29.1.17

बजट देश का बनाम घर का

बच्चों बताओ! बजट कौन बनाता है? कक्षा के सभी बच्चों ने उत्तर दिया-वित्त मंत्री । मगर एक ने हाथ उठा कर कहा-गृह मंत्री! उत्तर सुनते ही गुरूजी म्यान से बाहर! गृह मंत्री वाला जवाब उनकी कुंजी में नहीं था जिससे वो पढ़ाते थे और न उस तंत्र के पास था जिसने उन्हें गुरूजी बनाया था। सजा सुना दिया-दोनों हाथ उठाकर बेंच्च पर खड़े हो जाओ! लड़का विरोध में उस रिक्शे वाले की तरह हकलाने लगा जिसकी हवा बीच सड़क सिपाही निकाल दे-म..म..गर गुरूजी.. मैं..मैं..स..ही..। बच्चों के ठहाकों के बीच गुरूजी दारोगा की तरह गर्जे-चोप्प! कक्षा में ठहाके लगा रहे बच्चे गुरूजी का असली रूप देख, सहम कर चुप हो गये। कुछ देर बाद फिर खुसुर-पुसुर शुरू हुई। मॉनीटर ने खड़े होकर अनुरोध किया-'उसका जवाब तो सुन लीजिये गुरु जी!' दूसरे बच्चों में उम्मीद की किरण जागी। गुरूजी ने दोनों हाथ हवा में लहराया। बायें से मानीटर को बिठाया और दायें से लड़के को बोलने के लिये ललकारा-बक्को!
लड़के ने उत्तर दिया -देश का बजट कौन बनाता है यह तो सभी जानते हैं मगर घर का बजट गृह मंत्री बनाती हैं। यह बात मुझे पिताजी ने बताई थी। गलत है क्या सर? लड़के की मासूमियत ने गुरूजी के हृदय को छीलकर मुलायम कर दिया। हँसते हुए कहा-बैठो-बैठो। कक्षा में गुरूजी का और घर में बाउजी का हँसना माहौल को खुशनुमा बनाता है। गुरूजी की एक हंसी पर सभी मुर्झाये फूल झूम कर खिल उठे।
बच्चों की ये बातें तो मजाक में कही गयीं मगर इन बातों से एक बात यह समझ में आती है कि देश का बजट देश के वित्त मंत्री और घर का बजट घर की मालकिन बनाती हैं. साधारण शब्दों में कहें तो बजट का अर्थ होने वाली आय और किये जाने वाले खर्चों का पूर्वानुमान है. देश का बजट साल में एक बार और घर का बजट हर माह बनता है. यह पति के आय और गृहणी की कुशलता पर निर्भर करता है. जैसे भ्रष्टाचारी काला धन विदेशों में या पाताल खातों में जमा करते हैं वैसे ही महिलायें हर माह होने वाले आय का पहला हिस्सा गुप्त पोटली में जमा करती हैं और घर में आने वाले किसी बड़े आफत के समय साक्षात लक्ष्मी बन मुस्कुराते हुए प्रकट होती हैं! यह गुण भ्रष्ट नेताओं में नहीं पाया जाता. देश पर आने वाले आफत के समय ये बगलें झाँकने लगते हैं. छापे के समय ही इनकी कलई खुल पाती है. घर के बजट में महिलाओं का ध्यान सबसे पहले घर में राशन-पानी भरने में लगा रहता है. बच्चों की आवश्यकताओं के बाद उन पर ध्यान जाता है जिसके कठिन श्रम से प्रति माह घर में पैसा आता है. अक्सर वहां तक आते-आते धन ख़तम हो जाता है. बजट बनाने वाले के हिस्से में तो कुछ भी नहीं बचता. वे अपनी जरूरतों के लिए अतिरिक्त धन की मांग करती हैं और इन्हें नेताओं की तरह आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता. देश का बजट बनाने वाले भी इसी त्याग की भावना से देश का बजट बनायें तो कितना अच्छा हो!
देश का बजट बनाते समय सिर्फ पूर्वानुमान ही नहीं बल्कि लक्ष्य और उद्देश्य को भी ध्यान में रखना होता है. जिसे परफार्मेंस बजट या निष्पादन बजट कहते हैं. जनता का पैसा जनता के विकास में इस प्रकार लगाना कि देश के हित के साथ-साथ चुनाव के पूर्व किये गए वादे पूरे होते दिखाई दें यह वित्त मंत्री की आर्थिक नहीं राजनैतिक कुशलता पर भी निर्भर करता है. जनता से घुमा फिर कर कई प्रकार से टैक्स के रूप में लिए गए धन को देश हित में खर्च करना होता है. 'तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे है मेरा!' वाले भाव में वित्तीय और राजनैतिक कुशलता झलके तो विपक्ष भले कोसे मगर पार्टी के लोग खुश हो जाते हैं. बजट के प्राविधान के साथ इसको क्रियान्वयन की व्यस्था भी पारदर्शी होनी चाहिये.अक्सर देखा गया है कि आम आदमी तक आते-आते उनके लिए आवंटित धन चुक जाता है. दुष्यंत कुमार ने इस दर्द को कुछ यूं बयां किया है.."यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियाँ, मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!"
जैसे ही बजट की घोषणा होती है लम्बे बजट की मोटी-मोटी बातें जानकर सरकार के पक्षकार वाह! वाह! तो विरोधी हाय! हाय! करने लगते हैं. सरकार कितना ही अच्छा बजट पेश करे विरोधी को हाय-हाय करना है. विरोधी जब सरकार में आ जाते हैं तो लोगों के रोल बदल जाते हैं. हाय-हाय करने वाले वाह-वाह और वाह-वाह करने वाले हाय-हाय करने लगते हैं. सरकारी कर्मचारियों की नजर आयकर में मिलने वाले छूट पर होती है. सरकारी कर्मचारी हर साल चाहते हैं कि उनकी आय अधिक से अधिक बढ़े और आयकर कम से कम लिया जाय. हर साल आय में वृद्धि होती है और हर साल छूट की दर बढ़ती जाती है. सरकारें भी जीत कर आने के शुरू के वर्षों में अंगूठा दिखाने और मुँह चिढ़ाने वाला और चुनाव वर्ष से ठीक पहले आय में अधिक छूट देते हुए लोक लुभावन बजट पेश करती है.
आजकल आभासी दुनियाँ का बाजार प्रिंट मीडिया से तेज खबर देता है. इन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं. अभी कुछ दिन पहले वाट्स एप में, आयकर में भारी छूट का मैसेज आया। पढ़ते ही लगा कि कोई #मामा बना रहा है। सरकार और इतनी उदार! कभी हो ही नहीं सकता। फिर याद आया कि 5 राज्यों में चुनाव होने वाला है, कौन जाने खबर सच ही हो! मन लड्डू बनाता, दिमाग फोड़ देता। हकीकत तो बजट आने के बाद ही पता चलेगा कि सच क्या है मग़र जिसने भी यह हवा उड़ाई है वो बड़ा शातिर है। सरकार के विरुद्ध राजनीति कर रहा है। इससे कम छूट मिला तो सरकार छूट देने के बाद भी आलोचना का शिकार होगी कि क्या देने वाले थे, क्या दिये! छूट मिला ही नहीं तो और बुरा होगा! आरोप लगते देर नहीं- सरकार तो बड़ी जालसाज निकली! ये भी कोई बजट है! 

22.1.17

दल बदल या दिलबदल

बीहड़ में किसी डाकू का दिल बड़े गिरोह पर आ जाय और वह लूट में अधिक हिस्से के लोभ में अपना दल बदल कर बड़े गिरोह में शामिल हो जाय तो किसी को कोई अचरज नहीं होता। जंगल का अपना क़ानून होता है। ताकत की सत्ता होती है। अस्तित्व का संघर्ष होता है। सत्ता की छाया में अधिक माल लूटने या जान बचाने के लिये डकैत दल बदलते रहते हैं। आश्चर्य तब होता है जब किसी लोकतांत्रिक देश में जन सेवा के लिये काम करने वाले नेता जी का दिल एन चुनाव के समय बड़े गिरोह पर आ जाता है और वे झट से अपना दल बदल कर दूसरे दल में शामिल ही नहीं हो जाते बल्कि चुनाव लड़ने का टिकट भी पा जाते हैं!

