दोनो कब तक चुप रहते! परिचय हुआ, बातें होने लगीं और एक शाम ट्रेन की प्रतीक्षा में खड़े देव को देखकर दीपा चहकी,  "ट्रेन आने में अभी 15 मिनट का समय है, आइए! एक कप चाय हो जाय?" उस दिन के बाद यह अक्सर होने लगा। यूँ कहिए दोनो 15 मिनट पहले ही स्टेशन पहुँचने लगे। जिस दिन ऑफिस में छुट्टी होती दोनो मोबाइल में बातें करने लगे! बातों ही बातों में उन्हें एहसास हुआ कि जब एक ही शहर में रहते हैं तो मिलकर भी बातें हो सकती हैं!

जाड़े के दिन थे । दोनो भोर में ही सूर्योदय देखने खंडाला हिल्स व्यू पॉइंट्स पहुँच चुके थे। पहाड़ों के बीच से स्वर्णिम आभा बिखेरता एक गोला ऊपर और ऊपर उठता जा रहा था। दोनो एक दूसरे को भूल अपलक उगते सूरज को ही निहार रहे थे। एक प्यास समाप्त होती है, दूसरी जग जाती है। ठण्ड के मारे हालत खराब थी और दोनो को जोरों की भूख लग रही थी। पास ही सड़क किनारे एक गुमटी नुमा ढाबे से दोनो ने ब्रेड आमलेट का नाश्ता किया। नाश्ते के बाद एक पहाड़ी पर बैठ, धूप की गर्मी लेते हुए दोनो ने आपस में बहुत सी इधर-उधर की बातें कीं लेकिन घर के बारे में बताते हुए बचते रहे।

दरअसल दिपाली एक अनाथ लड़की थी। बचपन में ही एक दुर्घटना में माता पिता की मृत्यु हो गई। पिता ऑटो चलाते थे और भयंकर शराबी थे। एक शाम शराब के नशे में गर्भवती पत्नी को अस्पताल ले जाते समय पहाड़ी से ऑटो फिसल कर सैकड़ों फिट नीचे खाई में गिर गई। अबोध दीपा को उसके मामा अपने साथ घर ले आए और वहीं उसकी शिक्षा हुई। मामी बात-बात पर दीपा को यह एहसास दिलाती कि वह एक मनहूस लड़की है जिसने अपने माँ बाप को बचपन में ही खा लिया और अब यहाँ छाती पर मूंग दलने आई है। काम की न काज की, खाली पढ़ती रहती है। दूसरी ओर दीपा को भी यह एहसास हो चुका था कि उसे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़ा होना है, मामा-मामी पर बोझ नहीं बनना है। इसी एहसास ने उसे तंग हालत में पढ़ना और लड़ना सिखाया। बड़ी सफलता तो उसे नहीं मिली लेकिन स्पोर्ट्स में रूचि होने के कारण ग्रेजुएशन के बाद एक स्कूल में गेम टीचर हो गई। उसकी मामी रोज ताने मारती, "कौन करेगा इससे शादी? कहाँ से लाएंगे दहेज के पैसे? कमाने लगी है तो पुणे में ही कमरा लेकर क्यों नहीं रहती? क्यों रोज आती-जाती है!" 

देव से बातें करते वक्त दीपा सोचती, 'अब अपना दुखड़ा देव को क्या बताएं! वह भी क्या सोचेगा,'कैसी लड़की से पाला पड़ा है!' इधर देव सोचता, 'मेरी ग़रीबी सुनकर भाग जाएगी, मैं इसे खोना नहीं चाहता।' इसी कश्मकश में दोनो इधर-उधर की बातें करके अपने-अपने घर चले गए।

बहुत दिनों से दीपा दिख नहीं रही थी, उसका फोन भी नहीं लग रहा था, देव परेशान था। रोज सुबह उम्मीद से उठता, रोज ट्रेन चलते ही मायूस हो जाता, 'आज भी नहीं दिखी!' काश! वह अपने घर का पता बता देती। एक दिन ऑफिस में काम अधिक होने के कारण उसे पुणे में रुकना पड़ा। वह देर शाम 'दगडू सेठ गणेश जी' के दर्शन करने चला गया। दर्शन करके लौट रहा था तो अचानक सड़क के दूसरे किनारे दीपा खड़ी दिख गई! वह सड़क पार करते हुए लपक कर उसके पास पहुंचा तो उसे देख दीपा सकपका गई। 

साथ-साथ गुमसुम 3 किमी पैदल चलते-चलते शिवाजी नगर रेलवे स्टेशन के पास पहुंच गए। वहीं रुककर दोनो एक दुकान में चाय पीने लगे। संक्षेप में दीपा ने अपना हाल बताया और यह भी कि मामी के तानों से घबड़ाकर उसने यहाँ एक कमरा किराए में ले लिया है, अपना दुखड़ा सुनाना नहीं चाहती थी, इसलिए मोबाइल का सिम भी बदल दिया। यहाँ रहकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने के लिए बहुत समय मिल जाता है। गणेश जी ने चाहा तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी, कुछ अच्छा होता तो तुमसे जरूर बात करती।

देव को उसकी बातें सुनकर झटका सा लगा, मैं व्यर्थ ही अपनी ग़रीबी से शरमा रहा था! गरीब होना तो बहुत छोटी बात है, बड़ी बात तो यह है कि हम ग़रीबी से कैसे लड़ते हैं!

उसने दीपा का फोन नंबर लिया और अपने दिल की बात उससे कह दी, "मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और तुमसे भी गरीब हूँ। आर्थिक रूप से भी, मानसिक रूप से भी। तुमने मेरी मानसिक गरीबी एक झटके में दूर कर दी, तुम्हारा यह एहसान मैं भूल नहीं पाउँगा। गणेश जी ने चाहा तो हम जल्दी ही मिलेंगे।"

दूसरे दिन घर लौटकर उसने माँ से कहा, "माँ! मैने शादी करने का फैसला कर लिया है, लड़की भी ढूंढ ली है। अब हम पूना में किराए का घर लेकर वहीं रहेंगे। नौकरी के साथ मन लगाकर पढ़ाई करेंगे। गणेश जी ने चाहा तो हमको अच्छी नौकरी मिल जाएगी और तुमको प्यार करने वाली बहू, क्यों! तैयार हो?"

