26.11.10

पंचगंगा घाट


काशी दर्शन-2

                       पंचगंगाघाट....गंगा, यमुना, सरस्वति, धूत पापा और किरणा इन पाँच नदियों का संगम तट। कहते हैं कभी, मिलती थीं यहाँ..पाँच नदियाँ..! सहसा यकीन ही नहीं होता ! लगता है कोरी कल्पना है। यहाँ तो अभी एक ही नदी दिखलाई पड़ती हैं..माँ गंगे। लेकिन जिस तेजी से दूसरी मौजूदा नदियाँ नालों में सिमट रही हैं उसे देखते हुए यकीन हो जाता है कि हाँ, कभी रहा होगा यह पाँच नदियों का संगम तट, तभी तो लोग कहते हैं..पंचगंगाघाट। यह कभी थी 'ऋषी अग्निबिन्दु' की तपोभूमी जिन्हें वर मिला था भगवान विष्णु का । प्रकट हुए थे यहाँ देव, माधव के रूप में और बिन्दु तीर्थ, कहलाता था यहाँ का सम्पूर्ण क्षेत्र। कभी भगवान विष्णु का भव्य मंदिर था यहाँ जो बिन्दु माधव मंदिर के नाम से विख्यात था। 17 वीं शती में औरंगजेब द्वारा बिंदु माधव मंदिर नष्ट करके मस्जिद बना दी गई उसके बाद इस घाट को पंचगंगा घाट कहा जाने लगा। वर्तमान में जो बिन्दु माधव का मंदिर है उसका निर्माण 18वीं शती के मध्य में भावन राम, महाराजा औध (सतारा) के द्वारा कराये जाने का उल्लेख मिलता है। वर्तमान में जो मस्जिद है वह माधव राव का धरहरा के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ चढ़कर पूरे शहर को देखा जा सकता है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित पत्थरों से बना खूबसूरत हजारा दीपस्तंभ भी यहीं है जो देव दीपावली के दिन एक हजार से अधिक दीपों से जगमगा उठता है।

                       मोक्ष की कामना में काशीवास करती विधवाएँ, रोज शाम को आकर बैठ जाती हैं पंचगंगा घाट के किनारे। आँखें बंद किए बुदबुदाती रहती हैं मंत्र। एक छोटे से थैले के भीतर तेजी से हिलती रहती हैं अंगुलियाँ, फेरती रहती हैं रूद्राक्ष की माला....आँखें बंदकर...पालथी मारे... रोज शाम.....पंचगंगाघाट के किनारे। दिन ढलते ही, कार्तिक मास में, जलते हैं आकाश दीप....पूनम की रात उतरते हैं देव, स्वर्ग से...! जलाते हैं दीप...! मनाते हैं दीपावली...तभी तो कहते हैं इसे ‘देव दीपावली’ । देवताओं से प्रेरित हो, मनाने लगे हैं अब काशीवासी,  संपूर्ण घाटों पर देव दीपावली...आने लगे हैं विदेशी..होने लगी है भीड़...बनारस को मिल गया है एक और लाखा मेला...बढ़ने लगी है भौतिकता..जोर-जोर बजते हैं घंटे-घड़ियाल, मुख फाड़कर चीखता है आदमी,  जैसे कोई तेज बोलने वाला यंत्र, व्यावसायिक हो रहे हैं मंत्र...। आरती का शोर..! पूजा का शोर...! धीमी हो चली है गंगा की धार....पास आते जा रहे हैं किनारे...बांधे जा रहे हैं बांध...बहाते चले जा रहे हैं हम अपना मैल....डर है...कहीं भाग न जांय देव ..! भारतीय संस्कृति के लिए कहीं यह खतरे की घंटी तो नहीं…!

21.11.10

मुट्ठी भर धूप

..................................


