6.10.26
1.10.26
चार धाम यात्रा
23 सितंबर, 2026
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दो मित्रों प्रमोद और आशुतोष के साथ ट्रेन नम्बर 13009 दून एक्सप्रेस में बैठे हैं। बनारस से सही समय 11.10 A. M. पर छूटी है। 15-16 दिन की जमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ, तुंगनाथ की लम्बी यात्रा है। इस ट्रेन का कल सुबह 5. 20A.M. हरिद्वार पहुंचने का समय है। बंगलोर से देहली होते हुए अरविन्द के साथ आनंद भी पहुँच रहे हैं हरिद्वार। कल सुबह 5 मित्रों का हर की पौड़ी में स्नान, मनसा देवी दर्शन और हर की पैड़ी में गंगा आरती देखने का प्रोग्राम है। बनारस से एक मित्र और अजीत भाई भी चलने वाले थे, किसी कारण से उनका आना नहीं हो सका। चार धाम सब किस्मत से कर पाता है। हम लोग चले तो हैं लेकिन कहाँ पहुँच पाते हैं, कहाँ नहीं, सब ईश्वर पर निर्भर करता है।
24 सितंबर
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अपनी ट्रेन लेट हो गई है। अभी मुरादाबाद पहुँचे हैं जबकि अब तक हरिद्वार के करीब होना चाहिए था। 2.30 घण्टे लेट है। अपनी आदत के अनुसार हम जगकर घूमने के लिए तैयार हो चुके हैं, नींद उड़ चुकी है।
मुरादाबाद से आगे चली है ट्रेन। बाहर, भीतर अँधेरा है सिर्फ मेरा मोबाइल और चश्मे के भीतर मेरी ऑंखें चमक रही हैं। पैर दौड़ने के लिए बेताब है, मन उड़ना चाहता है लेकिन मजबूरी है, लेटे हैं लोहे के घर के अपने बर्थ में। यह सम्पन्न मित्रों का ग्रुप है, 2nd. A.C. की आराम दायक बर्थ है, बाहरी शोर कम सुनाई देता है, सोने के लिए ठीक है। स्लीपर में अलग आनंद है। खिड़की से फोटोग्राफी की जा सकती है, स्टेशन आने पर हाथ बढ़ाकर कुछ खरीदा जा सकता है और अनजान यात्रियों से खूब बातें की जा सकती हैं। स्लीपर क्लास के यात्री आपस में दिल खोलकर बतियाते हैं, इस बोगी में तो सब मुँह बनाकर अपरिचितों से सावधान की मुद्रा में दिखते हैं। यात्रा का मेरा अनुभव कहता है कि कम दूरी (4,5 घण्टे) की यात्रा स्लीपर में, रात की यात्रा 3rd AC में और दिन-रात की, लम्बी दूरी की यात्रा 2nd AC में करनी चाहिए।
अभी सुबह के 5.20 हुए हैं। ट्रेन सही समय पर होती तो अभी हरिद्वार के प्लेटफार्म पर उतर रहे होते। हाय! अभी अँधेरे में लेटे-लेटे सिर्फ ट्रेन के चलने की आवाज सुन रहे हैं। जब सेवा में थे तो दून पकड़ कर कई बार जौनपुर-बनारस किए हैं, दून से खूब बतियाए हैं, आज दून हमे पहचान पाती तो जानती कि उसका एक पुराना यात्री 'बेचैन आत्मा' लोहे के घर में कल दिन से सफर कर रहा है। 😃
अंततः दून 3 घण्टे विलम्ब से हरिद्वार पहुंची और हमने उसे मात्र 3 घण्टे विलम्ब के लिए धन्यवाद दिया। रात भी कर देती तो मैं क्या बिगाड़ लेता?
आगे सब अच्छा रहा। सेठ आनंदमयी जयपुरिया धर्मशाला में अपना दो रूम, एक 3 बेड वाला दूसरा 2 बेड वाला, पहले से बुक था। यह धर्मशाला राम घाट में है। हर की पैड़ी की 400 मीटर की पैदल दूरी है। हम कमरे में सामान रखकर गंगा स्नान के लिए हर की पैड़ी चल दिए। हालांकि गंगा स्नान तो उसी धर्मशाला में ही हो जाता लेकिन हमको हर की पैड़ी में स्नान का मन था। धर्मशाला में बकायदा गंगा घाट बना है। आँगन से सीड़ी उतरकर घाट में जाने का रास्ता है। धर्मशाला में ठहरे यात्रियों के अलावा कोई दूसरा नहीं जाता। पुरुष तो कहीं भी कपड़े बदल सकते हैं लेकिन यहाँ महिलाओं के लिए भी कपड़े बदलने की अच्छी व्यवस्था है।
हर की पैड़ी में गंगा स्नान, चंदन मंदन, संकलप के बाद हम गलियों में घूमते हुए प्राचीन मथुरा की दुकान की कचौड़ी खाते हुए कमरे में लौटे। थोड़ी देर आराम करने के बाद माँ मनसा देवी के दर्शन के लिए 'रोप वे' से पहुँचे। आराम से दर्शन हुआ। दर्शन के बाद होटल 'होशियार पुरी' में स्वादिष्ट भोजन के बाद कमरे में आराम किया और शाम को पुनः हर की पैड़ी की गंगा आरती देखने पहुँच गए। देर शाम आनंद लेते हुए, एक पुरुआ दूध पीते हुए कमरे में लौटे। दिन के भारी भोजन के बाद शाम को भोजन की इच्छा नहीं थी।
अब इतना लिखने के बाद सोने का मन है। कल सुबह सूर्योदय से पहले ही निकलना है बरकोट की यात्रा के लिए। शुभ रात्रि।
25 सितंबर
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केशर सिंह इनोवा क्रिस्टा गाड़ी नम्बर UK07TE7218 लेकर आए। बारकोट के लिए हमारी यात्रा सुबह 6.40 से प्रारम्भ हुईं। कल 24 सितंबर की शाम हरिद्वार में खूब बारिश हुई थी, सुबह का मौसम भी बादल और नमी लिए हुए खूबसूरत था। जयपुरिया भवन से निकलकर गलियों से होते हुए मुख्य सड़क पर गाड़ी तक आना भी कठिन था। एक ऑटो ड्राइवर के सहयोग से सभी सामान गाड़ी में रखा जा सका। 5 मित्रों का 15 दिनों की यात्रा का सामान भी खूब था। दो घण्टे चलने के बाद रास्ते में हमने प्रमोद जी द्वारा गुजरात से मँगाए गए फाफड़े का स्वाद लिया और एक स्थान पर रुककर चाय पिया।
शाम 3 बजे तक ऋषिकेश होते हुए, एक गाँव में पहाड़ी दीदी की चाय पीते हुए, बरकोट यात्री निवास GMVN पहुँच गए। वहाँ की व्यवस्था दयनीय थी। कमरे में न पँखे, न AC और तो और बिजली भी गायब थी। कोई किचन नहीं था। कमरे भी 3 मंजिल ऊपर, सामान चढ़ाना कठिन। 3 कमरों का पूर्ण भुगतान ऑनलाइन पहले ही किया जा चुका था। पहली बार तो हम लोगों की बुद्धि गोल हो गई, लगा की पहाड़ी यात्रा अभी से दुष्कर, रोमांचक होने वाली है। वहाँ के व्यवस्थापक से बात करने पर समस्या का हल निकला। एक किलोमीटर आगे बरकोट पार्किंग, बाजार के पास GMVN का दूसरा गेस्ट हाउस था। संजोग से वहाँ 3 कमरे खाली थे। हमारे कमरे वहाँ समायोजित कर दिया गया और हम लोगों की बड़ी समस्या टली।