माँ खुशी से उछल पड़ी, "जै गजानन! तुमने मेरी सुन ली। मुझे बहू मिलेगी और मेरा देव पैसा कमाकर यहाँ आएगा और पक्का घर बनाएगा।".

.............

19.8.23

चार

घूमते-घूमते एक घने नीम के वृक्ष के नीचे पहुँचा। वैसे तो मैं जंगल में ही था और आसपास कई घने वृक्ष थे लेकिन यह थोड़ा अलग था। किसी ने शाखों को काट छांट कर बकायदा सीढ़ी का आकार दिया था, इससे ऊपर चढ़ना बहुत आसान था। मैं भी अपनी मानसिक उलझन में था, चढ़ता चला गया और ऊपर एक चौड़े शाख पर आराम से बैठकर सुस्ताने लगा। सफर कितना भी आसान हो, चढ़ाई तो चढ़ाई होती है।


बैठकर आसपास के दृष्यों का आनंद ले ही रहा था कि एक युवा कुल्हाड़ी लेकर धड़ल्ले से चढ़ता चला आया और सामने की शाख पर खड़े हो मुझे घूरने लगा! मैने भी उसे ध्यान से देखा।  हृष्ट पुष्ट, गेहूआं रंग, स्वस्थ शरीर, अवस्था 25-30 वर्ष। एक और खास बात थी, उसके हाथ, पैर, और सर में भी जगह-जगह गंदे कपड़े लपेटे हुए थे, कपड़ों में खून के धब्बे लगे थे और वह दर्द से कराह भी रहा था!

मैं कौतूहल से एक टक उसी को देखने लगा। उससे बड़ा नमूना मैने जिंदगी में कभी नहीं देखा था। उसे देख लग रहा था जैसे कालीदास का पुनर्जन्म हो गया है। इसने भी डाल के आगे की तरफ खड़े हो कर कुल्हाड़ी चलानी शुरू करी और हर वार पर जोर से चिल्लाता, "चार!" मुझसे रहा न गया, बोल पड़ा, 'पागल हो चुके हो क्या?' शाख कटेगी तो गिरोगे नहीं?

वह मेरी बात सुनकर जोर से ठहाके लगाने लगा, "जानता था, तुमसे बर्दाश्त नहीं होगा और ज्ञान बाँटने चले आओगे। मैं क्या बोल रहा हूँ इस पर भी ध्यान दो और उसने कुल्हाड़ी चलाते हुए चीखा..."चार!"

शाख कटकर गिरने ही वाली थी, इसी रफ्तार से कुल्हाड़ी चलाता रहा तो अगले दो, तीन वार में यह व्यक्ति शाख के साथ जमीन पर होगा! मैने घबड़ाकर कहा, "ठीक है, काट लेना, आत्महत्या करने का मन है तो तुम्हें कौन रोक सकता है? लेकिन मरने से पहले मेरी जिज्ञासा तो शांत कर दो, कृपया मुझे बताओ कि ऐसा क्यों कर रहे हो और यह "चार-चार" क्या बोले जा रहे हो?"

मेरे विनम्र आग्रह से वह थोड़ा प्रभावित हुआ और शाख काटना छोड़, धच्च से उसी डाल पर बैठ गया और ठहाके लगाते हुए बोलना शुरू किया, "चार -चार का मतलब यह चौथी बार है! वह देखो, तीन शाख काट कर पहले ही गिरा चुका हूँ! इन कपड़ों में जो खून लगा है, मेरे ही हैं और तुम मुझी को समझा रहे हो कि गिर जाओगे? मैं जानता हूँ, तुम अब और परेशान हो चुके होगे, पूछोगे, ऐसा क्यों कर रहे हो? हा हा हा हा... तुम भी करो तो तुम्हें भी इसके आनंद का ज्ञान होगा! जिस डाल पर बैठो, उसी को काटो और धड़ाम से गिर जाओ! जितनी चोट लगेगी, जितना दर्द होगा, उतना आनंद आएगा!

क्या बकते हो! इससे तो जान भी जा सकती है!!! तीन बार भाग्यशाली रहे तो जरूरी थोड़ी न है कि चौथी बार भी बच जाओगे?

हा हा हा हा... मर जाएंगे इससे ज्यादा कुछ नहीं न होगा? जब तक जिन्दा रहेंगे दर्द का आनंद लेंगे। होशोहवाश में अपनी डाल काटने का आनंद ही कुछ और है, कम से कम इसमें पता तो रहता है, गिरेंगे और चोट लगेगी। आजकल जिसे देखो वही अपने पैरों में कुल्हाड़ी चला रहा है, जिस डाल में बैठा है उसी को काट रहा है, गिरता है तो चिल्लाता है, धोखा -धोखा! मैं तो पूरे होश में काट रहा हूँ। चोट भी मुझे ही लगेगी, दर्द भी मुझे ही होगा, उनकी तरह शैतान तो नहीं हूँ न जो पूरा जंगल काट रहे हैं? तुम बताओ, क्या अब किसी नदी का जल पी सकते हो? हवा, पानी सब प्रदूषित हो चुका है, क्या यह जिस डाल में बैठे हैं उसे काटना नहीं हुआ? तुम जंगल में क्यों भटक रहे हो? अपने पैरों में कुल्हाड़ी तो तुमने भी मारी है, गिरे तो तुम भी हो, जंगल में नहीं गिरे तो घर में ही गिरे होगे? धोखा तो तुमने भी खाया है, तुम्हारा दर्द तुम्हें जीने नहीं दे रहा इसलिए जंगल में भटक रहे हो। मैं पूरे होश में यह काम कर रहा हूँ, कोई धोखा नहीं, आनंद ही आनंद। मैं मर गया तो यह कुल्हाड़ी तुम उठा लेना, मैं तो चला डाल काटने, "चार!"
....@देवेन्द्र पाण्डेय।

29.5.21

सेवानिवृत्ति के दिन

मॉर्निंग वॉक के समय लॉन में शर्मा जी मिल गए। घूम घाम कर लौटे थे और बेंच पर, मुँह लटकाकर  विश्राम कर रहे थे। मैने पूछा...मुँह क्यों लटकाए हैं शर्मा जी? आपके तो तीन-तीन बेटे हैं, क्या हुआ?