दल बदलू के दल बदलने से दोनों दलों के वे कार्यकर्ता खुद को दल दल में फँसा समझते हैं जिन्होंने उनसे उम्मीदें पाल रखी थीं। सामान्य को पूछता ही कौन है? दलबदलू कोई साधारण तो होता नहीं। वही हो सकता है जिसके पास जन बल और धन बल दोनों हो। इन बादशाली दलबदलुओं के अपना दिल बदलने से ये नरक में नहीं जाते बल्कि इनके इस आचरण से कितने स्वर्ग में जाने की तैयारी करने लग जाते हैं!

दिल दोनों तरफ टूटते हैं। जिस दल में थे उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि अब अपनी ताकत और कम हो गई। जिस दल में गये उसके कार्यकर्ता निराश होते हैं कि जीवन भर मेहनत हमने किया और जब हाथ सफाई का मौका मिला तो टिकट कोई बाहरी ले उड़ा! ये उस मजनू की तरह मायूस होते हैं जो लड़की पटाये और उसका टिकट छीन कर फिलिम दिखाने कोई और ले कर चला जाया! कुछ दिन तक तो 'दिल के टुकड़े हजार हुए। कोई यहां गिरा, कोई वहाँ गिरा।' वाला हाल होता है, इरोध-विरोध होता है फिर 'हरि इच्छा' बलवान की तरह 'हाई कमान बलवान' मान कर सभी अपने पार्टी में ही अपने विलेन की जय जयकार करने लगते हैं!

प्रश्न उठता है कि आदमी दिल बदलता ही क्यों है?

कंजूस की पत्नी डाक्टर से मन्नत कर अपने पति का दिल धोखे से बदल दे और राजा का दिल लगवा दे। बाद में जब राजा उसे बेगम समझ कर रोज शाही कबाब बनाने का हुक्म देने लगे तब जा कर पत्नी को एहसास हो कि इससे अच्छा तो अपना कंजूस पति ही था!

किसी लड़की का दिल अपने रामू को छोड़ सलमान खान पर आ जाय और बाद में पता चले कि सलमान तो पहले से बहुतों का दिल तोड़ चुका है!

अच्छी भली पत्नी छोड़ कोई अधेड़ पड़ोस के लड़के से पूछे-भाभी जी घर पर हैं? और घर से पहलवान भैया निकलकर उसका सर तोड़ दें!

कोई चमचा, चम्मच की तरह एक अधिकारी के जाते ही नये वाले अधिकारी से तुरंत घुल मिल जाय और उनके प्याली में भी पुराने की तरह फिट बैठे!

ये सब बातें तो आम आदमी के लिए पुरानी सामान्य घटनाएं हैं। सब चलता है। यही दुनियाँ है, यहाँ यही होता है, मान कर हँसते हुए स्वीकार कर लेता है। मगर किसी सिद्धांत की दुहाई देने वाले का दिल, किसी दूसरे उस सिद्धान्त की दुहाई देने वाले दल पर आ जाय जिसकी जीवन भर बुराई करके नेता बना है तो दोनों दलों के अलावा जन सामान्य का भी दिल टूटना स्वाभाविक है।

एक प्रश्न के बाद कई प्रश्न उठते हैं। आखिर नेता जी ने अपना दिल क्यों बदला ? क्या सत्ता की चौकीदारी में ही होशियारी है? सत्ता सुख के सामने सब सुख ओछे हैं? क्या सिद्धांत, सत्ता प्राप्त करने की अलग-अलग सीढ़ियाँ हैं जिसमे पीढी दर पीढ़ी चढ़ती-उतराती रहती है? क्या सेवा भाव इतना प्रबल होता है कि आदमी मुँह मांगे भाव में उसे खरीद लेना चाहता है। अंत में यह कि यदि देश में इतने सारे सेवक हैं तो आम आदमी इतना दुखी क्यों है?

सिद्धार्थ ने आम आदमी के दुःख दूर करने के लिए सत्ता सुख का त्याग किया और नेता जी आम आदमी का दुःख दूर करने के लिये सत्ता पाना चाहते हैं! दोनों में सही कौन? वो जो बुद्ध बन गये या वो जो राजा बनना चाहते हैं?

19.1.17

किताबें और मेले

क्या पाण्डे जी! विश्व पुस्तक मेला लगा था दिल्ली में, गये नहीं?
हाँ मिर्जा, नहीं गये। टिकट नहीं था।
आप कहते तो टिकट कटा देता आपका। दिल्ली कौन दूर है?
ट्रेन के टिकट की बात नहीं कर रहा मिर्जा, मैं पुस्तक मेला के टिकट की बात कर रहा हूँ! पुस्तक मेले में वही लेखक जाता है जिसकी एकाध पुस्तक छप चुकी हो। बिना पुस्तक छपे मेले में जाना वइसे ही है जैसे बिना टिकट ट्रेन पर चढ़ना। तुम्हें क्या पता? बिना पुस्तक वाला कवि मेले में बिना पूँछ वाले बन्दर की तरह कितना शरमाता रहता है!
एक साल हम भी गये थे मिर्जा, मेले में। बहुत से बिछुड़े भाई एक साथ मिल गये। किसी के हाथ में पुस्तक, किसी के बैग में पुस्तक, किसी का झोला भरा हुआ तो किसी का बोरा बंधा हुआ और हम खाली हाथ! मारे शरम के जमीन पर गड़े जा रहे थे, कोई देख कर पहचान न ले।
तब! फिर का हुआ?
का होना था मिर्जा! वही हुआ जिसका डर था। हम सोच ही रहे थे कि फूट लें यहाँ से तभी एक मित्र ने पीछे से आ कर टी.टी. की तरह पीठ में धौल जमा ही दिया-कैसे हैं पाण्डे जी? आपकी कौन सी पुस्तक आई इस बार? फिर बिना उत्तर सुने पकड़ कर एक कोने में ले गया जहां कम भीड़ थी। वहाँ मेले में बिछुड़े सभी भाई मौजूद थे। सभी से मेऱा परिचय कराते हुए बोलने लगा-इनसे मिलिये! यही बेचैन आत्मा हैं। इत्तफाक की बात थी मिर्जा! सभी मुझसे तपाक से हँसते हुये मिले! किसी ने मुझे शर्मिंदा नहीं किया!! मुझे उसी पल विश्वास हो गया कि इंसानियत कहानियों में ही नहीं, लेखकों में भी पाई जाती है! सभी मुझे प्रोत्साहित करते रहे-अगली बार मेले में आपकी पुस्तक भी आ ही जानी चाहिये।
तब! इतने अच्छे मित्र हैं तब क्यों नहीं गये मेले में?
कहाँ कोई पुस्तक छपी मिर्जा! हर बार कोई प्रोत्साहित थोड़ी न करता है। इस बार जाता तो तंज कसता-पूरी जिंदगी फेसबुक में ही गुजार दोगे क्या!
तो क्या खाली लेखक ही जाते हैं पुस्तक मेले में! पाठक कोई नहीं जाता?
वही पाठक, वही लेखक मिर्जा! यूँ समझो सभी पाठक, सभी लेखक।
इनके अलावा?
लेखक को हरदम झाँसा देते रहने वाला प्रकाशक, देखा-देखी पढ़ाकू दिखने वाले नये लड़के, बड़े लेखकों के बीच घुसकर एल्फी-सेल्फी खिंचा कर फेसबुक में चस्पा करने वाले और इस तरह हमेशा आत्ममुग्ध रहने वाले नये लेखक और लेखकों को विद्वान समझ कर चाय-पानी कराते रहने वाले उनके मित्र। इन्ही सब की चौकड़ी दिन भर हुँकार-फुँकार करती रहती है मिर्जा।
मतलब गाँव के मेले की तरह कोई मजा नहीं होता मेले में?
देश-शहर-गाँव सब पुस्तक में घुस जाता है मिर्जा! तुमने देखा है न गाँव का मेला? जिस बच्चे की उमर गुब्बारा फुलाने की होती है, वही गुब्बारा बेच रहा होता है! कितनी सूनी रहती हैं हरी चूड़ी बेचने वाली गुलाबो की आँखें! यही हाल विद्वत समाज का है। जिसके पास पैसा है वह हर साल पुस्तक छपवा सकता है। प्रकाशक किसी गरीब की पुस्तक नहीं छापता। बड़े-बड़े लेखकों की तमाम उम्र फकीरी में कट गई। जब स्वर्गवासी हुए, लोगों ने तारीफ करी तभी प्रकाशक उनके घर गया। बुद्धिजीवियों की दुनियाँ और जालिम है मिर्जा, कत्ल करते हैं और खून का एक धब्बा नहीं दिखता।
सही बात है गुरु! एक बार हमने भी एक कवि समेलन कराया था। बड़े लिफ़ाफ़े के लिये सब कवि झगड़ने लगे थे आपस में! किसी तरह बीच-बचाव किया और अपनी जेब से पइसा लगा कर मामला रफा-दफा किया।
तब मेला एकदम बेकार चीज है?
नहीं मिर्जा! यह नहीं कह रहा। मेला तो मेला है, मजा ही मजा है। जइसे गरीब को मेले से ही रोटी मिलती है वइसे बुद्धिजीवी को मेले से ही खुराक मिलती है। जेब में पैसा हो, फालतू समय हो और लिखने-पढ़ने का शौक हो तो मेले से बढ़कर और दूसरी अच्छी जगह कौन है साहित्य के मनोरोगियों के लिये! सोने में सुहागा-अपनी तरह दूसरे और रोगी भी मिल जाते हैं ओने-कोने, शब्दों के चाट-पकौड़े चखते हुए! कवि को कवयित्री मिल जाती हैं, कवयित्री को कवि मिल जाते हैं। आलोचकों को कवि-कवयित्री के रूप में जुगाली करने के लिए आलू-चना दोनों मिल जाते हैं। प्रकाशकों के पुराने अंडे बिक जाते हैं, नये मुर्गे मिल जाते हैं। इससे अच्छा और क्या हो सकता है भला!
एक ताजा शेर सुनो मिर्जा-
मृत्यु लोक के लेखकों की उल्टी-पल्टी गई बहुत 
अधिक बिकी इस बार भी स्वर्गीय की पुस्तक।
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15.1.17