अभी जहाँ रुके हैं, वहाँ भी ac तो नहीं है लेकिन और सभी सुविधाएं हैं। यहाँ का मौसम भी पँखे से काम चलने वाला है। AC की आवश्यकता नहीं है। शाम बाजार में घूमकर पहाड़ी सेव और खीरे का आनंद लिया। प्रमोद जी ने 1kg पहाड़ी लाल चावल खरीदा। हमने गूगल सर्च किया तो यह चावल बनारस में ऑनलाइन उपलब्ध दिखा। सोचा, वहीं ऑनलाइन मंगा लेंगे, यहाँ ढोकर क्यों ले जाया जाय। प्रमोद जी का कहना था 1kg ले जाकर स्वाद चखा जाय, बढ़िया होगा तो मंगाया जाएगा। बाजार से लौटकर कीचन में बढ़िया भोजन बनवाया और आराम किया। कल सुबह आसपास घूमते हुए शाम तक GMVN जानकी चट्टी पहुँचने का प्रोग्राम है। वहाँ भी दो रात के लिए कमरों की अग्रिम बुकिंग हो चुकी है। शुभ रात्रि।
26 सितंबर
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सुबह नहा धो कर हम 4 मित्र बारकोट से लाखा मंडल दर्शन के लिए निकले। अरविन्द ने अपने को अस्वस्थ बताया और नहीं गए। बारकोट से लाखा मंडल की दूरी 25km है। अन्तिम 5 km तो यमुना नदी के किनारे-किनारे गाड़ी चलती है। कहीं-कहीं मार्ग खराब था, लैंड स्लाइड हुईं थी और क्रेन / ट्रैक्टर मलबा उठा रहे थे।
लाखा मंडल में भगवान शिव का प्राचीन शिव मन्दिर है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहाँ लाखों शिवलिंग मिले थे, इसलिए इसका नाम लाखा मंडल हुआ। यह कथा भी प्रचलित है कि महाभारत में दुर्योधन ने पांडवों के लिए लक्षागृह यहीं बनवाया था। अंदर ग्रेफाइट का एक प्राचीन शिवलिंग है जो पानी डालने पर आइने की तरह चमकता है और इसमे अपना प्रतिबिम्ब दिखता है। हम गए तो वहाँ पुजारी ने लोटे में जल का प्रबंध कर रखा था। शिवलिंग पर जल चढ़ाने में बनारसियों को बहुत आनंद आता है। हमने भी जल चढ़ाया और आनंद लिया। एक वीडियो भी बनाया जिसे बाद में अपने यूट्यूब चैनल bechain atma में पोस्ट कर दिया। लिंक यह रहा....(https://youtube.com/shorts/COSS10SW8Pw?si=sNHgrPgybtWG_MND)
लाखा मंडल से वापस gmvn के कमरे में आकर समाचार पढ़ा तो मन खिन्न हो गया। पूरे उत्तराखण्ड में 26, 27 को भारी बारिश का रेड एलर्ट! स्कूल कॉलेज दो दिन के लिए बन्द। नाश्ता करते-करते बारिश शुरू हो गई। हम रास्ते के दृश्यों को देखते हुए जानकी चट्टी की यात्रा के लिए तैयार थे। वहाँ भी gmvn में अपने कमरे बुक थे। यहाँ से दूरी लगभग 50-60km थी। यहाँ से चेक आउट का समय हो चुका था। हमने किसी तरह से अपना सामान इनोवा के रैक में लदवाया, प्लास्टिक चढ़वाया और भीगते-भागते बैठ गए गाड़ी में। 30km चले होंगे कि आगे प्रशासन द्वारा गाड़ी रोक दी गई। भारी बारिश की संभावना के कारण यात्रा रोकी जा रही थी, गाड़ियों की लम्बी लाइन लगी थी।
अब हम फंस चुके थे। जानकी चट्टी में 2 दिन के लिए 3 रूम बुक थे, ऑनलाइन भुगतान किया जा चुका था। अभी हम मात्र 20km दूर थे। बरकोट वापस जाने, नया होटल लेने का मतलब खर्चा लम्बा होना। अब रूम कैंसिल करने पर पैसा वापस भी नहीं मिलता। क्या करें-क्या करें सोचते हुए 2 घण्टे बीत गए। तभी देखा, एक गाड़ी जा रही है! हमने प्रमोद को वहाँ तैनात सिपाही से बात करने के लिए भेजा। उसने लम्बा तर्क वितर्क किया।
वह गाड़ी कैसे गई?
स्थानीय लोग हैं, अपने घर नहीं जाएंगे? ये जमुनोत्री नहीं जा रहे हैं।
हमारा भी 2 दिन के gmvn जानकी चट्टी में रूम बुक है, मात्र 20km है। बारिश नहीं रुकी तो हम भी जमुनोत्रि नहीं जाएंगे।
हम क्या करें? ऊपर से आदेश है। हमको ऊपर से आदेश दिला दीजिये, जाइए।
प्रमोद ने ऊपर राहत दल को अपना परिचय देते हुए फोन लगाया। वहाँ भी लम्बे बहस के बाद इस शर्त पर जाने की अनुमति मिली की बारिश नहीं रुकी तो आप लोग जानकी चट्टी में ही रुके रहेंगे, जमुनोत्री नहीं जाएंगे।
हम लोग इस अनुमति से बहुत खुश थे। कई गाड़ियाँ खड़ी थीं और हम आगे जा रहे थे। आगे का रास्ता वाकई खराब था। तेज बारिश हो रही थी। जानकी चट्टी से पहले हनुमान चट्टी आया। हमने गाड़ी रोक कर हनुमान जी के दर्शन का मन बनाया। दो मित्र भीगते हुए, दो रेन कोट का जैकेट पहन कर दर्शन करने के लिए भागे। अरविन्द इस बार भी गाड़ी में बैठा रहा, "हमारा रेन कोट ऊपर सूटकेस में रखा है, आप लोग जाकर दर्शन कर लो।"
हाँ तो हनुमान चट्टी के हनुमान जी भी काफी ऊँचाई पर थे। चढ़ने के लिए ऊँची-ऊँची 50 सीढ़ियां थीं। पानी-पानी सीढ़ी चढ़ते हुए जब तक ऊपर पहुँचे बिना रेन कोट के चढ़े प्रमोद और आनंद दर्शन करके तेजी से नीचे उतर रहे थे। हम और शर्मा जी आराम-आराम से चढ़े और दिव्य दर्शन के बाद आराम-आराम से लौटे। वहाँ कोई दुर्लभ प्रतिमा स्थापित नहीं है। आम प्रतिमा है जो हमने खूब देखे हैं लेकिन स्थान का अपना महत्व होता है। भक्तों को हनुमान जी हर रूप में प्रिय हैं।
जानकी चट्टी से 1km पहले शनि मन्दिर भी है लेकिन खराब रास्ते की परेशानी से भक्त लोगों की हिम्मत जवाब दे चुकी थी, हाथ जोड़कर आगे बढ़े और जानकी चट्टी पहुँचकर ही रुके। पार्किंग से gmvn का गेस्ट हाउस मात्र 100 मीटर की चढ़ाई पर है लेकिन जोरदार बारिश ने उतने में ही बुद्धि हरी कर दी। बड़े बक्से पहाड़ी छोरा ले आया लेकिन छोटे सामान तो हमको ही लाने पड़े। सूटकेश पूरी तरह भीग चुका है और चेन कवर से पानी घुसकर जगह-जगह कपड़े भीग चुके हैं। घनघोर बारिश जारी है। गनीमत यह कि गेस्ट हाउस में बिजली पानी उपलब्ध है, मैनेजर कर्मियों का व्यवहार विनम्र है और रात का भोजन भी हमारी इच्छानुसार बढ़िया बनाया था। बारिश अभी भी हो रही है, खाना खा कर हम अपने कमरों में सो रहे हैं। कल सुबह भी ऐसी ही बारिश होती रही तो ट्रैकिंग करना संभव नहीं होगा, शुभ रात्रि।