बड़ा लड़का बहुत दुःखी रहता है। जब देखो तब पैसे मांगता रहता है। 

अच्छा! दूसरा वाला?

वह भी दुखी रहता है लेकिन कभी किसी से कुछ नहीं मांगता। स्वाभिमानी है। जितना कमाता है, उतने में ही गुजारा करता है।

गनीमत है और तीसरा? वो तो कमाने के लिए अमेरिका गया था न?

हाँ, वह बहुत खुश है। बचपन से बहुत तेज था। हर सप्ताह वीकेंड पर पत्नी के साथ पार्टी करता है, नई-नई जगह घूमने जाता है और फेसबुक, इंस्टाग्राम में खूबसूरत तस्वीरें पोस्ट करता है। 

तब तो खूब डॉलर भेजता होगा?

नहीं, कभी एक पैसा नहीं भेजा। मैने मांगा भी नहीं। कल  शाम ही तो उसका फोन आया था। पूछ रहा था, "पिताजी! आप रिटायर्ड हो जाएंगे तो ग्रेच्युटी, भविष्य निधि और सब मिलाकर कुल कितना मिल जाएगा? सोच रहा हूँ यहाँ एक मकान खरीद लूँ और आपको भी यहीं बुला लूँ। रिटायर्ड होने में अभी कितने दिन हैं?"

अरे!!!

कल बैंक गया था। मैनेजर कह रहा था, "आपने बेटे को अमेरिका पढ़ाने के लिए घर की जमानत पर जो एजूकेशन लोन लिया था, बढ़कर 50 लाख से ऊपर हो चुका है। कम से कम हर महीने ब्याज तो चुकाते रहिए। रिटायर्ड होने में अभी कितने दिन हैं?"

14.5.20

कविता सुनाने का नशा

एक बनारसी कवि ने दो बनारसी कवियों का एक मजेदार किंतु सत्य किस्सा सुनाया। जिसे मैं अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ। दोनो कवि मुफलिसी में जीवन गुजारते लेकिन कविता के लिए जान देते। एक दिन एक कवि ने रात्रि में 10 बजे दूसरे कवि का दरवाजा खटखटाया...

कवि जी हैं? कवि जी छंद रच रहे थे, अचकचा कर द्वार खोला तो सामने दर्पण में अपनी छवि की तरह दूसरे मित्र कवि को खड़ा पाया। चौंक कर बोले...इस समय ! यहाँ!!! आइए, आइए, भीतर आइए, बाहर क्यों खड़े हैं? 

कवि जी कमरे में घुसते ही बोले..एक नई कविता लिखी थी, सोचा सुना ही दूँ। गलत समय आ गया, आपको कोई एतराज तो नहीं? 

आतिथेय ने अतिथि से कहा..नहीं, नहीं, एतराज कैसा! आपने तो मेरी मुश्किल आसान कर दी। मैं अभी छंद पूरा करते-करते सोच रहा था.. श्रीमती जी तो कविता के नाम से चिढ़ती हैं, किसे सुनाऊँ?  तभी किस्मत से आप आ गए। शीतल जल पिलाता हूँ, आप अपनी कविता प्रारम्भ कीजिए।

अतिथि कवि प्रसन्न हो कविता सुनाने लगे और आतिथेय वाह! वाह! करने लगे। इधर कविता समाप्त हुई, उधर कवि जी के सब्र का बांध टूटा...आपने बहुत अच्छी कविता सुनाई अब मेरा छंद सुनिए। प्रशंसा से मुग्ध मेहमान जी ने कहा..हां, हां, सुनाइए। मेजबान कवि जी ने अपना ताजा छंद सुनाया और मेहमान कवि जी ने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करी।

कविता सुनने सुनाने का यह दौर लम्बा चला। रात्रि के डेढ़ बजे गए। दूसरे कमरे से रह-रह कर श्रीमती जी के गुर्राने और बाउजी के नींद में खर्राने की आवाजें साफ सुनाई पड़ रही थीं। तभी मेहमान कवि जी ने डरते-डरते फरमाइश की...एक कप चाय मिल जाती तो....मजा आ जाता, नहीं? मेजबान मांग सुन, मन ही मन थर्राए..घर में न दूध न चायपत्ती। होती भी तो सर फोड़ देतीं श्रीमती जी। प्रत्यक्ष में हकलाए...हां, हां, क्यों नहीं, लेकिन श्रीमती जी तो सो चुकी लगती हैं। चलिए, बाहर चाय पिलाते हैं आपको। 

मेहमान जी बोले..रहने दीजिए, जब घर मे नहीं मिल रही तो इतनी रात में बाहर कहाँ मिलेगी? 

मेजबान कवि जी ताव खा गए..मिलेगी कैसे नहीं! आपने चाय पीने की इच्छा प्रकट की तो हम आपको चाय पिलाए बिना जाने कैसे दे सकते हैं! चलिए, घर से बाहर निकलिए तो सही।

दोनो कवि मित्र रात्रि के टेढ़ बजे सड़क की खाक छानते, चाय की दुकान ढूँढते, सुनते/सुनाते चले जा रहे थे। कहीं दुकान खुली होती तब न चाय मिलती। रथयात्रा से साजन सिनेमा हॉल तक (लगभग 2 किमी) चले आये, चाय नहीं मिली। मेहमान निराश हो बोले..मैं तो पहिले ही कह रहा था, चाय नहीं मिलेगी। मेजबान बोले..कैसे नहीं मिलेगी? चलिए, कैंट रेलवे स्टेशन तक चलते हैं, वहाँ तो रात भर दुकानें खुली रहती हैं। 