एक प्रश्न करना था

बूढ़ी होती जा रही संध्या से

न कर सका


एक प्रश्न करना था

उषा की लाली से

न कर सका


न जाने कैसे

दुष्ट सूरज

जान गया सब कुछ

किरणों से मिलकर

लगाने लगा ठहाके

उत्तर आइनों से निकलकर

जलाने लगे

मेरी ही हथेलियॉं।


सहज नहीं है

कैद करना

धूप को

मुट्ठियों में।

19.11.10

व्यंग्य


काशी दर्शन-1

           काशी में निवास करने का एक सुख यह भी है कि दूर-दराज के रिश्तेदार, मित्र तीर्थाटन की दृष्टि से पधारते हैं और अपने स्वागत-सत्कार का अवसर काशी वासियों को  स्वेच्छा से प्रदान करते हैं। यह अवसर सभी को प्राप्त होता है मगर काशी वासियों को कुछ अधिक ही मिलता होगा, ऐसा मेरा सोचना है। एक तो बाबा विश्वनाथ दूसरे माँ गंगा के पवित्र तट पर  स्थित काशी के घाट, दोनों इतनी ख्याति अर्जित कर चुके हैं कि काशी के ठग, सड़कें और गंगा में गिरने वाली गंदी नालियों के संयुक्त प्रयास भी व्यर्थ ही सिद्ध हुए हैं। यह अवसर जब कभी हाथ लगता है तो नव निर्माण से गुजर रहे बनारस की खस्ताहाल सड़कों, भयंकर जाम व धूल-गंदगी के चलते अपनी दशा सांप-छछुंदर वाली हो जाती है। न तीर्थ यात्रियों के संग घूमने का ही मन करता है और न अतिथि की मनोकामना पूर्ण करने में किसी प्रकार की कोताही कर के, सामाजिक अपराध का भागी ही बनना चाहता हूँ ।  मन मन भावे, मुड़ी हिलावे से उलट, मन ना भावे, मुड़ी झुकावे वाले हालात पैदा हो जाते हैं। तुरत-फुरत पहला प्रयास तो यह होता है कि आई बला भक्काटे हो जाय ! सांप भी मर जाय और लाठी भी न टूटे ! मतलब अतिथि को दर्शन भी प्राप्त हो जाय और मुझे साथ जाना ही न पड़े। मगर ऐसे मौकों पर सबसे पहले जीवन साथी ही साथ छोड़ जाती है तो मित्रों या घर के दूसरे सदस्यों से क्या अपेक्षा की जाय ! टका सा जवाब होता है...जब मैं ही घूमने चली जाऊँगी तो घर का काम कौन करेगा...? भूख तो लगेगी ? भोजन तो ठीक टाईम पर चाहिए ही होगा ? यह संभव नहीं कि दिन भर घूमूं और शाम ढले वापस आकर स्वादिष्ट भोजन भी परोस दूँ..! आपके मित्र हैं, आप ही जाइए...मुझे तो माफ ही कर दीजिए..! ‘ऑफिस जाना जरूरी है और शर्मा जी की पत्नी भी चाहती हैं कि तुम साथ रहोगी तो कुछ खरीददारी भी हो जाएगी !’……सीधे-सीधे यह क्यों नहीं कहते कि मैं चाहता हूँ कि मेरी आफत तुम झेलो ! मुझे नहीं फांकनी सड़कों की धूल । एक दिन की छुट्टी क्यों नहीं ले लेते ऑफिस से ?“ मेरे पास खिसियाकर तुरंत यू टर्न लेने के सिवा कोई चारा शेष नहीं रहता..हाँ, तुम ठीक कह रही हो...! यह सब तुम्हारे बस का नहीं..! मैं ही चला जाता हूँ।              