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27 सितंबर
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आज का दिन काफी मनहूस रहा। भारी बारिश के कारण प्रशासन ने चार धाम यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया। लगातार इतनी बारिश हो रही थी कि प्रतिबंध न लगाता तो भी हमारी हिम्मत यमुनोत्री की कठिन चढ़ाई का नहीं था। हमने पूरा एक दिन ट्रैकिंग करने और थककर चूर होने के बाद पूर्ण विश्राम के लिए रखा था। यहाँ ट्रैकिंग तो नहीं हुई, पूर्ण विश्राम हो गया।
कोई कल शाम बारिश से भीगे कपड़े सुखवाने लगा, कोई तानकर सो गया। 48 घण्टे की मूसलाधार बारिश ने जानकी चट्टी का तापमान 2 डिग्री सेंटिग्रेट तक गिरा दिया था। हमने गर्म कपड़े रखे थे तो कोई परेशानी नहीं हुई। एक लाभ यह भी हुआ कि भारी बारिश और यात्रा पर प्रतिबंध के कारण पूरे गेस्ट हाउस में हमारा अलावा दो चार यात्री ही थे। अरविन्द बगल के 12 बेड वाले हॉल में सभी बेड पर अपने भीगे कपड़े फैला कर सुखा रहे थे। प्रमोद गेस्ट हाउस के मैनेजर से एक बड़ा हीटर मांग लाए थे, आनंद उसी पर अपने सूटकेश, कपड़े सुखा रहे थे। शर्मा जी गैसट्रिक से परेशान थे, रजाई के ऊपर कंबल लादकर सो रहे थे और हम अपने मोबाइल से तस्वीरें ब्लॉग पर, वीडियो यूट्यूब पर लोड करने, यात्रा वृतांन्त लिखने, मोबाइल साफ करने में भिड़े हुए थे। किसी के घर से फोन आता तो यही ताना सुनने को मिलता कि इतनी दूर सोने गए हैं! पूरा दिन बिता, रात आई लेकिन हमारे सोने तक बारिश नहीं रुकी।
28 सितंबर
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जैसे कल का दिन मनहूस था, वैसे आज का दिन यात्रा का अबतक का सबसे आनंद दायक था। सुबह 5 बजे खबर मिली, यात्रा पर प्रतिबंध हट गया है। कमरा खोल कर बाहर निकले तो बारिश रुक चुकी थी, आसमान साफ था। कमरों में प्रमोद का शोर गूंजने लगा...यात्रा प्रारम्भ हो चुकी है, जागो! उठो! तैयारी करो।
दो घण्टे में नहा धोकर, पूरे कपड़े(इनर, लोअर, फुल जैकेट, रेनकोट, टोपी) पहन कर, हाथों में लाठी लेकर जब 5km की ट्रैकिंग के लिए बाहर निकले तो घड़ी में सुबह के 7 बज रहे थे और सामने बारिश से धूलि-धूलि हिमालय की चोटियाँ दिख रही थीं । यह कल शाम को ही तय था कि हर हाल में 12 बजे तक यहाँ से आगे की यात्रा के लिए कूच कर जाना है, नहीं तो आगे का प्रोग्राम चौपट हो जाता। हर जगह gmvn का गेस्ट हॉउस बुक है। हमारे पास दिनभर ट्रैकिंग करने और विश्राम करने का समय नहीं था। एक दिन पहले ही पूर्ण विश्राम हो चुका था। बारी-बारी से सबने घोड़े बुलाए और चढ़कर माता यमुनोत्री के दर्शन के लिए चल दिए। प्रमोद और आनंद ने तो गेस्ट हाउस में ही घोड़े बुलवा लिए थे, हम और शर्मा जी 4 घण्टे में पैदल ही दर्शन का दम्भ भर रहे थे लेकिन 500 मीटर की ट्रैकिंग से यह समझ में आ गया कि यदि पैदल यात्रा किया तो लौटने में शाम हो जाएगी और थकने के बाद आगे की यात्रा नहीं हो पाएगी, 12 बजे तक अगली यात्रा के लिए प्रस्थान करना तो असम्भव है। हारकर हम भी घोड़े पर चढ़ गए। हमारे पीछे अरविन्द भी घोड़े पर चढ़े आते दिखाई दिए। 500 मीटर की ट्रैकिंग से फायदा यह हुआ कि जहाँ प्रमोद, आनंद और अरविन्द को घोड़े 2000/-में मिले, हमको 1500/- में ही मिल गए। घोड़े पर चढ़कर ज्यों-ज्यों हम ऊपर चढ़ते जाते, यह एहसास पक्का होता जाता कि 4 घण्टे में तो पैदल आना-जाना और दर्शन करना संभव नहीं था। भयंकर खड़ी चढ़ाई है। 5km, सपाट सड़क के 25km के बराबर है।
2 दिन से यात्रा प्रतिबंधित थी तो जब हम 9 बजे यमुनोत्री धाम पहुँचे तो मुश्किल से 8, 10 यात्री ही जुट पाए थे। दिव्य, आराम दायक दर्शन के बाद जब हम वापस आए तो घड़ी में 11 बज चुके थे।
नाश्ते के बाद हमने जल्दी-जल्दी सामान गाड़ी में रखवाना शुरू किया और चल दिए उत्तरकाशी की अगली यात्रा के लिए। आज उत्तरकाशी के भागीरथी gmvn गेस्ट हाउस में कमरे बुक थे। बरकोट तक की दूरी के 45km की यात्रा में 20km का मार्ग बहुत खराब है। जगह-पत्थर गिरे थे, किचड़ / मिट्टी में गाड़ी फिसल रही थी। जरा सा ड्राइवर चूकता तो हजारों फीट गहरे खाई में गिरकर हमारी यात्रा यहीं पूर्ण हो जाती। उस पर मजा यह की यात्रा खुलने के कारण सैकड़ों कारों, बसों के काफिले आते जा रहे थे। सिंगल, कीचड़ भरे रास्ते में गाड़ियों की इस भीड़ के कारण 20km जाने में 2 घण्टे लग गए। आगे उत्तरकाशी तक का 81km का मार्ग बढ़िया था। हम रुकते, नाश्ता करते, चाय पीते हुए शाम 6. 45 तक गेस्ट हॉउस पहुँच चुके थे।
सामान रखकर, हाथ-मुँह धोकर हम लोग पैदल ही श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर पहुँचे। गेस्ट हॉउस से मन्दिर मात्र 600मीटर की दूरी पर है। हम काशी के निवासी उत्तरकाशी में श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर, माँ शक्ति मन्दिर, प्राचीन खूब लम्बा त्रिशूल, शनिदेव, बजरंगबली,, गणेश जी और दूसरे देवताओं के भव्य मन्दिर के दर्शन से अभिभूत थे। दिव्य दर्शन के बाद पुल पर खड़े हो गोमुख से निकलने वाली, गंगोत्री से होकर आने वाली भागीरथी नदी के प्रवाह का आनंद लिया। इन सबके बाद जब हम गेस्ट हॉउस में पहुँचे शाम के 9 बज चुके थे। स्वादिष्ट भोजन के बाद खूब गहरी नींद आई। कल का दिन जितना मनहूस था, आज का दिन उतना ही आनंद दायक था। जीवन यात्रा में समय एक सा नहीं रहता, दुःख के बाद सुख भी आते हैं, हमे बस धैर्य के साथ संकट का सामना करना होता है।
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29 सितम्बर