रेलवे स्टेशन लगभग 4 किमी दूर था लेकिन वे चलते रहे। आगे चौराहे पर पुलिस की जीप रात्रि गश्त में निकली थी। दरोगा जी ने देखा..दो दुबले-पतले सात जनम के भूखे युवक, बिखरे बाल, बढ़ी दाढ़ी-मूँछें, लहराते, गाते चले जा रहे हैं! रोककर पूछा...शराब पी रखी है? कहाँ जा रहे हो इतनी रात को? कवियों को गुस्सा आ गया। राष्ट्र चिंतकों का यह अपमान! घोर कलियुग है। गुर्राकर बोले..हम कवि हैं। कविता सुनाकर थक गए तो चाय पीने स्टेशन जा रहे हैं। आपको हमसे तमीज से बात करनी चाहिए। दरोगा जी को गुस्सा आ गया। सिपाहियों से कहा..पकड़कर गाड़ी में बिठाओ, दोनो को। एक रात बन्द रहेंगे हवालात में तो रात में घूमना भूल जाएंगे।

कवि विरोध करते रहे लेकिन भारत मे पुलिस से बड़ा कौन है? दोनो को गाड़ी में बिठाया और 10 किमी दूर मडुआडीह स्टेशन के पास उतारते हुए दरोगा जी बोले..कवि हो इसलिए छोड़े दे रहे हैं, कवि न होते तो जेल में बन्द कर देते। जाओ! सुबह तक चाय जरूर मिल जाएगी। पी कर ही घर जाना। 

दोनो खिसियाए, मुँह लटकाए, दरोगा जी को कोसते, घर की ओर पैदल ही चलने लगे। दोनो मित्रों को घर पहुँचने में भोर हो गया लेकिन मानना पड़ेगा कि चाय पीकर ही एक दूसरे को गुडबाय कहा।

25.8.18

लोहे का घर -47(एक प्रेम कथा)

फिफ्टी डाउन अपने सही समय पर चल रही थी। हम जहां बैठे थे वहीं एक युवा परिवार सफ़र कर रहा था। बीमार सी दिखने वाली पत्नी, तीन छोटे-छोटे मैले कुचैले वस्त्र पहने बच्चों को बमुश्किल संभाल पा रही थी। हर साल प्रकाशित होने कैलेंडर की तरह तीनों आपस में एक-एक वर्ष से बड़े छोटे होंगे। गोदी का बच्चा मां का दूध पी रहा था और बड़ी दो बेटियां बारी-बारी से खिड़की झांक रही थीं। हालांकि गोदी वाले बच्चे के सर के बाल भी लड़कियों की तरह बड़े-बड़े थे तो हमें लगा वह भी लड़की है! तभी  मेरे बगल में बैठे उनके जनक ने हंसते हुए गर्व से कहा..यह लरका है। मुंडन कराने जा रहे हैं बक्सर। देवी को बकरा चढ़ाएंगे। उधर ऐसी मानता है।

मैंने उसका उत्साह बढ़ाया..कोई बात नहीं जी! आपकी कहानी भी मेरी तरह है। पुत्र की कामना में कितने लोग पांच छः लड़कियां पैदा करते हैं, आपको तो भगवान ने दो के बाद ही पुत्र दे दिया। हमारी भी दो लड़कियां ऐसे ही एक के बाद एक हुईं। सब भगवान की कृपा है। हां, तीसरा बच्चा हमें पॉच साल बाद हुआ लेकिन यहां आपने थोड़ी जल्दी कर दी। आगे क्या इरादा है? 

वो खुलकर हंसने लगा। अब हमारे बीच से अपरिचितों वाला शील संकोच गायब हो चुका था। उसने अपनी राम कहानी सुनानी शुरु की और मैं दम साधे सुनता रहा.. 

मेरा नाम अजय है। भभुआ, बिहार का रहने वाला हूं। लुधियाना में सिलाई का काम करता था। साल २०१० की बात है। घर में शादी तय हो गई थी। पन्द्रह दिन बाद शादी/गौना था। मैं अपनी शादी के लिए घर जाने की तैयारी में था कि सिलाई के काम से हिमाचल जाना पड़ गया। लौटकर आया तो वहीं बुरी तरह फंस गया। 

अरे! क्या हुआ?

मेरे जिगरी दोस्त ने दगा दे दिया जी। मेरे नाम से एक सरदार जी से पचास हजार कर्जा ले लिया और सब पैसा लेकर फरार हो गया। मेरी मोटर सायकिल भी ले गया। लौटकर लुधियाना आया तो सब कुछ लुट चुका था। सरदार जी ने मुझे पाया और मैं फंस गया। 

शादी करने घर नहीं गए?

कैसे जाता? वो तो सरदार जी का भला हो कि उसने काम करने दिया और पैसा चुकाने का मौका दे दिया। 

फिर शादी ?

शादी टूट गई जी। पिताजी को शादी के लिए लिया पैसा भी लौटाना पड़ा। जब मैं घर गया ही नहीं, कोई खबर ही नहीं दिया तो घर वाले क्या करते? मेरे कठिन वक़्त में इसने (पत्नी को दिखाकर) बड़ा सहारा दिया!!!

तो! आप लोगों ने लव मैरेज की है? कितना पढ़े हैं आप लोग?

मैं तो अनपढ़ हूं जी, ये बी. ए. पास है!

अब चौंकने की बारी मेरी थी। इसीलिए इनका ये हाल किया आपने? एक के बाद एक तीन बच्चे! शरीर देख रहे हैं? फिर मैंने पत्नी की ओर रुख किया..और आपने क्या देख कर इनसे शादी की? 

बस हो गया जी। ये हमारी दुकान में आती थीं, धीरे धीरे हो गया। मैंने इनके खाने में कोई कमी नहीं करी। पूछिए इनसे.. मांस, मछली..जो यह कहे लाया कि नहीं? खाती ही नहीं है तो क्या करें? पत्नी भी अब खुल कर बतियाने लगी थीं.. दिमागी टेंशन से। इनको क्रोध बहुत आता है। अजय हंसकर कहने लगा.. क्रोध क्यों आता है, किस बात पर आता है? पूछिए ? खाना ही नहीं खाती। 

अब घर जा रहे हैं? घर वालों ने स्वीकार कर लिया? 