            दूसरे दिन, अलसुबह, बाधरूम में मेरा जोर-जोर से गाना...सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है सुनकर जब शर्मा जी की नींद उचटती है और उनके मुखारविंद से मेरे लिए तारीफ के दो बोल फूटते हैं...पाण्डेय जी, आप गाना बहुत अच्छा गाते हैं....हम भी थोड़ा बहुत गा लेते हैं.. कभी अवसर मिला तो जरूर सुनाएंगे !” मैने कहा, अरे नहीं, वो तो बाथरूम में...! आप तो पुराने गायक हैं...कभी क्या, आज शाम को ही सुनेंगे। .......चलना नहीं है क्या ? जल्दी से आप लोग भी तैयार हो जाईए..सुबहे काशी की छटा ही निराली है...वही नहीं देखा तो क्या देखा !” तभी दूसरे कमरे से, अकर्णप्रिय आवाज गूँजती है...सुनिए..s...s..!  
            मैं अढ़ाई इंची मुस्कान चेहरे पर जबरी झोंकते हुए, शर्मा जी से....अभी आया, आप जल्दी से तैयार हो जाइए..” कहकर  श्रीमती जी के सम्मुख डरते-डरते वैसे ही उपस्थित होता हूँ जैसे कोई कक्षा में शोरगुल मचा रहा बच्चा,कक्षा अध्यापक के बुलावे पर अपराध बोध से ग्रस्त उनकी मेज के सम्मुख उपस्थित होता है....क्या जरूरी है कि सुबह-सुबह सारे मोहल्ले की नींद हराम की जाय ? सर फरोशी की तमन्ना....उंह, वो तो अच्छा है कि शर्मा जी ने कंठ की तारीफ की, कहीं बोल पर ध्यान देते तो कितना बुरा मानते !.. सोचा है ? घूमने में इतनी परेशानी ! शहीद होने जा रहे हैं…! क्यों ?” मैने खिसियाकर कहा, तुम भी न….! ....सो जाओ चुपचाप। कभी घर से बाहर निकलती तो हो नहीं, तुम्हें क्या मालूम कि आजकल बनारस की सड़कों के क्या हाल हैं ! ‘हर कदम रखना कि जैसे अब मरा...चल रहा हर शख्श डरा डरा । यहाँ,  कहीं पहाड़ तो कहीं गहरी खाई है..सड़कें देखो तो लगता है, बिहार से भटककर बनारस में चली आई है।‘” श्रीमती जी ने जाओ मरो न कहके बस इतना ही कहा,अच्छा जाइए, शहीद हो जाइए..धीरे बोलिए, बच्चे सो रहे हैं, मेरी हर बात को कविता में न उड़ाइए।
            हम सब जब चलने को उद्यत हुए तो श्रीमति जी ने पत्नी धर्म का बखूबी निर्वहन किया । जिसकी उम्मीद, सुबह के प्रेमालाप के बाद मैं लगभग छोड़ चुका था।  सुनिए..s..s..एक कप चाय तो पीते जाईए...कहते हुए जब उन्होने चाय की ट्रे मुस्कुराते हुए पास किया तो मुझे भारतीय पती होने पर होने पर अनायास ही गर्व का अनुभव हुआ। चाय पीने के पश्चात, शर्मा जी - शर्माइन जी और उनके दो होनहार बाल पुत्रों के साथ अभी-अभी रूके बारिश और हर कहीं खुदे सड़क पर जब हमारी साहसिक यात्रा का शुभारंभ हुआ तो शर्मा जी बोले,  हें..हें..हें..आप ठीक कह रहे थे...यहां कोई गाड़ी नहीं आ सकती। कितनी दूर...?” (मैने बात बीच में ही काटी), अरे, बस एक कि0मी0 की पदयात्रा के बाद आटो मिल जाएगी, इसीलिए कह रहा था न कि सुबह-सुबह चलने में भलाई है। मार्निंग वॉक भी हो जाएगी और दर्शन भी हो जाएगा। व्हेन देयर इज नो वे, से हे..हे..!” शर्माजी हंसते हुए बोले, आप बढ़िया मजाक कर लेते हैं। आपके साथ दुःख अपने आप दूर हो जाता है।
             अब रास्ते के गढ्ढों, शर्माइन जी की रेशमी साड़ी पर पड़ने वाले कीचड़ के छींटों, बच्चों के फिसल कर गिरने की चर्चा करूंगा तो बात और भी लम्बी हो जाएगी, कोई पढ़ेगा भी नहीं। सीधे मुद्दे पर आते हैं। लगभग एक कि0मी0 की पदयात्रा के पश्चात जब हम ऑटो पर सवार हुए तो सबकी जान में जान आई। शर्मा जी ने ही मौन तोड़ा, सड़क बहुत खराब है। मैने कहा, हाँ.... पूरे वरूणा पार ईलाके में सीवर लाईन बिछाने का कार्य चल रहा है न, इसीलिए अभी इतनी खराब हो गई है। पहले से भरे बैठीं, शर्माईन जी ने वार्ता में भाग लिया..