2.8.18

फेसबुक में पुस्तक चर्चा -2

Nivedita Srivastava
जिक्र जब किताबों का हो रहा हो ,तब मेरा मन इतना चलायमान हो उठता है कि लगता है इस किताब के बारे में बोलूँ तब तक दूसरी किताबें दस्तक देने लगती हैं जैसे मेरे बारे में क्यों न बोला ... 😊 ऐसी परिस्थिति में मैं #अमृताप्रीतम की तरफ खिसक लेती हूँ ... अमृता जी की कविताएं हो या उपन्यास दोनों बिना कुछ अतिरिक्त बोले मन को बांध लेते हैं ....
आज मैं अमृता प्रीतम जी के उपन्यास #उनचास #दिन की बात करूँगी ..... इस उपन्यास को सबसे पहले मैंने तब पढ़ा था, जब मैं इंटर में थी । ये उपन्यास और इसके पात्र करीम ,संजय और मीता ने मेरे जेहन पर कब्जा कर लिया था .... कभी कभी एक पागल सी ख्वाहिश भी जागती थी करीम ऐसा कोई दोस्त होता जो संजय के जैसा भगवान से भी लड़ जाता मेरे लिये ! कथानक संजय की बेहोशी की हालत में उनचास दिनों में घूमता है । संजय का पागलपन मीता के लिये ,जो बहिश्त की हूरों में भी मीता को ही तलाशता है और दूसरी तरफ करीम का पागलपन है जिसका विश्वास है कि उनचास दिनों के बाद रूह दूसरा जिस्म पा जाती है । 