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कल शाम के श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर के दर्शन ने ही मन यह भाव उत्पन्न कर दिया था कि प्रातः काल स्नान करके यहाँ आना है। उत्तरकाशी में अधिक ठण्ड भी नहीं थी। हम भोर में ही स्नान करके सुबह 6 बजने से पहले गलियों से होते हुए मन्दिर पहुँच गए। आज मन्दिर और खूबसूरत दिखा। शान्त वातावरण में दिव्य दर्शन हुए। मन्दिर से बाहर निकले तो पता चला बगल में हनुमान जी का भव्य मन्दिर है।
आज मंगलवार था। हम और शर्मा जी पहुँच गए हनुमान मन्दिर। उस समय मन्दिर में आरती चल रही थी। कुछ भक्त हाथ जोड़ पंक्तिबद्ध खड़े थे। हमने भी उनका अनुसरण किया। मन्दिर में प्रतिमा के पास खड़े हो पुजारी निरंतर जोर-जोर से हनुमान स्तुति का पाठ कर रहे थे। एक भक्त पीछे घण्टा बजा रहा था। एक पुजारी पंक्ति बद्ध खड़े भक्तों के हाथों में एक गेंदे का पुष्प थमा रहे थे और हमारे जैसे नए भक्तों को समझा भी रहे थे, 'आरती से पहले जाना नहीं।'
हम धैर्य के साथ पूर्ण भक्ति भाव से हाथ जोड़कर दूसरे भक्तों के साथ खड़े रहे और आरती के बाद पुजारी की तस्तरी में दक्षिणा के साथ पुष्प समर्पित कर दिए। पुजारी किसी से दक्षिणा की मांग नहीं कर रहे थे। सब भक्तों की श्रद्धा पर था था।
मन्दिर की एक परिक्रमा कर, बजरंग बली का दर्शन कर जब बाहर निकले तो बाहर तीर के साथ दीवार में लिखा मिला... संध्या गंगा आरती स्थल! मन मे विचार आया, आरती नहीं, गंगा जी के दर्शन ही कर लिए जांय। बनारस की गलियों की तरह उत्तर काशी की गलियाँ पार करते हुए पास ही स्थित गंगा घाट की सीढ़ियां उतर गए।
गंगा तट पर विशाल भव्य घाट बना था। सामने पहाड़ों के किनारे हर-हर बहती भागीरथी के दिव्य दर्शन हुए। घाट में एक शिला पर महादेव की पीतल की विशाल प्रतिमा स्थापित थी। हमने वीडियो बनाए, गंगा आचमन किया, अपने ऊपर जल छिड़का और घाटों का भ्रमण किया। गंगा की धार हरिद्वार से भी तेज थी। कोई स्नान नहीं करते नहीं दिखा। कुछ मॉर्निंग वाकर विशाल घाटों पर घूमकर, योगाभ्यास कर रहे थे। ऊँचे पहाड़ों पर धूप चमकने लगी थी। घाटों की सफाई देखते ही बनती थी। जगह जगह स्वक्षता के स्लोगन भी लिखे हुए थे। ऐसा प्रतीत हुआ कि यहाँ के नागरिक स्वक्षता का खूब ध्यान रखते हैं।
अपना दर्शन, पूजन, प्रातः भ्रमण, वीडियोग्राफी सब हो चुका था। शर्मा जी के साथ गलियों से होते हुए जब हम वापस लौटने लगे आनंद टोपले चंदन मंदन लगा कर आते दिखलाई दिए उनके पीछे अरविन्द भी थे। प्रमोद तो हनुमान मन्दिर में ही खड़े दिखे थे।
गेस्ट हॉउस में लौटकर, नाश्ते के बाद 8 बजे तक हमारी गंगोत्री यात्रा प्रारम्भ हो चुकी थी। रास्ते भर हमने पहाड़ी दृश्यों का खूब आनंद लिया। पूरे सर्पाकार पहाड़ी मार्ग में भागीरथी कभी दाएं, कभी बाएं बहती दिखीं। पहाड़ी झरने खूब दिखे। जब गंगोत्री पास आने लगा, पहाड़ों के ऊपर चांदी की तरह चमकती हिमालय की चोटियों के भव्य दर्शन ने मन मोह लिया। पूरा मार्ग प्राकृतिक ऊर्जा से इतना भरा हुआ था कि किसी में थकान नाम की चीज नहीं थी। दुर्गम पहाड़ी मार्ग तय करते हुए हम पहुँच चुके थे गंगोत्री धाम।
यहाँ कोई चढ़ाई नहीं थी, धाम में 400 मीटर की पैदल यात्रा के बाद हम मुख्य मन्दिर के सामने पंक्तिबद्ध खड़े हो चुके थे। अधिक भीड़ नहीं थी। भक्तों की संख्या हजारों में नहीं, सैकड़ों में ही थी। कुछ ही देर में हम गर्भ गृह में प्रवेश कर चुके थे। भीतर गंगोत्री माँ के साथ कई प्रतिमाएं स्थापित थीं।पुजारी ने कृपा किया, बढ़िया ढंग से प्रतिमा के बारे में ज्ञान दिया। हम धन्य हुए।
गर्भगृह से बाहर निकलकर हमने खूब फोटोग्राफी की। मित्र प्रसाद लेने के बाद प्लास्टिक के छोटे डिब्बे में गंगाजल भरने के लिए घाटों की सीढ़िया उतरने लगे, हम ऊपर किनारे खड़े हो वीडियो बनाते रहे। बाहर निकलकर गाड़ी में बैठने तक 3 बज चुके थे।
गंगोत्री से 25km आगे हर्षिल घाटी में हमारा होटल रॉयल krista में अपना कमरा आरक्षित था। शाम 5 बजे तक हर्षिल घाटी के बागोरी गाँव में जब हमने अपने गेस्ट हॉउस में प्रवेश किया मन आनंद से भर गया। कमरों के फर्श की टाइल्स, दीवारें, सिलाब सब लकड़ी की लग रही थीं। भीतर सब सुविधा के सामान थे।
सामान रखकर जब हम बाहर घूमने निकले बाहर का वातावरण अत्यधिक आनंद दायक था। ऐसा खूबसूरत गाँव हमने पहले कभी नहीं देखा। पहाड़ी पक्के पैदल मार्ग में बीच-बीच में पुलिया के नीचे बहती भागीरथी नदी की धार, ऊपर तीन दिशाओं में चांदी की तरह चमकती हिमालय की चोटियां और सामने सेव के वृक्षों की शाखों पर में लटक रहे रस भरे पके सेव मन को मोह रहे थे। एक दो सेव तोड़कर हमने खाया तो रस से भरे सेव इतने मीठे थे कि पूछिए मत, ऐसे सेव हमने पहले कभी नहीं खाए।
600-700 मीटर पैदल स्वर्ग में चलते हुए जब हम हर्षिल पोस्टऑफिस पहुँचे तो राजकपूर और उनकी प्रसिद्ध फिल्म फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली' की मन्दाकिनी सामने आ गई। 1985 में यहाँ इस फिल्म की सूटिंग हुई थी। आज भी यह पोस्ट ऑफिस चालू हालत में है। गाँव की पहाड़ी गलियों, पुराने लकड़ी के घरों, बौद्ध मंदिरों और सेव के बगानों का दर्शन करते हुए जब हम कमरों में पहुँचे तो शाम ढल चुकी थी, ठण्ड काफी बढ़ चुकी थी।
अपने रायल्स होटल के 2,3 कर्मचारियों ने हमारी इच्छानुसार भोजन तैयार किया हुआ था। भोजन घर की तरह सादा और स्वादिष्ट था। आज का पूरा दिन भी आनंद दायक रहा। गंगोत्री धाम का दर्शन और हर्षिल की घाटी में गाँवों का भ्रमण जीवन में कभी न भुलाने वाली यात्रा थी। सोने से पहले हमने और प्रमोद ने तय किया कि कल सुबह प्रातः भ्रमण इन्हीं वादियों में होगा।