सत्य


देखो! सुनो! समझो! तब बोलो।
बोलो तो..
जोर-जोर से बोलो
पूरे आत्मविश्वास से बोलो
दो चार और सुनें कि तुमने
क्या देखा? क्या सुना? और क्या समझा?
विचलित मत होना
जब वे बोलें
चिल्लाने मत लगना..
झूठ! झूठ!
तुम गलत! तुम गलत!
मैं सही! मैं सही!
ध्यान से सुनना
उन्होंने क्या बोला
और समझना
कि यह
उनका देखा, उनका सुना और उनका समझा सत्य है।
सत्य
सभी के लिये
कभी एक सा नहीं होता
सभी की
अपनी नज़र, अपनी शक्ति और अपनी समझ होती है
इसीलिये सभी के
अपने-अपने सच होते हैं।
सभी के सत्य एक होते तो
सभी
वृक्ष न बन गये होते!

8.1.17

लोहे का घर-25


'हाय! ललमुँही, आज तो बड़ी रफ्तार से चल रही हो!' 40 मिनट में जौनपुर से खालिसपुर आ गई!!!'..हवा ने ट्रेन को छेड़ा।
दून ने लम्बी सीटी बजाई और खालिसपुर से भी चल दी। 'चुप री पगली हवा! बहुत लेट हो चुकी हूँ पहले से ही। कुछ तो समय कवर करने दे। मुझे जौनपुर दिन में 2 बजे ही पहुँचना था, शाम हो गई। तुम्हें पता है? जौनपुर से एक बेचैन आत्मा चढ़ता है। लेट हुआ और किसी ने जरा भी कोसा/गाली दिया नहीं कि झट से लिखकर फेसबुक में छाप देता है।
अच्छा! बड़ा बदमास है तब तो! एक दिन गिरा क्यों नहीं देती?
अरे! वो अकेला थोड़ी न मरेगा। वो नहीं तो कोई और लिखेगा। किसी का मुँह थोड़ी न बंद कर सकते हैं। कुछ झूठ तो लिखता नहीं। किसी की आलोचना से घबराकर और गलत काम नहीं करना चाहिए। खुद को सुधारना ही सबसे बढ़िया विकल्प है। आलोचना करने वाला तुहारा शत्रु नहीं, सदैव मित्र होता है।
वाह री ललमुँही! बड़ी ज्ञानी बन गई हो नये साल में!!!
मैं तो हमेशा से ज्ञानी हूँ पगली हवा! सब मुसीबत तेरे और कंट्रोलर के कारण है।
मेरे! अब मैंने क्या किया?
तू ही तो हिमालय से लाती है ठंडी हवा और घना कोहरा। तेरे कारण न मुझे कुछ दिखाई देता है और न कंट्रोलर को। भागूँ तो कैसे भागूँ?
दूसरे पर आरोप मढ़ने को कह दो। अब यहाँ वीरापट्टी में क्यों खड़ी हो गई? यहाँ तो तेरा स्टापेज नहीं है। घना कोहरा भी नहीं है!
देखती नहीं सिगनल लाल है! मेरी सारी तेजी बेकार कर दिया इस स्टेशन मास्टर ने। वो भी क्या करे! कंट्रोलर ने सिग्नल ही नहीं दिया होगा। चाय पीने चला गया होगा। देख! सिग्नल ग्रीन हो गया। अब मुझे बातों में मत उलझा। तुझसे बतियाने के चक्कर में सिग्नल दिखाई नहीं दिया तो नाहक मारा जाएगा एक एक बेचैन आत्मा. 
..............................
तेरा नाम #दून किसने रख दिया लालमुँही! तू तो खून कर देगी कितनों का। आज फिर लेट!!! बेचैन आत्मा छोड़ेगा नहीं। मैंने उसे टेशन पर देखा था। काँधे पर झोला लटकाये, मूँगफली फोड़ रहा था और तुम्हारा मजाक उड़ा रहा था।
अच्छा! क्या कह रहा था?
मुझसे तो कुछ नहीं मगर अपने साथियों से कह रहा था कि इससे अच्छी तो #गोदिया है। राइट टाइम है और आगे चलकर दून को पीटेगी। तुम गोदिया से पिटाओगी क्या जानेमन?
मुझे बनारस तक 4 स्टेशन रुकना है और वो नान स्टॉप #ट्रेन है, इसलिये ऐसा बोल रहा होगा मगर उसके आने में तो अभी 30 मिनट देर है! तब तक तो मैं पहले पहुँच जाऊँगी बनारस। लो! अभी #जफराबाद से चली हूँ और किसी ने मेरी चेन खींच ली!!! यही हाल रहा तो मैं क्या कर सकती हूँ भला! पहले चेन छुड़ाऊँ फिर चलूँ।
तू तो आज गई काम से।
चेनपुलिंग के बाद रुकी दून ने जोर की सीटी बजाई और हवा से बातें करते हुये कहा-चुप रे पागल हवा! उसे मेरे ऊपर भरोसा ही नहीं तो क्यों बैठता है मेरी गोदी में? चले जाना था न अपनी गोदिया के पास।
वो तो नहीं मान रहा था दुन्नी! उसके दोस्तों ने यह कहते हुए बिठा दिया कि गोदिया राइट टाइम है लेकिन आधे घण्टे में तू बहुत आगे ले जाएगी और रुकने के बाद भी पहले पहुँचेगी बनारस।
छुक छुक छुक उसके दोस्त ज्यादा समझदार हैं। अब कोई चेन पुंलिंग न करे तो मैं अभी भी गोदिया को क्रास न होने दूँ। जा! ज़रा देख कर बता तो, गोदिया अब जौनपुर पहुँची की नहीं?
ठीक है। बताता हूँ। तू ज़रा संभलकर चल। आगे जलालगंज का पुल आने वाला है।
उधर हवा, गोदिया का हाल लेने गई और इधर दून ने अपनी चाल से जलालगंज पुल को थरथरा दिया। अंग्रेजों के जमाने का मजबूत पुल काँप सा गया। आगे दून धीरे हो, जलालगंज में मात्र एक मिनट के लिये रुकी फिर हारन जोर की सीटी मार पटरियों पर दौड़ने हुये भुनभुनाने लगी-'पता नहीं हवा कहाँ मर गया! नाम हवा और चाल कछुए जैसी।' दून अभी बड़बड़ा ही रही थी कि हवा ने पीछे से उड़ते हुए आकर ट्रेन के कान में कहा- गोदिया सही समय पर छूट गई जौनपुर से। तू अपनी चाल बढ़ा, वरना आगे तुझे रोक देगा स्टेटशन मास्टर और तू खड़ी-खड़ी सीटी बजाती रह जायेगी।
ओह! मैं तेज दौड़ने के सिवा और अधिक कर भी क्या सकती हूँ भला!!! आगे कंट्रोलर की मर्जी। हानी, लाभ, जीवन, मरण, यश , अपयश, सब कंट्रोलर के हाथ है। मैं तो निमित्त मात्र हूँ। मेऱा काम बस कंट्रोलर की इच्छानुसार रुकना या पटरी पर चलते चले जाना है। जा! देख तो जरा। बेचैन सो गया या मोबाइल में उँगलियाँ चला रहा है?
उसके दोस्त तो ऊपर बर्थ में चैन से सो रहे हैं लेकिन वो जब से बैठा है, कुछ न कुछ लिखे जा रहा है।
इसीलिये तो उसका नाम बेचैनआत्मा है। सबका मन बेचैन होता है, इसकी तो आत्मा भी बेचैन है! इसके अलावा किसी की आत्मा बेचैन हो ही नहीं सकती दुनिया में।
तू क्यों खालिसपुर में ही खड़ी हो गई? यहीं पिटायेगी क्या गोदिया से!
चलती हूँ। हरा सिगनल हो गया। कहीं बेचैन आत्मा हमारी-तुम्हारी सब बातें तो नहीं सुन लेता!
मैं क्या जानू? अब यह मत कहना कि क्या लिखा है, पढ़ कर आ। मुझे दो पायों की बातें समझ में नहीं आती। दुनियाँ में जहाँ भी जाती हूँ, इनकी चाल-ढाल, भाषा-बोली में गहरी भिन्नता है।
यहाँ, लोहे के घर में बैठा, सुन रहा हूँ ट्रेन और ठंडी हवा की गरमा गरम बहस। अपने घर में टी.वी. के सामने बैठ कर टी.वी. एंकर और बुद्धिजीवियों की राजनैतिक काँव-काँव सुनने से तो अच्छा है इनकी बातें सुनना। उसी टाइप के कुछ लोग यहाँ इसी बोगी में आगे बैठकर झगड़ रहे हैं। उनके झगड़ने की आवाजें यहाँ तक आ रही हैं। बड़ी देर से रुकी है #बाबतपुर में बेचारी दून। गोदिया से पिटने ही वाली है। सुनना बंद कर दिया है अब मैंने हवा से इसकी बातें। आ रही है गोदिया जोर से हारन बजाते हुये। धक्क! से बैठ गया दून के साथ मेरे साथियों का भी दिल।

