12.4.26

राजस्थान यात्रा

4 अप्रैल को शुरू हुई राजस्थान की यह पारिवारिक यात्रा आज 12 अप्रैल को अपने पड़ाव पर है। फिलहाल मैं 'लोहे के घर' यानी रेलगाड़ी के 2nd AC डिब्बे में अपनी साइड लोअर बर्थ पर लेटा हूँ। सामने वाली बर्थ पर श्रीमती जी, दोनों बेटियाँ और दोनों नाती जीवन के आनंद में डूबे हैं। नातियों का 'उपद्रव' जारी है और रात के भोजन के बाद भी किसी की आँखों में नींद नहीं है। मेरे सामने के पर्दे गिर चुके हैं, पड़ोस की महिलाओं की गपशप शांत हो चुकी है, और मेरा अंगूठा मोबाइल की स्क्रीन पर नाच रहा है। सच है, जिसे दुनिया 'अंगूठा छाप' कहकर अनपढ़ कहती थी, आज वही अंगूठा हमें पूरी दुनिया दिखा रहा है।

### **रणथंभौर: जहाँ इतिहास और जंगल का मिलन होता है**

हमारी यात्रा का श्रीगणेश बनारस-ओखा एक्सप्रेस से हुआ। सवाई माधोपुर पहुँचते ही 'होटल रिजेंटा वान्या महल' के शाही स्वागत ने थकान मिटा दी। **त्रिनेत्र दर्शन और भालू से मुठभेड़:** शाम को जब हम रणथंभौर किला फतह करने निकले, तो मार्ग रोमांच से भरा था। 2 किलोमीटर की चढ़ाई में मोर और चीतलों का साथ मिला। तभी अचानक कुछ युवकों के 'भालू-भालू' चिल्लाने की आवाज आई। हमने देखा कि एक जंगली भालू फुर्ती से भाग रहा था और एक चौकीदार उसे लाठी से ऐसे खदेड़ रहा था जैसे बनारस की गलियों में कोई ग्वाला अपनी भैंस को हांकता है। उस दृश्य को कैमरे में कैद करना वाकई रोमांचक था। ऊपर पहुँचकर **त्रिनेत्र गणेश जी** की मनोहर छवि और भक्तों के जयकारों ने रूह को सुकून से भर दिया। > **एक ऐतिहासिक तथ्य:** अबुल फजल ने इस दुर्ग के बारे में कहा था— *"अन्य सब दुर्ग नंगे हैं, जबकि यह दुर्ग बख्तरबंद है।"* पहाड़ियों के बीच छिपा यह किला सामरिक और प्राकृतिक सुंदरता का बेजोड़ मेल है। > ### **टाइगर सफारी: 'बादल' का इंतज़ार और साक्षात् दर्शन** सफारी के पहले दिन जब 'बादल' नाम का बाघ नहीं दिखा, तो मैंने गाइड का खूब मजाक उड़ाया— *"भाई, उल्लू दिखा रहे हो या बना रहे हो?"* लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही गाइड ने हिरण की 'कॉल' सुनी, माहौल में तनाव और रोमांच घुल गया। तभी झाड़ियों को चीरता हुआ एक भव्य बाघ सड़क पार कर हमारे सामने आया। साँसे थम सी गईं! वह शाही अंदाज़ में चला और झाड़ियों में ओझल हो गया। शाम की सफारी में तो ड्राइवर ने कमाल ही कर दिया; उसने मानो बाघ का पीछा करते हुए हमें दो-तीन बार उसके 'दिव्य दर्शन' कराए। ### **जयपुर: गुलाबी शहर की रंगीनी** 7 अप्रैल को हम 'पिंक सिटी' पहुँचे। यहाँ का अनुभव मिला-जुला रहा। * **चोखी ढाणी:** यहाँ राजस्थानी संस्कृति की झलक तो दिखी, लेकिन व्यावसायिकता का बोझ (₹1100 प्रति व्यक्ति टिकट) कुछ ज्यादा लगा। कठपुतली और लोक नृत्य तो अच्छे थे, पर भोजन का स्वाद औसत रहा। * **आमेर का किला और पन्ना मीणा कुंड:** आमेर की भव्यता देख आँखें फटी रह गईं। गाइड ने 'दीवाने-आम' से लेकर 'शीश महल' तक की कहानियाँ सुनाईं। महल के ऊपर से मावठा झील का नज़ारा किसी फिल्म के सीन जैसा था। * **जल महल और मॉर्निंग वॉक:** सुबह-सुबह मानसागर झील के बीच खड़े जल महल को निहारना एक सुखद अनुभव था। पानी में डूबी चार मंजिलें और ऊपर की राजसी बनावट... इसे बस दूर से निहारा जा सकता है, महसूस किया जा सकता है। ### **ब्लॉगिंग के रिश्ते और गोविंद देव जी की भक्ति** जयपुर यात्रा तब और खास हो गई जब मैं ब्लॉगर मित्र **वाणी गीत जी** से मिला। डिजिटल दुनिया के परिचय जब साक्षात् मुलाक़ात में बदलते हैं, तो लगता ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं। उनकी बिटिया के हाथ की चाय और पुरानी यादों के साथ समय कब बीत गया, पता ही नहीं चला। शाम को **गोविंद देव जी मंदिर** में जो प्रेम की वर्षा देखी, वह अद्भुत थी। *"मोहें गोपी बना दे इक बार..."* भजनों पर झूमते भक्त और पर्दा उठते ही राधा-कृष्ण की वह मनमोहक छवि... लगा जैसे यात्रा सफल हो गई। **उपसंहार** सिटी पैलेस के वैभव और सेंट्रल पार्क की हरियाली को समेटे हुए अब हम वापस अपनी जड़ों की ओर (बनारस) लौट रहे हैं। राजस्थान की यादें, वह ₹200 की चाय का राजसी ठाट, और परिवार के साथ बिताए ये पल अब जीवन भर की पूँजी बन चुके हैं। सुबह हो चुकी है, खिड़की के बाहर बनारस की चिर-परिचित हवाएँ महकने लगी हैं।