वो तो ठीक है भाई साहब, लेकिन जिधर सीवर लाईन बिछ गई, उधर तो सड़क बना देनी चाहिए। कम से कम मजदूर लगा कर मिट्टी तो एक बराबर कर ही सकते थे। गढ्ढे तो पट जाते। सड़क तो एक लेबल की हो जाती। लगता है सारनाथ के लोगों पर भगवान बुद्ध के उपदेशों का गहरा असर पड़ा है। हड़ताल, हिंसा पर यकीन नहीं करते। कम से कम बापू को ही याद कर लेते। मुन्ना भाई पिक्चर भी नहीं  देखी क्या ? थोड़ा गांधी गिरी चलाते तो भी सड़क बन जाती। बैठे हैं भगवान के भरोसे ! फल भी शाख से तोड़कर खाना पड़ता है। नहीं तोड़ा तो कौआ खा जाएगा। मैने हंसकर कहा, सारनाथ का ही नहीं भाभी जी, पूरे शहर का यही हाल है ! इधर वरूणापार के लोगों पर भगवान बुद्ध के उपदेशों का असर है तो उधर गंगा तट के लोगों पर भोले बाबा की बूटी का गहरा प्रभाव देखने को मिलेगा ! आगे-आगे देखिए, दिखता है क्या !”
             शुक्र है कि सुबह का समय था, जाम नहीं झेलना पड़ा लेकिन विश्वनाथ मंदिर पहुंचने से पहले, रास्ते में बन रहे दो-दो ओवर ब्रिजों के लिए की गई खुदाई से बने गढ्ढों, धूल से सने पवन झोकों और आजादी के पहले से अनवरत खराब चल रही खस्ता हाल सड़कों पर उछलते हुए हमारी टेम्पो जैसे ही गोदौलिया चौराहे पर रुकी, उतरने से पहले गंगा मैया के भेजे दो घाट दूत साधिकार रास्ता रोक सामने आ खड़े हो गए ! उनमें से एक बोला. नाव में जाना है साहब ? दूसरा उत्तर का इंतजार किए बिना बोला, चलिए हम ले चलते हैं, हमारी नाव एकदम अच्छी है, जहाँ कहेंगे वहीं घुमा देंगे ! मैने झल्लाकर उसी की भाषा में जवाब दिया, नैया में घूमें नाहीं दर्शन करे निकलल हई !  समझला ? नाव में जाना है ! अबहिन रेगिस्तान कs धूल फांक के उतरबो नाहीं किया कि आ गइलन नैया लेके ! नदी इहाँ हौ ? 2 कि0मी0 पहिले से खोपड़ी पर सवार !“ मेरी बात सुनते ही दोनो बड़बड़ाते हुए भाग खड़े हुए..अरे, नाहीं जाएके हौ तs मत जा ! कौनो जबरी तs उठा न ले जाब ! चीखत काहे हौआ कौआ मतिन !” शर्माइन जी यूँ खिलखिला कर हंसने लगीं मानो उन्हें  बात पूरी तरह से समझ में आ गई हो ! मैं भी उनकी तरफ देख कर बोला, अभी बड़े-बड़े यमदूत आएंगे भाभी जी, किसी की बात मत सुनिएगा। शर्माइन जी हंसते हुए बोलीं, नहीं भाई साहब, मैं तो केवल आपकी ही बात सुनुंगी !” शर्माजी ने बस अपनी पत्नी को घूरा और मेरी तरफ देख कर जबरी मुस्कान बिखेरी, आप ठीक कह रहे हैं।
            विश्वनाथ मंदिर पहुंचने से पहले विश्वनाथ गली से होकर गुजरना पड़ता है। विश्वनाथ गली, दुनियाँ की सबसे नायाब गली है। भांति-भांति की दुकाने, भांति-भांति के लोग। बिंदी, टिकुली, चूड़ी, कंगना, साड़ी, धोती, कुर्ता, पैजामा से लेकर पीतल के बर्तन, खिलौने, मूर्तियाँ, भगवान को सजाने वाले कपड़े, पत्थऱ के छोटे-छोटे टुकड़े, फूल-माला की दुकानें, कैसेट सब कुछ मिलता है यहाँ। जिधर देखो उधर निगाहें ठहर जाती हैं। आपके साथ कोई महिला हो, बच्चे हों तो फिर आपकी इतनी पूछ होती है कि कहना ही क्या ! जगह-जगह रास्ता रोकने के लिए तैयार खड़े दलाल, राह चलना मुश्किल कर देते हैं। आईए बहेंजी, मत खरीदिएगा...देख तो लीजिए...!”…..” जूते यहाँ उतार दीजिए, आगे मंदिर है.....!”…”दर्शन करा दूँ...? भींड़ में कहाँ जाईएगा ? मैं आपको जल्दी और आराम से दर्शन करा दुंगा....!” भांति-भांति के विद्वान अपनी चंद्रकलाओं का समवेत गान करते हुए साधिकार राह रोके खड़े हो जाते हैं। मेरे लाख बचाने का प्रयास करते हुए भी शर्मा जी, श्रीमती जी के साथ कई स्थानो पर रूके और समान खरीदने के लिए लपकते दिखाई दिए। मैंने समझाया कि पहले दर्शन-पूजन हो जाय फिर आप जितना चाहें खरीददारी कर लेना, तब जाकर शांत हुए।