यू पी रोडवेज की बस यात्राएँ

कोहरा घना है। सड़क पर चमक रही हैं वाहनों की आँखें। छोटे कस्बे में रुकती है बस। दिखते हैं शाल, स्वेटर, मफ़लर या कम्बल ओढ़े आम आदमी। सुनाई पड़ती है आग तापते, चाय की चुस्की लेते या खैनी रगड़ते लोगों की हँसी-ठिठोली। एक बैल वाली 5-6 गाड़ियों का काफिला देखा। बोरा या कथरी ओढ़े ग्रामीण हाँक रहे थे बैल। जा रहे होंगे मंडी या लौट रहे होंगे समान उतारकर मंडी से।
ठंडा देख आज बैठ गए रहिशों की तरह ए. सी. बस में। यहाँ बैठ ग्रामीण अधिक परेशान दिखाई देते हैं! यू. पी. रोडवेज की ए. सी. बस है। सामान्य बसों का किराया 61 रूपया तो इसका 155. बहुत बड़ी खाई है आम और ख़ास में! इसे पाटना सम्भव नहीं दिखता। इस खाई को पाटने की आम जन की इच्छा, ख़ास बनते ही गुम हो जाती है।
इस बस में मिनरल वाटर भी मिलता है। आगे बैठी लड़की का बॉटल दो बार गिर चुका है। गिरकर बॉटल प्लास्टिक की कालीन पर बायें से दायें, दायें से बायें बार-बार लहराता रहा। लड़की उसे देखती रही। फाइनली उसने झुककर उठा ही लिया। आस-पास बैठे यात्रियों का कौतूहल शांत हुआ और वे पहले की तरह गरदन सीट से सटा कर बैठ गये।
ए.सी ट्रेन की बोगी की तरह ए.सी रोडवेज के यात्री भी धीर-गंभीर हो बैठते हैं। हँसने का समय और स्थान निर्धारित रहता है। आम आदमी की तरह सस्ती नहीं होती इनकी हँसी।
.....................

कोहरा छंटा नहीं है। आराम-आराम से चल रही है अपनी बस। जल रही हैं सड़क की दूसरी पटरी से आते वाहनों की आँखें। बाबतपुर हवाई अड्डे से पहले की सड़क पर काम चल रहा है। ओवर ब्रिज बन रहा है जहॉं से गुजरेगी रिंग रोड। हो रहे हैं विकास के काम।
अन्तरिक्ष यात्री की तरह लग रहे हैं जैकेट, हेलमेट पहने मोटर साइकिल चलाते लोग। इन्हें देख धोखा हुआ कि देश चाँद पर पहुँच गया है क्या! उदास चेहरा लिए गुजरा मफ़लर से कान बाँधे, दोनों हैंडिल में बड़े-बड़े झोले लटकाये, झुककर साइकिल चलाता आदमी। इसे देख भरम जाता रहा। हम उसी भारत में हैं जहां पैदा हुये थे।
एक किशोर दिखा। बिना मफ़लर लगाये, कंधे के साथ सर भी बायें-दायें झटकते, गुनगुनाते, मटकते हुए जा रहा था। ग्रामीण इलाके का है, जाड़े के कारण स्कूल बंदी का मजा ले रहा है। शहर के छोरे तो मम्मी की गोदी में सो रहे होंगे अभी। एक साइकिल चलाती दो बहनें दिखीं। पीछे कैरियर में छोटी थी, बड़ी साइकिल चला रही थी।
और भी बहुत कुछ दिखा जो आप हमेशा देखते हैं। मैंने कुछ नया नहीँ देखा। कोहरे के कारण लेट चल रही है ट्रेन। आज जिंदगी सड़क पर है।
........................