शुरु शुरु में तो बहुत दिक्कत हुई। घर से भी गए, ससुराल से भी गए। न इनका कोई, न मेरा। लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो गया। बक्सर में इनके पिताजी ने एक घर दिया है, वहीं जा रहे हैं। बकरा चढ़ाना है, लड़के का मुंडन है। अपने घर वालों को भी वहीं बुलाएंगे। काम मिला तो लुधियाना से कपड़ा लाकर वहीं सिलाई करेंगे। नहीं मिला तो फिर लुधियाना चले जाएंगे।

मुझे किसी से उसकी जाति पूछना असभ्यता लगती है, इसीलिए नहीं पूछा। बस इतना ही कहा..सब ठीक हो गया, अब धीरे धीरे और अच्छा होगा। आप बस एक काम करना। इनकी हालत देख रहे हो न? अब बच्चे पैदा मत करना। जितनी जल्दी हो, अपनी नसबंदी करा लो। अब अगर बच्चा हुआ तो यह नहीं बचेंगी। फिर तुम्हारे इन बच्चों का क्या होगा? स्वस्थ रहीं तो पढ़ी लिखी हैं, सभी बच्चों को पढ़ाकर बड़ा आदमी बना देगी। 

उसने मुझे दिल से आश्वासन दिया.. अबकी जाड़े में जरूर करा लुंगा।

मैंने भी उन्हें दिल से आशीर्वाद दिया.. ईश्वर तुम लोगों को सदा खुश रखे। 

मन तो कर रहा था इनका साथ न छूटे लेकिन #ट्रेन बनारस पहुंचने वाली थी, मुझे उतरना था। मैंने उन्हें फिर एक बार भरपूर निगाहों से देखा और हाथ हिलाकर अपनी राह पकड़ ली।

6.5.18

अभागन की शादी

किशन लाल परेशान थे। हों भी क्यों न? बेटी जवान हो चुकी और अभी तक शादी के लिए योग्य तो क्या अयोग्य वर भी नहीं मिला! बेटी पढ़ी लिखी, खूबसूरत थी मगर हाय! दोनों पैरों से अपाहिज ही बड़ी हुई थी अभागन। लड़के की तलाश में रिश्तेदारों, परिचितों के दरवाजे-दरवाजे माथा टेकते कई दिन बीत चुके थे। आज का मोबाइल और नेट का जमाना होता तो शायद इतना व्यर्थ न दौड़ना पड़ता। सब इनकार ऑन लाइन ही मिल जाता। कोई सकारता तो चल जाते उसके घर।

सब ओर से निराश हो अपने गांव लौट जाने की सोच रहे थे किशन लाल। भोर का समय था और राधे चाय वाले ने पहली केतली धरी ही थी आंच पर। भट्टी से अभी धुंआ निकल रहा था। चाय देखी तो पीने की चाह में रुक गए। जय रम्मी के बाद राधे ने बेंच पर बैठने का इशारा क्या किया, थच्च से बैठ कर अपना दुखड़ा रोने लगे। चाय पीते-पीते जैसे ही उन्होंने अपना वाक्य पूरा किया…अब कौन करेगा अभागन से शादी? वहीं पास खड़ा हो, नीम के दातून से दांत रगड़ रहा एक युवक पास आया और झुक कर चरण छूने के बाद बोला.. बाऊजी! मैं करूंगा आपकी बेटी से शादी! मैं बहुत देर से आपकी बातें सुन रहा हूं। आप ही के जाति बिरादरी का हूं। आपको अपने गांव में कोई परेशानी नहीं होगी। सेना में सैनिक हूं। आज ही डयूटी ज्वाइन करने का आदेश है। इसलिए अभी तो नहीं लेकिन आज से 6 माह बाद इस तारीख को मैं अपने पूरे परिवार और मित्रों के साथ आपके घर आऊंगा। आप शादी की तैयारी शुरू कीजिए! इतना कह कर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लड़का मोटर सायकिल स्टार्ट कर वहां से चला गया।

किशन लाल को लगा किसी ने उसके साथ बड़ा भद्दा मजाक किया है! मैं ही पागल हूं जो हर जगह अपना दुखड़ा सुनाता रहता हूं। राधे चाय वाले ने किशन लाल को समझाने का खूब प्रयास किया कि मैं लड़के को जानता हूं। पास ही के गांव का है। सेना में मेजर है, कहा है तो आएगा लेकिन किशन लाल को यकीन नहीं हुआ। बिना लड़की देखे, मेरे बारे में जाने, दहेज की बात किए कैसे कोई अपाहिज लड़की से शादी करने को तैयार हो जाएगा? लड़के ने मेरे साथ बड़ा भद्दा मजाक किया है। रोते कोसते किशन लाल चाय की दुकान से भारी मन लिए बड़बड़ाते लौट गए.. लड़के ने मेरे साथ...।

अपने गांव/घर आ कर भी किशन लाल कई दिनों तक बेसूध से घूमते नजर आते। अब इत्ती बेइज्जती की बात किससे कहें? क्या विश्वास करें और क्या तैयारी करें? बिटिया तो पहले से ही कहती है कि उसे किसी से शादी नहीं करनी। मास्टरनी बन जाऊंगी और ढेर सारे बच्चों को पढ़ाऊंगी।

कहे भी तो किससे कहे? अंत में कई दिनों बात उनके मन का लावा शर्मा नाऊ के पीढ़े पर बैठे दाढ़ी बनाते समय निकल ही गया! सब बात बता कर किशन लाल बोले... यह यकीन करने की बात है? छोरे ने मेरे साथ बड़ा भद्दा मज़ाक किया है। शर्मा नाऊ ने हंसते हुए कहा.. क्या जाने तुम पर भगवान को दया आ गई हो और भेज दिया हो किसी को तुम्हारी भलाई करने! तारीख याद रखियो, कहीं सच में आ गया तो का करोगे? वैसे लड़का देखने में कैसा था? किशन लाल को लगा शर्मा भी मेरा मजाक उड़ा रहा है। है ही ऐसी बात कि सभी मजाक उड़ाएंगे। इत्ते दिनों से दिल में जब्त था, नाहक मुख से फिसल गया।