            मंदिर में प्रवेश के कई मार्ग हैं। पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण चारों दिशाओं में गेट बने हैं। पुलिस चौचक जांच-पड़ताल करती है। मोबाईल, कलम भी भीतर ले जाना सख्त मना है। मैंने सीधे रास्ते से मंदिर में प्रवेश करना चाहा तो पुलिस ने ज्ञानवापी वाला रास्ता पकड़ा दिया। भगवान के दर्शन में, किसी प्रकार का सोर्स या पंडे की मदद लेना नहीं चाहता था अतः जिधर पुलिस ने मोड़ा उधर ही मुड़ गया। ज्ञानवापी मार्ग थोड़ा घुमावदार है लेकिन वहाँ से गुजरना भी कम रोचक नहीं होता। इधर मस्जिद, उधर मंदिर और चौतरफा पुलिस की चौचक सुरक्षा व्यवस्था। हमारी रक्षा भगवान करते हैं और भगवान की रक्षा सिपाही !  दिन-रात मंदिर की  सुरक्षा में लगे सुरक्षा कर्मियों की हालत दयनीय हो जाती है। खूब जांच पड़ताल के बाद जब हमने ज्ञानवापी गेट से प्रवेश लिया तो वहाँ का नजारा, श्रीमान-श्रीमती, बच्चों के साथ आँखें फाड़े देखने लगे। मैने कहा, अब चलिगा भी...! आगे लम्बी लाईन है। हाँ भाई साहब, चल तो रहे हैं...ये बंदर आपस में क्यों झगड़ रहे हैं ?” मैने कहा, ये मंदिर के बदंर हैं, वे मस्जिद के बंदर हैं। झगड़ेंगे नहीं तो क्या प्रेम से रहेंगे.. ? आदमी जब समझदार नहीं हो सके तो बंदरों से क्या  उम्मीद की जाय…!”
            मंदिर में खूब भींड़ थी लेकिन व्यवस्था इतनी अच्छी थी कि आराम से दर्शन हो गया। दर्शन के बाद शर्माइन जी का धैर्य का बांध पूरी तरह टूट गया। मेरे लाख मना करने के बाद भी उन्होने जमकर खरीददारी की, शर्मा जी ने मुक्त भाव से पैसे लुटाए और मैं मूर्ख भाव से सबकुछ शांत होकर देखता रहा। विश्वनाथ गली से निकलते-निकलते धूप तेज हो चुकी थी, हमने गंगा में नौका विहार की योजना दूसरे दिन के लिए टाल दिया और यह तय किया कि आज अधिक से अधिक मंदिरों के दर्शन कीए जांय। केरला कफे में दिन का भोजन लेने के पश्चात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित विश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन, मानस मंदिर, दुर्गा मंदिर आदि घूमते-घूमते शाम ढल चुकी थी, बच्चों के साथ हम भी थककर चूर हो चुके थे और हमारे पास घर की राह पकड़ने के सिवा दूसरा कोई चारा न था।