यू पी रोडवेज की नई बस है। इसमें गाना भी बजता है! स्पीकर लाउड है। ड्राइवर, कंडक्टर को शायद पहली बार लाउड स्पीकर वाली बस मिली है। फुल्ल भैल्यूम में सबसे बेकार वाला गाना बज रहा है। मैंने हल्ला मचाया तो ड्राइवर ने बंद ही कर दिया। सभी यात्री खुश हो गये-हाँ, हाँ बंद कर दो। मुझे एहसास हुआ लोग शान्ति चाहते हैं लेकिन इसके लिये भी विरोध नहीं कर पाते। बिना माँगे कुछ नहीं मिलता, खामोशी भी नहीं।
अब बस फाइनली रोडवेज से बाहर निकल कर सड़क पर दौड़ने लगी। हल्की-हल्की उछल रही है। अभी शहर है, शहर से बाहर निकलेगी तो पेट भर उछलेगी। इतना भी उछल सकती है कि मोबाइल छूट जाये हाथ से और लिखा हुआ पोस्ट ही न हो।
टिकट बोलिये भाई, टिकट! लिखने में कंडक्टर डिस्टर्ब कर रहा है। बोलिये भाई! मैंने बोल दिया-टिकट! और लिखता रहा। कंडक्टर मुझसे शरीफ है। प्यार से फिर बोला-टिकट भाई! कटा ही लेता हूँ टिकट। इतने शरीफ कंडक्टर कहाँ मिलते हैं!
बस अब शहर से बाहर निकल रही है। खुशी से उछल रही है। एक बार बाहर झाँकता हूँ, कन्फर्म करता हूँ, जौनपुर ही जा रही है या कहीं इलाहाबाद वाली में बैठ गया! रस्ता जाना पहचाना है। जौनपुर ही जा रही है। कितना आसान है सही और गलत रास्ते को पहचानना! जाना पहचाना है तो सही, अनजाना है तो गलत। सही गलत रास्ते का यह फर्क वास्तविक जीवन में भी कर पाते तो कितना अच्छा होता! मंजिल श्योर-शाट मिल ही जाती। मगर हाय! ऐसा होता नहीं। भगवान का कंडक्टर यमराज जब बिना पूछे जिंदगी का टिकट काट देता है तब समझ में आता है कि जिंदगी भर जिस रास्ते पर चले वो तो गलत था!
सफर में ऐसे बहुत से यात्री मिलते हैं जो गलत #ट्रेन में बैठ जाते हैं। रोज के यात्री उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं। कुछ बात मान कर अगले स्टेशन पर उतर जाते हैं और लौटकर सही ट्रेन पकड़ लेते हैं, कुछ टी.टी. से कन्फर्म करने जाते हैं। टी.टी. हड़काते है-आप विदाउट टिकट हैं, पहले फाइन भरिये! असल जिंदगी में भी यही होता है। सही रास्ता दिखाने वाले मिलते हैं मगर हम अपने मन से ही कन्फर्म करते हैं और मन की ही करते चले जाते हैं। कई बार फाइन भरते हैं मगर अंत तक नहीं सुधरते। अंत में जब यम सवार हो जाता है सर पर और कहता है-टिकट बोलिये,टिकट! तब जा कर होश आता है।
अब बस खुशी के मारे अधिक उछल रही है। मेऱा मतलब शहर से बहुत बाहर निकल चुकी है। एक दिन ऐसा भी आयेगा जब रँगी-पुती गढ्ढा मुक्त सड़क की होर्डिंग नहीं दिखेगी और सड़क वास्तव में गढ्ढा मुक्त होगी। खूब हो रहे हैं यू पी में विकास के काम।
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आराम-आराम से यूपी रोडवेज की बस पकड़ लिये हैं। पुराना गाना धीरे-धीरे बज रहा है। ड्राइवर समझदार लगता है। कभी कंडक्टर समझदार मिलता है , कभी ड्राइवर। दफ्तर में जैसे कभी अधिकारी समझदार मिलते हैं, कभी कर्मचारी। दोनों समझदार, दयावान मिल जांय, यह किस्मत की बात है।
हवा में आज भी ठंड है। अपनी बस खुशी-खुशी, उछल-उछल कर चल रही है। मैं दोनों हाथों से मोबाइल पकड़,संभल-संभल कर लिख रहा हूँ। माननीय अखिलेश जी के जमाने की नई बस है। अभी इसके शीशे पूरी तरह से बंद हो जाते हैं। ठंडी हवा भीतर नहीं आ रही। बाहर सरसों के फूलों से छेड़खानी कर रही है। अज्ञेय जी ने इन्हीं सरसों के खेतों को देखकर शेखर एक जीवनी में लिखा था-बाड़े पर पोस्ते, खेत फुली कुसुम्मी। पीली चोली वाली री! दे जा एक चुम्मी!
नया साल अभी शुरू हुआ है। अभी इसने नये सवाल नहीं उठाये। अभी उलझी है पुराने सवालों में। नये सवाल आने से पहले के पलों का भरपूर आनंद लीजिये। शेष तो रोज की दिनचर्या है, जैसे जीते थे, वैसे जीयेंगे। शुभ दिन।

चुनाव और दंगल

"चुनाव और दंगल" विषय सुनते ही #मिर्जा की ऑंखें भर आईं। मुश्किल से मुँह खोल पाया और भर्राई आवाज में बोल पड़ा-सब आपस में गड्डमगड्ड हौ पाण्डे! पहिले दंगा भयल रहल फिन चुनाव। एहर चुनाव क घोषणा भयल ओहर दँगा शुरू। कब्बो चुनाव के बादो दँगा भयल। अउर कब्बो-कब्बो त वोटिंग अउर दंगा दुन्नो साथे-साथ चलल। ई दंगा में सब बहुत नँगा हो जाला पाण्डे! हमार केतना नुकसान भयल.....
मुझे बीच में मिर्जा को रोकना पड़ा-चुप पागल! अब एक्को शब्द बोलबे त धकेल देब यहीं छत से, गिर जइबा नीचे। हम कहत हई 'दंगल' अउर तू सुनत हउआ 'दँगा'! पचासे ग्राम में जै श्री राम हो गइला!
मिर्जा को गहरा संतोष हुआ- हाँ, यह विषय ठीक है। चुनाव में दंगल हो, दँगा कभी नहीं होना चाहिये। फिर हँस कर बोला -ई बात पे एक पैग अउर पिलाव! बढ़िया बात हौ..चुनाव और दंगल! लेकिन न जाने काहे, हमें लगत हौ दंगल शब्द क चुनाव तू हमें च्यूतिया बनाये बदे करत हउआ! ऊ कउन चुनाव हौ पाण्डे जेहमें कत्तो दंगा ना भयल? जब-जव चुनाव क तारीख़ नजीक आवला लगेला कि दँगा होखे वाला...
मुझे बीच में ही मिर्जा को टोकना पड़ा। कहीं फिर अतीत में न चला जाय...
तोहें याद हौ मिर्जा?-दो बैलों की जोड़ी है, एक अंधा एक कोढ़ी है।
तोहे याद हौ पाण्डे?- जिस दिये में तेल नहीं है, वो दिया बेकार है।
गली-गली में शोर है, इंदिरा गांधी....है।
समग्र क्रान्ति अब नारा है, हिंदुस्तान हमारा है।
राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।
घाँस कपार लेहलन सारे! हमने ठहाके लगाते हुए एक दूसरे को देखा-कितनी बार उम्मीदें जुटाईं लोगों ने और न जाने कितनी बार लोगों का विश्वास टूटा!!!
मिर्जा! तुम हँसी-हँसी में बड़ी गम्भीर बात बोल जाते हो! धीरे-धीरे नारे का स्तर भी गिरा है न?
मिर्जा खिसियाकर पूछते हैं-अच्छा! कौन सी वह अच्छी बात है जिसका स्तर बढ़ा है?
चुनाव में कहॉं-कहाँ दंगल होता है पता है? शुरुआत उस घर से होता है जिस घर के लोग चुनाव लड़ते हैं फिर शहर में होता है। फिर देखते ही देखते गली-मोहल्ले घर-घर में दंगल होने लगता है।
ये पार्टियाँ तो देश सेवा के लिये बनी हैं न मिर्जा?
दंगल के शोर से सेवा होता है पाण्डे? सेवा का इरादा तो बुद्ध ने किया था। राज पाट छोड़ निकल पड़े थे चुपचाप जंगल में। ये चुनाव का दंगल तो राज-पाट पाने के लिये है।

सुबह की बातें -4


शाम के शोर से 
भोर का मौन अच्छा है 
शाम महबूबा है मेरी,
भोर 
एक मासूम बच्चा है
शब्दों का खजाना था 
शाम के पास 
एक भी याद नहीं 
रात के बाद 
भोर 
बोलता कुछ नहीं 
मगर सुनता हूँ 
खुद ब खुद 
अभिव्यक्त होता है 
चहक लूँ 
मन ही मन 
पंछियों के जगने से पहले 
अभी अँधेरा है, 
जाग लूँ थोड़ा
उजाला देख लूँ 
अजोर से पहले.