इधर शर्मा नाऊ को अपने ग्राहकों को सुनाने के लिए नया मसाला मिल गया! धीरे धीरे कुछ ही दिनों में किशन लाल की छोड़, पूरा गांव जान गया कि किशन लाल के घर फलां दिवस बारात आने वाली है।

निर्धारित तिथि पर सच में आ गई बारात! गांव में हल्ला मच गया..बारात आ गई, किशन लाल के घर बारात आ गई। पगला सो चुका होगा खा पी कर। उसे जगाओ। बिटिया को सजाओ। शादी का मंडप तैयार करो। आग लगाओ, भट्टी सुलगाओ और देखते ही देखते पूरे गांव ने बारात को हाथों हाथ ले लिया। मंडप सजा, पण्डित आए.. बारात किशन लाल के घर तक तभी पहुंच पाई जब सारी तैयारी पूरी हो गई।

वर्षों बाद लड़के के गांव के पास राधे चाय की दुकान पर चर्चा होती है...

इस गांव में जब पहली बार आईं, वैशाखी पर आईं । अब तो आप देख ही रहे थे, कैसे आराम से कार चला कर जा रही थीं प्रिंसिपल मैडम? पीछे वाली सीट पर उनके दो बेटे थे और बगल में मेजर साहब। कित्ते सुंदर बच्चे थे न?

2.1.14

टिंबकटूं, शेखचिल्ली और चिलगोजर


तीन मित्र थे- टिंबक टूं, शेखचिल्ली और चिलगोजर। नाम से ऐतराज हो तो आप अपने सुविधानुसार दूसरे नाम भी समझ सकते हैं। मैने ये नाम इसलिए दिये कि मुझे बहुत प्रिय थे और कहीं अपने बचपन में किसी कथा-कहानी को पढ़ते हुए दिमाग में बैठ गये थे। मेरे इन पात्रों में टिंबकटूं सबसे चालाक, शेखचिल्ली सबसे मूर्ख और चिलगोजर सबसे हिम्मती था। मैने इन पात्रों को तब गढ़ा था जब मेरी दोनो बेटियाँ बहुत छोटी थीं। उन्होने बोलना सीख लिया था और तोतली जुबान में तब मुझसे लिपट जातीं जब मैं ऑफिस से घर आकर सब्जी और दूसरे घर के सामाने का झोला पटक कर चाय पीने बैठता। श्रीमती जी लम्बी सांस लेतीं और कीचन में यह कहते हुए घुस जातीं-अब आप संभालिये! मेरी मजबूरी थी कि मैं उन्हें देर तक झूठी-मुठी कहानियों में भुलाता रहता। यदि ऐसा न करता तो समय से भोजन मिलना संभव ही नहीं था। मैं शुरू करता-तीन मित्र थे..तभी कोई बोल पड़ता- आं आं पता है तिबंकतू, थेखतिल्ली औsss...तिलगोदर। आगे बताइये... :) 

तीनो में घनिष्ट मित्रता थी। कोई टोकता ..घनित माने ? मतलब.. खूब मित्रता थी। …अत्ता। तीनो तुम लोगों से अधिक बड़े नहीं थे। आठ-दस साल के होंगे। एक दिन पता है क्या हुआ! टिंबकटूं ने नदी किनारे मछली पकड़ने की योजना बनाई। सबको सूर्योदय के समय बुला लिया और बैठ गया नदी में बंसी डाल कर। छोटी बिटिया बीच में ही टोक देती.. बंती तो आप बजाते हैं न पापा ! उतते तिबंकतू मतली कैते पकल तकता है ? तब तक बड़ी समझाती- तिंबकतूं पापा की तलह बंती बदाता होगा..मतलियाँ तुनने के लिए आतीं होंगी, तिलगोदर और थेखतिल्ली दौल कल पकल लेते होंगे, है न पापा ? 

मैं माथा पीट लेता। दोनो की टोकाटेकी के कारण जो कहानी सोच रहा होता वह सब भूल जाता लेकिन प्रश्न ऐसे होते की बिना बताये आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। मैं समझाता-वो दूसरी वाली बंसी होती है। एक लम्बी-सी डंडी होती है। जसमें एक तरफ मछली को फंसाने के लिए एक मजबूत धागा लटका होता है। जिसमें लोहे का कांटा बंधा होता है। कांटे में मछली को खाने के लिए कुछ फंसा देते हैं, जिसे चारा कहते हैं। फिर धागे को पानी में डुबो देते हैं और डंडी को पकड़ कर नदी किनारे बैठ जाते हैं। मछली चारा खाने के लिए आती है और कांटा उसके मुँह में फंस जाता है। कांटे में मछली के फंसते ही डंडी भारी लगने लगती है और किनारे बैठा शिकारी झट से धागे को ऊपर खींच लेता है। मछली फँस जाती है। समझी? दोनो बिटिया एक साथ बोल पड़तीं-तमझ गये। तिबंकतू बहुत बदमात था! मतली को खाने का लालच देकल पकल लेता था! 

मैं समझाना चाहता-हाँ बेटा। जबसे यह दुनियाँ बनी है तभी से चालाक और ताकतवर, कमजोर और सीधे लोगों को फँसाने का खेल खेलते आये हैं। यह दुनियाँ भी एक नदी की तरह है। जहाँ घाट-घाट पर बहुत से ‘टिंबकटूं’ बंसी लटाकाये बैठे हुए हैं। अपने आनंद के लिए मछली के गले में कांटा फँसाकर पकड़ना और खा जाना इनकी आदत है। सावधानी तो मछलियों को रखनी पड़ती है। लेकिन इतना ही कह पाता- जीव ही जीव का भोजन होता है। जंगल में बड़े जानवर, कमजोर को मारकर अपनी भूख मिटाते हैं। मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है। वह शिकार भी करता है और अन्न भी उगा सकता है। बहुत से लोग ऐसे हैं जो मछली पकड़कर, इनको बेचकर ही अपना और अपने परिवार का पेट भर पाते हैं। भूख मिटाने के लिए शिकार करना उनकी मजबूरी है। सिर्फ आनंद लेने के लिए दूसरे जीवों को कष्ट देना गलत बात है। टिंबकटूं सिर्फ आनंद लेने के लिए मछली पकड़ रहा था। इसलिए तुम लोगों का कहना सही है। टिंबकटूं बदमाशी कर रहा था। 