14.11.10

गुस्सा बहुत बुरा है। इसमे जहर छुपा है।

आज हम सब के प्यारे चाचा नेहरू का जन्म दिवस है।  14 नवंबर 1889 को ईलाहाबाद में जन्मे भारत के प्रथम प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस को हम 'बाल दिवस' के रूप में मनाते हैं। प्रस्तुत है एक बाल गीत जिसका शीर्षक है...


गुस्सा
.............

जीवन में अपने सीखो तुम
गुस्से पर काबू करना।
मीठी बोली बोल के बच्चों
दुश्मन का भी मन हरना।।

बाती जलती अगर दिये में
घर रोशन कर जाती है
बनी आग तो स्वयं फैलकर
तहस नहस कर जाती है

बहुत बड़ा खतरा है खुद में,
गुस्सा बेकाबू रहना।
जल्दी से बच्चों सीखो तुम
गुस्से पर काबू करना।।

खिलते हैं गर फूल चमन में
भौरें गाने लगते हैं
बजते बीन सुरीले जब भी
अहि को भाने लगते हैं

कौवे कोयल दोनों काले
एक बोल मधु का झरना।
जल्दी से बच्चों सीखो तुम
गुस्से पर काबू करना।।

सूरज करता क्रोध अगर तो
सोचो सबका क्या होता
कैसी होती धरती अपनी
कैसा यह अंबर होता

करती नदिया क्रोध जब कभी
कैसी होती है धरती
जल थल नभ का प्यार परस्पर
सिखलाता है दुख हरना।
जल्दी से सीखो बच्चों तुम
गुस्से पर काबू करना।।

इसीलिए कहता हूं तुमसे
क्रोध स्वयं सीखो सहना
पानी जैसा किसी रूप में
धूप शीत सीखो बहना
गुस्सा बुरा जहर के जैसा
बस सीखो इसको महना।
जल्दी से सीखो बच्चों तुम
गुस्से पर काबू करना।।
..........@देवेन्द्र पाण्डेय।

8.11.10

प्रतीक्षा

जीवन के रास्ते में कई मुकाम हैं

जैसे

एक नदी है

नदी पर पुल है

पुल से पहले

सड़क की दोनों पटरियों पर

कूड़े के ढेर हैं

दुर्गंध है

पुल के उस पार

रेलवे क्रासिंग बंद है।


क्रासिंग के दोनों ओर भीड़ है

भी़ड़ के चेहरे हैं

चेहरे पर अलग-अलग भाव हैं

अपने-अपने घाव हैं

अपनी-अपनी मंजिल है

सब में एक समानता है

सबको मंजिल तक जाने की जल्दी है

लम्बी प्रतीक्षा-एक विवशता है।


ट्रेन की एक सीटी

सबके चेहरे खिल जाते हैं

ट्रेन की सीटी

आगे बढ़ने का एक अवसर है

अवसर

चींटी की चाल से चलती एक लम्बी मालगाड़ी है।



प्रतीक्षा में

एक हताशा है

निराशा है

गहरी बेचैनी है।

प्रतीक्षा

कोई करना नहीं चाहता

ट्रेन के गुजर जाने की भी नहीं

मंजिल है कि आसानी से नहीं मिलती।


जीवन एक रास्ता है जिसमें कई नदियाँ हैं

मगर अच्छी बात यह है

कि नाव है और नदियों पर पुल भी बने हैं।

रेलवे क्रासिंग बंद है

मगर अच्छी बात यह है कि

ट्रेन के गुजर जाने के बाद खुल जाती है।

( हिन्द युग्म में प्रकाशित )

28.10.10

‘विजयोत्सव’


सुना है राम
तुमने मारा था मारीच को
जब वह
स्वर्णमृग बन दौड़ रहा था
वन-वन

तुमने मारा था रावण को
जब वह
दुष्टता की सारी हदें पार कर
लड़ रहा था तुमसे
युद्धभूमि में ।

सोख लिए थे उसके अमृत कलश
एक ही तीर से
विजयी होकर लौटे थे तुम
मनी थी दीवाली
घर-घर ।

मगर आज भी
जब मनाता हूँ विजयोत्सव
जलाता हूँ दिए
तो लगता है…….  
कोई हँस रहा है मुझपर….!

चलती है हवा
बुझती है लौ
उठता है धुआँ
तो लगता है……
जीवित हैं अभी
मारीच और रावण

मन कांप उठता है
किसी अनिष्ट की आशंका से....!

22.10.10

आशीर्वाद

 
”नमस्कार !”

“पण्डित जी, नमस्कार !”

“नमस्कार, पाण्डित जी !”

“पा लागी पंडित जी !”

“पंडित जी ‘पा.s.s लागी’ !”

(क्रोध से तमतमा कर दोनो कंधे झकझोरते हुए....)

“‘बही.s.s.र’ हो गयल हौवा का ? ढेर घमंड हो गयल हौ ?”

“अरे बाबू साहब, का बात हौ ? काहे चीखत हौवा ? का हो गयल ?”

(दोनो हाथ नचाते हुए, गुस्से से.....)


“पाँच दाईं नमस्कार कर चुकली...एक्को दाईं जवाब ना मिले, त का होई ?” ईहे न मन करी, “जा सारे के, कब्बो नमस्कार ना करब..!”