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30 सितम्बर
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आज की मॉर्निंग वेरी वेरी वेरी गुड थी। प्रातः 6 बजे हम शर्माजी और प्रमोद के साथ भ्रमण के लिए निकल चुके थे। कड़ाके की ठंड थी। तापमान शून्य से 2 डिग्री के बीच होगा। हमने ऊनि लोअर, इनर के बाद हॉफ जैकेट, टोपी पहन रखा था। प्रमोद ने तो मफलर, टोपी, जैकेट के बाद रेन सूट भी पहन रखा था। शर्मा जी भी कई पर्त में कपड़े पहने चल रहे थे। उजाला हो चुका था। सेव बागान लटके सेवों को देखते हुए हम आगे बढ़ रहे थे। आसमान साफ था। तीन दिशाओं में हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं दिख रही थीं। एक चोटी पर जब सूर्य की सुनहरी किरणे पड़ी, हिमाच्छादित हिमालय सुनहरा हो गया। धीरे-धीरे धूप पड़ती गई, हिमालय की चोटियाँ चाँदनी से नहाती गईं। एक पुलिया के नीचे भागीरथी तेज धार में हर-हर, गोल-गोल, बड़े-बड़े पत्थरों से टकराती बह रही थीं और ऊपर हिमालय चम चम चमक रहा था। हर्षिल घाटी मे बगोरी गाँव की सड़कें पक्की थीं। घूमते-घूमते फिर हर्षिल पोस्टऑफिस तक पहुँचे जहाँ मन्दाकिनी पोस्टमास्टर से अपने प्रेमी की चिट्ठी मांग रही थी। पोस्ट ऑफिस में ताला जड़ा था। लगा कि अभी भी भागीरथी नदी में मन्दाकिनी नहाते हुए गा रही है... राम तेरी गंगा मैली हो गई, पापियों के पाप धोते-धोते...। राजकपूर ने अपनी फिल्म 'राम तेरी गंगा मैली हो गई ' की सूटिंग के लिए हर्षिल गाँव को चुना तो इस गाँव में कोई खास बात तो होगी। हमने एक घण्टे के प्रातः भ्रमण में पाया कि वाकई यह गाँव स्वर्ग से सुन्दर है। कुछ देसी, विदेसी जोड़े भी ट्रैकिंग सूट में, हाथों में फोल्डिंग छड़ी लिए चलते दिखाई दिए। पूछने पर उन्होने एक चोटी की ओर ऊँगली से इशारा किया, हम वहाँsss जा रहे हैं। उन्हें देख लगा, ये लोग जीना जानते हैं।
एक दो घण्टे की मॉर्निंग वॉक, फोटोग्राफी के बाद कमरे में लौटने से पहले हमने होटल के सामने लकड़ी से बने सैकड़ों वर्ष पहले बने पुराने घर में ताजे सेव खरीदने के लिए प्रवेश किया तो सुबह के 8 बज रहे थे। होटल के एक लोकल छोरे से पता चला था कि यहाँ ताजे सेव मिलते हैं। घर में 65 वर्षीय महिला, जो 50 से अधिक नहीं दिख रही थीं, अपनी युवा पुत्री के साथ सिलाई मशीन पर भेड़ के ऊन के धागे निकाल रही थीं। हमने और हमारे मित्रों ने यहाँ से खूब सेव खरीदे। यहाँ के हरे सेव इतने रसीले और मीठे थे कि बिना छिलका छीले, दांतों काटते चले जाओ, जितना भी खाओ मन नहीं भरता। महिला, जिन्होंने अपना नाम गुड्डी बताया ने अपना एक लम्बा साक्षात्कार दिया। उन्होने ग्रामीण जीवन के बारे में, 4 बच्चों के साथ अपने जीवन के लम्बे संघर्ष के बारे में, सेव की बागवानी और भेड़ के खाल से ऊन के धागे निकालने, मफलर, दस्ताने, टोपी, स्वेटर बनाने के बारे में खूब विस्तार से बताया। मैने उनका लम्बा साक्षात्कार रिकार्ड किया था लेकिन हाय! अच्छी आवाज के लिए जो माइक हमने लगाया था, वही फेल हो गया। वीडियो तो है लेकिन उसमे आवाज नहीं है। माइक कभी फेल नहीं हुआ था, कल शायद बैटरी खतम हो गई थी, एक दुर्लभ साक्षात्कार बिना आवाज के बरबाद हो गया। हमने लौटने से पहले ढोने की क्षमता भर सेव के अलावा दस्ताने और टोपी भी खरीदे।
नाश्ता करके श्रीनगर की अगली यात्रा के लिए गाड़ी में बैठे तो सुबह के 10 बज चुके थे। इस गाँव को छोड़ने का मन तो नहीं कर रहा था लेकिन अपने चार धाम की यात्रा की योजना के अनुसार आज 250km की लम्बी पहाड़ी यात्रा के बाद हमे श्रीनगर पहुँचना था। जम्मू में ही नहीं उत्तराखंड में भी श्रीनगर है। यहाँ पहुँचते-पहुँचते शाम के 9 बज चुके थे। हर्षिल की ठण्डी वादियों की तुलना में यहाँ का मौसम एकदम विपरीत था। यहाँ ठण्ड तो बिलकुल नहीं थी। ए.सी. नहीं लेकिन पंखा चलाने की आवश्यकता यहाँ महसूस हो रही थी। हमने हर शहर में GMVN के गेस्ट हॉउस पहले से बुक कर रखे थे। कमरे में सामान रखकर खाने और सोने के अलावा शरीर में कोई शक्ति नहीं बची थी। अगला धाम जय बाबा केदारनाथ था...
1 अक्टूबर
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श्रीनगर में अपनी आदत के अनुसार प्रातः 6 बजे कमरे से मॉर्निंग वॉक के लिए निकले। मेरे साथ शर्मा जी और प्रमोद थे। 5 मिनट घूमने के बाद एक चाय विक्रेता से पूछा, "इधर कोई मॉर्निंग वॉक के लिए पार्क है क्या? उसने सामने गली में इशारा किया, "उधर सीड़ी चढ़कर चले जाइए, ऊपर घूमिए और कोई पार्क नहीं है।" 30-35 सीड़ी चढ़ने के बाद एक नन्दी बाबा दिखे! गुस्से में फुफ़कार रहे थे और दहाड़ भी रहे थे। हमने सोचा, अभी लम्बी यात्रा करनी है, एकाध सींग लग गया तो यात्रा छोड़ अस्पताल की शरण लेना पड़ेगा। हम उल्टे पाँव वापस चल दिए।
शहर में गोला बाजार चौराहे का एक चक़्कर लगा कर अपने gmvn के गेस्ट हॉउस की तरफ चलने लगे। रास्ते में बड़ी-बड़ी बन्द दुकाने दिखीं। अभी सुबह के 7 भी नहीं बजे थे, इतनी जल्दी कैसे खुलती! पूर्व में सूर्यदेव निकल चुके थे, सड़क पर अपनी लम्बी परछाई देख कxर पता चल रहा था कि हम पश्चिम दिशा की ओर dzv uhल रहे हैं। 200 मीटwxi र चलने के बाद 5avv6सामaने गrणेश जी का सुन्दर मन्दिर दिखा। दर्शन के बाद हम घूमकर हमने gmvn लौट आए। इस प्रकार श्रीनगर में अपनी गणेश परिक्रमा पूर्ण हुई। स्नान ध्यान के बाद श्रीनगर से केदारनाथ जाते समय 18km दूर रास्ते में sgही धारा देवी केथा, 76fदर्शन का सौभाग्य मिला।