आगे जानती हो क्या हुआ? (अब मैं जल्दी-जल्दी कहानी पूरी करना चाहता था। कीचन में पक रहे भोजन की खुशबू आने लगी थी।) एक बड़ी-सी मछली जाल में फँस गई। टिंबकटूं चीखा- भारी मछली फँसी है। पकड़ो-पकड़ो। वह चीखकर कहना चाहता था कि मछली भारी है जल्दी से डंडी पकड़ो नहीं तो मैं ही पानी में गिर जाउँगा लेकिन शेखचिल्ली तो मूर्ख था ही। उसने समझा टिंबकटूं मछली पकड़ने के लिए कह रहा है। वह खुद ही दौड़कर नदी में कूद गया मछली पकड़ने के लिए। 

दोने बेटियाँ जोर-जोर से हँसने लगतीं। छोटकी कहती-उतको तो तैलना आता है। बड़की कहती-लेकिन कपला तो भीग ही गया न! मैं कहता-फिर जानती हो क्या हुआ ? शेखचिल्ली मछली को नहीं, मछली शेखचिल्ली को पकड़कर नदी में ले जाने लगी! 

दोनो चीखतीं- धूत! धूत! 

मैं समझाता-मेरा मतलब है कि मछली इत्ती बड़ी और ताकतवर थी कि शेखचिल्ली उसे पकड़कर ला ही नहीं पा रहा था और लालच में छोड़ भी नहीं रहा था। दोनो अचरज से पूछतीं- तब का हुआ ? मैं समझाता-चिलगोजर को भूल गई? चिलगोजर ने देखा तो दौड़कर नदी में कूदा और मछली को पकड़ लिया। इतने में टिंबकटूं भी आ गया। फिर तीनो मिलकर मछली को पकड़ कर किनारे ले आये। पानी से बाहर निकलते ही मछली छटपटाने लगी। शेखचिल्ली मछली को छटपटाते देखकर बोला-लगता है मछली को ठंडी लग रही है! तभी इत्ता कांप रही है!!!  टिंबकटूं को उसकी बात सुनकर गुस्सा आ गया। वह शेखचिल्ली को मारने के लिए दौड़ा-मूर्ख! यह पानी से निकलने के कारण छटपटा रही है और तुम कह रहे हो कि इसे ठंडी लग रही है!!! चिलगोजर ताली पीट-पीट कर हँसने लगा। इत्ते में जानती हो क्या हुआ? 

दोनो आँखे फाड़कर - का हुआ? 

मछली छटपटाते-छटपटाते फिसलकर पानीं में गिर गई। मछली को पानी में गिरते तीनो ने देखा तो फिर से दौड़ पड़े पकड़ने के लिए। लेकिन जानती हो क्या हुआ? 

… का हुआ? 

मछली पानी में भाग गई! इतना सुनते ही दोनो खुशी के मारे चीखने-उछलने लगीं। हो हल्ला सुनकर बच्चों की अम्माँ कमरे में आ गईं- क्या हुआ? 

दोनो हाथ नचाकर बोलीं-मतली पानी में भाग गई! 

बहुत देर तक दोनो का नाटक चलता रहता। एक पूछती-का हुआ? दूसरी कहती-मतली पानी में भाग गई!  

मैं मनाता-हे ईश्वर! इनकी हँसी यूँ ही सलामत रहे। मछलियाँ कभी किसी लालच में न फँसें और अगर फँस भी जायें तो शिकारियों को चकमा देकर भागने में कामयाब हो जायें।

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4.3.11

व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर....?


मौज लेने के लिए लिखी गयी  हल्की-फुल्की छोटी कहानी। कृपया गंभीर साहित्यिक मूड में न पढ़ें....

दोनो साथ पढ़ते थे। लड़के के पिता एक कॉलेज के प्रिंसिपल थे तो लड़की की माँ दूरसंचार में अधिकारी। एक दिन लड़के ने लड़की से पूछा - व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़की ने झट से अपनी माँ का मोबाइल नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार रंग जमाने कॉलेज में लाया करती थी। फिर उसने लड़के से पूछा - व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ?  लड़के ने भी तुरंत अपने पिता का नम्बर बता दिया जो वह कभी कभार कॉलेज में रंग जमाने लाया करता था।

एक शाम ल़ड़की की माँ ने अपने मोबाइल में एक मैसेज पढ़ा - यू आर वेरी ब्युटीफुल ! पढ़कर वह शर्मा गई। सोंचने लगीं। जरूर अरोड़ा का काम होगा ! चार दिन से मुझे घूर रहा था। मन किया कि जोर की फटकार लगाऊँ मगर फिर रूक गई। चलो मजा लेते हैं। उत्तर दिया...थैंक्स ! यू हैंडसम ! इधर लड़के ने मैसेज पढ़ा तो मोबाइल फेंक नाचने लगा। रात में प्रिंसपल ने मैसेज बाक्स खोला तो पढ़कर दंग रह गया ! चिंतित हो गया। मैने क्या किया जो एक लड़की मुझे इस तरह धन्यवाद दे रही है ?  सेंट मैसेज खोला तो पाया....यू आर वेरी ब्युटीफुल !  समझ गया कि मेरा लड़का किसी लड़की के चक्कर में फंस गया है। फिर सोचा कि चलो लड़की देख लेते हैं। सुंदर सुशील होगी तो हर्ज क्या है ! बहुत से लड़के लव मैरिज करते हैं। मेरा लड़का भी करे तो क्या बुरा है ! लिखा....कल शाम छः बजे पार्क में मिलो। हाथ में गुलाब हो तो समझ जाऊंगा कि तुम भी मुझसे प्यार करती हो !