“अरे..रे... के तोहरे नमस्कार कs जवाब नाहीं देत हौ ! नमस्कार…..!”


बाबू साहब चुप !


‘पण्डित जी’ फिर से काम में मगन !


(बाबू साहब फिर चालू....)


“हमरे ई ना समझ में आवत हौ कि तू कौन जरूरी काम करत हौवा ? तोहीं से पूछत है पंडित जी…! तोहीं के पाँच दाईं नमस्कार कैले रहली....! ई कम्प्यूटर न हो गयल चुम्बक हो गयल ससुरा...अच्छे-भले मनई के पगला देत हौ..! जा अब तोहें कब्बो नमस्कार ना करब....!”


(पंडित जी घबड़ाकर.....)


“दू मिनट बाबू साहब....नाहीं तs हमार सब करल-धरल 'गुण गोबर' हो जाई..”


‘हम जात है पंडित जी...तू यही में चपकल रहा...ससुरा कम्प्यूटर ना हो गयल सनीमा कs ‘हीरोईन’ हो गयल...!”


(आसपास खड़े लोग जो बाबू साहब की बातें ध्यान से सुन रहे थे...ठहाके लगाने लगते हैं ..उसी में कोई चुटकी लेता है...’झण्डूबाम हुई...कम्प्यूटर तेरे लिए…!’फिर एक जोरदार ठहाका लगता है...!हरबड़ी में पंडित जी कम्प्यूटर बंद करते हैं और बाबू साहब को जबरिया कुर्सी पर बिठाकर पूछते  हैं.....)


“हाँ, तs बतावा का हल्ला करत रहला...?”


“कुछ नाहीं पंडित जी, ‘पलग्गी’ कैली, तs चाहत रहली की आप कs आशीर्वाद मिले...कौनो काम ना हौ,,आखिर नमस्कार कs जवाब तs देवे के न चाही ?


“देखत ना रहला कि इतना लम्बा अंक लिखले रहली...अंत में जोड़ न करीत, ओह के कम्प्यूटर में ‘सेव’ न करीत तs कुल ‘गुण गोबर’ ना हो जात ? ...तोहें तs बस… पलग्गी कs जवाब नाहीं देहला...!पलग्गी कैला तs हम तोहरी ओर तकले ना रहली...! कौनो जबरी हौ..? जे आशीर्वाद नाहीं देई, ओहसे जबरी आशीर्वाद लेबा...?”


“ए पंडित जी, ई त कौनो बात ना भईल…! ‘पलग्गी’ कैली… तs आशीर्वाद तs तोहें देवे के पड़बै करी..!” (दूसरे लोगों की ओर देखते हुए....) का भाई, आपे लोग समझावा ‘पंडित जी’ के....!”

 
(बाबू साहब की बात सुनकर लोग दो खेमे में बंट गए...कोई बाबू साहब को चढ़ाता….”हाँ बाबू साहब, आशीर्वाद तs  पंडीजी के देवे के चाही...” कोई कहता...”जायेदा, बाबू साहब, तू ‘पा लागी’ करबे मत  करा..!” कोई कहता....”आशीर्वाद देना कोई जरूरी नहीं।“)


पंडित जी बोले,    "तोहार माथा गरम हौ। पहिले पानी पीया...। सब तोहें चढ़ा के मजा लेत हौ...तू तनिको बतिया समझते नाहीं हौवा..(मंगरू को आवाज देते हुए...) जाओ जल्दी से बाबू साहब को चाय पिलाओ….!”

“चाय-वाय नाहीं पीयब ! पहीले ई बतावा, आशीर्वाद देना काहे जरूरी ना हौ ?”

“चाय पी ला, अब छेड़ देहले हौवा..कम्प्यूटर बंद हो गयल हौ, तs तोहें तबियत से समझावत हई।“


(चाय पीने के बाद के बाद पंडित जी ने प्रश्न किया...)


“ई बतावा, संकटमोचन में हनुमान जी के लड्डू चढ़ावला..? हनुमान जी कs दर्शन हो जाला तs मस्त हो के चल आवला...! ई तs अच्छा हौ कि हनुमान जी नाहीं बोललन ..बोल्तन त का तू उनहूँ से जबरी आशीर्वाद लेता..?”