वृक्षों का माथा चाट
पत्ती-पत्ती रेंगती, 
टप्प से धरती पर कूद-कूद 
गायब हो रही थीं 
शरारती ओस की बूदें! 
पँछी खामोश थे,
गेट के ताले ठंडे 
कुछ देर स्तब्ध खड़ा 
भोर को सुनता रहा 
फिर भागकर 
रजाई में दुबक गया।

जारी है 
ओस की टिप-टिप.
छाया है कोहरा
चुप हैं पँछी
गूँज रहा है
भोर का मौन

नहीं है मेरे पास
एक भी
मेऱा पढ़ाया पालतू तोता
होता भी तो
'गोपी-कृष्ण कहो' नहीं कहता
मौन हो
राधे-राधे
सुनता रहता।

उठो न! 
सुनो न! 
धरती पर जल तरंग बजा रही हैं 
ओस की बूँदें!!! 
सुन रहे हैं पँछी 
दुबक कर 
अपने-अपने घोंसलों में
मौन मुखर है 
चहुँ ओर
आओ! 
आँखें बंद कर बैठो यहाँ, 
शाल ओढ़कर 
ना ना 
कुछ ना कहो।
भोर के अजोर तक 
सुनती रहो...
कितना मधुर है मौन का संगीत! 
इन पंछियों की तरह सशंकित होकर मत देखो! 
ऑंखें बंद कर विश्वास से सुनो..
ऐसे ही होता है 
अन्धकार के बाद 
रोज सबेरा।
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7.1.17