लड़की की माँ ने पढ़ा तो दो फीट उछल गई ! बड़बड़ाई...इस अरोड़ा के बच्चे को तो मजा चखाना ही पड़ेगा ! दूसरे दिन ऑफिस से छूटते ही पहुँच गई पार्क में। शाम का समय। हाथ में गुलाब। ठीक छः बजे प्रिंसपल साहब आये बहू देखने ! पूरा पार्क छान मारा। कहीं कोई षोड़शी न दिखी। दिखी तो एक प्रौढ़ महिला ! एक हाथ में गुलाब लिये ऐसे खड़ी थी मानो कृष्ण के मोरपंख में गुलाब टांकना चाहती हो ! उधर लड़की की माँ परेशान। कहाँ मर गया अरोड़ा का बच्चा ? आना नहीं था तो मुझे क्यों बुलाया ? लोग क्या सोचते होंगे ? वह बुढ्ढा तो मुझे ही घूर रहा है ! उंह..! झल्लाकर गुलाब झाड़ियों में फेंका और पैर पटकती जाने को हुई कि फोन कि घंटी बजी....हैलो..! कौन..?  उधर से आवाज आई.....तुम कहाँ हो ? मैं कितनी देर से पार्क में खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ? चौंककर पलटी तो कोई नहीं ! सिर्फ वही बुढ्ढा फोन में किसी से बात कर रहा था। अचानक ज्ञानचक्षु खुल गये ! पारा सातवें आसमान पर ! ओह…! तो ये हजरत हैं ! दनदनाती पहुँच गईं प्रिंसिपल साहब के पास ! बोलीं...ऐ मिस्टर ! व्हाट इज योर मोबाइल नम्बर ? प्रिंसपल सकपकाये। थोड़ा हकलाये...! क्यों ? क्यों पूछ रही हैं आप ? क..क..कहीं आपका मोबाइल नम्बर यह तो नहीं ? लड़की की माँ ने सुना तो तिलमिला कर बोलीं...हाँ...यही है ! मगर ज्यादा भोले बनने की जरूरत नहीं है। आपको शर्म आनी चाहिए ! किसी भद्र महिला को इस तरह परेशान करते हुए। प्रिंसिपल साहब भी तमतमा गये...शर्म ! मुझे आनी चाहिए ? आपको नहीं ? क्या जरूरत थी आपको मेरे मोबाइल में संदेश भेजने की ? मोबाइल में हैण्डसम ! सामने बद्तमीज ! लड़की की माँ सकपका गईं। उसे इस तरह के जवाब की उम्मीद न थी। बोली...जरूर हमलोगों को कुछ गलतफहमी हो गई है। आइए बैठकर बातें करते हैं। प्रिंसपल बोले...यह ठीक है। चलिए उस रेस्टूरेंट में चलकर एक कप कॉफी पीते हैं। एक घंटे के बाद दोनो जब उस रेस्टूरेंट से निकले तो उनके ठहाकों की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी।

कुछ दिनो पश्चात। लड़की ने दुःखी होकर लड़के से कहा.....आजकल एक बुढ़ढा रोज मेरे घर आ रहा है। कल वह मेरी माँ से देर तक हंस-हंस कर बातें कर रहा था। मुझे भी देखा। बोला...यदि आपकी लड़की मेरे साथ रहने को तैयार है तो मुझे यह शादी मंजूर है। लड़का चौंका ! अच्छा ! परसों शाम मेरे घर भी एक महिला आई थी। मेरे पिताजी से खूब हिलमिल कर बातें कर रही थी। पूछ रही थी...आपके लड़के को तो कोई आपत्ति नहीं ? पिताजी बोले उसे क्या आपत्ति हो सकती है ! तो बोली...मुझे यह शादी मंजूर है।

लड़की....इसका मतलब तुम्हारे पिता जी दूसरी शादी करना चाहते हैं ?

लड़का...ठीक कह रही हो। तुम्हारी बातों से भी यही लगता है कि तुम्हारी मम्मी दूसरी शादी करना चाहती हैं !

लड़की...कहीं तुम्हारे पिता प्रिंसिपल तो नहीं ?

लड़का...कहीं तुम्हारी मम्मी दूर संचार विभाग में अधिकारी तो नहीं ?

दोनो एक दूसरे से लिपटकर देर तक रोते रहे। घंटो पश्चात दोनो ने फैसला किया कि अब इस दुनियाँ में जीने से कोई फायदा नहीं। कल सुबह राजघाट पुल से गंगा में कूद कर आत्महत्या कर लेते हैं। हाँ फिर हमारे मम्मी-पापा जैसा चाहें वैसा करें। सुबह ठीक छः बजे मिलने का वादा कर दोनो अपने-अपने घर लौट गये। दोनो ने अपना-अपना सुसाइट नोट तैयार किया....

लड़के ने लिखा...पिता जी ! आपको शादी मुबारक हो...गुड बाय !

लड़की ने लिखा..मम्मी ! आपको शादी मुबारक हो...गुड बाय !

दूसरे दिन। लड़की ने माँ को अंतिम बार देखा। माँ गहरी नींद में सो रही थी। टेबल पर शादी के कार्ड रखे थे। मारे गुस्से के तिलमिलाई....ओह ! तो इनलोगों ने शादी के कार्ड भी छपवा लिये ! इस उम्र में धूम धाम से शादी करेंगे ? आँसूओं को जब्त कर धीरे से एक कार्ड उठा लिया।

पुल पर लड़का उसी का इंतजार कर रहा था। लड़की ने लड़के के हाथ में कार्ड रख दिया। लड़का बोला..यह क्या है ? लड़की बोली...मरने से पहले अपने पिताजी के शादी का कार्ड नहीं देखना चाहोगे ? लड़के ने कार्ड खोला। कार्ड में सुनहरे अक्षरों में उसका और लड़की का नाम लिखा हुआ था ! उसने मारे शर्म के लड़की को कार्ड थमाते हुए कहा...मरने से पहले तुम भी देख लो ! कहीं इस बात का अफसोस न रहे कि जीते जी हम अपने माँ-बाप को ठीक से पहचान नहीं सके !

नीचे नदी के बीच धार में नाव पर बैठा बूढ़ा माझी युवा जोड़े को आपस में लिपटते, रोते, हँसते, खिलखिलाते देख झूम कर गाने लगता है....जै गंगा मैया तोहें पियरी चढ़ैबे.......