“देखा पंडित जी, बेवकूफ मत बनावा...पहिली बात कि तू हनूमान जी नाहीं हौवा......!”


(बीच में ही बात काटकर.....)


“हाँ,...आ गइला न रस्ते में....हम हनुमान जी नाहीं है...ठीक कहत हौवा...एकर मतलब ई भयल कि जितना ‘श्रद्धा’ तोहार हनुमान जी बदे हौ. उतना हमरे बदे नाहीं हौ……हमरे बदे ‘श्रद्धा’ में कमी हौ । हौ... मगर उतना नाहीं हौ, जितना हनुमान जी बदे हौ..?”


“हाँ, ठीक कहत हौवा...तs एकर मतलब ई भयल कि तू आशीर्वाद नाहीं देबा..?”

नाहीं…s..s…एकर मतलब ई भयल कि ‘पालागी’ ओही के करे के चाही जेकरे बदे तोहरे मन में भरपूर श्रद्धा हो…। ’श्रद्धा’ होई... तs ‘संशय’ अपने आप मिट जाई...। ‘पंडित जी’ देख लेहलन कि हम ‘पा लागी’ करत हई... यही बहुत हौ...! अऊर यहू जरूरी नाहीं हौ कि ‘पंडित जी’ के पा लागी करबे करा....! कौनो डाक्टर बतौले हौ कि ‘पंडित जी’ के पा लागी करा तबै स्वस्थ रहब...?भ्रष्ट हौ..चोर हौ..व्यभिचारी हौ..मगर ‘पंडित’ हौ तs पा लागी करबे करा...?  ई कौन बात हौ...! ‘पा लागी’ ओहके करा जे ऊ योग्य हो...! फिर चाहे कौनो जात बिरादरी कs होखे...! ’पा लागी’ ओहके करा..जेकरे प्रति मन में श्रद्धा जागे...! ‘अइरू गइरू नत्थू खैरू’ जौन मिल गइलन ओही के ‘पंडित जी पा लागी..’ ई कौन बात हौ..?”                                                                                                                                                           


“तू ‘अइरू गइरू’ हौवा...?”

“नाहीं..हम ‘अईरू गईरू’ ना है..हमरे प्रति तोहरे मन में श्रद्धा हौ..तs हम आशीर्वाद ना देहली..तोहार ‘श्रद्धा’ छण भर में खतम...! ई कैसन ‘श्रद्धा’ ? ई कैसन विश्वास...? अऊर यहू समझा कि आशीर्वाद जबरी लेबs तs का ऊ फली ?.. ई हमरे अधिकार कs बात हौ ..ई हमरे मन कs बात हौ....जे आशीर्वाद कs पात्र ना हौ, ओहू के आशीर्वाद दे देई....?” जैसे सबके ‘पा लगी’ नाहीं करल जाला वैसे सबके आशीर्वादो नाही देहल जाला...! ई कौनो जबरी कs सौदा ना हौ...। जे आशीर्वाद देला ओकर शक्ति कम होला...जे आशीर्वाद पावला ओकर शक्ति बढ़त जाला..। ऐही बदे ऋषी-मुनी सालन तपस्या कै के शक्ति जुटावत रहलन कि संसार में बहुत अभागी हौवन ...उनकर कल्याण कs जिम्मा उनहीं के ऊपर रहल.. ..


“तs का तू ‘चमार’ के भी पा लागी करबा...?”


“काहे नाहीं...! ऊ योग्य हौ…..हमे ओहसे शिक्षा मिलत हौ...हमार जीवन ओकरे कारण सुधरत हौ, तs ई हमार परम सौभाग्य हौ कि हम उनकर पैर पकड़ के उनसे आशार्वाद लेई...! उनहूँ के खुशी होई की हमरे शिक्षा क मोल हौ...! तs ऊ जब आशीर्वाद देई हैं.. तs समझा जनम सफल हो जाई...!”


“तू धन्य हौवा पंडित जी...! आजू से हमार आँख खुल गयल.....! तोहार चरण कहाँ हौ....?  पालागी...!”


“जा खुश रहा..! मस्त रहा..!”

( सभा बर्खास्त हुई...लोग अपने-अपने घर को चले गए..लेकिन बहुतों के मन में यह भाव था कि ‘पंडित जी’ ने बड़ी चालाकी से ‘बाबू साहब’ को मूर्ख बना दिया...! हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या पंडित जी गलत थे ?)