लोहे का घर-24

लोहे के घर की खिड़की से झाँक रहा हूँ मैं और घर में घुसने का प्रयास कर रहा है कोहरा। आजकल रोज के यात्रियों के समय से नहीं आती ट्रेन, ट्रेन के समय से चलना पड़ता है यात्रियों को। लेट है अपनी फोट्टीडाउन, दस बजे के बाद आयेगी। भोर में आने वाली किसान सुबह 7 बजे के आस-पास चली। कोई नहाकर आया है, कोई बिना नहाये। किसी को चाय मिल गई , कोई-कोई भाग्यशाली है जो नाश्ता भी कर चुका है। सभी के झोले में है टिफिन और पानी।
सभी के चेहरे पर ट्रेन पकड़ पाने की खुशी है। कोई अभागा भगा-भागा प्लेटफॉर्म से फोन कर रहा है। साथी संवेदना प्रकट कर रहे हैं-आप चूक गए, जाइये! बस से आइये। चौड़ी करण के कारण सड़क मार्ग धूल और जाम से भरा है, उप्पर से 61/. रूपये का अतिरिक्त खर्च। ट्रेन छूटने की पीड़ा वही समझ सकता है जिसकी ट्रेन कभी छुटी हो। जाके पैर न पड़ी बिवाई, ऊ का जाने पीर पराई!
जिसने ट्रेन पकड़ लिया वे अपने को परम् सौभाग्यशाली समझ रहे हैं। कोई अख़बार पढ़ रहा है, कोई मोबाइल चला रहा है और कोई खाली बर्थ ढूँढ कर अधूरी नींद पूरी कर रहा है। नोट बंदी पर चर्चा करते-करते बोर हो चुके लगता है। मोबाइल बैंकिंग के डाउनलोड किये गये नये-नये एप दिखाये जा रहे हैं एक दुसरे को। वेतन निकालने और खर्च करने के तरीके ढूंढे जा रहे हैं। वक्त के साथ खुद को अपडेट करने में लगे है लोग। एक दुसरे से पूछ कर सीख रहे हैं जीने के तरीके। सुबह-सुबह दाने-पानी की तलाश में भागते पंछियों की तरह चहक रहे हैं रोज के यात्री।
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ठंड बहुत बढ़ गई है। रोज के यात्री जैकेट, टोपी, मफ़लर पहने चहक रहे हैं। अंतरिक्ष यात्री लग रहे हैं सभी लोहे के घर में। आज कोहरा नहीं है लेकिन चल रही है शीतलहरी। रोज के यात्रियों के अपने-अपने ग्रुप हैं। कहीं चल रही है चर्चा, कहीं खुल गई है तास की गड्डी, कहीं खुल चुका है टिफिन, कोई पढ़ रहा है अखबार तो कोई मशगूल है मोबाइल में।
एक ने उछलकर सभी को वीडियो दिखया जिसमें जयमाल के समय खुल जाता है दूल्हे का पजामा और हँसने लगती है सबके साथ दुल्हन भी। हँसी या गम इसी को कहते हैं, जो फ़ूटकर निकल जाये। रोकना चाहो मगर रुके ही न। न माने कोई बंधन। वैसे ही दुःख छाती पीटने या संसद में कोहराम मचाने से व्यक्त नहीं होता। अच्छे दिन के नारों से नहीं आते अच्छे दिन। ये तो महसूस होता है खुद ब खुद। हल्ला मचाकर किसी को एहसास नहीं दिला सकते कि अच्छे या बुरे दिन आ गये।
लगभग सही समय से ही चल रही है अपनी #ट्रेन। धूप नहीं निकली है लेकिन कोहरा भी नहीं है। लोहे के घर की खिड़की से दिख रहे हैं हरे अरहर और पीले सरसों के खेत। आसमान के श्वेत रंग को मिलाकर देखो तो याद आता है अपना #तिरंगा । बीच-बीच में बरगद की लम्बी झूलती जड़ें, पगडंडियों पर चलते स्कूल जाते बच्चे, अलाव जला कर आग तापते लोग और खेतों में अपनी मिट्टी से प्यार करते ग्रामीण। कर्मशील मनुष्यों का दर्शन बड़ा शुभ होता है। अकर्मण्य नहीं दिखते, लोहे के घर से।
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ट्रेन लेट हो तो मुसीबत, राइट हो तो और भी मुसीबत! आज फोट्टीनाइन बहुत दिनों के बाद राइट टाइम आई और छूट भी गई। बहुत से रोज के यात्रियों की ट्रेन छूट गई। वे घर से ये मान कर चले थे कि नेट में भले राइट टाइम दिखा रहा हो पर आयेगी थोड़ी न!
अविश्वास लोगों में बढ़ता जा रहा है। शादी की पार्टी हो, समारोह हो या फिर लैला के वादे हों निर्धारित समय से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। इधर ट्रेन और नोट बंदी के बाद बन-बिगड़ रहे नये नियमों से भी लोग सशंकित हुए हैं। आम आदमी के पास 2000 का नया नोट आया नहीं कि जल्दी से भजाने की जुगत में लग जाता है। कहीं यह भी बंद न हो जाय! अब ऐसे माहौल में किसी का ईमानदार निकल जाना, किसी का वादा निभाना या किसी ट्रेन का सही समय पर छूट जाना सरासर धोखा है। आम आदमी पर यह ईमानदारी भी गाज बनकर गिर रही है।
इस ईमानदार धोखाधड़ी करने वालों में हमारे प्रधान मंत्री जी नोटबंदी करके सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए। समूचा विपक्ष नाराज है-ये तो बहुत बड़ा धोखा है! चुनाव सर पर है और इतना बड़ा धोखा!!! अब सबने मिलकर प्रचारित करना शुरू किया, यह तो गरीबों के साथ धोखा है। गरीबों को परेशानी हो भी रही है। बड़े लोगों की चोर-बाजारी पकड़ में भी आ रही है। चोर नये-नये पैतरे खोज रहे है, सरकार नये-नये नीयम बना रही है।
इस नूरा कुश्ती में जो सबसे ज्यादा परेशान है वो है आम आदमी। पहले उसे लगा कि डकैती डालकर जो धनवान बने थे उनके नोट बेकार हो गए। बहुत खुश हुए कि घंटों लाइन में लगे हैं तो क्या, चोरवे तो बरबाद हुए! अब नाराज है -हमारे लिए नोट नहीं लेकिन चोरों को लाखों के नए नोट! जइसे नोट बंद कर मोदी जी अपनी पीठ थपथपा कर, तालियाँ बजवाकर राजनीति करने लगे वइसे पूरा विपक्ष नोटबंदी की परेशानियां गिना कर उन्हें झूठा साबित करने में जुट गए। जइसे किसी दफ्तर में आ टपके किसी ईमानदार अधिकारी को उनके मातहत ही कोसने लगते हैं, वइसे जिनके बल पर नोटबंदी का फैसला किया, वे ही उनको गलत साबित करने में जुट गये!
अब तो माहौल यह हो गया है कि जिसके साथ जो भी बुरा होता है इल्जाम झट से मोदी जी के सर फोड़ देता है। आर बी आई नीयम बदले, इल्जाम मोदी पर। कहीं कोई किसी अव्यवस्था का शिकार हो, इल्जाम मोदी पर। हद तो तब हो गई जब सही समय पर जाने से यात्रियों की ट्रेन छूटी, इल्जाम मोदी पर! कोई कह रहा था-मोदिया ट्रेन छुड़ा देहलस!!! सरकार, पार्टी सब हल्के, अच्छे-बुरे सभी के लिये जिम्मेदार-मोदी जी।
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इधर दून के आने का एनाउंसमेंट शुरू हुआ , उधर भण्डारी स्टेशन पर नशे में झूमते, सबका मालिक एक....नशेमन तेरे लिये...! गाते, नाचते अर्धविक्षिप्त शराबी के कदम ठिठके। यात्रियों का रेला एक प्लेटफॉर्म से दूसरे की ओर भागने लगा। शराबी के इर्द-गिर्द गोल गोलइया में बड़ी देर से मजमा लगाये हंस रहे रोज के यात्रियों ने नशेड़ी को छोड़ अपनी-अपनी पोजीशन ले ली।
बहुत भीड़ है आज ट्रेन में। इस बोगी से उस बोगी टहलते-टहलते आखिर ऊपर चढ़ कर बैठने भर की जगह मिल गई है। दून से आ रहे कोलकोता जाने वाले यात्रियों की भीड़ है। लगता है जैसे बंगाल के किसी घर में बैठे हैं। आज बंगाली हो गई है लोहे के घर की यह बोगी। गोरूम, एक्टो, चहार घण्टा लेट, एक टका जैसे शब्द सुनाई पड़ रहे हैं। नीचे बैठे परिवार ने झाल-मुड़ी बनाई। नाक की नोक पर चश्मा अटकाये सुफेद मूँछ वाले टकले प्रौढ़ ने बड़े सलीके से प्याज और टमाटर काटकर पॉलीथीन में रखे लाई- चने में मिलाया। सामने बैठी महिला ने मुझे छोड़ सबको अखबार के टुकड़ों पर निकाल-निकाल कर दिया। मैं भी उधर से मुँह मोड़ जेब से निकाल कर चीनिया बादाम फोड़ने और छिलकों को छोटी पॉलीथीन में रखने लगा।
कोहरे की वजह से धीमे चल रही हैं सभी ट्रेनें। 'सौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाली हालत है। दोपहर में आने वाली ट्रेन शाम को मिल रही है, शाम वाली सुबह। नीचे बैठे मूंछों वाले टकले ने एक मोटी किताब खोल ली है। चश्मा नाक के नोक से पीछे आ गया है। पता नहीं कौन सी पुस्तक पढ़ रहे हैं! मेरे बैग में भी वेतन निर्धारण के शासनादेश वाली एक किताब है लेकिन मैं उसे पढ़ना नहीं चाहता। सिन्दबाद की साहसिक यात्राओं वाली पुस्तक के अलावा दूसरी पुस्तक पढ़ने का मन नहीं है। क्या जमाना था जब यात्रा में निकलने वाला युवा, बूढ़ा होने के बाद घर लौटता था! ऐसी पुस्तकें पढ़ी जांय तो ट्रेन का लेट होना कभी न खले। मैं तो कहता हूँ प्रभु जी को सभी यात्रियों में यह पुस्तक मुफ्त बंटवानी चाहिये और कान में तेल डाल कर सो जाना चाहिये।
पीछे बैठे यात्री बतियाने के मूड में हैं। राम मंदिर, आरक्षण, नोट बंदी सभी मुद्दों पर बहसियाने के बाद अब किसी फिल्म की चर्चा कर रहे हैं। फालतू मुद्दों में आम आदमी कितना उलझे! थक हार कर साहित्य, संगीत, भजन या प्रकृति की शरण में जाना ही पड़ता है। बच्चे अपने में मस्त हैं। उनका पेट भरा लगता है। कभी ऊपर चढ़ रहे हैं, कभी नीचे उतर रहे हैं। बंद हैं लोहे के घर की खिड़कियाँ। बाहर चल रही है शिमला से आयी बर्फिली हवा। नीचे बैठे सुफेद मूँछ वाले की मोबाइल घनघना रही है। टोपी हटाकर, अपने चाँद को पूरा हिलाते हुए उसने फोन उठाया और जोर से बोला..हैलो...!
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आज पाटलीपुत्र में भीड़ नहीं है मगर एक बेंगाली परिवार आज भी है। दादी और पोती में खूब बातें हो रही हैं। इतने जल्दी-जल्दी बोल रहीं हैं दोनों कि बात समझ में नहीं आ रही।
मेरे न चाहने के बाद भी यादव जी ऊपर चले गये! मैंने कहा -इतनी जल्दी! तो चिढ़कर बोले-'तोहें साथे लेकर जाइब हो, अभहिन सूते जात हई।' यादव जी की पलकें बंद हैं। ऊपर के बर्थ पर लेटकर पटरियों की खटर-पटर सुनने में अधिक मजा आता होगा।