धारा देवी का भव्य मन्दिर पहाड़ों के बीच गहरे झील में है। मुख्य द्वार सड़क पर ही है लेकिन द्वार से प्रवेश करने के बाद ढलुए रास्ते पर कई फिट नीचे उतरने के बाद मन्दिर का भव्य द्वार दिखता है। मन्दिर के संकरे रास्ते में दोनो तरफ अपने बनारस के विश्वनाथ गली की तरह दुकाने सज्ज थीं। हनुमान जी, गणेश जी, भैरोनाथ के छोटे छोटे मन्दिर, प्रतिमाएं दिखीं। रास्ते भर वीडियो बनाते हुए हमने भव्य मन्दिर में प्रवेश किया। मन्दिर में फोटोग्राफी या वीडियो बनाने पर कठोर प्रतिबंध था। साफ लिखा था, मोबाइल जब्त कर लिया जाएगा। चेतावनी पढ़कर मोबाइल बन्द कर जेब में रखने में ही भलाई लगी। भीतर मध्य झील के बीच धारा देवी की विशाल प्रतिमा का भव्य दर्शन हुआ। झांकी दर्शन की ही अनुमति थी। व्यवस्था इतनी बढ़िया थी कि हजारों के भीड़ में भी धारा देवी की परिक्रमा करते हुए सहज ही दिव्य दर्शन हो रहे थे। दर्शन के अब जितना नीचे उतरे थे, उतना ऊपर चढ़ना था। धीरे-धीरे सांसों पर नियंत्रण करते हुए चढ़ाई चढ़कर बाहर सड़क के किनारे पार्किंग में खड़े अपने गाड़ी की सीट पर बैठने के बाद लगा कि घर आ गए। कुछ दिनों से गाड़ी ही घर बन चुकी थी। सुबह से शाम तक गाड़ी में बैठना, रात को gmvn के कमरों की शरण लेना, आदत बन चुका था।
केदारनाथ पहुँचने के लिए हमे सोन प्रयाग, गौरीकुण्ड नहीं जाना था। सोन प्रयाग से 18-20 km पहले ही रास्ते में सड़क के किनारे अपना होटल होटल वासुकी में तीन बेड वाले दो कमरे बुक थे। शाम 7 बजे तक हम अपने बिस्तर में आराम कर रहे थे और कल सुबह 3 बजे उठने की योजना बना रहे थे।
2 अक्टूबर
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गाँधी जयंती के दिन जामू गाँव स्थित हैलिपैड के कार्यालय में भोर में 5 बजे रिपोर्टिंग करनी थी। हेलीकाप्टर उड़ान के लिए अपनी बुकिंग सुबह के पहले स्लाट 6-9 बजे में थी। बाबा केदारनाथ दर्शन के लिए सभी 5 सदस्य उत्साह, उमंग से भरे हुए थे। भोर में 3 बजे सबके मोबाइल का एलार्म घनघनाने लगा। भोर में 3 बजे उठना, तैयार होकर 4-4.30 तक साइकिल लेकर घर से निकल जाना तो अपनी रोज की दिनचर्या थी, हमको कोई परेशानी नहीं हुईं। हम सभी होटल से 4km दूर के हेलीपैड कार्यालय में 4.30 तक पहुँच चुके थे। 5 बजे की रिपोर्टिंग के लिए पहुँचने वाले पहले 5 व्यक्ति हम ही थे। सबके प्रयासों में प्रमोद का प्रयास सफल रहा था और उसकी कृपा से ही हम सभी हेलीकाप्टर में उड़ने जा रहे थे। एक दिन पहले धारा देवी के दर्शन के बाद रास्ते में चलते-चलते जब हमे अपनी बुकिंग कन्फर्म होने की सूचना मिली थी हमने जमकर हरहरमहादेव का नारा लगाया था।
बाबा केदारनाथ का दर्शन वाकई बहुत कठिन है। 22 km की पैदल कठिन चढ़ाई या घोड़े की चढ़ाई दोनो जान जोखिम में डालने जैसा है। रास्ते गड्डों वाले, फिसलन भरे, इतने खराब हैं कि हजारों की भीड़ में कब आदमी का या घोड़े का पैर फिसल जाय कोई ठीक नहीं। ऐसे में सबसे आरामदायक यात्रा है हेलीकाप्टर की यात्रा। हम सभी सेवानिवृत्त 63-64 वर्षों वाले साथी हेलीकाप्टर टिकट पाकर बहुत खुश थे।
हेलीपैड की उड़ान खिड़की पर हम सुबह 5 बजने से 15 मिनट पहले पहुँच चुके थे लेकिन यहाँ खिड़की पर ताले बन्द थे, कोई नहीं आया था। हमारे बाद धीरे-धीरे और भाग्यशाली यात्री जमा होने लगे, खिड़की नहीं खुली। 5.30 के बाद लोग बड़बड़ाने लगे, जब खुद 6 बजे आना था तो हमे 5 बजे क्यों बुलाया? खैर लम्बी प्रतीक्षा के बाद 6 बजते-बजते काउंटर खुला।
रिपोर्टिंग के बाद वजन के हिसाब से 6-6 यात्रियों को बुलाया जा रहा था। जिसका वजन 80kg से ऊपर था और जिसके बैग का वजन 2kg से ऊपर था, प्रति kg 150/-अतिरिक्त लिया जा रहा था। अरविन्द को 300/- अतिरिक्त जमा करना पड़ा और सभी का वजन सीमा में ही था। प्रमोद और आनंद तो 62kg से कम थे। सामान भी हमने रेनकोट और दवा के अतिरिक्त कुछ रखा ही नहीं था। पहली उड़ान में आनंद टोपले का नाम बुलाया गया, दूसरी उड़ान में मेरा, प्रमोद का और आशुतोष का नाम बुलाया गया और तीसरी उड़ान में अरविन्द का नाम बुलाया गया। सबसे पहले आनंद उड़े और हम उनको चिड़ियों की तरह, हेलीकाप्टर में उड़कर जाते देखते रहे। जब हमारी बारी आई, हम 3 मित्रों के अलावा 3 और यात्री थे। दो हल्के यात्रियों को पायलट के बगल में बिठाया गया और 4 भारी यात्रियों को पीछे वाली सीट में बिठाया गया। थोड़ा बहुत जो भय था, हेलीकाप्टर उड़ने के बाद खतम हो चुका था। पहाड़ों के बीच हम आराम-आराम से उड़ रहे थे। मात्र 7-8 मिनट में हम सैकड़ों फिट ऊपर, बाबा केदारनाथ से लगभग 500 मीटर दूर हेलीपैड पर उतर चुके थे। प्रमोद के ही जुगाड़ से हमे प्रोटोकॉल दर्शन की सुविधा प्राप्त थी। प्रोटोकॉल दफ्तर से दर्शन पर्ची प्राप्त करने में एक घण्टा से ज्यादा लग गया। पर्ची लेकर, एक विक्रेता के काउंटर से पूजन सामग्री खरीदकर, उसी के पास अपना एअरबैग रखकर, जूता उतारकर हमने VIP दर्शन में जब अपनी पर्ची दिखाकर प्रवेश किया, सुबह के 8 बज रहे थे। लाइन में खड़े होने के थोड़ी ही देर बाद यह एहसास हो गया कि भारत में हम ही नहीं, हजारों VIP हैं! लगभग 11 बजे तक चूहा दौड़ वाली लाइन में इधर से उधर, उधर से इधर पंक्ति बद्ध खड़े ही थे। हमारा सौभाग्य था कि आसमान साफ था, चटक धूप खिली हुई थी, ठण्ड से कोई परेशानी नहीं थी।
भीड़ में धक्के खाते हुए जब हम मित्रों के साथ मन्दिर के मुख्य द्वार से भीतर धकियाए गए, भीतर भी नन्दी के पास चपाचप भीड़ थी। दीवारों में महाभारत के पात्रों की मूर्तियां गड़ी थीं और गजब की नक्कासी थी। गर्भ गृह में प्रवेश के तो बाबा केदारनाथ के दिव्य स्पर्श दर्शन हुए। बाहर से खरीदे गए पूजन सामग्री से घी, चंदन लगाया गया। पंडित जी के सहयोग से जल चढ़ाया गया। प्रत्येक भक्त बड़े मन से बाबा केदारनाथ की सेवा में लगे थे। बाहर की भीड़ और चपाचपी का एक कारण यह भी था।