बड़े छोटे छोटे मासूम से लम्हे भी हैं - करीम की पत्नी पेड़ काटने की बात कर के उसके मन मे संशय बीजती है ,तभी उसकी बेटी शीरीं फूलों के पौधे लिये सामने आ जाती है ,एक नई उम्मीद की तरह ! इंद्रधनुषी झूले पर झूलती मीता , सात आसमान की परतों से अपने यार को वापस खींच लाने की कोशिश में डायरी लिखता करीम .... सब पर भारी पड़ता है करीम का अपनी बेटी शीरीं से कहना कि तू तो मेरे जैसी ही है .... सब एक पेंटिंग की तरह सामने आ जाते हैं । 
अमृता जी की लेखनी के हम से दीवाने उनके उपन्यास में भी कविता पा जाते हैं 😊
दूसरी लेखिका की बात करूँ तो #प्रभा #खेतान जी का नाम लूंगी .... #छिन्नमस्ता है इनके उपन्यास का नाम ।इसमें एक बेबस सी लड़की किस तरह परिस्थितियों के सामने कुचली जाती रही ,पर जब उसका आत्मविश्वास जागता है तो एकदम से ही परिस्थितियाँ बदल जाती हैं । डगमगाते मन को एक साहस देती ढांढस बंधाता है इसका कथानक । 
Nivedita Srivastava
है कि मैं किधर किताबों की भीड़ में गुम हूँ 😄 .... और हाँ बुक फेयर में ही मैं अपना पर्स ले जाना कभी नहीं भूलती ,सिर्फ इसलिए कि जितना समय अमित जी का इंतजार करने में लगेगा उतनी देर में तो और भी किताबें खोज लूंगी 😇
आज बचपन की एक घटना शेयर करूँगी ... 
मम्मी कभी भी पुराने पेपर बेचती नहीं थीं कि इसका कोई मोल हो ही नहीं सकता ,पर पापा की ट्रांसफर वाली सर्विस की वजह से सब नहीं रखा जा सकता था ,तो वो रददीवाले को ऐसे ही पेपर दे देती थीं । एक बार वो पुराने पेपर निकाल रहीं थीं कि पापा आ गए और अचानक से ही उनकी निगाह उसके बोरे पर पड़ गयी । उन्होंने उसमें से एक किताब निकलवाई जो फ़टी हुई थी । रददीवाला चौंक गया ,"बाबूजी ई त फटी ह " पापा ने कहा "कोई बात नहीं ,ये मुझे चाहिये " और उन्होंने उसको रुपये दिये । मैं शायद 7 या 8 कक्षा में रही होउंगी ।उन्होंने मुझको वो किताब दी और कहा ," इसको ध्यान से पढ़ो और जहाँ के पन्ने गायब हैं या फ़टे हुए हैं ,उनको तुम अपने मन से लिखो ये सोच कर कि वहाँ क्या हो सकता है ।" एकबार को तो भाई और मैं चकरा गये कि ये क्या हुआ । खैर मैंने उनके कहे अनुसार कोशिश की ,अब उस समय मैं क्या लिख पायी होउंगी याद नहीं है। इस काम के इनाम के तौर पर मुझको उस किताब की नई प्रति मिली .... किताब का नाम था "गोदान" 😊 बाद में मैंने पापा से पूछा कि इतने महान लेखक की किताब के गायब अंश मुझसे क्यों लिखवाए । पापा का जवाब मुझे आज भी याद है ,उन्होंने कहा ,"किसी के नाम से प्रभावित हुए बिना पढ़ो तो तुम उसको ज्यादा अच्छे से समझोगी ।" मैंने उनकी इस बात की गाँठ बांध ली और नए पुराने हर लेखक को समभाव से सादर पढा । 
आज प्रेमचंद जी के जन्मदिन पर उनको नमन करते हुए इस संस्मरण को जी रही हूँ ।
आज की पोस्ट लम्बी हो गयी ,तो पसंदीदा किताबों के बारे में बिना कुछ लिखे ही नाम बताती हूँ .... 
#इसमतचुगताई जी की काग़ज़ी हैं पैरहन
#प्रतिभाराय जी की कोणार्क
#शंकर #मोकाशी #पुणेकर जी की अवधेश्वरी 
आज अपने जिन साथियों से उन की पसन्द जानना चाहूँगी वो हैं - प्रियंका गुप्ता ,Shekhar Suman ,Sunita Raman,Sudha Chaudhary 🤗🤗🤗
मेरी प्रिय पुस्तक श्रृंखला में आज मैं प्रतिभा रॉय का "द्रौपदी" उपन्यास लायी हूँ. लेखिका ने उपन्यास में द्रौपदी की अंतर्वेदना, उसकी चाहत, उसकी सोच को दृष्टि दी है. द्रौपदी के माध्यम से उस समय को चरितार्थ किया है जहाँ स्त्री सिर्फ वस्तु बना दी जाती है.....द्रौपदी क्या सोचती थी ये जानना बेहद जरूरी है. लेकिन अक्सर उसे ही उपेक्षित रखा गया. आखिर कैसे पितृ सत्ता द्रौपदी यानि स्त्री के दृष्टिकोण को परिलक्षित करती और फिर वो समाज द्वारा स्वीकार्य हो जाता , ऐसे में उनका वर्चस्व, उसका सिंहासन न हिल जाता? लेखिका ने सम्पूर्ण स्त्री विमर्श को आधार बनाया है. एक सोचने को विवश करता उपन्यास संग्रहणीय है.
वहीँ शिवाजी सावंत द्वारा लिखित "मृत्युंजय" कर्ण के दृष्टिकोण को व्याख्यायित करने का प्रयास है. वैसे भी महाभारत में हर किसी का एक अपना दृष्टिकोण था. हर कोई अपने नज़रिए से उस समय को देख रहा था और अपना पक्ष तय कर रहा था. ऐसे में कर्ण ने भी अपने नज़रिए से अपना दृष्टिकोण तय किया लेकिन क्यों उसका उत्तर इस उपन्यास में मिलता है. लेखक ने यहाँ कर्ण के मन में किस पात्र के लिए क्या क्या भावनाएं थीं, उनका विस्तृत वर्णन किया है जो जरूरी भी है. हम किसी भी घटना को एक ही नज़रिए से नहीं देख सकते. सबके नज़रिए को समझने की कोशिश करनी चाहिए शायद तब सही अन्वेषण कर सकें.
मेरी प्रिय पुस्तक श्रृंखला में आज मैं लायी हूँ डॉ मिनाक्षी स्वामी जी द्वारा लिखित उपन्यास "भूभल". 
उपन्यास स्त्री विमर्श का जीता जागता उदाहरण है. स्त्री फिर वो किसी भी तबके की हो, किसी भी पद पर हो, किसी भी जाति की हो, वो है सिर्फ स्त्री ही यानि एक देह भर........पितृ सत्ता की निगाह में, हमारे समाज की निगाह में, फिर वो मीडिया हो, पुलिस हो या कानून व्यवस्था......दोषी पुरुष दोषी होने पर भी दोषी नहीं लेकिन स्त्री जो पीड़ित है वो ही दोषी फिर वो जज ही क्यों न हो ........क्या ये तथ्य विचारणीय नहीं कि आज हमारा समाज , हमारी सोच किस दिशा की ओर अग्रसित है ? बलात्कार शब्द ही तोड़ने को काफी होता है एक स्त्री को उस पर बाकी सारी तोहमतें न केवल उसे बल्कि उसके परिवार को भी तोड़ देती हैं लेकिन जरूरत है इसी सोच से आज़ादी पाने की और उस दिशा में कदम उठाने की ......देखा जाए तो कहाँ फर्क आया है आज भी समाज में और कितना? आज तो बलात्कार करने की इन्तहा हो गयी.......जागरूकता के बाद तो और ज्यादा अति हो रही है आखिर क्यों? शायद यही वो प्रश्न है जिस पर ध्यान देने की सबसे ज्यादा जरूरत है ........चाहे जितने आन्दोलन कर लो, कानून बना लो जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी कुछ नहीं होगा मानो यही लेखिका का इस उपन्यास में आह्वान है .....बहुत से प्रश्न पीछे छोड़ता है उपन्यास और पढने पर लगता है अरे यही तो हो रहा है आस पास .