खाना-खाना चिल्लाते हुए चार आदमी खाने की ट्रंक पकड़े गुजर गये। वे खाना-खाना चीख रहे थे, मुझे 'राम नाम सत्य है' सुनाई दे रहा था। हरा मटर बेचने वाले पीछे-पीछे मसाले की दुर्गन्ध फैलाते हुए गुजर गये। जैसे 'राम नाम सत्य है' के पीछे अगरबत्ती सुलगाये लोग! अब माहौल में मरघटी सन्नाटा पसर गया है। यादव जी की पलकें पहले की तरह बंद हैं लेकिन अब उन्होंने दाहिने हाथ से पकड़ लिया है बर्थ की रेलिंग। ऊपर गये जरूर हैं मगर और ऊपर नहीं जाना चाहते। मुझे साथ लेकर जाने का संकल्प दृढ है शायद!
मरघटी माहौल के बीच अपने आप थोड़ी उठ गई है लोहे के घर की खिड़की। सुरसुर-सुरसुर मेरे जिस्म से छू छू जाती है बर्फिली हवा। मैं सिहर-सिहर मजा ले रहा हूँ ठंडी हवा का।
कहीं रुक गई है अपनी ट्रेन। यादव जी भूत की तरह मेरे सामने टपक कर पूछ रहे हैं-कहाँ पँहुचल पाँड़े? कुछ और जग कर बड़बड़ाने लगे-अभहिंन ले त बढ़िया लियायल, अब का हो गयल! अब बेचैनी से सुर्ती रगड़ रहे हैं। पता नहीं कहाँ जाने की जल्दी है! इस घर में इतने लोग, उस घर में एक अदद पत्नी और 1-2 बच्चे! वहाँ पहुँच कर वहीं रह पायें ऐसा भी नहीं। फिर सुबह उठकर आना है इसी घर में! क्या जाहिलाना प्रश्न है-कहाँ पहुँचल पाँड़े? हमको कहना पड़ा-चुप मारे रहा, हमें लिखे द। पहुँच जाई त तोहें साथे लेके चलब। तू भले उप्पर अकेले चला जा, हम तोहें बिना लेहले न उतरब।
एक ट्रेन सरसरा के गुजरी है अभी। एक ताजा हवा चली है अभी। चलकर शिवपुर के आउटर में खड़ी है अपनी भी #ट्रेन। मंजिल पास जान उठकर बड़बड़ाने लगे हैं सभी यात्री। उनके शोर से जाना, बहुत से बेंगाली हैं इस बोगी में! जब तक लोग बोलते नहीं तब तक समझ में नहीं आती उनकी भाषा। एक और ट्रेन गुजर गई। कुछ ज्यादा इतमिनान से खड़ी है अपनी ट्रेन। लिखना बंद कर बंगाली समझने का प्रयास करता हूँ। सुनने में बड़ी मीठी लगती है बंगाली।
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मोबाइल में गाना बजा रहा है-चार दिनों का खेल हो रब्बा लंबी..जुदाई..। बांसुरी में इसकी धुन खूब बजती है। जाड़े में लोहे के घर की शाम रंग-बिरंगी होती है। कहीं मनहूसियत से भरी तो कहीं आनंद दायक। एक ही बोगी में अलग-अलग ग्रुप। कोई अपने में सिकुड़े-सिकुड़े, गुमसुम तो कोई हँसी-मजाक, हल्ला-गुल्ला करते हुए। मेरे अगल-बगल गाल में हाथ रख कर कहाँ पहुँचे?, रुक गई, चल दी, पीछे वाली क्रास न कर जाए! ऐसी ही मनहूसियत की बातें करने वाले लोग हैं। बगल में शोर गुल है। लगातार गाना बज रहा है-चला जाता हूँ, किसी की धुन में, धड़कते दिल के तराने लिये...।
आज कितनो की फूटी किस्मत का लाभ हमें मिला। डाइवर्टेड ट्रेन समय से मिल गई और अब लगता है 9 बजे तक घर पहुँच जायेंगे। लोग बता रहे हैं-अभी शिवपुर में खड़ी है। यहॉं से चले तो बात बने। चल दी! पता नहीं जल्दी घर पहुँच कर ही क्या खजाना लूट लेंगे! 
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सफ़र में ख़ुद को झोंक कर देखो, रास्ते और सवारियाँ दोनों मिल ही जाती हैं। किसी की लेट, किसी की राइट टाइम हो जाती है। किसी की राइट भी छूट जाती है।
आज शाम जौनपुर में फरक्का मिली। जफराबाद में छूटे/छठे रोज के यात्रियों को अपने बोगी में बिठाकर कुछ देर आराम करने के बाद पटरी पर दौड़ने लगी। अब हवा से बातें कर रह रही है।
जहाँ-जहाँ से यह गुजरती होगी, पूस की शाम चैन से सो रही ठंडी पटरियों में ग़ज़ब की गर्मी आ जाती होगी! #ट्रेन हवा से कहती होगी-देखा! कितना गरम कर दिया न! पटरियों को। हवा कहती होगी-चुप रह लालमुँही! इंजन के बल पर इतना न अकड़! पटरियाँ न होतीं तो तू एक कदम चल न पाती। पटरियों से उतर कर दिखा! ट्रेन हँसते-हँसते धीमी हो रही है। कह रही शायद-अकेले किसी का कभी कोई वजूद नहीं होता। अकेले किसी का होना या न होना बेमानी है। पटरियाँ न होतीं तो हम ही क्यों होते? हम न होते तो पटरियाँ ही क्यों होती? तू भी तो धरती के दम पर इतना इतरा रही है हवा! चाँद पर क्यों नहीं बहती? सूरज से क्यों नहीं बतियाती?
लोहे के घर में मैं जहाँ बैठा हूँ कोई किसी से बात नहीं कर रहा। सभी मेरी तरह मोबाइल में भिड़े हुए हैं। मैं लिख रहा हूँ, वे देख/सुन रहे हैं। दोनों कानों में तार फंसाकर, गरदन झुका कर तल्लीन हैं, भीडियो/ फिल्म देखने या गाना सुनने में। मेरे बगल में एक बेंगाली वृद्धा का तकिया, ओढ़ना पड़ा है। वृद्धा अपने बुढऊ और दूसरे बेंगाली परिचितों के साथ पीछे वाली सीट पर बैठ कर बतिया रही हैं और लाई खाने के लिए सीमेंट के पुरानी बोरी से बरतन-भांडा निकाल रही है। उसने एक भगोना निकाला, बुढऊ ने बुढ़िया के हाथ से पकड़ कर बगोने में दाने भरे और अब बुढ़िया स्टील की थाली निकाल रही हैं। साथ बैठे बेंगाली लगातार कुछ न कुछ चपड़-चपड़ बतियाते जा रहे हैं। यादव जी ऊपर से टपक कर, कहाँ पहुँचल पाण्डे? पूछ चुके हैं। मैं उनसे कह चुका हूँ-चुप मारे रहा! तोहें साथे ले के उतरब।
शायद शिवपुर आ रहा है। यहां से उनका घर पास पड़ता है। ट्रेन हवा से बातें करने के बाद अब अब धीमे-धीमे सरक रही है। अंडा चावल बेचने वाला "बोलिये! खाना-खाना" चीखते हुये गुजरा है। अब रुक ही गई शिवपुर स्टेशन पर। कुछ लोग अब ट्रेन के लेट होने का समय गिना-गिना कर इसे कोसना शुरू कर चुके हैं। यहॉं तो स्टापेज नहीं है! यहाँ क्यों रुक गई! कोई बता रहा है कि फलाँ ट्रेन इतने घण्टे लेट है और फलाँ इतने घण्टे। फरक्का के लेट होने पर हक्का-बक्का होने वाले यह जानकर संतोष कर रहे हैं कि सभी ट्रेनें लेट चल रही है।
ट्रेन इतमिनान से खड़ी हो लम्बी साँसें ले रही है-कोसो-कोसो और गाली दो नाशुक्रों! यह कभी नहीं कहेंगे कि सकुशल यहां तक ले आई और किसी को एक खरोंच तक नहीं लगी इस जाड़े/कोहरे में! दूसरे का लेट होना खूब दिखता है, अपने क्या सही रहते हो हमेशा? साढ़े चार घण्टे लेट हुई तो क्या अधिक पैसे ले लिये तुमसे?
यह तो अच्छा है कि ट्रेन की बातें सिर्फ मैं ही सुन पाता हूँ वरना बवाल हो जाता।
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लोहे के घर में बैठ कर बंद खिड़कियों के शीशे से कोहरे में डूबे वृक्षों, कंकरीट के मकानों, झुग्गी-झोपड़ियों और सरसों-अरहर के खेतों को तेजी से नाचते हुए पीछे भागते देखना भी अलग किसिम का आनंद है। पटरी पर हवा से बातें कर रही है वरूणा और इसकी बोगी में बैठ कर मन से बातें कर रहा हूँ मैं।
हमारे आदरणीय प्रधान मंत्री जी भी मन की बात करते हैं। वे राष्ट्र के प्रधान मंत्री हैं तो उन्हें अपने मन की नहीं जन- जन के मन की बात करनी पड़ती है। हम इस मामले में खुशनसीब हैं कि अपने मन की बात खुल कर कर सकते हैं। वे नहीं बैठ सकते मेरी तरह अकेले लोहे के घर में। नहीं सोच सकते अपना दुःख दर्द। मुझे तो लगता है कि उनका मन कहीं गुम हो चुका होगा अब तक। रूठ गया होगा-जाओ! कभी उतरोगे कुर्सी से और लोगे सामाजिक जीवन से सन्यास तो आएंगे फिर तुम्हारे पास। अभी तो उन्हें वही करना है जिससे राष्ट्र का भला हो, वही उपाय सोचना है जिससे विरोड़ियों को जवाब दिया जा सके और वही करना है जो देश हित में जन सेवक कार्यक्रम तय करें।
मन की बात बताना और मन की करना दोनों में बड़ा फर्क होता है। बताते समय हम अच्छा-अच्छा बताते हैं लेकिन करते समय गन्दा-गन्दा भी कर जाते हैं। बताते समय जो गंदा किया उसे गोल कर जाते हैं, जो अच्छा किया वही बताते हैं।
समाज के सभ्य होने की पहली शर्त ही गन्दा छुपाना और अच्छा दिखाना से हुई! जैसे ही मानव को सभ्य होने का थोड़ा ज्ञान हुआ उसने सबसे पहले अपने अंगों को गुप्त रखना शुरू कर दिया। कपड़े पहनना शुरू किया। नँगा रहना शर्म की बात हो गई। धीरे-धीरे सभ्य और सभ्य होता गया। अब तो खुले में शौच करना भी असभ्यता की निशानी है। गन्दगी छुपाना और स्वच्छ दिखना सभ्य समाज की शर्त है। यही कारण है कि हम जब किसी से मन की बात करते हैं तो अच्छा-अच्छा, साफ-सुथरा ही दिखने और बताने का प्रयास करते हैं। गन्दा करने में संकोच नहीं करते मगर जब कोई आपकी गन्दगी दिखा कर आपको नँगा कर देता है तो मारे शर्म के पानी-पानी हो जाते हैं।
सन्नाटा है लोहे के घर में। मेरे सामने बैठे मेरे मित्र के अलावा इस बोगी में दूर-दूर तक कोई नहीं दिखता। मैं मन की बात लिख रहा हूं, मित्र मन का करते हुए मोबाइल में भीडियो देख रहे हैं। करने को तो मैं भी मन का ही कर रहा हूँ लेकिन मन की बात लिखकर सार्वजनिक भी कर रहा हूँ। बड़ा महीन अंतर है मन की इस बात में।
#ट्रेन अब जौनपुर पहुँच रही है। लिखना बंद करना पड़ेगा और सबको शुभ प्रभात बोलना पड़ेगा। मैंने आज की सुबह का भरपूर आनंद लिया। वो सब आनंद आप तक पहुंचे। सुबह के साथ आपका दिन भी शुभ हो।
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