मन्दिर से बाहर निकलकर हमने खूब फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी की, जिनके मोबाइल नेटवर्क तेज थे, उन्होने अपने घर, परिवार से वीडियोग्राफी से बाहर के दर्शन कराए, बात की। प्रसाद विक्रेता से अपने बैग, जूते लेकर जब हम लौटने के लिए हेलीकाप्टर पकड़ने हेलीपैड पहुँचे, दिन के 1 बज चुके थे और हमारी रिपोर्टिंग टाइम 9.30 थी। दर्शन में विलम्ब की स्वीकार करते हुए राजस एयरलाइन्स वालों ने हमारा नाम दर्ज किया और 2 घण्टे प्रतीक्षा करने को कहा। हम नाश्ता करके, हेलीपैड के सामने कुर्सी में बैठ गए।
2 घण्टे बीत गए हमारी बारी तो नहीं आई लेकिन संकट के बादल छाने लगे! मौसम एकदम से खराब होने लगा। हेलीपैड धुंध से भर गया। हेलीकाप्टर सेवा स्थगित हो गई। काउंटर पर पूछने पर पता चला, 'बस अगला नम्बर आपका ही है, एक भी फ्लाइट हुई तो आप जाएंगे।' हम हिम्मत जुटा कर प्रतीक्षा करने लगे। कुछ देर बाद ठण्डी हवा चलेने लगी, काउंटर से घोषणा होने लगा, जिसे दूसरे साधन से जना हो टिकट कैन्सिल करा कर जाय, टिकट कैंसिल कराने की सुविधा उपलब्ध है। यात्रा स्थगित कर दी गई है।" यात्रियों के धैर्य का बांध टूटने लगा। कोई टिकट कैंसिल करा कर घोड़े / पैदल से जाने लगा, कोई रात रुकने के लिए होटल में कमरे तलाशने लगा। हमको लौटना था, इसलिए हमने होटल पहले से बुक नहीं कराया था। अब ऐसी मारामारी में होटल मिलना कठिन था। प्रमोद और आनंद को होटल देखने भेजा गया तो ये लोग होटल देखने गए ही नहीं घोड़े वाले को लेकर आ गए। ये लोग रुकने से घबराए हुए और अधिक जल्दी मे थे। मैने रुकने की सलाह दी, "आज रात रुकिए कल सुबह पहली फ्लाइट से उतर जाएंगे। हम लोगों का पहला नम्बर है।" लेकिन मित्र अधिक घबराए हुए थे, "कल भी मौसम का क्या ठिकाना?" जैसे प्रश्न करके टिकट कैंसिल कराने लगे। ठण्ड से मेरी तबियत भी घबरा रही थी, अकेले रुकने मे भय लग रहा था। हमसे यहीं भारी चूक हो गई, मित्रों के कहने पर अंत मे हमने भी टिकट निरस्त करा दिया।
टिकट निरस्त कराकर जैसे ही दस कदम आगे बढ़े होंगे कि मौसम एकदम से साफ होने लगा। पलटकर काउंटर पर कहने गए, "जो टिकट कैंसिल कराए हैं, उसे फिर से चालू कर दीजिए!" काउंटर वाले ने स्पष्ट कह दिया, अब हम कुछ नहीं कर सकते, आप का टिकट कैंसिल हो चुका है, पैसा आपके खाते मे चला गया होगा या 2 दिन मे चला जाएगा। देखिए, मैसेज आ गया होगा।" हमने देखा, रिफंड का मैसेज आ चुका था। हम समझ चुके थे कि प्रमोद की जल्दीबाज़ी के कारण हम सभी ने अपने पैर मे कुल्हाड़ी मार दी है। 15 मिनट भी और रुके होते तो मौसम होते देख लेते और टिकट निरस्त न कराते। होटल मे कमरा देखने गए होते तो भी 15 मिनट बीत जाता। अब कुछ नहीं किया जा सकता था। दिनभर की खुशी कपूर की तरह उड़ चुकी थी। अब सामने 22km का दुर्गम रास्ता था। रास्ते इतने खराब थे कि घोड़े से जाना भी खतरा मोल लेना था। रोज घोड़ा फिसलने और लोगों के घायल होने की खबरें आ रही थी। प्रमोद और आनंद तो घोड़े पर जाने के लिए शुरू से तैयार थे, आशुतोष, अरविन्द और हमने तय किया कि हम धीरे-धीरे पूरी रात चलेंगे लेकिन पैदल ही जाएंगे।
वे घोड़े से चले गए, हम तीन पैदल उतरने लगे। रास्ते मे एक लाठी भी खरीद लिए। उतरने के लिए लाठी बहुत जरूरी था बिना उसके, फिसलन भरे दुरूह मार्ग पर ढाल उतरना संभव नहीं था। हर कदम लगता था कि अब गिरे तब गिरे। सबसे अधिक परेशानी घोड़ों से थी। कब कौन घोड़ा वाला धक्का मारते, गिराते चला जाय, कोई ठिकाना न था। आगे बढ़ने से पहले पीछे पलटकर देखते थे कि घोड़े का कोई काफिला तो नहीं उतर रहा! घोड़े लगातार दर्जनों की संख्या मे उतरते दिखलाई देते। ऊपर आकाश मे जब हेलीकाप्टर उड़ते दिखते तो हम प्रमोद को उसकी जल्दीबाज़ी के लिए कोसते। हेलीकाप्टर का टिकट, प्रोटोकॉल दर्शन सब उसी के प्रयासों से संभव हुआ था। सुबह से पूरे दिन केदारनाथ के बाद हम प्रमोद की ही जयजयकार कर रहे थे। दिनभर जो हमारा हीरो था, वही शाम होते ही अपने गलत निर्णय के कारण विलेन हो गया। अब हम हर कदम उसे कोसते हुए उतर रहे थे।
उतरते-उतरते अपनी क्षमतानुसार हम तीन मित्र भी अलग-अलग बट गए। आशुतोष सबसे तेज चल रहा था और बार-बार हमारे कारण रुककर प्रतीक्षा करना उसे खल रहा था। अरविन्द सबसे पीछे बहुत धीरे चल रहा था। हम बीच मे थे। थककर जहाँ बैठते आशुतोष को फोन कर रुकने को कहते और अरविन्द का हाल लेते हुए उसकी प्रतीक्षा करते। 7km तो सब लगभग साथ चले फिर बिखर गए। आशुतोष 2km आगे हो गया, अरविन्द 2 km पीछे हो गया और हम बीच मे रह गए। रामबाड़ा पहुँच कर हमने गूगल सर्च किया तो गौरीकुण्ड अभी 6km दूर था। शाम 5 बजे से चल रहे थे और रात के 11 बज चुके थे। रास्ते के कीचड़ और बहते पानी से जूता मोजा भींग चुका था। आशुतोष का फोन भी नहीं उठ रहा था। जिस्म थककर चूर हो चुका था। हमने सोचा, "घोड़े बराबर मिल रहे हैं, अब घोड़ा कर लें।" अरविन्द से पूछा तो उसने कहा, "तुम घोड़ा कर लो, रात भर चलना पड़े, हम पैदल ही आएंगे।" मेरे पास नकद पैसे भी नहीं थे। 3 घोड़े वालों से पूछने के बाद एक ऑनलाइन पेमेंट लेने को तैयार हुआ और हमको घोड़े पर चढ़ा दिया। घोड़े वाले से हमारी शर्त थी कि तुम मेरे घोड़े को छोड़कर नहीं जाओगे, मेरे साथ-साथ चलोगे। खैर घोड़े वाला अच्छा था, हमको आराम-आराम से 6km गौरीकुण्ड तक पहुँचा दिया। रास्ते में एक दुकान पर रुककर उसने मैगी रोटी खाई। रात के 12 बज चुके थे, हमने भी भूख लग रही थी। घोड़े वाले ने भी कहा, खा लीजिए, बहुत रात हो चुकी, गौरीकुण्ड में भी अब कुछ नहीं मिलेगा। हमने भी नजाकत भाँपते हुए मैगी के साथ 2 रोटी खा ली। 2 रोटी, मैगी और एक लीटर पानी का दुकानदार ने 200 रुपिया लिया।