"मेरी प्रिय पुस्तक" श्रृंखला के तहत अलग अलग टैग लाइन्स के साथ फेसबुक के तमाम मित्रों की सक्रियता और जोश देखकर अब विश्वास हो चला है कि फेसबुक पर कितना भी समय हल्की फुल्की बातों में बिता लिया जाय किन्तु यहाँ सार्थक परिचर्चा करने वाले असंख्य प्रबुद्ध लोग मौजूद हैं। Manish Vaidya जी द्वारा प्रस्तावित इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में जिन लोगों ने प्रत्यक्ष भूमिका का निर्वाह किया है, उन्हें हार्दिक धन्यवाद। आप लोगों ने सिद्ध किया है कि इस मंच की उपयोगिता केवल अपनी अपनी उपलब्धियाँ गिनाने तक ही सीमित नहीं है।

आप सभी की तरह मैं भी हर रोज थोड़ा बहुत सहयोग इस श्रृंखला को देने की कोशिश कर रहा हूँ।

आज ऐसी दो पुस्तकों के आवरण जो भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। इन दो विशिष्ट कृतियों के नाम हैं- * माटी मटाल * एवं 
* मृत्युंजय *

उड़िया भाषा के गौरव ग्रंथ के रूप में समादृत "माटी मटाल" वस्तुतः भारतीय भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिना जाता है। छह सौ से अधिक पृष्ठों में समाये "माटी मटाल" की कथा भारतीय जीवन विशेषकर ग्राम्य जीवन और संस्कृति की अद्वितीय दास्तान है। मूल कथा के बाद इस उपन्यास का सबसे सबल पक्ष इसका अनुवाद है। शंकरलाल पुरोहित साहब ने इस उपन्यास का ऐसा अद्भुत भावानुवाद किया है कि पढ़ते समय कहीं से यह अनुभव होता ही नहीं कि यह अनुवाद है। इस तरह की महाकाव्यात्मक कृतियों के अनुवाद में अनुवादक की भूमिका अतिशय महत्वपूर्ण होती है। यदि अनूदित करने वाला रचनाकार भावानुवाद करने की बजाय शब्दानुवाद में उलझा तो उच्चकोटि की किताब भी बेअसर साबित हो सकती है।
1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में असम की भूमिका पर आधारित "मृत्युंजय" असमिया भाषा के कालजयी उपन्यासों में अग्रगण्य है।
पराधीन भारत के उस दौर में असम के सामान्य जनमानस, उनके आक्रोश और विद्रोह की यादगार छवियाँ इस उपन्यास में दर्ज हैं।
गोसाईं जैसा अहिंसावादी व्यक्ति आजादी की दुर्निवार चाह में हिंसात्मक आन्दोलन की तरफ़ मुड़ जाता है। असम के तात्कालिक समाज , मानव स्वभाव की विभिन्न छवियों, आंदोलनकर्ताओं के आंतरिक एवं बाह्य संघर्ष, योजनाओं के निर्माण और निर्वाह की मुख्य कथा के समानांतर नायिका के कोमल मानवीय पक्ष की सहज प्रस्तुति उपन्यास को एक अलग कद और सर्जनात्मक ऊँचाई पर ले जाती है। डॉ कृष्ण प्रसाद सिंह मागध द्वारा अनूदित इस उपन्यास में मुख्य चरित्रों के मध्य प्रेम की ऐसी मर्यादित धारा बहती है जहाँ एक न होने की कसक है तो पारस्परिक मोह और आदर भी है।

1 comment:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, चैन पाने का तरीका - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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