गौरीकुण्ड से 1km पहले भुसखलन वाला खतरनाक रास्ता भी आया, जहाँ कुछ पत्थर भी गिरे दिखे। भगवान का नाम लेकर हमने जल्दी-जल्दी उस रास्ते को पार किया। गौरीकुण्ड पहुँचकर जब हम घोड़े से उतरे आशुतोष का फोन आ रहा था, पूछ रहा था, "हम गौरीकुण्ड पहुँच गए, तुम कहाँ हो?" जब हमने बताया कि हम भी गौरीकुण्ड पहुँच चुके हैं, उसे आश्चर्य हुआ। 100 मीटर पैदल चलने के बाद शर्मा जी मिल गए। मिलते ही उसने पूछा, "गौरीकुण्ड से 1km पहले एक स्थान पर भुसखलन हुआ था, पत्थर गिरने से एक घोड़ा गिरकर मरा पड़ा था, तुमने देखा?" हमको पत्थर तो दिखे थे, घोड़ा नहीं दिखा था। अच्छा ही हुआ, नहीं दिखा। दिखा होता तो हम भी आशुतोष की तरह डर जाते।
गौरीकुण्ड से 50/-शेयर में सोनप्रयाग के लिए टैक्सी मिलती है। रात 1 बजे के आसपास भी हमको टैक्सी मिल गई। अब हमारे सामने दो विकल्प थे। हम वहीं किसी होटल मे
एक कमरा लेकर सो जांय या टैक्सी रिजर्व करके 30km अपने होटल फाटा चले जांय। सुबह भी उठकर मित्रों के पास फाटा जाना ही पड़ता, हमको उसी समय टैक्सी रिजर्व करके अपने होटल जाना उचित लगा। खूब मौलभाव करने के बाद एक टैक्सी वाला 2000/- में ले जाने को राजी हुआ। जब हम अपने होटल वासुकी के बिस्तर में पहुँचे भोर के 3 बज रहे थे। प्रमोद और आनंद सो रहे थे, अरविन्द का पता नहीं था।
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3 अक्टूबर
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सुबह की नींद एक वाक्य से खुली, "अरविन्द आ गया!" यह खुशी की बात थी कि अरविन्द भी सकुशल आ गया था। हाँ, धीरे-धीरे रात भर पैदल चलने के कारण उसके एक पैर के अंगूठे का नाख़ून थोड़ा निकल गया था, ब्लीडिंग हो रही थी, बैण्डेज बांध कर बोल रहा था, 'हम ठीक हैं।'
हेलीकाप्टर कांड ने सबको बुरी तरह थका दिया था। हम लोगों की योजना केदारनाथ से लौटने के बाद फाटा से 60-70km दूर रात 'चोपता' जाकर रुकने और सुबह 'तुंगनाथ' की 4km ट्रैकिंग करने की थी। रात भर पैदल चलने के बाद किसी की हिम्मत तुंगनाथ जाने की नहीं थी। घोड़े से आने वाले भी पस्त थे।
दिन में 11 बजे तक़ तैयार होकर हमने होटल वासुकी छोड़ दिया। आज रात हमारी बुकिंग बद्रीनाथ से पहले पीपल कोटि में थी। फाटा से कुछ ही दूर गुप्त काशी में एक और शिव मन्दिर था। हम काशी वासी 'उत्तरकाशी' घूम चुके थे, 'गुप्त काशी' कैसे छोड़ते! सड़क पर ही बाएं गाड़ी लगाकर ड्राइवर 'केशर सिंह' ने कहा, "गुप्त काशी आ गया, वो दाहिने मन्दिर की सीढ़ियाँ हैं।"
अरविन्द अपने पैर की थकान के कारण नहीं आया बाकि हम 4 सड़क पार कर सीढ़ियां चढ़ने लगे। 40-50 सीढ़ियां चढ़ने के बाद मन्दिर आ गया। द्वार पर ही लिखा था -'श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर, गुप्तकाशी।' द्वार से भीतर प्रवेश करते ही सामने एक छोटा सरोवर दिखा जिसमें दो पाइप के माध्यम से लगातार पहाड़ी झरने का शुद्ध पानी गिर रहा था। पानी का निकास तो नहीं दिखा, लेकिन होगा जरूर। कुण्ड के बारे में पता करने पर चकित करने वाली जानकारी मिली।
कुण्ड का नाम है, 'मणिकर्णिका कुंड' है । कुण्ड में 2 धाराएँ गिरती हैं, एक गोमुख से - गाय के मुँह के आकार की टोंटी से, इसे 'गंगा / भागीरथी' माना जाता है दूसरी हाथी की सूँड से- हाथी के मुँह की टोंटी से, इसे 'यमुना' माना जाता है।
दोनों पहाड़ से आने वाले प्राकृतिक झरने हैं, कुंड के अंदर एक शिवलिंग है जो इन्हीं दो धाराओं से लगातार अभिषेक होता रहता है। कहते हैं दोनों का स्वाद भी अलग-अलग है।
मान्यता है कि गंगा-यमुना का संगम यहीं प्रतीक रूप में है, और यहाँ स्नान करके केदारनाथ जाना चाहिए।
इस जानकारी के बाद मन आनंद से भर गया। बाई तरफ मन्दिर गर्भ गृह में प्रवेश के लिए लाइन लगी थी। हम लाइन में खड़े-खड़े जानकारियाँ जुटा रहे थे। जब तक़ लाइन में खड़े थे, वीडियो बनाते रहे, गर्भ गृह में फोटो की मनाही थी, मोबाइल जेब में रखकर गर्भगृह में प्रवेश किए। ध्वनि यँत्र से घोषणा हो रही थी... 'दर्शन का समय समाप्त हो रहा है, मन्दिर बन्द होने वाला है, भक्त शीघ्रता करें।' यह सुनकर थोड़ी धक्का मुक्की शुरू हो गई। भीड़ में जब धक्का मुक्की हो तो संघर्ष करने के बजाय खुद को भीड़ के सुपुर्द कर देना चाहिए। भीड़ अपने आप आपको धकेलते हुए ले जाएगी। यही हुआ, हम आराम से मन्दिर में प्रवेश कर गए।
मन्दिर में केदारनाथ जी का ही छोटा रूप विराजमान था! हम अभी कल ही केदारनाथ दर्शन करके लौटे थे। केदारनाथ में तो भयंकर भीड़ थी, उसकी तुलना में यहाँ कुछ भी नहीं, शान्ति थी। छोटे केदारनाथ (श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर) का दर्शन करके हम बाहर लौटे तो सामने अर्धनारिश्वर का मन्दिर और बगल में भैरोनाथ भी विराजमान थे। दर्शन के बाद सीढ़ियां उतरने में हमारे भी घुटनो में दर्द हो रहा था। कल की थकान अभी दूर नहीं हुई थी।
आगे मार्ग में गाड़ी रोककर ऊपर पुल से कर्ण प्रयाग का दर्शन हुआ। कर्ण प्रयाग अलकनंदा और पिंडर नदियों का संगम तट है। वीडियो बनाते हुए पैदल ही पुर पार किया और वापसी में एक दुकान से अपने लिए पूरे बांह का स्वेटर खरीद लिया।
पीपल कोटि पहुँचने में शाम हो गई। वहाँ gmvn के डार्मेटरी में हमने 6 बेड ले रखा था। (पहले 6 मित्र आने वाले थे, एक नहीं आए ) हम इतने थके हुए थे कि रात्रि डिनर के बाद कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।
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